भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


समस्तपितृभीतिघ्नः—सम्पूर्ण पितरोंके भयका निवारण करनेवाले, ३९९ समस्तपितृजीवनम्—समस्त पितरोंके जीवनाधार ॥ १८३॥
हव्यकव्यैकभुग्धव्यकव्यैकफलदायकः ।
रोमान्तर्लीनजलधिः क्षोभिताशेषसागरः ॥ १८४ ॥
४०० हव्यकव्यैकभुक्—हव्य और कव्य (यज्ञ और श्राद्ध) के एकमात्र भोक्ता, ४०१ हव्यकव्यैकफलदायकः—यज्ञ और श्राद्धके एकमात्र फलदाता, ४०२ रोमान्तर्लीनजलधिः—अपने रोम-कूपोंमें समुद्रको लीन कर लेनेवाले महावराह, ४०३ क्षोभिताशेषसागरः—वराहरूपसे पृथ्वीकी खोज करते समय समस्त समुद्रको क्षुब्ध कर डालनेवाले ॥ १८४ ॥
महावराहो यज्ञघ्नध्वंसको याज्ञिकाश्रयः ।
श्रीनृसिंहो दिव्यसिंहः सर्वानिष्टार्थदुःखहा ॥ १८५ ॥
४०४ महावराहः—महान् वराहरूपधारी भगवान्, ४०५ यज्ञघ्नध्वंसकः—यज्ञमें विघ्न डालने-वाले असुरोंके विनाशक, ४०६ याज्ञिकाश्रयः— यज्ञ करनेवाले ऋत्विजोंके परम आश्रय, ४०७ श्रीनृसिंहः—अपने भक्त प्रह्लादकी बात सत्य करनेके लिये नृसिंह रूप धारण करनेवाले भगवान्, ४०८ दिव्यसिंहः—अलौकिक सिंहकी आकृति धारण करनेवाले, ४०९ सर्वानिष्टार्थदुःखहा—सब प्रकारकी अनिष्ट वस्तुओं और दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १८५ ॥
एकवीरोऽद्भुतबलो यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः ।
ब्रह्मादिदुःसहज्योतिर्युगान्ताग्न्यतिभीषणः ॥ १८६ ॥
४१० एकवीरः—अद्वितीय वीर, ४११ अद्भुतबलः—अद्भुत शक्तिशाली, ४१२ यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः—शत्रुके यन्त्र-मन्त्रोंको एकमात्र भंग करनेवाले, ४१३ ब्रह्मादिदुःसहज्योतिः—जिनके श्रीविग्रहकी ज्योति ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुःसह है, ऐसे नृसिंह भगवान्, ४१४ युगान्ताग्न्यतिभीषणः—प्रलयकालीन अग्निके समान अत्यन्त भयङ्कर ॥ १८६ ॥
कोटिवज्राधिकनखो जगद्दुष्प्रेक्ष्यमूर्तिधृक् ।
मातृचक्रप्रमथनो महामातृगणेश्वरः ॥ १८७ ॥
४१५ कोटिवज्राधिकनखः—करोड़ों वज्रोंसे भी अधिक तीक्ष्ण नखोंवाले, ४१६ जगद्दुष्प्रेक्ष्यमूर्तिधृक्—सम्पूर्ण जगत् जिसकी ओर कठिनतासे देख सके, ऐसी भयानक मूर्ति धारण करनेवाले, ४१७ मातृचक्रप्रमथनः—डाकिनी, शाकिनी, पूतना आदि मातृ-मण्डलको मथ डालनेवाले, ४१८ महामातृगणेश्वरः—अपनी शक्तिभूत दिव्य महामातृगणोंके अधीश्वर ॥ १८७ ॥
अचिन्त्यामोघवीर्याढ्यः समस्तासुरघस्मरः ।
हिरण्यकशिपुच्छेदी कालः संकर्षणीपतिः ॥ १८८ ॥
४१९ अचिन्त्यामोघवीर्याढ्यः—कभी व्यर्थ न जानेवाले अचिन्त्य पराक्रमसे सम्पन्न, ४२० समस्तासुरघस्मरः—समस्त असुरोंको ग्रास बनानेवाले, ४२१ हिरण्यकशिपुच्छेदी—हिरण्यकशिपु नामक दैत्यको विदीर्ण करनेवाले, ४२२ कालः—असुरोंके लिये कालरूप, ४२३ संकर्षणीपतिः—संहारकारिणी शक्तिके स्वामी ॥ १८८ ॥
कृतान्तवाहनः सद्यःसमस्तभयनाशनः ।
सर्वविघ्नान्तकः सर्वसिद्धिदः सर्वपूरकः ॥ १८९ ॥
४२४ कृतान्तवाहनः—कालको अपना वाहन बनानेवाले, ४२५ सद्यःसमस्तभयनाशनः—शरणमें आये हुए भक्तोंके समस्त भयोंका तत्काल नाश करनेवाले, ४२६ सर्वविघ्नान्तकः—सम्पूर्ण विघ्नोंका अन्त करनेवाले, ४२७ सर्वसिद्धिदः—सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले, ४२८ सर्वपूरकः—सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले ॥ १८९ ॥
समस्तपातकध्वंसी सिद्धिमन्त्राधिकाह्वयः ।
भैरवेशो हरार्तिघ्नः कालकोटिदुरासदः ॥ १९० ॥
४२९ समस्तपातकध्वंसी—सब पातकोंका नाश करनेवाले, ४३० सिद्धिमन्त्राधिकाह्वयः—नाममें ही सिद्धि और मन्त्रोंसे अधिक शक्ति रखनेवाले, ४३१ भैरवेशः—भैरवगणोंके स्वामी, ४३२ हरार्तिघ्नः—भगवान् शङ्करकी पीड़ाका नाश करनेवाले, ४३३ कालकोटिदुरासदः—करोड़ों कालोंके लिये भी दुर्धर्ष ॥ १९० ॥