पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ************************************************************************************
करनेवाले, ४७१ रुद्रः—प्रलयकालमें सबको रुलानेवाले रुद्र अथवा भयंकर आकारवाले नृसिंह, ४७२ नारायणः—नार अर्थात् जीवसमुदायके आश्रय; अथवा नार—जलको निवासस्थान बनाकर रहनेवाले शेषशायी, ४७३ मेषरूपशङ्करवाहनः— मेषरूपधारी शिवको वाहन बनानेवाले ॥ १९८ ॥
मेषरूपशिवत्राता दुष्टशक्तिसहस्रभुक् ।
तुलसीवल्लभो वीरो वामाचाराखिलेष्टदः ॥ १९९ ॥
४७४ मेषरूपशिवत्राता—मेषरूपधारी शिवके रक्षक, ४७५ दुष्टशक्तिसहस्रभुक्—सहस्रों दुष्टशक्तियोंका विनाश करनेवाले, ४७६ तुलसीवल्लभः—तुलसीके प्रेमी, ४७७ वीरः—शूरवीर, ४७८ वामाचाराखिलेष्टदः—सुन्दर आचरणवालोंका सम्पूर्ण अभीष्ट सिद्ध करनेवाले ॥ १९९ ॥
महाशिवः शिवारूढो भैरवैककपालधृक् ।
झिल्लिचक्रेश्वरः शक्रदिव्यमोहनरूपदः ॥ २०० ॥
४७९ महाशिवः—परम मङ्गलमय, ४८० शिवारूढः—कल्याणमय वाहनपर आरूढ होनेवाले, अथवा ध्यानस्थ भगवान् शिवके हृदयकमलपर आसीन होनेवाले, ४८१ भैरवैककपालधृक्—रुद्ररूपसे हाथमें एक भयानक कपाल धारण करनेवाले, ४८२ झिल्लिचक्रेश्वरः—झींगुरोंके समुदायके स्वामी, ४८३ शक्रदिव्यमोहनरूपदः—इन्द्रको दिव्य एवं मोहक रूप देनेवाले ॥ २०० ॥
गौरीसौभाग्यदो मायानिधिर्मायाभयापहः ।
ब्रह्मतेजोमयो ब्रह्मश्रीमयश्च त्रयीमयः ॥ २०१ ॥
४८४ गौरीसौभाग्यदः—भगवती पार्वतीको सौभाग्य प्रदान करनेवाले, ४८५ मायानिधिः—मायाके भंडार, ४८६ मायाभयापहः—मायाजनित भयका नाश करनेवाले, ४८७ ब्रह्मतेजोमयः— ब्रह्मतेजसे सम्पन्न भगवान् वामन, ४८८ ब्रह्मश्रीमयः—ब्राह्मणोचित श्रीसे परिपूर्ण विग्रहवाले, ४८९ त्रयीमयः—ऋक्, यजुः और साम—इन तीन वेदोंद्वारा प्रतिपादित स्वरूपवाले ॥ २०१ ॥
सुब्रह्मण्यो बलिध्वंसी वामनोऽदितिदुःखहा ।
उपेन्द्रो नृपतिर्विष्णुः कश्यपान्वयमण्डनः ॥ २०२ ॥
४९० सुब्रह्मण्यः—ब्राह्मण, वेद, तप और ज्ञानकी भलीभाँति रक्षा करनेवाले, ४९१ बलिध्वंसी—राजा बलिको स्वर्गसे हटानेवाले, ४९२ वामनः—वामनरूपधारी भगवान्, ४९३ अदितिदुःखहा—देवमाता अदितिके दुःख दूर करनेवाले, ४९४ उपेन्द्रः—इन्द्रके छोटे भाई, द्वितीय इन्द्र, ४९५ नृपतिः—राजा, जो 'नराणां च नराधिपः' के अनुसार भगवान्की दिव्य विभूति है, ४९६ विष्णुः—बारह आदित्योंमेंसे एक, ४९७ कश्यपान्वयमण्डनः—कश्यपजीके कुलकी शोभा बढ़ानेवाले ॥ २०२ ॥
बलिस्वाराज्यदः सर्वदेवविप्रान्नदोऽच्युतः ।
उरुक्रमस्तीर्थपादस्त्रिपदस्त्वित्रिविक्रमः ॥ २०३ ॥
४९८ बलिस्वाराज्यदः—राजा बलिको [अगले मन्वन्तरमें इन्द्र बनाकर] स्वर्गका राज्य प्रदान करनेवाले, करनेवाले, ४९९ सर्वदेवविप्रान्नदः—सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्राह्मणोंको अन्न देनेवाले, ५०० अच्युतः—अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, ५०१ उरुक्रमः—बलिके यज्ञमें विराद्रूप होकर लम्बे डगसे त्रिलोकीको नापनेवाले, ५०२ तीर्थपादः—गङ्गाजीको प्रकट करनेके कारण तीर्थरूप चरणोंवाले, ५०३ त्रिपदस्थः—तीन स्थानोंपर पैर रखनेवाले, ५०४ त्रिविक्रमः—तीन बड़े-बड़े डगवाले ॥ २०३ ॥
व्योमपादः स्वपादाम्भःपवित्रितजगत्त्रयः ।
ब्रह्मेशाद्याभिवन्द्याङ्घ्रिर्दुतधर्माहिधावनः ॥ २०४ ॥
५०५ व्योमपादः—सम्पूर्ण आकाशको चरणोंसे नापनेवाले, ५०६ स्वपादाम्भःपवित्रितजगत्त्रयः—अपने चरणोंके जल (गङ्गाजी) से तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले, ५०७ ब्रह्मेशाद्याभिवन्द्याङ्घ्रिः—ब्रह्मा और शङ्कर आदि देवताओंके द्वारा वन्दनीय चरणोंवाले, ५०८ द्रुतधर्मा—शीघ्रतापूर्वक धर्मका पालन करनेवाले, ५०९ अहिधावनः—सर्पकी भाँति तेज दौड़नेवाले ॥ २०४ ॥
अचिन्त्याद्भुतविस्तारो विश्ववृक्षो महाबलः ।
राहुमूर्धापराङ्गच्छिद् भृगुपत्नीशिरोहरः ॥ २०५ ॥
५१० अचिन्त्याद्भुतविस्तारः—किसी तरह चिन्तनमें न आनेवाले अद्भुत विस्तारसे युक्त, ५११