पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०७ ********************************************************************************
दैत्यगर्भस्राविनामा स्फुटद्ब्रह्माण्डगर्जितः ।
स्मृतमात्राखिलत्राताऽद्भुतरूपो महाहरिः ॥ १९१ ॥
४३४ दैत्यगर्भस्राविनामा—जिनका नाम सुनकर ही दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर जाते हैं—ऐसे भगवान् नृसिंह, ४३५ स्फुटद्ब्रह्माण्डगर्जितः—जिनके गर्जनपर सारा ब्रह्माण्ड फटने लगता है, ४३६ स्मृतमात्राखिलत्राता—स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाले, ४३७ अद्भुतरूपः—आश्चर्यजनक रूप धारण करनेवाले, ४३८ महाहरिः—महान् सिंहकी आकृति धारण करनेवाले ॥ १९१ ॥
ब्रह्मचर्यशिरःपिण्डी दिक्पालोऽर्धाङ्गभूषणः ।
द्वादशार्कशिरोदामा रुद्रशीर्षैकनूपुरः ॥ १९२ ॥
४३९ ब्रह्मचर्यशिरःपिण्डी—अपने शिरोभागमें ब्रह्मचर्यको धारण करनेवाले, ४४० दिक्पालः—समस्त दिशाओंका पालन करनेवाले, ४४१ अर्धाङ्गभूषणः—आधे अङ्गमें आभूषण धारण करनेवाले नृसिंह, ४४२ द्वादशार्कशिरोदामा—मस्तकमें बारह सूर्योंके समान तेज धारण करनेवाले, ४४३ रुद्रशीर्षैकनूपुरः—जिनके चरणोंमें प्रणाम करते समय रुद्रका मस्तक एक नूपुरकी भाँति शोभा धारण करता है, वे भगवान् ॥ १९२ ॥
योगिनीग्रस्तगिरिजात्राता भैरवतर्जकः ।
वीरचक्रेश्वरोऽत्युग्रो यमारिः कालसंवरः ॥ १९३ ॥
४४४ योगिनीग्रस्तगिरिजात्राता—योगिनियोंके चंगुलमें फँसी हुई पार्वतीकी रक्षा करनेवाले, ४४५ भैरवतर्जकः—भैरवगणोंको डाँट बतानेवाले, ४४६ वीरचक्रेश्वरः—वीरमण्डलके ईश्वर, ४४७ अत्युग्रः—अत्यन्त भयंकर, ४४८ यमारिः—यमराजके शत्रु, ४४९ कालसंवरः—कालको आच्छादित करनेवाले ॥ १९३ ॥
क्रोधेश्वरो रुद्रचण्डीपरिवारादिदुष्टभुक् ।
सर्वाक्षोभ्यो मृत्युमृत्युः कालमृत्युनिवर्तकः ॥ १९४ ॥
४५० क्रोधेश्वरः—क्रोधपर शासन करनेवाले, ४५१ रुद्रचण्डीपरिवारादिदुष्टभुक्—रुद्र और चण्डीके पार्षदोंमें रहनेवाले दुष्टोंके भक्षक, ४५२ सर्वाक्षोभ्यः—किसीके द्वारा भी विचलित नहीं किये जा सकनेवाले, ४५३ मृत्युमृत्युः—मौतको भी मारनेवाले, ४५४ कालमृत्युनिवर्तकः—काल और मृत्युका निवारण करनेवाले ॥ १९४ ॥
असाध्यसर्वरोगघ्नः सर्वदुर्ग्रहसौम्यकृत् ।
गणेशकोटिदर्पघ्नो दुःसहाशेषगोत्रहा ॥ १९५ ॥
४५५ असाध्यसर्वरोगघ्नः—सम्पूर्ण असाध्य रोगोंका नाश करनेवाले, ४५६ सर्वदुर्ग्रहसौम्यकृत्—समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाले, ४५७ गणेशकोटिदर्पघ्नः—करोड़ों गणपतियोंका अभिमान चूर्ण करनेवाले, ४५८ दुःसहाशेषगोत्रहा—समस्त दुःसह शत्रुओंके कुलका नाश करनेवाले ॥ १९५ ॥
देवदानवदुद्दर्शो जगद्व्यदभीषकः ।
समस्तदुर्गतिस्त्राता जगद्भक्षकभक्षकः ॥ १९६ ॥
४५९ देवदानवदुद्दर्शः—देवता और दानवोंको भी जिनकी ओर देखनेमें कठिनाई होती है—ऐसे भगवान् नृसिंह, ४६० जगद्व्यदभीषकः—संसारके भयदाता असुरोंको भी भयभीत करनेवाले, ४६१ समस्तदुर्गतिस्त्राता—सम्पूर्ण दुर्गंतियोंसे उद्धार करनेवाले, ४६२ जगद्भक्षकभक्षकः—जगत्का भक्षण करनेवाले कालके भी भक्षक ॥ १९६ ॥
उग्रेशोऽम्बरमार्जारः कालमूषकभक्षकः ।
अनन्तायुधदोर्दण्डी नृसिंहो वीरभद्रजित् ॥ १९७ ॥
४६३ उग्रेशः—उग्र शक्तियोंपर शासन करनेवाले, ४६४ अम्बरमार्जारः—आकाशरूपी बिलाव, ४६५ कालमूषकभक्षकः—कालरूपी चूहेको खा जानेवाले, ४६६ अनन्तायुधदोर्दण्डी—अपने बाहुदण्डोंको ही अक्षय आयुधोंके रूपमें धारण करनेवाले, ४६७ नृसिंहः—नर तथा सिंह दोनोंकी आकृति धारण करनेवाले, ४६८ वीरभद्रजित्—वीरभद्रपर विजय पानेवाले ॥ १९७ ॥
योगिनीचक्रगुह्येशः शक्रारिपशुमांसभुक् ।
रुद्रो नारायणो मेषरूपशङ्करवाहनः ॥ १९८ ॥
४६९ योगिनीचक्रगुह्येशः—योगिनी-मण्डलके रहस्योंके स्वामी, ४७० शक्रारिपशुमांसभुक्—इन्द्रके शत्रुभूत दैत्यरूपी पशुओंका भक्षण