भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

७०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ************************************************************************************

करनेवाले, ४७१ रुद्रः—प्रलयकालमें सबको रुलानेवाले रुद्र अथवा भयंकर आकारवाले नृसिंह, ४७२ नारायणः—नार अर्थात् जीवसमुदायके आश्रय; अथवा नार—जलको निवासस्थान बनाकर रहनेवाले शेषशायी, ४७३ मेषरूपशङ्करवाहनः— मेषरूपधारी शिवको वाहन बनानेवाले ॥ १९८ ॥

मेषरूपशिवत्राता दुष्टशक्तिसहस्रभुक् ।
तुलसीवल्लभो वीरो वामाचाराखिलेष्टदः ॥ १९९ ॥

४७४ मेषरूपशिवत्राता—मेषरूपधारी शिवके रक्षक, ४७५ दुष्टशक्तिसहस्रभुक्—सहस्रों दुष्टशक्तियोंका विनाश करनेवाले, ४७६ तुलसीवल्लभः—तुलसीके प्रेमी, ४७७ वीरः—शूरवीर, ४७८ वामाचाराखिलेष्टदः—सुन्दर आचरणवालोंका सम्पूर्ण अभीष्ट सिद्ध करनेवाले ॥ १९९ ॥

महाशिवः शिवारूढो भैरवैककपालधृक् ।
झिल्लिचक्रेश्वरः शक्रदिव्यमोहनरूपदः ॥ २०० ॥

४७९ महाशिवः—परम मङ्गलमय, ४८० शिवारूढः—कल्याणमय वाहनपर आरूढ होनेवाले, अथवा ध्यानस्थ भगवान् शिवके हृदयकमलपर आसीन होनेवाले, ४८१ भैरवैककपालधृक्—रुद्ररूपसे हाथमें एक भयानक कपाल धारण करनेवाले, ४८२ झिल्लिचक्रेश्वरः—झींगुरोंके समुदायके स्वामी, ४८३ शक्रदिव्यमोहनरूपदः—इन्द्रको दिव्य एवं मोहक रूप देनेवाले ॥ २०० ॥

गौरीसौभाग्यदो मायानिधिर्मायाभयापहः ।
ब्रह्मतेजोमयो ब्रह्मश्रीमयश्च त्रयीमयः ॥ २०१ ॥

४८४ गौरीसौभाग्यदः—भगवती पार्वतीको सौभाग्य प्रदान करनेवाले, ४८५ मायानिधिः—मायाके भंडार, ४८६ मायाभयापहः—मायाजनित भयका नाश करनेवाले, ४८७ ब्रह्मतेजोमयः— ब्रह्मतेजसे सम्पन्न भगवान् वामन, ४८८ ब्रह्मश्रीमयः—ब्राह्मणोचित श्रीसे परिपूर्ण विग्रहवाले, ४८९ त्रयीमयः—ऋक्, यजुः और साम—इन तीन वेदोंद्वारा प्रतिपादित स्वरूपवाले ॥ २०१ ॥

सुब्रह्मण्यो बलिध्वंसी वामनोऽदितिदुःखहा ।
उपेन्द्रो नृपतिर्विष्णुः कश्यपान्वयमण्डनः ॥ २०२ ॥

४९० सुब्रह्मण्यः—ब्राह्मण, वेद, तप और ज्ञानकी भलीभाँति रक्षा करनेवाले, ४९१ बलिध्वंसी—राजा बलिको स्वर्गसे हटानेवाले, ४९२ वामनः—वामनरूपधारी भगवान्, ४९३ अदितिदुःखहा—देवमाता अदितिके दुःख दूर करनेवाले, ४९४ उपेन्द्रः—इन्द्रके छोटे भाई, द्वितीय इन्द्र, ४९५ नृपतिः—राजा, जो 'नराणां च नराधिपः' के अनुसार भगवान्‌की दिव्य विभूति है, ४९६ विष्णुः—बारह आदित्योंमेंसे एक, ४९७ कश्यपान्वयमण्डनः—कश्यपजीके कुलकी शोभा बढ़ानेवाले ॥ २०२ ॥

बलिस्वाराज्यदः सर्वदेवविप्रान्नदोऽच्युतः ।
उरुक्रमस्तीर्थपादस्त्रिपदस्त्वित्रिविक्रमः ॥ २०३ ॥

४९८ बलिस्वाराज्यदः—राजा बलिको [अगले मन्वन्तरमें इन्द्र बनाकर] स्वर्गका राज्य प्रदान करनेवाले, करनेवाले, ४९९ सर्वदेवविप्रान्नदः—सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्राह्मणोंको अन्न देनेवाले, ५०० अच्युतः—अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, ५०१ उरुक्रमः—बलिके यज्ञमें विराद्रूप होकर लम्बे डगसे त्रिलोकीको नापनेवाले, ५०२ तीर्थपादः—गङ्गाजीको प्रकट करनेके कारण तीर्थरूप चरणोंवाले, ५०३ त्रिपदस्थः—तीन स्थानोंपर पैर रखनेवाले, ५०४ त्रिविक्रमः—तीन बड़े-बड़े डगवाले ॥ २०३ ॥

व्योमपादः स्वपादाम्भःपवित्रितजगत्त्रयः ।
ब्रह्मेशाद्याभिवन्द्याङ्घ्रिर्दुतधर्माहिधावनः ॥ २०४ ॥

५०५ व्योमपादः—सम्पूर्ण आकाशको चरणोंसे नापनेवाले, ५०६ स्वपादाम्भःपवित्रितजगत्त्रयः—अपने चरणोंके जल (गङ्गाजी) से तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले, ५०७ ब्रह्मेशाद्याभिवन्द्याङ्घ्रिः—ब्रह्मा और शङ्कर आदि देवताओंके द्वारा वन्दनीय चरणोंवाले, ५०८ द्रुतधर्मा—शीघ्रतापूर्वक धर्मका पालन करनेवाले, ५०९ अहिधावनः—सर्पकी भाँति तेज दौड़नेवाले ॥ २०४ ॥

अचिन्त्याद्भुतविस्तारो विश्ववृक्षो महाबलः ।
राहुमूर्धापराङ्गच्छिद् भृगुपत्नीशिरोहरः ॥ २०५ ॥

५१० अचिन्त्याद्भुतविस्तारः—किसी तरह चिन्तनमें न आनेवाले अद्भुत विस्तारसे युक्त, ५११

उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०९


विश्ववृक्षः—संसार-वृक्षरूप, ५१२ महाबलः—महान् बलसे युक्त, ५१३ राहुमूर्धापराङ्गच्छित्—राहुके मस्तक और धड़को काटकर अलग करनेवाले, ५१४ भृगुपत्नीशिरोहरः—भृगुपत्नीके मस्तकका अपहरण करनेवाले ॥ २०५ ॥

पापात्रस्तः सदापुण्यो दैत्याशानित्यखण्डकः।
पूरिताखिलदेवाशो विश्वार्थैकावतारकृत् ॥ २०६ ॥

५१५ पापात्रस्तः—पापसे डरनेवाले, ५१६ सदापुण्यः—निरन्तर पुण्यमें प्रवृत्त, ५१७ दैत्याशानित्यखण्डकः—धर्मविरोधी दैत्योंकी आशाका सदा खण्डन करनेवाले, ५१८ पूरिताखिलदेवाशः—सम्पूर्ण देवताओंकी आशा पूर्ण करनेवाले, ५१९ विश्वार्थैकावतारकृत्—एकमात्र विश्वका कल्याण करनेके लिये अवतार लेनेवाले ॥ २०६ ॥

स्वमायानित्यगुप्तात्मा भक्तचिन्तामणिः सदा।
वरदः कार्तवीर्यादिराजराज्यप्रदोऽनघः ॥ २०७ ॥

५२० स्वमायानित्यगुप्तात्मा—अपनी मायासे निरन्तर अपने स्वरूपको छिपाये रखनेवाले, ५२१ सदा भक्तचिन्तामणिः—सदा भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये चिन्तामणिके समान, ५२२ वरदः—भक्तोंको वर प्रदान करनेवाले, ५२३ कार्तवीर्यादिराजराज्यप्रदः—कृतवीर्य-पुत्र अर्जुन आदि राजाओंको राज्य देनेवाले, ५२४ अनघः—स्वभावतः पापसे रहित ॥ २०७ ॥

विश्वश्लाघ्योऽमिताचारो दत्तात्रेयो मुनीश्वरः।
पराशक्तिसदाश्लिष्टो योगानन्दसदोन्मदः ॥ २०८ ॥

५२५ विश्वश्लाघ्यः—समस्त संसारके लिये प्रशंसनीय, ५२६ अमिताचारः—अपरिमित आचारवाले, ५२७ दत्तात्रेयः—अत्रिकुमार दत्त, जो भगवान्‌के अवतार हैं, ५२८ मुनीश्वरः—मुनियोंके स्वामी, ५२९ पराशक्तिसदाश्लिष्टः—सदा पराशक्तिसे युक्त, ५३० योगानन्दसदोन्मदः—निरन्तर योगजनित आनन्दमें विभोर रहनेवाले ॥ २०८ ॥

समस्तेन्द्रारितेजोहत्परमामृतपद्मपः ।
अनसूयागर्भरत्नं भोगमोक्षसुखप्रदः ॥ २०९ ॥

५३१ समस्तेन्द्रारितेजोहत्—इन्द्रसे शत्रुता रखनेवाले सम्पूर्ण दैत्योंका तेज हर लेनेवाले, ५३२ परमामृतपद्मपः—परम अमृतमय कमलका रस पान करनेवाले, ५३३ अनसूयागर्भरत्नम्—अत्रिपत्नी अनसूयाजीके गर्भके रत्न, ५३४ भोगमोक्षसुखप्रदः—भोग और मोक्षका सुख प्रदान करनेवाले ॥ २०९ ॥

जामदग्निकुलादित्यो रेणुकाद्भुतशक्तिधृक्।
मातृहत्यादिनिर्लेपः स्कन्दजिद्विप्रराज्यदः ॥ २१० ॥

५३५ जामदग्निकुलादित्यः—मुनिवर जमदग्निके वंशको सूर्यके समान प्रकाशित करनेवाले परशुरामजी, ५३६ रेणुकाद्भुतशक्तिधृक्—माता रेणुकाकी अद्भुत शक्ति धारण करनेवाले, ५३७ मातृहत्यादिनिर्लेपः—मातृहत्या आदि दोषोंसे निर्लिप्त रहनेवाले परशुरामजी, ५३८ स्कन्दजित्—कार्तिकेयजीको जीतनेवाले, ५३९ विप्रराज्यदः—ब्राह्मणोंको राज्य देनेवाले ॥ २१० ॥

सर्वक्षत्रान्तकृद्वीरदर्पहा कार्तवीर्यजित्।
सप्तद्वीपवतीदाता शिवार्चकयशःप्रदः ॥ २११ ॥

५४० सर्वक्षत्रान्तकृत्—समस्त क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले, ५४१ वीरदर्पहा—बड़े-बड़े वीरोंका दर्प दलन करनेवाले, ५४२ कार्तवीर्यजित्—कृतवीर्य-पुत्र अर्जुनको परास्त करनेवाले, ५४३ सप्तद्वीपवतीदाता—ब्राह्मणोंको सातों द्वीपोंसे युक्त पृथिवीका दान करनेवाले, ५४४ शिवार्चकयशःप्रदः—शिवकी पूजा करनेवालेको यश देनेवाले ॥ २११ ॥

भीमः परशुरामश्च शिवाचार्यैकविश्वभूः।
शिवाखिलज्ञानकोशो भीष्माचार्योऽग्निदैवतः ॥ २१२ ॥

५४५ भीमः—भयङ्कर पराक्रम करनेवाले, ५४६ परशुरामः—परशुरामरूपधारी भगवान्, ५४७ शिवाचार्यैकविश्वभूः—भगवान् शङ्करको गुरु बनाकर विद्या सीखनेवाले संसारमें एकमात्र पुरुष, ५४८ शिवाखिलज्ञानकोशः—भगवान् शङ्करसे सम्पूर्ण ज्ञानका कोष प्राप्त करनेवाले, ५४९ भीष्माचार्यः—पाण्डवोंके पितामह भीष्मजीके आचार्य, ५५० अग्निदैवतः—अग्निदेवताके उपासक ॥ २१२ ॥

द्रोणाचार्यगुरुर्विश्वजैत्रधन्वा कृतान्तजित्।
अद्वितीयतपोमूर्तिर्ब्रह्मचर्यैकदक्षिणः ॥ २१३ ॥

७९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


५५१ द्रोणाचार्यगुरुः — आचार्य द्रोणके गुरु, ५५२ विश्वजैत्रधन्वा — विश्वविजयी धनुष धारण करनेवाले, ५५३ कृतान्तजित् — कालको भी परास्त करनेवाले, ५५४ अद्वितीयतपोमूर्तिः — अद्वितीय तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप, ५५५ ब्रह्मचर्यैकदक्षिरणः — ब्रह्मचर्यपालनमें एकमात्र दक्ष ॥ २१३ ॥

मनुश्रेष्ठः सतां सेतुर्महीयान् वृषभो विराद् ।
आदिराजः क्षितिपिता सर्वरत्नैकदोहकृत् ॥ २१४ ॥

५५६ मनुश्रेष्ठः — मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजा पृथु, ५५७ सतां सेतुः — सेतुके समान सत्पुरुषोंकी मर्यादाके रक्षक, अथवा सत्पुरुषोंके लिये सेतुरूप, ५५८ महीयान् — बड़ोंसे भी बड़े महापुरुष, ५५९ वृषभः — कामनाओंकी वर्षा करनेवाले श्रेष्ठ राजा, ५६० विराद् — तेजस्वी राजा, ५६१ आदिराजः — मनुष्योंमें सबसे प्रथम राजाके पदसे विभूषित, ५६२ क्षितिपिता — पृथ्वीको अपनी कन्याके रूपमें स्वीकार करनेवाले, ५६३ सर्वरत्नैकदोहकृत् — गोरूपधारिणी पृथ्वीसे समस्त रत्नोंके एकमात्र दुहनेवाले ॥ २१४ ॥

पृथुर्जन्माद्येकदक्षो गीःश्रीकीर्तिस्वयंवृतः ।
जगद्वृत्तिप्रदश्चक्रवर्तिश्रेष्ठोऽद्वयास्त्रधृक् ॥ २१५ ॥

५६४ पृथुः — अपने यशसे प्रख्यात पृथु नामक राजा, ५६५ जन्माद्येकदक्षः — उत्पत्ति, पालन और संहारमें एकमात्र कुशल, ५६६ गीःश्रीकीर्तिस्वयंवृतः — वाणी, लक्ष्मी और कीर्तिके द्वारा स्वयं वरण किये हुए, ५६७ जगद्वृत्तिप्रदः — संसारको जीविका प्रदान करनेवाले, ५६८ चक्रवर्तिश्रेष्ठः — चक्रवर्ती राजाओंमें श्रेष्ठ, ५६९ अद्वयास्त्रधृक् — अद्वितीय शस्त्रधारी वीर ॥ २१५ ॥

सनकादिमुनिप्राप्यभगवद्भक्तिवर्धनः ।
वर्णाश्रमादिधर्माणां कर्ता वक्ता प्रवर्तकः ॥ २१६ ॥

५७० सनकादिमुनिप्राप्यभगवद्भक्तिवर्धनः — सनकादि मुनियोंसे प्राप्त होने योग्य भगवद्भक्तिका विस्तार करनेवाले, ५७१ वर्णाश्रमादिधर्माणां कर्ता — वर्ण और आश्रम आदिके धर्मोंके बनानेवाले, ५७२ वक्ता — वर्ण और आश्रम आदिके धर्मोंका उपदेश करनेवाले, ५७३ प्रवर्तकः — उक्त धर्मोंका प्रचार करनेवाले ॥ २१६ ॥

सूर्यवंशध्वजो रामो राघवः सद्गुणार्णवः ।
काकुत्स्थो वीरराजार्यो राजधर्मधुरन्धरः ॥ २१७ ॥

५७४ सूर्यवंशध्वजः — सूर्यवंशकी कीर्ति-पताका फहरानेवाले श्रीरघुनाथजी, ५७५ रामः — योगीजनोंने रमण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप परमात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी, ५७६ राघवः — रघुकुलमें जन्म ग्रहण करनेवाले, ५७७ सद्गुणार्णवः — उत्तम गुणोंके सागर, ५७८ काकुत्स्थः — ककुत्स्थ-पदवी धारण करनेवाले राजा पुरञ्जयकी कुल-परम्परामें अवतीर्ण, ५७९ वीरराजार्यः — वीर राजाओंमें श्रेष्ठ, ५८० राजधर्मधुरन्धरः — राजधर्मका भार वहन करनेवाले ॥ २१७ ॥

नित्यस्वस्थाश्रयः सर्वभद्रग्राही शुभैकदृक् ।
नररत्नं रत्नगर्भो धर्माध्यक्षो महानिधिः ॥ २१८ ॥

५८१ नित्यस्वस्थाश्रयः — सदा अपने स्वरूपमें स्थित रहनेवाले महात्माओंके आश्रय, ५८२ सर्वभद्रग्राही — समस्त कल्याणोंकी प्राप्ति करानेवाले, ५८३ शुभैकदृक् — एकमात्र शुभकी ओर ही दृष्टि रखनेवाले, ५८४ नररत्नम् — मनुष्योंमें श्रेष्ठ, ५८५ रत्नगर्भः — अपनी माताके गर्भके रत्न अथवा अपने भीतर रत्नमय गुणोंको धारण करनेवाले, ५८६ धर्माध्यक्षः — धर्मके साक्षी, ५८७ महानिधिः — अखिल भूमण्डलके सम्राट् होनेके कारण बहुत बड़े कोषवाले ॥ २१८ ॥

सर्वश्रेष्ठाश्रयः सर्वशस्त्रास्त्रग्रामवीर्यवान् ।
जगदीशो दाशरथिः सर्वरत्नाश्रयो नृपः ॥ २१९ ॥

५८८ सर्वश्रेष्ठाश्रयः — सबसे श्रेष्ठ आश्रय, ५८९ सर्वशस्त्रास्त्रग्रामवीर्यवान् — समस्त अस्त्र-शस्त्रोंके समुदायकी शक्ति रखनेवाले, ५९० जगदीशः — सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, ५९१ दाशरथिः — अयोध्याके चक्रवर्ती नरेश महाराज दशरथके प्राणाधिक प्रियतम पुत्र, ५९२ सर्वरत्नाश्रयो नृपः — सम्पूर्ण रत्नोंके आश्रयभूत राजा ॥ २१९ ॥

उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७११


समस्तधर्मसूः सर्वधर्मद्रष्टाखिलार्तिहा।
अतीन्द्रो ज्ञानविज्ञानपारद्रष्टा क्षमाम्बुधिः ॥ २२० ॥

५९३ समस्तधर्मसूः—समस्त धर्मोंको उत्पन्न करनेवाले, ५९४ सर्वधर्मद्रष्टा—सम्पूर्ण धर्मोंपर दृष्टि रखनेवाले, ५९५ अखिलार्तिहा—सबकी पीड़ा दूर करनेवाले अथवा समस्त पीड़ाओंके नाशक, ५९६ अतीन्द्रः—इन्द्रसे भी बढ़कर ऐश्वर्यशाली, ५९७ ज्ञानविज्ञानपारद्रष्टा—ज्ञान और विज्ञानके पारंगत, ५९८ क्षमाम्बुधिः—क्षमाके सागर ॥ २२० ॥

सर्वप्रकृष्टः शिष्टेष्टो हर्षशोकाद्यनाकुलः।
पित्राज्ञयात्यक्तसाम्राज्यः सपत्नोदयनिर्भयः ॥ २२१ ॥

५९९ सर्वप्रकृष्टः—सबसे श्रेष्ठ, ६०० शिष्टेष्टः—शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, ६०१ हर्ष-शोकाद्यनाकुलः—हर्ष और शोक आदिसे विचलित न होनेवाले, ६०२ पित्राज्ञयात्यक्तसाम्राज्यः—पिताकी आज्ञासे समस्त भूमण्डलका साम्राज्य त्याग देनेवाले, ६०३ सपत्नोदयनिर्भयः—शत्रुओंके उदयसे भयभीत न होनेवाले ॥ २२१ ॥

गुहादेशार्पितैश्वर्यः शिवस्पर्धजटाधरः।
चित्रकूटाप्तरत्नाद्रिर्जगदीश्रो वनेचरः ॥ २२२ ॥

६०४ गुहादेशार्पितैश्वर्यः—वनवासके समय पर्वतकी कन्दराओंको ऐश्वर्य समर्पित करनेवाले—अपने निवाससे गुफाओंको भी ऐश्वर्य-सम्पन्न बनानेवाले, ६०५ शिवस्पर्धजटाधरः—शङ्करजीकी जटाओंसे होड़ लगानेवाली जटाएँ धारण करनेवाले, ६०६ चित्रकूटाप्तरत्नाद्रिः—चित्रकूटको निवास-स्थल बनाकर उसे रत्नमय पर्वत (मेरुगिरि) की महत्ता प्राप्त करानेवाले, ६०७ जगदीशः—सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर, ६०८ वनेचरः—वनमें विचरनेवाले ॥ २२२ ॥

यथेष्टामोघसर्वास्त्रो देवेन्द्रतनयाक्षिहा।
ब्रह्मेन्द्रादिनतैषीको मारीचघ्नो विराधहा ॥ २२३ ॥

६०९ यथेष्टामोघसर्वास्त्रः—जिनके सभी अस्त्र इच्छानुसार चलनेवाले एवं अचूक हैं, ६१० देवेन्द्र-तनयाक्षिहा—देवराजके पुत्र जयन्तकी आँख फोड़नेवाले, ६११ ब्रह्मेन्द्रादिनतैषीकः—जिनके चलाये हुए सींकके बाणको ब्रह्मा आदि देवताओंने भी मस्तक झुकाया था, ऐसे प्रभावशाली भगवान् श्रीराम, ६१२ मारीचघ्नः—मायामय मृगका रूप धारण करनेवाले मारीच नामक राक्षसके नाशक, ६१३ विराधहा—विराधका वध करनेवाले ॥ २२३ ॥

ब्रह्मशापाहताशेषदण्डकारण्यपावनः ।
चतुर्दशसहस्रोग्ररक्षोग्रैकशरैकधुक् ॥ २२४ ॥

६१४ ब्रह्मशापाहताशेषदण्डकारण्यपावनः—ब्राह्मण (शुक्राचार्य) के शापसे नष्ट हुए दण्डकारण्यको अपने निवाससे पुनः पावन बनानेवाले ६१५ चतुर्दशसहस्रोग्ररक्षोग्रैकशरैकधुक्—चौदह हजार भयङ्कर राक्षसोंको मारनेकी शक्तिसे युक्त एकमात्र बाण धारण करनेवाले ॥ २२४ ॥

खरारिस्त्रिशिरोहन्ता दूषणघ्नो जनार्दनः ।
जटायुषोऽग्निगतिदोगस्त्यसर्वस्वमन्त्रराट् ॥ २२५ ॥

६१६ खरारिः—खर नामक राक्षसके शत्रु, ६१७ त्रिशिरोहन्ता—त्रिशिराका वध करनेवाले, ६१८ दूषणघ्नः—दूषण नामक राक्षसके प्राण लेनेवाले, ६१९ जनार्दनः—भक्तलोग जिनसे अभ्युदय एवं निःश्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी याचना करते हैं, ६२० जटायुषोऽग्निगतिदः—जटायुका दाह-संस्कार करके उन्हें उत्तम गति प्रदान करनेवाले, ६२१ अगस्त्यसर्वस्वमन्त्रराट्—जिनका नाम महर्षि अगस्त्यका सर्वस्व एवं मन्त्रोंका राजा है ॥ २२५ ॥

लीलाधनुष्कोट्यपास्तदुन्दुभ्यस्थिमहाचलः ।
सप्ततालव्यधाकृष्टध्वस्तपातालदानवः ॥ २२६ ॥

६२२ लीलाधनुष्कोट्यपास्तदुन्दुभ्यस्थि-महाचलः—खेल-खेलमें ही दुन्दुभि नामक दानवकी हड्डियोंके महान् पर्वतको धनुषकी नोकसे उठाकर दूर फेंक देनेवाले, ६२३ सप्ततालव्यधाकृष्टध्वस्त-पातालदानवः—सात तालवृक्षोंके वेधसे आकृष्ट होकर आये हुए पातालवासी दानवका विनाश करनेवाले ॥ २२६ ॥

सुग्रीवराज्यदोऽहीनमनसैवाभयप्रदः ।
हनुमद्प्रमुखेशः समस्तकपिदेहभृत् ॥ २२७ ॥

७९२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

*************************************************************************************

६२४ सुग्रीवराज्यदः—सुग्रीवको राज्य देनेवाले, ६२५ अहीनमनसैवाभयप्रदः—उदार चित्तसे अभय-दान देनेवाले, ६२६ हनुमद्रुद्रमुख्येशः—हनुमान्‌जी तथा भगवान् शङ्करके प्रधान आराध्यदेव, ६२७ समस्तकपिदेहभृत्—सम्पूर्ण वानरोंके शरीरोंका पोषण करनेवाले ॥ २२७ ॥

सनागदैत्यबाणैकव्याकुलीकृतसागरः ।
सम्लेच्छकोटिबाणैकशुष्कनिर्दग्धसागरः ॥ २२८ ॥

६२८ सनागदैत्यबाणैकव्याकुलीकृतसागरः—एक ही बाणसे नाग और दैत्योंसहित समुद्रको क्षुब्ध कर देनेवाले, ६२९ सम्लेच्छकोटिबाणैकशुष्कनिर्दग्धसागरः—एक ही बाणसे करोड़ों म्लेच्छोंसहित समुद्रको सुखा देने और जला डालनेवाले ॥ २२८ ॥

समुद्राद्भुतपूर्वैकबद्धसेतुर्यशोनिधिः ।
असाध्यसाधको लङ्कासमूलोत्साददक्षिणः ॥ २२९ ॥

६३० समुद्राद्भुतपूर्वैकबद्धसेतुः—समुद्रमें पहले-पहल एक अद्भुत पुल बाँधनेवाले, ६३१ यशोनिधिः—सुयशके भंडार, ६३२ असाध्यसाधकः—असम्भवको भी सम्भव कर दिखानेवाले, ६३३ लङ्कासमूलोत्साददक्षिणः—लङ्काको जड़से नष्ट कर डालनेमें दक्ष ॥ २२९ ॥

वरदृप्तजगच्छल्यपौलस्त्यकुलकृन्तनः ।
रावणिघ्नः प्रहस्तच्छित्कुम्भकर्णभिदुग्रहा ॥ २३० ॥

६३४ वरदृप्तजगच्छल्यपौलस्त्यकुलकृन्तनः—वर पाकर घमंडसे भरे हुए तथा संसारके लिये कण्टकरूप रावणके कुलका उच्छेद करनेवाले, ६३५ रावणिघ्नः—लक्ष्मणरूपसे रावणके पुत्र मेघनादका वध करनेवाले, ६३६ प्रहस्तच्छित्—प्रहस्तका मस्तक काटनेवाले, ६३७ कुम्भकर्णभित्—कुम्भकर्णको विदीर्ण करनेवाले, ६३८ उग्रहा—भयङ्कर राक्षसोंका वध करनेवाले ॥ २३० ॥

रावणैकशिरश्छेत्ता निःशङ्केन्द्रैकराज्यदः ।
स्वर्गास्वर्गत्वविच्छेदी देवेन्द्रानिन्द्रताहरः ॥ २३१ ॥

६३९ रावणैकशिरश्छेत्ता—रावणके सिर काटनेवाले एकमात्र वीर, ६४० निःशङ्केन्द्रैकराज्यदः—निःशङ्क होकर इन्द्रको एकमात्र राज्य देनेवाले, ६४१ स्वर्गास्वर्गत्वविच्छेदी—स्वर्गकी अस्वर्गताको मिटा डालनेवाले,* ६४२ देवेन्द्रानिन्द्रताहरः—देवराज इन्द्रकी अनिन्द्रता दूर करनेवाले† ॥ २३१ ॥

रक्षोदेवत्वहृद्धर्मधर्मत्वघ्नः पुरुष्टुतः ।
नतिमात्रदशास्यारिश्चात्तराज्यविभीषणः ॥ २३२ ॥

६४३ रक्षोदेवत्वहृत्—राक्षसलोग जो देवताओंको हटाकर स्वयं देवता बन बैठे थे, उनके उस देवत्वको हर लेनेवाले, ६४४ धर्माधर्मत्वघ्नः—धर्मकी अधर्मताका नाश करनेवाले, (राक्षसोंके कारण धर्म भी अधर्मरूपमें परिणत हो रहा था, भगवान् रामने उन्हें मारकर धर्मको पुनः अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित किया), ६४५ पुरुष्टुतः—बहुत लोगोंके द्वारा स्तुत होनेवाले, ६४६ नतिमात्रदशास्यारिः—नत मस्तक होनेतक ही रावणको शत्रु माननेवाले, ६४७ दत्तराज्यविभीषणः—विभीषणको राज्य प्रदान करनेवाले ॥ २३२ ॥

सुधावृष्टिमृताशेषस्वसैन्योज्जीवनैककृत् ।
देवब्राह्मणनामैकधाता सर्वामरार्चितः ॥ २३३ ॥

६४८ सुधावृष्टिमृताशेषस्वसैन्योज्जीवनैककृत्—सुधाकी वर्षा कराकर अपने समस्त मरे हुए सैनिकोंको जीवन प्रदान करनेवाले, ६४९ देवब्राह्मणनामैकधाता—देवता और ब्राह्मणके नामोंके एकमात्र रक्षक, वे यदि न होते तो देवताओं एवं ब्राह्मणोंका


* राक्षसोंने 'स्वर्ग'का वैभव लूटकर उसे 'अस्वर्ग' बना दिया था, भगवान् रामने रावणको मारकर पुनः उसे अपनी प्रतिष्ठाके अनुरूप बनाया, स्वर्गकी अस्वर्गता दूर कर दी।
† रावणने इन्द्रको इन्द्रपदसे हटा दिया था, वे 'अनिन्द्र' (इन्द्रपदसे च्युत) हो गये थे; श्रीरामने उनकी अनिन्द्रता दूर की—उन्हें पुनः इन्द्रके सिंहासनपर बिठाया।

उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७१३


नाम-निशान मिट जाता, ६५० सर्वामराचितः—सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित ॥ २३३ ॥
ब्रह्मसूर्येन्द्ररुद्रादिवृन्दर्पितसतीप्रियः ।
अयोध्याखिलराजाग्र्यः सर्वभूतमनोहरः ॥ २३४ ॥
६५१ ब्रह्मसूर्येन्द्ररुद्रादिवृन्दार्पितसतीप्रियः—ब्रह्मा, सूर्य, इन्द्र तथा रुद्र आदि देवताओंके समूह-द्वारा शुद्ध प्रमाणित करके समर्पित की हुई सती सीताके प्रियतम, ६५२ अयोध्याखिलराजाग्र्यः—अयोध्यापुरीके सम्पूर्ण राजाओंमें अग्रगण्य, ६५३ सर्वभूतमनोहरः—अपने सौन्दर्य-माधुर्यके कारण सम्पूर्ण प्राणियोंका मन हरनेवाले ॥ २३४ ॥
स्वाम्यतुल्यकृपादण्डो हीनोत्कृष्टैकसत्प्रियः ।
श्वपक्ष्यादिन्यायदर्शी हीनार्थाधिकसाधकः ॥ २३५ ॥
६५४ स्वाम्यतुल्यकृपादण्डः—प्रभुताके अनुरूप ही कृपा करने और दण्ड देनेवाले, ६५५ हीनोत्कृष्टैकसत्प्रियः—ऊँच-नीच—सबके सच्चे प्रेमी, ६५६ श्वपक्ष्यादिन्यायदर्शी—कुत्ते और पक्षी आदिके प्रति भी न्याय प्रदर्शित करनेवाले, ६५७ हीनार्थाधिकसाधकः—असहाय पुरुषोंके कार्यकी अधिक सिद्धि करनेवाले ॥ २३५ ॥
वधव्याजानुचितकृत्तारकोऽखिलतुल्यकृत् ।
पावित्र्याधिक्यमुक्तात्मा प्रियात्यक्तः स्मरारिजित् ॥ २३६ ॥
६५८ वधव्याजानुचितकृत्तारकः—अनुचित कर्म करनेवाले लोगोंका वधके बहाने उद्धार करनेवाले, ६५९ अखिलतुल्यकृत्—सबके साथ उसकी योग्यताके अनुरूप बर्ताव करनेवाले, ६६० पावित्र्याधिक्यमुक्तात्मा—अधिक पवित्रताके कारण नित्यमुक्त स्वभाववाले, ६६१ प्रियात्यक्तः—प्रिय पत्नी सीतासे कुछ कालके लिये वियुक्त, ६६२ स्मरारिजित्—कामदेवके शत्रु भगवान् शिवको भी जीतनेवाले ॥ २३६ ॥
साक्षात्कुशलवच्छद्मद्रावितो ह्यपराजितः ।
कोसलेन्द्रो वीरबाहुः सत्यार्थत्यक्तसोदरः ॥ २३७ ॥
६६३ साक्षात्कुशलवच्छद्मद्रावितः—कुश और लवके रूपमें स्वयं अपने-आपसे युद्धमें हार जानेवाले, ६६४ अपराजितः—वास्तवमें कभी किसीके द्वारा भी परास्त न होनेवाले, ६६५ कोसलेन्द्रः—कोसल देशके ऐश्वर्यशाली सम्राट्, ६६६ वीरबाहुः—शक्तिशालिनी भुजाओंसे युक्त, ६६७ सत्यार्थत्यक्तसोदरः—सत्यकी रक्षाके लिये अपने भाई लक्ष्मणका त्याग करनेवाले ॥ २३७ ॥
शरसंधाननिर्धूतधरणीमण्डलो जयः ।
ब्रह्मादिकामसांनिध्यसनाथीकृतदैवतः ॥ २३८ ॥
६६८ शरसंधाननिर्धूतधरणीमण्डलः—बाणोंके संधानसे समस्त भूमण्डलको कँपा देनेवाले, ६६९ जयः—विजयशील, ६७० ब्रह्मादिकामसांनिध्यसनाथीकृतदैवतः—ब्रह्मा आदिकी कामनाके अनुसार समीपसे दर्शन देकर समस्त देवताओंको सनाथ करनेवाले ॥ २३८ ॥
ब्रह्मलोकाप्तचाण्डालद्यशेषप्राणिसार्थकः ।
स्वर्नीतगर्दभश्वादिश्चिरायोध्यावनैककृत् ॥ २३९ ॥
६७१ ब्रह्मलोकाप्तचाण्डालद्यशेषप्राणिसार्थकः—चाण्डाल आदि समस्त प्राणियोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाकर कृतार्थ करनेवाले, ६७२ स्वर्नीतगर्दभश्वादिः—गदहे और कुत्ते आदिको भी स्वर्गलोकमें ले जानेवाले, ६७३ चिरायोध्यावनैककृत्—चिरकालतक अयोध्याकी एकमात्र रक्षा करनेवाले ॥ २३९ ॥
रामो द्वितीयसौमित्रिलक्ष्मणः प्रहतेन्द्रजित् ।
विष्णुभक्तः सरामाङ्घ्रिपादुकाराज्यनिर्वृतिः ॥ २४० ॥
६७४ रामः—मुनियोंका मन रमानेवाले भगवान् श्रीराम, ६७५ द्वितीयसौमित्रिः—सुमित्राकुमार लक्ष्मणको साथ रखनेवाले, ६७६ लक्ष्मणः—शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न लक्ष्मणरूप, ६७७ प्रहतेन्द्रजित्—लक्ष्मणरूपसे मेघनादका वध करनेवाले, ६७८ विष्णुभक्तः—विष्णुके अवतारभूत भगवान् श्रीरामके भक्त भरतरूप, ६७९ सरामाङ्घ्रिपादुकाराज्यनिर्वृतिः—श्रीरामचन्द्रजीकी चरणपादुकाके साथ मिले हुए राज्यसे संतुष्ट होनेवाले भरतरूप ॥ २४० ॥
भरतोऽसह्यगन्धर्वकोटिघ्नो लव Nautilus: ।
शत्रुघ्नो वैद्यराडायुर्वेदगर्भोष्षधीपतिः ॥ २४१ ॥
६८० भरतः—प्रजाका भरण-पोषण करनेवाले

७१४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [संक्षिप्त पद्मपुराण


कैकेयीकुमार भरतरूप, ६८१ असह्यागन्धर्व-कोटिघ्नः—करोड़ों दुःसह गन्धर्वोंका वध करनेवाले, ६८२ लवborderान्तकः—लवणासुरको मारनेवाले शत्रुघ्नरूप, ६८३ शत्रुघ्नः—शत्रुओंका वध करनेवाले सुमित्राके छोटे कुमार, ६८४ वैद्यराट्—वैद्योंके राजा धन्वन्तरिरूप, ६८५ आयुर्वेदगर्भौषधीपतिः—आयुर्वेदके भीतर वर्णित ओषधियोंके स्वामी ॥ २४१ ॥

नित्यामृतकरो धन्वन्तरिर्यज्ञो जगद्धरः ।
सूर्यारिघ्नः सुराजीवो दक्षिRowणेशो द्विजप्रियः ॥ २४२ ॥

६८६ नित्यामृतकरः—हाथोंमें सदा अमृत लिये रहनेवाले, ६८७ धन्वन्तरिः—धन्वन्तरि नामसे प्रसिद्ध एक वैद्य, जो समुद्रसे प्रकट हुए और भगवान् नारायणके अंश थे, ६८८ यज्ञः—यज्ञस्वरूप, ६८९ जगद्धरः—संसारके पालक, ६९० सूर्यारिघ्नः—सूर्यके शत्रु (केतु) को मारनेवाले, ६९१ सुराजीवः—अमृतके द्वारा देवताओंको जीवन प्रदान करनेवाले, ६९२ दक्षिणेशः—दक्षिण दिशाके स्वामी धर्मराजरूप, ६९३ द्विजप्रियः—ब्राह्मणोंके प्रियतम ॥ २४२ ॥

छिन्नमूर्धापदेशार्कः शेषाङ्गस्थापितामरः ।
विश्वार्थाशेषकृद्राहुशिरश्छेताक्षताकृतिः ॥ २४३ ॥

६९४ छिन्नमूर्धापदेशार्कः—जिसका मस्तक कटा हुआ है तथा जो कहनेमात्रके लिये सूर्य—'स्वर्भानु' नाम धारण करता है, ऐसा राहु नामक ग्रह,* ६९५ शेषाङ्गस्थापितामरः—जिसके शेष अङ्गोंमें अमरत्वकी स्थापना हुई है, ऐसा राहु, ६९६ विश्वार्थाशेषकृत्—संसारके सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले भगवान्, ६९७ राहुशिरश्छेत्ता—राहुका मस्तक काटनेवाले, ६९८ अक्षताकृतिः—स्वयं किसी प्रकारकी भी क्षतिसे रहित शरीरवाले ॥ २४३ ॥

वाजपेयादिनामाग्नर्वेिधर्मपरायणः ।
श्वेतद्वीपपतिः सांख्यप्रणेता सर्वसिद्धिराट् ॥ २४४ ॥

६९९ वाजपेयादिनामाग्निः—वाजपेय आदि नाम धारण करनेवाले अग्नि देवता, ७०० वेदधर्मपरायणः—वेदोक्त धर्मके परम आश्रय, ७०१ श्वेतद्वीपपतिः—श्वेतद्वीपके स्वामी, ७०२ सांख्यप्रणेता—सांख्यशास्त्रकी रचना करनेवाले कपिलस्वरूप, ७०३ सर्वसिद्धिराट्—सम्पूर्ण सिद्धियोंके राजा ॥ २४४ ॥

विश्वप्रकाशितज्ञानयोगमोहतमिस्रहा ।
देवहूत्यात्मजः सिद्धः कपिलः कर्दमात्मजः ॥ २४५ ॥

७०४ विश्वप्रकाशितज्ञानयोगमोहतमिस्रहा—संसारमें ज्ञानयोगका प्रकाश करके मोहरूपी अन्धकारका नाश करनेवाले, ७०५ देवहूत्यात्मजः—मनुकुमारी देवहूतिके पुत्र, ७०६ सिद्धः—सब प्रकारकी सिद्धियोंसे परिपूर्ण, ७०७ कपिलः—कपिल नामसे प्रसिद्ध भगवान्‌के अवतार, ७०८ कर्दमात्मजः—कर्दम ऋषिके सुयोग्य पुत्र ॥ २४५ ॥

योगस्वामी ध्यानभङ्गसगरात्मजभस्मकृत् ।
धर्मो वृषेन्द्रः सुरभीपतिः शुद्धात्मभावितः ॥ २४६ ॥

७०९ योगस्वामी—सांख्ययोगके स्वामी, ७१० ध्यानभङ्गसगरात्मजभस्मकृत्—ध्यान भङ्ग होनेसे सगर-पुत्रोंको भस्म कर डालनेवाले, ७११ धर्मः—जगत्‌को धारण करनेवाले धर्मके स्वरूप, ७१२ वृषेन्द्रः—श्रेष्ठ वृषभकी आकृति धारण करनेवाले, ७१३ सुरभीपतिः—सुरभी गौके स्वामी, ७१४ शुद्धात्मभावितः—शुद्ध अन्तःकरणमें चिन्तन किये जानेवाले ॥ २४६ ॥

शम्भुस्त्रिपुरदाहैकस्थैर्यविश्वरथोध्वहः ।
भक्तशम्भुजितो दैत्यामृतवापीसमस्तपः ॥ २४७ ॥

७१५ शम्भुः—कल्याणकी उत्पत्तिके स्थानभूत, शिवस्वरूप, ७१६ त्रिपुरदाहैकस्थैर्यविश्वरथोध्वहः—त्रिपुरका दाह करनेके समय एकमात्र स्थिर रहनेवाले और विश्वमय रथका वहन करनेवाले, ७१७ भक्तशम्भुजितः—अपने भक्त शिवके द्वारा पराजित,


* राहुका एक नाम 'स्वर्भानु' भी है; इस प्रकार कहनेके लिये तो वह भानु है, पर वास्तवमें अन्धकाररूप है। प्रत्येक ग्रह भगवान्‌की दिव्य विभूति है, इसलिये वह भी भगवत्स्वरूप ही है।

उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७१५ *********************************************************************************************************

७१८ दैत्यामृतवापीसमस्तपः—त्रिपुरनिवासी दैत्योंकी अमृतसे भरी हुई सारी बावलीको गोरूपसे पी जानेवाले ॥ २४७ ॥
महाप्रलयविश्वैकनिलयोऽखिलनागराट् ।
शेषदेवः सहस्राक्षः सहस्रास्यशिरोभुजः ॥ २४८ ॥

७१९ महाप्रलयविश्वैकनिलयः—महाप्रलयके समय सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र निवासस्थान, ७२० अखिलनागराट्—सम्पूर्ण नागोंके राजा शेषनागस्वरूप, ७२१ शेषदेवः—प्रलयकालमें भी शेष रहनेवाले देवता, ७२२ सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रवाले, ७२३ सहस्रास्यशिरोभुजः—सहस्रों मुख, मस्तक और भुजाओंवाले ॥ २४८ ॥
फणामणिकणाकारयोजिताच्छाम्बुदक्षितिः ।
कालाग्निरुद्रजनको मुशलास्त्रो हलायुधः ॥ २४९ ॥

७२४ फणामणिकणाकारयोजिताच्छाम्बुदक्षितिः—फनोंकी मणियोंके कणोंके आकारसे पृथ्वीपर श्वेत बादलोंकी घटा-सी छा देनेवाले, ७२५ कालाग्निरुद्रजनकः—भयङ्कर कालाग्नि एवं संहारमूर्ति रुद्रको प्रकट करनेवाले, ७२६ मुशलास्त्रः—मुशलको अस्त्ररूपमें ग्रहण करनेवाले शेषावतार बलरामरूप, ७२७ हलायुधः—हलरूपी आयुधवाले ॥ २४९ ॥
नीलाम्बरो वारुणीशो मनोवाक्कायदोषहा ।
असंतोषदृष्टिमात्रपातितैकदशाननः ॥ २५० ॥

७२८ नीलाम्बरः—नीलवस्त्रधारी, ७२९ वारुणीशः—वारुणीके स्वामी, ७३० मनोवाक्कायदोषहा—मन, वाणी और शरीरके दोष दूर करनेवाले, ७३१ असंतोषदृष्टिमात्रपातितैकदशाननः—असंतोषपूर्ण दृष्टि डालनेमात्रसे ही पातालमें गये हुए रावणको गिरा देनेवाले शेषनागरूप ॥ २५० ॥
बिलसंयमनो घोरो रौहिणेयः प्रलम्बहा ।
मुष्टिकघ्नो द्विविदहा कालिन्दीकर्षणो बलः ॥ २५१ ॥

७३२ बिलसंयमनः—सातों पाताललोकोंको काबूमें रखनेवाले, ७३३ घोरः—प्रलयके समय भयङ्कर आकृति धारण करनेवाले, ७३४ रौहिणेयः—रोहिणीके पुत्र, ७३५ प्रलम्बहा—प्रलम्ब दानवको मारनेवाले, ७३६ मुष्टिकघ्नः—मुष्टिकके प्राण लेनेवाले, ७३७ द्विविदहा—द्विविद नामक वीर वानरका वध करनेवाले, ७३८ कालिन्दीकर्षणः—यमुनाकी धाराको खींचनेवाले, ७३९ बलः—बलके मूर्तिमान् स्वरूप ॥ २५१ ॥
रेवतीरमणः पूर्वभक्तिखेदाच्युताग्रजः ।
देवकीवसुदेवाह्वकश्यपादितिनन्दनः ॥ २५२ ॥

७४० रेवतीरमणः—अपनी पत्नी रेवतीके साथ रमण करनेवाले, ७४१ पूर्वभक्तिखेदाच्युताग्रजः—पूर्वजन्ममें लक्ष्मणरूपसे भगवान्‌की निरन्तर सेवा करते-करते थके रहनेके कारण दूसरे जन्ममें भगवान्‌की इच्छासे उनके ज्येष्ठ बन्धुके रूपमें अवतार लेनेवाले बलरामरूप, ७४२ देवकीवसुदेवाह्वकश्यपादितिनन्दनः—वसुदेव और देवकीके नामसे प्रसिद्ध महर्षि कश्यप और अदितिको पुत्ररूपसे आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण ॥ २५२ ॥
वार्ष्णेयः सात्वतां श्रेष्ठः शौरिर्यदुकुलेश्वरः ।
नराकृतिः परं ब्रह्म सव्यसाचिवरप्रदः ॥ २५३ ॥

७४३ वार्ष्णेयः—वृष्णिकुलमें उत्पन्न, ७४४ सात्वतां श्रेष्ठः—सात्वत कुलमें सर्वश्रेष्ठ, ७४५ शौरिः—शूरसेनके कुलमें अवतीर्ण, ७४६ यदुकुलेश्वरः—यदुकुलके स्वामी, ७४७ नराकृतिः—मानव-शरीर धारण करनेवाले श्रीकृष्ण, ७४८ परं ब्रह्म—वस्तुतः परमात्मा, ७४९ सव्यसाचिवरप्रदः—अर्जुनको वर देनेवाले ॥ २५३ ॥
ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः ।
पूतनाघ्नः शकटभिद्यमलार्जुनभञ्जनकः ॥ २५४ ॥

७५० ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः—ब्रह्मा आदि भी जिन्हें देखनेकी इच्छा रखते हैं तथा जो सम्पूर्ण जगत्‌को आश्चर्यमें डालनेवाली हैं, ऐसी ललित बाललीलाओंसे युक्त श्रीकृष्ण, ७५१ पूतनाघ्नः—पूतनाके प्राण लेनेवाले, ७५२ शकटभित्—लातके हलके आघातसे छकड़ेको चकनाचूर कर देनेवाले, ७५३ यमलार्जुनभञ्जनकः—यमलार्जुन नामसे प्रसिद्ध दो जुड़वें वृक्षोंको तोड़ डालनेवाले ॥ २५४ ॥

७१६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


वातासुरारिः केशिघ्नो धेनुकारिर्गवीश्वरः ।
दामोदरो गोपदेवो यशोदानन्ददायकः ॥ २५५ ॥
७५४ वातासुरारिः—तृणावर्तके शत्रु, ७५५ केशिघ्नः—केशी नामक दैत्यको मारनेवाले, ७५६ धेनुकारिः—धेनुकासुरके शत्रु, ७५७ गवीश्वरः—गौओंके स्वामी, ७५८ दामोदरः—उदरमें यशोदा मैयाद्वारा रस्सी बाँधी जानेके कारण दामोदर नाम धारण करनेवाले, ७५९ गोपदेवः—ग्वालोंके इष्टदेव, ७६० यशोदानन्ददायकः—यशोदा मैयाको आनन्द देनेवाले ॥ २५५ ॥

कालीयमर्दनः सर्वगोपगोपीजनप्रियः ।
लीलागोवर्धनधरो गोविन्दो गोकुलोत्सवः ॥ २५६ ॥
७६१ कालीयमर्दनः—कालिय नागका मान-मर्दन करनेवाले, ७६२ सर्वगोपगोपीजनप्रियः—समस्त गोपों और गोपियोंके प्रियतम, ७६३ लीलागोवर्धनधरः—अनायास ही गोवर्धन पर्वतको अँगुलीपर उठा लेनेवाले, ७६४ गोविन्दः—इन्द्रकी वर्षासे गौओंकी रक्षा करनेके कारण कामधेनुद्वारा 'गोविन्द' पदपर अभिषिक्त भगवान् श्रीकृष्ण, ७६५ गोकुलोत्सवः—गोकुलनिवासियोंको निरन्तर आनन्द प्रदान करनेके कारण उत्सवरूप ॥ २५६ ॥

अरिष्टमथनः कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदः ।
सद्यःकुवलयापीडघाती चाणूरमर्दनः ॥ २५७ ॥
७६६ अरिष्टमथनः—अरिष्टासुरको नष्ट करनेवाले, ७६७ कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदः—प्रेमविभोर गोपीको मुक्ति प्रदान करनेवाले, ७६८ सद्यःकुवलयापीडघाती—कुवलयापीड नामक हाथीको शीघ्र मार गिरानेवाले, ७६९ चाणूरमर्दनः—चाणूरनामक मल्लको कुचल डालनेवाले ॥ २५७ ॥

कंसारिरुग्रसेनादिराज्यव्यापारितामरः ।
सुधर्माङ्कितभूलोको जरासंधबलान्तकः ॥ २५८ ॥
७७० कंसारिः—मथुराके राजा कंसके शत्रु, ७७१ उग्रसेनादिराज्यव्यापारितामरः—राज्य-सम्बन्धी कार्योंमें उग्रसेन आदिके रूपमें देवताओंको ही नियुक्त करनेवाले, ७७२ सुधर्माङ्कितभूलोकः—देवोचित सुधर्मा नामक सभासे भूलोकको भी सुशोभित करनेवाले, ७७३ जरासंधबलान्तकः—जरासंधकी सेनाका संहार करनेवाले ॥ २५८ ॥

त्यक्तभग्नजरासंधो भीमसेनयशःप्रदः ।
सांदीपनिमृतापत्यदाता कालान्तकादिजित् ॥ २५९ ॥
७७४ त्यक्तभग्नजरासंधः—युद्धसे भगे हुए जरासंधको जीवित छोड़ देनेवाले, ७७५ भीमसेनयशःप्रदः—युक्तिसे जरासंधका वध कराकर भीमसेनको यश प्रदान करनेवाले, ७७६ सांदीपनिमृतापत्यदाता—अपने विद्यागुरु सांदीपनिके मरे हुए पुत्रको पुनः ला देनेवाले, ७७७ कालान्तकादिजित्—काल और अन्तक आदिपर विजय पानेवाले ॥ २५९ ॥

समस्तनारकत्राता सर्वभूपतिकोटिजित् ।
रुक्मिणीरमणो रुक्मिशासनो नरकान्तकः ॥ २६० ॥
७७८ समस्तनारकत्राता—शरणमें आनेपर नरकमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंका भी उद्धार करनेवाले, ७७९ सर्वभूपतिकोटिजित्—रुक्मिणीके विवाहमें करोड़ोंकी संख्यामें आये हुए समस्त राजाओंको परास्त करनेवाले, ७८० रुक्मिणीरमणः—रुक्मिणीके साथ रमण करनेवाले, ७८१ रुक्मिशासनः—रुक्मीको दण्ड देनेवाले, ७८२ नरकान्तकः—नरकासुरका विनाश करनेवाले ॥ २६० ॥

समस्तसुन्दरीकान्तो मुरारिर्गरुडध्वजः ।
एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वरः ॥ २६१ ॥
७८३ समस्तसुन्दरीकान्तः—समस्त सुन्दरियाँ जिन्हें पानेकी इच्छा करती हैं, ७८४ मुरारिः—मुर नामक दानवके शत्रु, ७८५ गरुडध्वजः—गरुड़के चिह्नसे चिह्नित ध्वजावाले, ७८६ एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वरः—अकेले ही रुद्र, सूर्य और वायु आदि समस्त लोकपालोंको जीतनेवाले ॥ २६१ ॥

देवेन्द्रदर्पहा कल्पद्रुमालंकृतभूतलः ।
बाणबाहुसहस्रच्छिन्नन्द्यादिगणकोटिजित् ॥ २६३ ॥
७८७ देवेन्द्रदर्पहा—देवराज इन्द्रका अभिमान चूर्ण करनेवाले, ७८८ कल्पद्रुमालंकृतभूतलः—कल्पवृक्षको स्वर्गसे लाकर उसके द्वारा भूतलकी शोभा

उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७१७ ************************************************************************************

बढ़ानेवाले, ७८९ बाणबाहुसहस्रच्छित्—बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका उच्छेद करनेवाले, ७९० नन्द्यादिगणकोटिजित्—नन्दी आदि करोड़ों शिवगणोंको परास्त करनेवाले ॥ २६२ ॥
लीलाजितमहादेवो महादेवैकपूजितः ।
इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः पाण्डवैकधृक् ॥ २६३ ॥
७९१ लीलाजितमहादेवः—अनायास ही महादेवजीपर विजय पानेवाले, ७९२ महादेवैकपूजितः—महादेवजीके द्वारा एकमात्र पूजित, ७९३ इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः—इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये अर्जुनको अखण्ड विजय प्रदान करनेवाले, ७९४ पाण्डवैकधृक्—पाण्डवोंके एकमात्र रक्षक ॥ २६३ ॥
काशिराजशिरश्छेत्ता रुद्रशक्त्येकमर्दनः ।
विश्वेश्वरप्रसादाढ्यः काशिराजसुतार्दनः ॥ २६४ ॥
७९५ काशिराजशिरश्छेत्ता—काशिराजका मस्तक काट देनेवाले, ७९६ रुद्रशक्त्येकमर्दनः—रुद्रकी शक्तिके एकमात्र मर्दन करनेवाले, ७९७ विश्वेश्वरप्रसादाढ्यः—काशीविश्वनाथकी प्रसन्नता प्राप्त करनेवाले, ७९८ काशिराजसुतार्दनः—काशीनरेशके पुत्रको पीड़ा देनेवाले ॥ २६४ ॥
शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसीकाशीनिर्दग्धनायकः ।
काशीशगणकोटिघ्नो लोकशिक्षाद्विजार्चकः ॥ २६५ ॥
७९९ शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसी—शङ्करजीकी प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, ८०० काशीनिर्दग्धनायकः—जिन्होंने काशीको जलाकर अनाथ-सी कर दिया था, वे भगवान् श्रीकृष्ण, ८०१ काशीशगणकोटिघ्नः—काशीपति विश्वेश्वरके करोड़ों गणोंका नाश करनेवाले, ८०२ लोकशिक्षाद्विजार्चकः—लोकको शिक्षा देनेके लिये सुदामा आदि ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले ॥ २६५ ॥
शिवतीव्रतपोवश्यः पुराशिववरप्रदः ।
शङ्करैकप्रतिष्ठाधृक्स्वांशशङ्करपूजकः ॥ २६६ ॥
८०३ शिवतीव्रतपोवश्यः—शिवजीकी तीव्र तपस्याके वशीभूत होनेवाले, ८०४ पुराशिववरप्रदः—पूर्वकालमें शिवजीको वरदान देनेवाले, ८०५ शङ्करैकप्रतिष्ठाधृक्—भगवान् शङ्करकी एकमात्र प्रतिष्ठा करनेवाले, ८०६—स्वांशशङ्करपूजकः—अपने अंशभूत शङ्करकी पूजा करनेवाले ॥ २६६ ॥
शिवकन्याव्रतपतिः कृष्णरूपशिवारिहा ।
महालक्ष्मीवपुर्गौरीत्राता वैदलवृत्रहा ॥ २६७ ॥
८०७ शिवकन्याव्रतपतिः—शिवकी कन्याके व्रतकी रक्षा करनेवाले, ८०८ कृष्णरूपशिवारिहा—कृष्णरूपसे शिवके शत्रु (भस्मासुर) का संहार करनेवाले, ८०९ महालक्ष्मीवपुर्गौरीत्राता—महालक्ष्मीका शरीर धारण करनेवाली पार्वतीके रक्षक, ८१० वैदलवृत्रहा—वैदलवृत्र नामक दैत्यका वध करनेवाले ॥ २६७ ॥
स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत् ।
यमुनापतिरानीतपरलीनद्विजात्मजः ॥ २६८ ॥
८११ स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत्—अपने तेजःस्वरूप राजा मुचुकुन्दके द्वारा केवल कालयवनका नाश कराकर उन्हें अभीष्ट वरदान देनेवाले, ८१२ यमुनापतिः—सूर्यकन्या यमुनाको पत्नीरूपसे ग्रहण करनेवाले, ८१३ आनीतपरलीनद्विजात्मजः—मरे हुए ब्राह्मण-पुत्रोंको पुनः लानेवाले ॥ २६८ ॥
श्रीदामरङ्कभक्तार्थभूम्यानीतेन्द्रवैभवः ।
दुर्वृत्तशिशुपालैकमुक्तदो द्वारकेश्वरः ॥ २६९ ॥
८१४ श्रीदामरङ्कभक्तार्थभूम्यानीतेन्द्रवैभवः—अपने दीन भक्त श्रीदामा (सुदामा) के लिये पृथ्वीपर इन्द्रके समान वैभव उपस्थित करनेवाले, ८१५ दुर्वृत्तशिशुपालैकमुक्तदो—दुराचारी शिशुपालको एकमात्र मोक्ष प्रदान करनेवाले, ८१६ द्वारकेश्वरः—द्वारकाके स्वामी ॥ २६९ ॥
आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकृत् ।
अक्रूरोद्धवमुख्यैकभक्तः स्वच्छन्दमुक्तिदः ॥ २७० ॥
८१७ आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकृत्—द्वारकामें चाण्डाल आदितकके लिये सुलभ होनेवाली करोड़ों निधियोंका संग्रह करनेवाले, ८१८ अक्रूरोद्धवमुख्यैकभक्तः—अक्रूर और उद्धव आदि प्रधान भक्तोंके साथ रहनेवाले, ८१९ स्वच्छन्द-

७१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


मुक्तिदः—इच्छानुसार मुक्ति देनेवाले ॥ २७० ॥ सबालस्त्रीजलक्रीडामृतवापीकृतार्णवः । ब्रह्मास्त्रदग्धगर्भस्थपरीक्षित्जीवनैककृत् ॥ २७१ ॥

८२० सबालस्त्रीजलक्रीडामृतवापीकृतार्णवः— बालकों और स्त्रियोंके जल-विहार करनेके लिये समुद्रको अमृतमयी बावलीके समान बना देनेवाले, ८२१ ब्रह्मास्त्रदग्धगर्भस्थपरीक्षित्जीवनैककृत्—अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे दग्ध हुए गर्भस्थ परीक्षित्‌को एकमात्र जीवन-दान देनेवाले ॥ २७१ ॥

परलीनद्विजसुतानेताऽर्जुनमदापहः । गूढमुद्राकृतिग्रस्तभीष्माद्यखिलकौरवः ॥ २७२ ॥

८२२ परलीनद्विजसुतानेता—नष्ट हुए ब्राह्मणकुमारोंको पुनः ले आनेवाले, ८२३ अर्जुनमदापहः—अर्जुनका घमंड दूर करनेवाले, ८२४ गूढमुद्राकृतिग्रस्तभीष्माद्यखिलकौरवः—गम्भीर मुद्रावाली आकृति बनाकर भीष्म आदि समस्त कौरवोंको कालका ग्रास बनानेवाले ॥ २७२ ॥

यथार्थखण्डिताशेषदिव्यास्त्रपार्थमोपहृत् । गर्भशापच्छलध्वस्तयादवोर्वीभरापहः ॥ २७३ ॥

८२५ यथार्थखण्डिताशेषदिव्यास्त्रपार्थमोपहृत्— समस्त दिव्यास्त्रोंका भलीभाँति खण्डन करनेवाले अर्जुनके मोहको हरनेवाले, ८२६ गर्भशापच्छलध्वस्तयादवोर्वीभरापहः— स्त्रीरूप धारण करके गये हुए साम्बके गर्भको मुनियोंद्वारा शाप दिलानेके बहाने पृथ्वीके भारभूत समस्त यादवोंका संहार करनेवाले ॥ २७३ ॥

जराव्याधारिगतिदः स्मृतमात्राखिलेष्टदः । कामदेवो रतिपतिर्मन्मथः शम्बरान्तकः ॥ २७४ ॥

८२७ जराव्याधारिगतिदः—शत्रुका काम करनेवाले जरा नामक व्याधको उत्तम गति प्रदान करनेवाले, ८२८ स्मृतमात्राखिलेष्टदः—स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोंको देनेवाले, ८२९ कामदेवः—कामदेवस्वरूप, ८३० रतिपतिः—रतिके स्वामी, ८३१ मन्मथः—विचारशक्तिका नाश करनेवाले कामदेवस्वरूप, ८३२ शम्बरान्तकः—शम्बरासुरके प्राणहन्ता ॥ २७४ ॥

अनङ्गो जितगौरीशो रतिकान्तः सदेप्सितः । पुष्पेषुर्विश्वविजयी स्मरः कामेश्वरीप्रियः ॥ २७५ ॥

८३३ अनङ्गः—अङ्गरहित, ८३४ जितगौरीशः—गौरीपति शङ्करको भी जीतनेवाले, ८३५ रतिकान्तः—रतिके प्रियतम, ८३६ सदेप्सितः—कामी पुरुषोंको सदा अभीष्ट, ८३७ पुष्पेषुः—पुष्पमय बाणवाले, ८३८ विश्वविजयी—सम्पूर्ण जगत्पर विजय पानेवाले, ८३९ स्मरः—विषयोंके स्मरणमात्रसे मनमें प्रकट हो जानेवाले, ८४० कामेश्वरीप्रियः— कामेश्वरी-रतिके प्रेमी ॥ २७५ ॥

उषापतिर्विश्वकेतुर्विश्वतृप्तोऽधिपूरुषः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्युगविधायकः ॥ २७६ ॥

८४१ उषापतिः—बाणासुरकी कन्या उषाके स्वामी अनिरुद्धरूप, ८४२ विश्वकेतुः—विश्वमें विजय-पताका फहरानेवाले, ८४३ विश्वतृप्तः—सब ओरसे तृप्त, ८४४ अधिपूरुषः—अन्तर्यामी साक्षी चेतन, ८४५ चतुरात्मा—मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, ८४६ चतुर्व्यूहः— वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंसे युक्त, ८४७ चतुर्युगविधायकः—सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चार युगोंका विधान करनेवाले ॥ २७६ ॥

चतुर्वेदैकविश्वात्मा सर्वोत्कृष्टांशकोटिसूः । आश्रमात्मा पुराणर्षिर्व्यासः शाखासहस्रकृत् ॥ २७७ ॥

८४८ चतुर्वेदैकविश्वात्मा—चारों वेदोंद्वारा प्रतिपादित एकमात्र सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, ८४९ सर्वोत्कृष्टांशकोटिसूः—सबसे श्रेष्ठ कोटि-कोटि अंशोंको जन्म देनेवाले, ८५० आश्रमात्मा—आश्रमधर्मरूप, ८५१ पुराणर्षिः—पुराणोंके प्रकाशक ऋषि, ८५२ व्यासः—वेदोंका विस्तार करनेवाले, ८५३ शाखासहस्रकृत्—सामवेदकी सहस्र शाखाओंका सम्पादन करनेवाले ॥ २७७ ॥

महाभारतनिर्माता कवीन्द्रो बादरायणः । कृष्णद्वैपायनः सर्वपुरुषार्थकबोधकः ॥ २७८ ॥

...] उत्तराखण्ड ] • नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन • ७१९


८५४ महाभारतनिर्माता—महाभारत ग्रन्थके रचयिता, ८५५ कवीन्द्रः—कवियोंके राजा, ८५६ बादरायणः—बदरी-वनमें उत्पन्न भगवान् वेदव्यास-रूप, ८५७ कृष्णद्वैपायनः—द्वीपमें उत्पन्न श्याम वर्णवाले व्यासजी, ८५८ सर्वपुरुषार्थैकबोधकः—समस्त पुरुषार्थोंके एकमात्र बोध करानेवाले ॥ २७८ ॥ वेदान्तकर्ता ब्रह्मैकव्यञ्जकः पुरुवंशकृत् । बुद्धो ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः ॥ २७९ ॥ ८५९ वेदान्तकर्ता—वेदान्तसूत्रोंके रचयिता, ८६० ब्रह्मैकव्यञ्जकः—एक अद्वितीय ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करानेवाले, ८६१ पुरुवंशकृत्—पुरुवंशकी परम्परा सुरक्षित रखनेवाले, ८६२ बुद्धः—भगवान्के अवतार बुद्धदेव, ८६३ ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः—ध्यानके द्वारा समस्त देव-देवियोंको जीतकर जगत्के प्रियतम बननेवाले ॥ २७९ ॥ निरायुधो जगज्जैत्रः श्रीधनो दुष्टमोहनः । दैत्यवेदबहिष्कर्ता वेदार्थश्रुतिगोपकः ॥ २८० ॥ ८६४ निरायुधः—अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करनेवाले, ८६५ जगज्जैत्रः—सम्पूर्ण जगत्को वशमें करनेवाले, ८६६ श्रीधनः—शोभाके धनी, ८६७ दुष्टमोहनः—दुष्टोंको मोहित करनेवाले, ८६८ दैत्यवेदबहिष्कर्ता—दैत्योंको वेदसे बहिष्कृत करनेवाले, ८६९ वेदार्थश्रुतिगोपकः—वेदोंके अर्थ और श्रुतियोंको गुप्त रखनेवाले ॥ २८० ॥ शौद्धोदनिर्दिष्टदिष्टः सुखदः सदसस्पतिः । यथायोग्याखिलकृपः सर्वशून्योऽखिलेष्टदः ॥ २८१ ॥ ८७० शौद्धोदनिः—कपिलवस्तुके राजा शुद्धोदनके पुत्र, ८७१ दृष्टदिष्टः—दैवके विधानको प्रत्यक्ष देखनेवाले, ८७२ सुखदः—सबको सुख देनेवाले, ८७३ सदसस्पतिः—सत्पुरुषोंकी सभाके अध्यक्ष, ८७४ यथायोग्याखिलकृपः—यथायोग्य सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा रखनेवाले, ८७५ सर्वशून्यः—सम्पूर्ण पदार्थोंको शून्यरूप ही माननेवाले, ८७६ अखिलेष्टदः—सबको सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ देनेवाले ॥ २८१ ॥ चतुष्कोटिपृथक्तत्त्वप्रज्ञापारमितेश्वरः । पाखण्डवेदमार्गेशः पाखण्डश्रुतिगोपकः ॥ २८२ ॥ ८७७ चतुष्कोटिपृथक्—स्थावर आदि चार श्रेणियोंमें विभक्त हुई सृष्टिसे पृथक्, ८७८ तत्त्व-प्रज्ञापारमितेश्वरः—तत्त्वभूत प्रज्ञापारमिता<sup></sup> (बुद्धिकी पराकाष्ठा) के ईश्वर, ८७९ पाखण्डवेदमार्गेशः—पाखण्ड-वेदमार्गके स्वामी, ८८० पाखण्ड-श्रुतिगोपकः—पाखण्डके द्वारा प्रतिपादित वेदकी श्रुतियोंके रक्षक ॥ २८२ ॥ कल्की विष्णुयशःपुत्रः कलिकालविलोपकः । समस्तम्लेच्छदुष्टघ्नः सर्वशिष्टद्विजातिकृत् ॥ २८३ ॥ ८८१ कल्की—कलियुगके अन्तमें होनेवाला भगवान्का एक अवतार, ८८२ विष्णुयशःपुत्रः—श्रीविष्णुयशाके पुत्र भगवान् कल्कि, ८८३ कलिकाल-विलोपकः—कलियुगका लोप करके सत्ययुगका प्रवेश करानेवाले, ८८४ समस्तम्लेच्छदुष्टघ्नः—सम्पूर्ण म्लेच्छों और दुष्टोंका वध करनेवाले, ८८५ सर्वशिष्टद्विजातिकृत्—सबको श्रेष्ठ द्विज बनानेवाले अथवा समस्त साधु द्विजातियोंके रक्षक ॥ २८३ ॥ सत्यप्रवर्तको देवद्विजदीर्घक्षुधापहः । अश्ववारादिक्रान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशनः ॥ २८४ ॥ ८८६ सत्यप्रवर्तकः—सत्ययुगकी प्रवृत्ति करानेवाले, ८८७ देवद्विजदीर्घक्षुधापहः—[यज्ञ और ब्राह्मण-भोजन आदिका प्रचार करके] देवताओं और ब्राह्मणोंकी बढ़ी हुई भूखको शान्त करनेवाले, ८८८ अश्ववारादिः—घुड़सवारोंमें श्रेष्ठ, ८८९ एकान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशनः—पृथ्वीकी दुर्गतिका पूर्णतया नाश करनेवाले ॥ २८४ ॥ सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृन्नष्टनिःशेषधर्मवित् । अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजः ॥ २८५ ॥


१-दस पारमिताओंमेंसे एकका नाम प्रज्ञापारमिता है।

७२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


८९० सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृत्—पृथ्वीको शीघ्र ही अनन्त लक्ष्मीसे परिपूर्ण करनेवाले, ८९१ नष्टनिःशेषधर्मवित्—नष्ट हुए सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता, ८९२ अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजः—अनन्त सुवर्णकी दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान कराकर सम्पूर्ण ब्राह्मणोंको स्वर्णसे सम्पन्न करनेवाले ॥ २८५ ॥

असाध्यैकजगच्छास्ता विश्वबन्धो जयध्वजः ।
आत्मतत्त्वाधिपः कर्तृश्रेष्ठो विधिर्मापतिः ॥ २८६ ॥

८९३ असाध्यैकजगच्छास्ता—किसीके वशमें न होनेवाले सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र शासक, ८९४ विश्वबन्धः—समस्त विश्वको अपनी मायासे बाँध रखनेवाले, ८९५ जयध्वजः—सर्वत्र अपनी विजयपताका फहरानेवाले, ८९६ आत्मतत्त्वाधिपः—आत्मतत्त्वके स्वामी, ८९७ कर्तृश्रेष्ठः—कर्ताओंमें श्रेष्ठ, ८९८ विधिः—शास्त्रीय विधिरूप, ८९९ उमापतिः—उमाके स्वामी ॥ २८६ ॥

भर्तृश्रेष्ठः प्रजेशाम्र्यो मरीचिर्जनकाग्रणीः ।
कश्यपो देवराडिन्द्रः प्रह्लादो दैत्यराट् शशी ॥ २८७ ॥

९०० भर्तृश्रेष्ठः—भरण-पोषण करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९०१ प्रजेशाम्र्यः—प्रजापतियोंमें अग्रगण्य, ९०२ मरीचिः—मरीचि नामक प्रजापतिरूप, ९०३ जनकाग्रणीः—जन्म देनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, ९०४ कश्यपः—सर्वद्रष्टा कश्यप मुनिरूप, ९०५ देवराट्—देवताओंके राजा, ९०६ इन्द्रः—परम ऐश्वर्यशाली इन्द्रस्वरूप, ९०७ प्रह्लादः—भगवद्भक्तिके प्रभावसे अत्यन्त आह्लादपूर्ण रानी कयाधूके पुत्ररूप, ९०८ दैत्यराट्—दैत्योंके स्वामी प्रह्लादरूप, ९०९ शशी—खरगोशका चिह्न धारण करनेवाले चन्द्रमारूप ॥ २८७ ॥

नक्षत्रेशो रविस्तेजःश्रेष्ठः शुक्रः कवीश्वरः ।
महर्षिराड्भृगुर्विष्णुरादित्येशो बलिश्वराट् ॥ २८८ ॥

९१० नक्षत्रेशः—नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमारूप, ९११ रविः—सूर्यस्वरूप, ९१२ तेजःश्रेष्ठः—तेजस्वियोंमें सबसे श्रेष्ठ, ९१३ शुक्रः—भृगुके पुत्र शुक्राचार्यस्वरूप, ९१४ कवीश्वरः—कवियोंके स्वामी, ९१५ महर्षिराट्—महर्षियोंमें अधिक तेजस्वी, ९१६ भृगुः—ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति भृगुस्वरूप, ९१७ विष्णुः—बारह आदित्योंमेंसे एक, ९१८ आदित्येशः—बारह आदित्योंके स्वामी, ९१९ बलिश्वराट्—बलिको इन्द्र बनानेवाले ॥ २८८ ॥

वायुर्वह्निः शुचिश्रेष्ठः शङ्करो रुद्रराड्गुरुः ।
विद्वत्तमश्चित्ररथो गन्धर्वाग्र्योऽक्षरोत्तमः ॥ २८९ ॥

९२० वायुः—वायुतत्त्वके अधिष्ठाता देवता, ९२१ वह्निः—अग्नितत्त्वके अधिष्ठाता देवता, ९२२ शुचिश्रेष्ठः—पवित्रोंमें श्रेष्ठ, ९२३ शङ्करः—सबका कल्याण करनेवाले शिवरूप, ९२४ रुद्रराट्—ग्यारह रुद्रोंके स्वामी, ९२५ गुरुः—गुरु नामसे प्रसिद्ध अङ्गिरापुत्र बृहस्पतिरूप, ९२६ विद्वत्तमः—सर्वश्रेष्ठ विद्वान्, ९२७ चित्ररथः—विचित्र रथवाले गन्धर्वोंके राजा, ९२८ गन्धर्वाग्र्यः—गन्धर्वोंमें अग्रगण्य चित्रथरूप, ९२९ अक्षरोत्तमः—अक्षरोंमें उत्तम 'ॐ'कारस्वरूप ॥ २८९ ॥

वर्णादिरग्र्यस्त्री गौरी शक्त्यग्र्या श्रीश्च नारदः ।
देवर्षिराट्पाण्डवाग्र्योऽर्जुनो वादः प्रवादराट् ॥ २९० ॥

९३० वर्णादिः—समस्त अक्षरोंके आदिभूत अकारस्वरूप, ९३१ अग्र्यस्त्री—स्त्रियोंमें अग्रगण्य सती पार्वतीरूप, ९३२ गौरी—गौरवर्णा उमारूप, ९३३ शक्त्यग्र्या—भगवान्‌की अन्तरङ्गा शक्तियोंमें सर्वश्रेष्ठ भगवती लक्ष्मीरूप, ९३४ श्रीः—भगवान् विष्णुका आश्रय लेनेवाली लक्ष्मी, ९३५ नारदः—सबको ज्ञान देनेवाले देवर्षि नारदरूप, ९३६ देवर्षिराट्—देवर्षियोंके राजा, ९३७ पाण्डवाग्र्यः—पाण्डवोंमें अपने गुणोंके कारण श्रेष्ठ अर्जुनरूप, ९३८ अर्जुनः—अर्जुन नामसे प्रसिद्ध कुन्तीके तृतीय पुत्र, ९३९ वादः—तत्त्वनिर्णयके उद्देश्यसे शुद्ध नीयतके साथ किये जानेवाले शास्त्रार्थरूप, ९४० प्रवादराट्—उत्तम वाद करनेवालोंमें श्रेष्ठ ॥ २९० ॥

पावनः पावनेशानो वरुणो यादसां पतिः ।
गङ्गा तीर्थोत्तमो द्यूतं छलकाग्र्यं वरोषधम् ॥ २९१ ॥

९४१ पावनः—सबको पवित्र करनेवाले, ९४२

उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७२१


पावनेशः—पावन वस्तुओंके ईश्वर, ९४३ वरुणः—जलके अधिष्ठाता देवता वरुणरूप, ९४४ यादसां पतिः—जल-जन्तुओंके स्वामी, ९४५ गङ्गा—भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई परम पवित्र नदी, जो भूतलमें भागीरथीके नामसे विख्यात एवं भगवद्विभूति है, ९४६ तीर्थोत्तमः—तीर्थोंमें उत्तम गङ्गारूप, ९४७ द्यूतम्—छल करनेवालोंमें द्यूतरूप भगवान्‌की विभूति, ९४८ छलकाग्र्यम्—छलकी पराकाष्ठा जूआरूप, ९४९ वरौषधम्—जीवनकी रक्षा करनेवाली श्रेष्ठ ओषधि— अन्नरूप ॥ २९१ ॥
अन्नं सुदर्शनोऽस्त्राग्र्यं वज्रं प्रहरणोत्तमम् ।
उच्चैःश्रवा वाजिराज ऐरावत इभेश्वरः ॥ २९२ ॥
९५० अन्नम्—प्राणियोंकी क्षुधा दूर करनेवाला धरतीसे उत्पन्न खाद्य पदार्थ, ९५१ सुदर्शनः—देखनेमें सुन्दर तेजस्वी अस्त्र—सुदर्शनचक्ररूप, ९५२ अस्त्राग्र्यम्—समस्त अस्त्रोंमें श्रेष्ठ सुदर्शन, ९५३ वज्रम्—इन्द्रके आयुधस्वरूप, ९५४ प्रहरणोत्तमम्—प्रहार करनेयोग्य आयुधोंमें उत्तम वज्ररूप, ९५५ उच्चैःश्रवाः—ऊँचे कानोंवाला दिव्य अश्व, जो समुद्रसे उत्पन्न हुआ था, ९५६ वाजिराजः—घोड़ोंके राजा उच्चैःश्रवारूप, ९५७ ऐरावतः—समुद्रसे उत्पन्न इन्द्रका वाहन ऐरावत नामक हाथी, ९५८ इभेश्वरः—हाथियोंके राजा ऐरावतस्वरूप ॥ २९२ ॥
अरुन्धत्येकपत्नीशो ह्यश्वत्थोऽशेषवृक्षराट् ।
अध्यात्मविद्या विद्याग्र्यः प्रणवश्छन्दसां वरः ॥ २९३ ॥
९५९ अरुन्धती—पतिव्रताओंमें श्रेष्ठ अरुन्धती-स्वरूप, ९६० एकपत्नीशः—पतिव्रता अरुन्धतीके स्वामी महर्षि वसिष्ठरूप, ९६१ अश्वत्थः—पीपलके वृक्षरूप, ९६२ अशेषवृक्षराट्—सम्पूर्ण वृक्षोंके राजा अश्वत्थरूप, ९६३ अध्यात्मविद्या—आत्मतत्त्वका बोध करानेवाली ब्रह्मविद्यास्वरूप, ९६४ विद्याग्र्यः—विद्याओंमें अग्रगण्य प्रणवरूप, ९६५ प्रणवः—ओंकाररूप, ९६६ छन्दसां वरः—वेदोंका आदिभूत ओंकार, अथवा मन्त्रोंमें श्रेष्ठ प्रणव ॥ २९३ ॥
मेरुर्गिरिपतिर्मार्गो मासाग्र्यः कालसत्तमः ।
दिनाद्यात्मा पूर्वसिद्धः कपिलः साम वेदराट् ॥ २९४ ॥
९६७ मेरुः—मेरु नामक दिव्य पर्वतरूप, ९६८ गिरिपतिः—पर्वतोंके स्वामी, ९६९ मार्गः—मार्गशीर्ष (अगहन) का महीना, ९७० मासाग्र्यः—मासोंमें अग्रगण्य मार्गशीर्षस्वरूप, ९७१ कालसत्तमः—समयोंमें सर्वश्रेष्ठ-ब्रह्मवेला, ९७२ दिनाद्यात्मा—दिन और रात्रि दोनोंका सम्मिलित रूप—प्रभात या ब्रह्मवेला, ९७३ पूर्वसिद्धः—आदि सिद्ध महर्षि कपिलरूप, ९७४ कपिलः—कपिल वर्णवाले एक मुनि, जो भगवान्‌के अवतार हैं, ९७५ साम—सहस्र शाखाओंसे विशिष्ट सामवेद, ९७६ वेदराट्—वेदोंके राजा सामवेदरूप ॥ २९४ ॥
तार्क्ष्यः खगेन्द्र ऋत्वग्र्यो वसन्तः कल्पपादपः ।
दातृश्रेष्ठः कामधेनुरार्तिघ्नाग्र्यः सुहृत्तमः ॥ २९५ ॥
९७७ तार्क्ष्यः—तार्क्ष (कश्यप) ऋषिके पुत्र गरुड़रूप, ९७८ खगेन्द्रः—पक्षियोंके राजा गरुड़, ९७९ ऋत्वग्र्यः—ऋतुओंमें श्रेष्ठ वसन्तरूप, ९८० वसन्तः—चैत्र और वैशाख मास, ९८१ कल्पपादपः—कल्पवृक्षस्वरूप, ९८२ दातृश्रेष्ठः—मनोवाञ्छित वस्तु देनेवालोंमें श्रेष्ठ कल्पवृक्ष, ९८३ कामधेनुः—अभीष्ट पूर्ण करनेवाली गोरूप, ९८४ आर्तिघ्नाग्र्यः—पीड़ा दूर करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९८५ सुहृत्तमः—परम हितैषी ॥ २९५ ॥
चिन्तामणिर्गुरुश्रेष्ठो माता हिततमः पिता ।
सिंहो मृगेन्द्रो नागेन्द्रो वासुकिन्नृवरो नृपः ॥ २९६ ॥
९८६ चिन्तामणिः—मनमें चिन्तन की हुई इच्छाको पूर्ण करनेवाली भगवत्स्वरूप दिव्य मणि, ९८७ गुरुश्रेष्ठः—गुरुओंमें श्रेष्ठ मातारूप, ९८८ माता—जन्म देनेवाली जननी, ९८९ हिततमः—सबसे बड़े हितकारी, ९९० पिता—जन्मदाता, ९९१ सिंहः—मृगोंके राजा सिंहरूप, ९९२ मृगेन्द्रः—समस्त वनके जन्तुओंका स्वामी सिंहरूप, ९९३ नागेन्द्रः—नागोंके राजा, ९९४ वासुकिः—नागराज वासुकिरूप, ९९५ नृवरः—मनुष्योंमें श्रेष्ठ, ९९६ नृपः—मनुष्योंका पालन करनेवाले राजारूप ॥ २९६ ॥

७२२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण *********************************************************************************

वर्णेशो ब्राह्मणश्चेतः करणाग्र्यं नमो नमः।
इत्येतद्वासुदेवस्य विष्णोर्नामसहस्रकम्॥ २९७॥*

९९७ वर्णेशः— समस्त वर्णोंके स्वामी ब्राह्मण-रूप, ९९८ ब्राह्मणः— ब्राह्मण माता-पितासे उत्पन्न एवं ब्रह्मज्ञानी, ९९९ चेतः— परमात्मचिन्तनकी योग्यतावाले चित्तरूप, १००० करणाग्र्यम्— इन्द्रियोंका प्रेरक होनेके कारण उनमें सबसे श्रेष्ठ चित्त—इस प्रकार ये सबके हृदयमें वास करनेवाले भगवान् विष्णुके सहस्र नाम हैं। इन सब नामोंको मेरा बारम्बार नमस्कार है॥ २९७॥

यह विष्णुसहस्रनामस्तोत्र समस्त अपराधोंको शान्त करनेवाला, परम उत्तम तथा भगवान्में भक्तिको बढ़ानेवाला है। इसका कभी नाश नहीं होता। ब्रह्मलोक आदिका तो यह सर्वस्व ही है। विष्णुलोकतक पहुँचनेके लिये यह अद्वितीय सीढ़ी है। इसके सेवनसे सब दुःखोंका नाश हो जाता है। यह सब सुखोंको देनेवाला तथा शीघ्र ही परम मोक्ष प्रदान करनेवाला है। काम, क्रोध आदि जितने भी अन्तःकरणके मल हैं, उन सबका इससे शोधन होता है। यह परम शान्तिदायक एवं महापातकी मनुष्योंको भी पवित्र बनानेवाला है। समस्त प्राणियोंको यह शीघ्र ही सब प्रकारके अभीष्ट फल दान करता है। समस्त विघ्नोंकी शान्ति और सम्पूर्ण अरिष्टोंका विनाश करनेवाला है। इसके सेवनसे भयङ्कर दुःख शान्त हो जाते हैं। दुःसह दरिद्रताका नाश हो जाता है तथा तीनों प्रकारके ऋण दूर हो जाते हैं। यह परम गोपनीय तथा धन-धान्य और यशकी वृद्धि करनेवाला है। सब प्रकारके ऐश्वर्यों, समस्त सिद्धियों और सम्पूर्ण धर्मोंको देनेवाला है। इससे कोटि-कोटि तीर्थ, यज्ञ, तप, दान और व्रतोंका फल प्राप्त होता है। यह संसारकी जड़ता दूर करनेवाला और सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवृत्ति करानेवाला है। जो राज्यसे भ्रष्ट हो गये हैं, उन्हें यह राज्य दिलाता और रोगियोंके सब रोगोंको हर लेता है। इतना ही नहीं, यह स्तोत्र वन्ध्या स्त्रियोंको पुत्र और रोगसे क्षीण हुए पुरुषोंको तत्काल जीवन देनेवाला है। यह परम पवित्र, मङ्गलमय तथा आयु बढ़ानेवाला है। एक बार भी इसका श्रवण, पठन अथवा जप करनेसे अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद, कोटि-कोटि मन्त्र, पुराण, शास्त्र तथा स्मृतियोंका श्रवण और पाठ हो जाता है। प्रिये ! जो इसके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षरका भी नित्य जप या पाठ करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथ तत्काल सिद्ध हो जाते हैं। सब कार्योंकी सिद्धिसे शीघ्र ही विश्वास पैदा करानेवाला इसके समान दूसरा कोई साधन नहीं है।

कल्याणी ! तुम्हें इस स्तोत्रको सदा गुप्त रखना चाहिये और अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये केवल इसीका पाठ करना चाहिये। जिसका हृदय संशयसे दूषित हो, जो भगवान् विष्णुका भक्त न हो, जिसमें श्रद्धा और भक्तिका अभाव हो तथा जो भगवान् विष्णुको साधारण देवता समझता हो, ऐसे पुरुषको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो अपना पुत्र, शिष्य अथवा सुहृद् हो, उसे उसका हित करनेकी इच्छासे इस श्रीविष्णु-सहस्रनामका उपदेश देना चाहिये। अल्पबुद्धि पुरुष इसे नहीं ग्रहण करेंगे। देवर्षि नारद मेरे प्रसादसे कलियुगमें तत्काल फल देनेवाले इस स्तोत्रको ग्रहण करके कल्पग्राम (कलापग्राम) में ले जायेंगे, जिससे भाग्यहीन लोगोंका दुःख दूर हो जायगा। भगवान् विष्णुसे बढ़कर कोई धाम नहीं है, श्रीविष्णुसे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है, श्रीविष्णुसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और श्रीविष्णुसे भिन्न कोई मन्त्र नहीं है। भगवान् श्रीविष्णुसे भिन्न कोई सत्य नहीं है, श्रीविष्णुसे बढ़कर जप नहीं है, श्रीविष्णुसे उत्तम ध्यान नहीं है तथा श्रीविष्णुसे श्रेष्ठ कोई गति नहीं है। जिस पुरुषकी भगवान् जनार्दनके चरणोंमें भक्ति है, उसे अनेक मन्त्रोंके जप, बहुत विस्तारवाले शास्त्रोंके स्वाध्याय तथा सहस्रों वाजपेय यज्ञोंके अनुष्ठान करनेकी क्या आवश्यकता है? मैं सत्य-सत्य कहता हूँ—भगवान् विष्णु सर्वतीर्थमय हैं, भगवान् विष्णु सर्वशास्त्रमय हैं


* पद्मपुराण, उत्तरखण्डका ७२ वाँ अध्याय।

उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७२३


तथा भगवान् विष्णु सर्वयज्ञमय हैं।* यह सब मैंने सम्पूर्ण विश्वका सर्वस्वभूत सार-तत्त्व बतलाया है।

पार्वती बोलीं— जगत्पते! आज मैं धन्य हो गयी। आपने मुझपर बड़ा अनुग्रह किया। मैं कृतार्थ हो गयी, क्योंकि आपके मुखसे यह परम दुर्लभ एवं गोपनीय स्तोत्र मुझे सुननेको मिला है। देवेश! मुझे तो संसारकी अवस्था देखकर आश्चर्य होता है। हाय! कितने महान् कष्टकी बात है कि सम्पूर्ण सुखोंके दाता श्रीहरिके विद्यमान रहते हुए भी मूर्ख मनुष्य संसारमें क्लेश उठा रहे हैं।† भला, लक्ष्मीके प्रियतम भगवान् मधुसूदनसे बढ़कर दूसरा कौन देवता है। आप-जैसे योगेश्वर भी जिनके तत्त्वका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, उन श्रीपुरुषोत्तमसे बड़ा दूसरा कौन-सा पद है। उनको जाने बिना ही अपनेको ज्ञानी माननेवाले मूढ़ मनुष्य दूसरे किस देवताकी आराधना करते हैं। अहो! सर्वेश्वर भगवान् विष्णु सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंसे भी उत्तम हैं। स्वामिन्! जो आपके भी आदिगुरु हैं, उन्हें मूढ़ मनुष्य सामान्य दृष्टिसे देखते हैं; किन्तु प्रभो! सर्वेश्वर! यदि मैं अर्थ-कामादिमें आसक्त होने या केवल आपमें ही मन लगाये रहनेके कारण अथवा प्रमादवश ही समूचे सहस्रनामस्तोत्रका पाठ न कर सकूँ, तो उस अवस्थामें जिस किसी भी एक नामसे मुझे सम्पूर्ण सहस्रनामका फल प्राप्त हो जाय, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।‡

महादेवजी बोले— सुमुखि! मैं तो 'राम! राम! राम!' इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्रीरामानाममें ही निरन्तर रमण किया करता हूँ। रामनाम सम्पूर्ण सहस्रनामके समान है।§ पार्वती! यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र भी प्रतिदिन विशेषरूपसे इस श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करें तो वे धन-धान्यसे युक्त होकर भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होते हैं।$ देवि! जो लोग पूर्वोक्त अङ्गन्याससे युक्त श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं। सुमुखि! बार-बार बहुत कहनेसे क्या लाभ; थोड़ेमें इतना ही जान लो कि भगवान् विष्णुका सहस्रनाम परम मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसके पाठमें उतावली नहीं करनी चाहिये। यदि उतावली की जाती है, तो आयु और धनका नाश होता है। इस पृथ्वीपर जम्बूद्वीपके अंदर जितने भी तीर्थ हैं, वे सब सदा वहीं निवास करते हैं, जहाँ श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ होता है। जहाँ श्रीविष्णुसहस्रनामकी स्थिति होती है, वहीं गङ्गा, यमुना, कृष्णवेणी, गोदावरी, सरस्वती और समस्त तीर्थ निवास करते हैं। यह परम पवित्र स्तोत्र भक्तोंको सदा प्रिय है। भक्तिभावसे भावित चित्तके द्वारा सदा ही इस स्तोत्रका चिन्तन करना चाहिये। जो मनीषी पुरुष परम उत्तम श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका पाठ करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होकर श्रीहरिके समीप जाते हैं। जो लोग सूर्योदयके समय इसका पाठ और जप करते हैं, उनके बल, आयु और लक्ष्मीकी प्रतिदिन वृद्धि होती है। एक-एक नामका उच्चारण करके श्रीहरिको तुलसीदल अर्पण करनेसे जो पूजा सम्पन्न होती


* नास्ति विष्णोः परं धाम नास्ति विष्णोः परं तपः। नास्ति विष्णोः परो धर्मो नास्ति मन्त्रो ह्यवैष्णवः ॥
नास्ति विष्णोः परं सत्यं नास्ति विष्णोः परो जपः। नास्ति विष्णोः परं ध्यानं नास्ति विष्णोः परा गतिः ॥
किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः शास्त्रैः किं बहुविस्तरैः। वाजपेयसहस्रैर्वा भक्तिर्यस्य जनार्दने ॥
सर्वतीर्थमयो विष्णुः सर्वशास्त्रमयः प्रभुः। सर्वक्रतुमयो विष्णुः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ (७२। ३१३-३१६)
† अहो बत महत्कष्टं समस्तसुखदे हरौ। विद्यमानेऽपि देवेश मूढाः क्लिश्यन्ति संसृतौ ॥ (७२। ३१८)
‡ कामाद्यासक्तचित्तत्वात्किन्तु सर्वेश्वर प्रभो। तन्मयत्वात्प्रमादाद्वा शक्नोमि पठितुं न चेत् ॥
विष्णोः सहस्रनामैतत्प्रत्यहं वृषभध्वज। नाम्रैकेन तु येन स्यात्तत्फलं ब्रूहि मे प्रभो ॥ (७२। ३३३-३३४)
§ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ (७२। ३३५)
$ ब्राह्मणा वा क्षत्रिया वा वैश्या वा गिरिकन्यके। शूद्रा वाथ विशेषेण पठन्त्यनुदिनं यदि ॥
धनधान्यसमायुक्ता यान्ति विष्णोः परं पदम्। ..................................... (७३। १-३)

सं०प०पु० २४—

७२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


है, उसे कोटि यज्ञोंकी अपेक्षा भी अधिक फल देनेवाली समझना चाहिये। पार्वती ! जो द्विज रास्ता चलते हुए भी श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करते हैं, उन्हें मार्गजनित दोष नहीं प्राप्त होते। जो लोग भगवान् केशवके इस माहात्म्यका श्रवण करते हैं, वे मनुष्योंमें श्रेष्ठ, पवित्र एवं पुण्यस्वरूप हैं।

गृहस्थ-आश्रमकी प्रशंसा तथा दान-धर्मकी महिमा

श्रीमहादेवजी कहते हैं— देवि ! सुनो, अब मैं धर्मके उत्तम माहात्म्यका वर्णन करूँगा, जिसका श्रवण करनेसे इस पृथ्वीपर फिर कभी जन्म नहीं होता। धर्मसे अर्थ, काम और मोक्ष—तीनोंकी प्राप्ति होती है; अतः जो धर्मके लिये चेष्टा करता है, वही विशेषरूपसे विद्वान् माना गया है।* जो कभी कुत्सित कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता, वह घरपर भी पाँचों इन्द्रियोंका संयमरूप तप कर सकता है। जिसकी आसक्ति दूर हो गयी है, उसके लिये घर भी तपोवनके ही समान है; अतः गृहस्थाश्रमको स्वधर्म बताया गया है।† गिरिराजकिशोरी ! जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, उनके लिये इस गृहस्थ आश्रमको पार करना कठिन है; वे इस शुभ एवं श्रेष्ठतम आश्रमका विनाश कर डालते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंने मनीषी पुरुषोंके लिये गृहस्थ-धर्मको बहुत उत्तम बताया है। साधु पुरुष वनमें तपस्या करके जब भूखसे पीड़ित होता है, तब सदा अन्नदाता गृहस्थके ही घर आता है। वह गृहस्थ जब भक्तिपूर्वक उस भूखे अतिथिको अन्न देता है तो उसकी तपस्यामें हिस्सा बँटा लेता है; अतः मनुष्य समस्त आश्रमोंमें श्रेष्ठ इस गृहस्थाश्रमका सदा पालन करता है और इसीमें मानवोचित भोगोंका उपभोग करके अन्तमें स्वर्गको जाता है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। देवि ! सदा गृहस्थ-धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंके पास पाप कैसे आ सकता है। गृहस्थाश्रम परम पवित्र है। घर सदा तीर्थके समान पावन है। इस पवित्र गृहस्थाश्रममें रहकर विशेषरूपसे दान देना चाहिये। यहाँ देवताओंका पूजन होता है, अतिथियोंको भोजन दिया जाता है और [थके-माँदे] राहगीरोंको ठहरनेका स्थान मिलता है; अतः गृहस्थाश्रम परम धन्य है।‡ ऐसे गृहस्थाश्रममें रहकर जो लोग ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उन्हें आयु, धन और संतानकी कभी कमी नहीं होती।

शुभ समय आनेपर चन्द्रदेवकी पूजा करके नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान करनेके पश्चात् अपनी शक्तिके अनुसार दान देना चाहिये। दानसे मनुष्य निस्संदेह अपने पापोंका नाश कर डालता है। दानके प्रभावसे इस लोकमें अभीष्ट भोगोंका उपभोग करके मनुष्य सनातन श्रीविष्णुको प्राप्त होता है। जो अभक्ष्य-भक्षणमें प्रवृत्त रहनेवाला, गर्भस्थ बालककी हत्या करनेवाला, गुरु-पत्नीके साथ सम्भोग करनेवाला तथा झूठ बोलनेवाला है, ये सभी नीच योनियोंमें जन्म लेते हैं। जो यज्ञ करानेके योग्य नहीं है ऐसे मनुष्यसे जो यज्ञ कराता, लोकनिन्दित पुरुषसे याचना करता, सदा कोपसे युक्त रहता, साधुओंको पीड़ा देता, विश्वासघात करता, अपवित्र रहता और धर्मकी निन्दा करता है—इन पापोंसे युक्त होनेपर मनुष्यकी आयु शीघ्र नष्ट हो जाती है, ऐसा जानकर [पापका सर्वथा त्याग करके] विशेषरूपसे दान करना उचित है।


* धर्मादर्थं च कामं च मोक्षं च त्रितयं लभेत्। तस्माद्धर्मं समीहेत विद्वान् स बहुधा स्मृतः ॥ (७५। २)
† गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपस्त्वकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते। निवृत्तरागस्य तपोवनं गृहं गृहाश्रमोऽतो गदितः स्वधर्मः ॥ (७५। ८)
‡ गृहाश्रमः पुण्यतमः सर्वदा तीर्थवद्गृहम्। अस्मिन् गृहाश्रमे पुण्ये दानं देयं विशेषतः ॥
देवानां पूजनं यत्र अतिथीनां तु भोजनम्। पथिकानां च शरणमतो धन्यतमो मतः ॥ (७५। १२-१३)

· उत्तरखण्ड ] * गण्डकी नदीका माहात्म्य तथा अभ्युदय एवं और्ध्वदैहिक नामक स्तोत्रका वर्णन * ७२५


गण्डकी नदीका माहात्म्य तथा अभ्युदय एवं और्ध्वदैहिक नामक स्तोत्रका वर्णन

**श्रीमहादेवजी कहते हैं—**देवि ! अब मैं गण्डकी नदीके माहात्म्यका विधिपूर्वक वर्णन करूँगा। पार्वती ! गङ्गाका जैसा माहात्म्य है, वैसा ही गण्डकी नदीका भी बताया गया है। जहाँसे नाना प्रकारकी शालग्राम-शिला प्रकट होती है, उस गण्डकी नदीकी महिमाका बड़े-बड़े मुनियोंने वर्णन किया है। अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज—सभी प्राणी उसके दर्शनमात्रसे पवित्र हो जाते हैं। महानदी गण्डकी उत्तरमें प्रकट हुई है। गिरिजें ! वह स्मरण करनेपर निश्चय ही सब पापोंका नाश कर देती है। वहाँ कल्याण प्रदान करनेवाले भगवान् नारायण सदा विद्यमान रहते हैं, ऋषियोंका भी वहाँ निवास है तथा सम्पूर्ण देवता, रुद्र, नाग और यक्ष विशेषरूपसे वहाँ रहा करते हैं। उस स्थलपर भगवान्‌की अनेक रूपवाली और सुखदायिनी चौबीस अवतारोंकी मूर्तियाँ उपलब्ध होती हैं। एक मत्स्यरूप है, दूसरी कच्छपरूप; इसी प्रकार वाराह, नृसिंह और वामनकी भी कल्याणदायिनी मूर्तियाँ हैं। श्रीराम, परशुराम तथा श्रीकृष्णकी भी मोक्षदायिनी मूर्ति देखी जाती है। श्रीविष्णुनामसे प्रसिद्ध उस स्थलपर उपर्युक्त मूर्तियोंके सिवा बुद्धकी मूर्ति भी बतायी गयी है। कल्कि और महर्षि कपिलकी भी पुण्यमयी मूर्ति उपलब्ध होती है, इनके सिवा और भी भाँति-भाँतिके आकार-वाली बहुत-सी मूर्तियाँ देखी जाती हैं। उन सबके अनेक रूप हैं और उनकी संख्या भी बहुत है। वह गण्डकी नामकी गङ्गा परम पुण्यमयी तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली है। उस भूमिपर आज भी मेरे साथ भगवान् हृषीकेश नियमपूर्वक निवास करते हैं, उसके जलका स्पर्श करनेमात्रसे मनुष्य भ्रूणहत्या, बालहत्या और गोहत्या आदि समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

गण्डकी नदीके जलका दर्शन करनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जातिके मनुष्य—सभी निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं; विशेषतः पापियोंके लिये तो यह त्रिवेणीके समान पुण्यमयी है। जहाँ ब्रह्महत्यारेकी भी मुक्ति हो जाती है, वहाँ औरोंके लिये क्या कहना है ? पार्वती ! मैं सदा हर समय वहाँ जाता रहता हूँ; वह तीर्थोंमें तीर्थराज है—यह बात ब्रह्माजीने कही थी। मुनियोंने वहाँ स्नान और दानका विधान किया है। भगवान् विष्णुद्वारा पूर्वकालमें निर्मित हुआ वह क्षेत्र महांन्-से-महान् है। वह वैष्णव पुरुषोंको उत्तम गति प्रदान करनेवाला और परम पावन माना गया है। देवि ! इस संसारमें मनुष्यका जन्म सदा दुर्लभ है; उसमें भी गण्डकी नदीका तीर्थ और वहाँ भी श्रीविष्णुक्षेत्र अत्यन्त दुर्लभ है। अतः श्रेष्ठ द्विजोंको आषाढ़ मासमें वहाँकी यात्रा करनी चाहिये। वरानने ! मैं बारंबार कहता हूँ कि गण्डकीके समान कोई तीर्थ, द्वादशीके तुल्य कोई व्रत और श्रीविष्णुसे भिन्न कोई देवता नहीं है। जो नरश्रेष्ठ गण्डकी नदीका माहात्म्य श्रवण करते हैं, वे इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीविष्णुधामको जाते हैं।

महादेव उवाच—
शृणु सुन्दरि वक्ष्यामि स्तोत्रं चाभ्युदयं ततः।
यच्छ्रुत्वा मुच्यते पापी ब्रह्महा नात्र संशयः ॥ १ ॥
धाता वै नारदं प्राह तदहं तु ब्रवीमि ते।
तमुवाच ततो देवः स्वयम्भूरमितद्युतिः ॥ २ ॥
प्रगृह्य रुचिरं बाहुं स्मारये चौर्ध्वदेहिकम्।

**महादेवजी कहते हैं—**सुन्दरी ! सुनो, अब मैं अभ्युदयकारी स्तोत्रका वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा भी निस्सन्देह मुक्त हो जाता है। ब्रह्माजीने देवर्षि नारदसे इस स्तोत्रका वर्णन किया था, वही मैं तुम्हें बताता हूँ। [पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जब रावणका वध कर चुके, उस समय समस्त देवता उनकी स्तुति करनेके लिये आये। उसी अवसरपर] अमित-तेजस्वी भगवान् ब्रह्माने श्रीरघुनाथजीकी सुन्दर बाँह हाथमें लेकर जो उनकी स्तुति की थी, वह 'और्ध्वदैहिक स्तोत्र' के नामसे प्रसिद्ध है। आज मैं उसीको स्मरण करके तुमसे कहता हूँ।

भवान्नारायणः श्रीमान् देवश्चक्रायुधो हरिः ॥ ३ ॥
शार्ङ्गधारी हृषीकेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
अजितः खड्गभिज्जिष्णुः कृष्णश्चैव सनातनः ॥ ४ ॥

७२६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यभवदात्मकः।
अक्षरं ब्रह्म सत्यं तु आदौ चान्ते च राघव ॥ ५॥
लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वाक्सेनश्चतुर्भुजः।
सेनानी रक्षणस्त्वं च वैकुण्ठस्त्वं जगत्प्रभो ॥ ६॥

श्रीब्रह्माजी बोले— श्रीरघुनन्दन ! आप समस्त जीवोंके आश्रयभूत नारायण, लक्ष्मीसे युक्त, स्वयंप्रकाश एवं सुदर्शन नामक चक्र धारण करनेवाले श्रीहरि हैं। शार्ङ्ग नामक धनुषको धारण करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही इन्द्रियोंके स्वामी एवं पुराणप्रतिपादित पुरुषोत्तम हैं। आप कभी किसीसे भी परास्त नहीं होते। शत्रुओंकी तलवारोंको टूक-टूक करनेवाले, विजयी और सदा एकरस रहनेवाले—सनातन देवता सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण भी आप ही हैं। आप एक दाँतवाले भगवान् वराह हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों काल आपके ही रूप हैं। श्रीरघुनन्दन ! इस विश्वके आदि, मध्य और अन्तमें जो सत्यस्वरूप अविनाशी परब्रह्म स्थित है, वह आप ही हैं। आप ही लोकोंके परम धर्म हैं। आपको युद्धके लिये तैयार होते देख दैत्योंकी सेना चारों ओर भाग खड़ी होती है, इसीलिये आप विष्वाक्सेन कहलाते हैं। आप ही चार भुजा धारण करनेवाले श्रीविष्णु हैं।

प्रभवश्चाव्ययस्त्वं च उपेन्द्रो मधुसूदनः।
पृश्निगर्भो धृतार्चिस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् ॥ ७॥
शरण्यं शरणं च त्वामाहुः सेन्द्रा महर्षयः।
ऋक्सामश्रेष्ठो वेदात्मा शतजिह्वो महर्षभः ॥ ८॥
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारः परन्तपः।
शतधन्वा वसुः पूर्वं वसूनां त्वं प्रजापतिः ॥ ९॥

आप सबकी उत्पत्तिके स्थान और अविकारी हैं। इन्द्रके छोटे भाई वामन एवं मधु दैत्यके प्राणहन्ता श्रीविष्णु भी आप ही हैं। आप अदिति या देवकीके गर्भमें अवतीर्ण होनेके कारण पृश्निगर्भ कहलाते हैं। आपने महान् तेज धारण कर रखा है। आपकी ही नाभिसे विराट् विश्वकी उत्पत्तिका कारणभूत कमल प्रकट हुआ था। आप शान्तस्वरूप होनेके कारण युद्धका अन्त करनेवाले हैं। इन्द्र आदि देवता तथा सम्पूर्ण महर्षिगण आपको ही सबका आश्रय एवं शरणदाता कहते हैं। ऋग्वेद और सामवेदमें आप ही सबसे श्रेष्ठ बताये गये हैं। आप सैकड़ों विधिवाक्यरूप जिह्वाओंसे युक्त वेदस्वरूप महान् वृषभ हैं। आप ही यज्ञ, आप ही वषट्कार और आप ही ॐकार हैं। आप शत्रुओंको ताप देनेवाले तथा सैकड़ों धनुष धारण करनेवाले हैं। आप ही वसु, वसुओंके भी पूर्ववर्ती एवं प्रजापति हैं।

त्रयाणामपि लोकानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः।
रुद्राणामष्टमो रुद्रः साध्यानामपि पञ्चमः ॥ १०॥
अश्विनौ चापि कर्णौ ते सूर्यचन्द्रौ च चक्षुषी।
अन्ते चादौ च मध्ये च दृश्यसे त्वं परन्तप ॥ ११॥
प्रभवो निधनं चासि न विदुः को भवानिति।
दृश्यसे सर्वलोकेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ १२॥
दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु गुहासु च।
सहस्रनयनः श्रीमाञ्शतशीर्षः सहस्रपात् ॥ १३॥

आप तीनों लोकोंके आदिकर्ता और स्वयं ही अपने प्रभु (परम स्वतन्त्र) हैं। आप रुद्रोंमें आठवें रुद्र और साध्योंमें पाँचवें साध्य हैं। दोनों अश्विनीकुमार आपके कान तथा सूर्य और चन्द्रमा नेत्र हैं। परंतप ! आप ही आदि, मध्य और अन्तमें दृष्टिगोचर होते हैं। सबकी उत्पत्ति और लयके स्थान भी आप ही हैं। आप कौन हैं—इस बातको ठीक-ठीक कोई भी नहीं जानते। सम्पूर्ण लोकोंमें, गौओंमें और ब्राह्मणोंमें आप ही दिखायी देते हैं तथा समस्त दिशाओंमें, आकाशमें, पर्वतोंमें और गुफाओंमें भी आपकी ही सत्ता है। आप शोभासे सम्पन्न हैं। आपके सहस्रों नेत्र, सैकड़ों मस्तक और सहस्रों चरण हैं।

त्वं धारयसि भूतानि वसुधां च सपर्वताम्।
अन्तःपृथिव्यां सलिले दृश्यसे त्वं महोरगः ॥ १४॥
त्रीँल्लोकान्धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान्।

आप सम्पूर्ण प्राणियोंको तथा पर्वतोंसहित पृथ्वीको भी धारण करते हैं। पृथ्वीके भीतर पाताललोकमें और क्षीरसागरके जलमें आप ही महान् सर्प—शेषनागके रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं। राम ! आप उस स्वरूपसे देवता, गन्धर्व और दानवोंके सहित तीनों लोकोंको धारण करते हैं।

उत्तरखण्ड ] * गण्डकी नदीका माहात्म्य तथा अभ्युदय एवं और्ध्वदैहिक नामक स्तोत्रका वर्णन * [ ७२७


अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥ १५ ॥
देवा रोमाणि गात्रेषु निर्मितास्ते स्वमायया ।
निमेषस्ते स्मृता रात्रिरुन्मेषो दिवसस्तथा ॥ १६ ॥
श्रीराम ! मैं (ब्रह्मा) आपका हृदय हूँ, सरस्वती देवी जिह्वा हैं तथा आपके द्वारा अपनी मायासे उत्पन्न किये हुए देवता आपके अङ्गोंमें रोम हैं। आपका आँख मूँदना रात्रि और आँख खोलना दिन है।

संस्कारस्तेऽभवद्देहो नैतदस्ति विना त्वया ।
जगत्सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं च वसुधातलम् ॥ १७ ॥
अग्निः कोपः प्रसादस्ते शेषः श्रीमांश्च लक्ष्मणः ।
शरीर और संस्कारकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। आपके बिना इस जगत्‌की स्थिति नहीं है। सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है, पृथ्वी आपकी स्थिरता है, अग्नि आपका कोप है और शेषावतार श्रीमान् लक्ष्मण आपके प्रसाद हैं।

त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥ १८ ॥
त्वयेन्द्रश्च कृतो राजा बलिर्बद्धो महासुरः ।
लोकान् संहृत्य कालस्त्वं निवेश्यात्मनि केवलम् ॥ १९ ॥
करोष्येकार्णवं घोरं दृश्यादृश्ये च नान्यथा ।
पूर्वकालमें वामनरूप धारण कर आपने अपने तीन पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे तथा महान् असुर बलिको बाँधकर इन्द्रको स्वर्गका राजा बनाया था। आप ही कालरूपसे समस्त लोकोंका संहार करके अपने भीतर लीनकर सब ओर केवल भयङ्कर एकार्णवका दृश्य उपस्थित करते हैं। उस समय दृश्य और अदृश्यमें कुछ भेद नहीं रह जाता।'

त्वया सिंहवपुः कृत्वा परमं दिव्यमद्भुतम् ॥ २० ॥
भयदः सर्वभूतानां हिरण्यकशिपुर्हतः ।
आपने नृसिंहावतारके समय परम अद्भुत एवं दिव्य सिंहका शरीर धारण करके समस्त प्राणियोंको भय देनेवाले हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था।

त्वमश्ववदनो भूत्वा पातालतलमाश्रितः ॥ २१ ॥
संहृतं परमं दिव्यं रहस्यं वै पुनः पुनः ।
आपने ही हयग्रीव अवतार धारण करके पातालके भीतर प्रवेशकर दैत्योंद्वारा अपहरण किये हुए वेदोंके परम रहस्य और यज्ञ-यागादिके प्रकरणोंको पुनः प्राप्त किया।


यत्परं श्रूयते ज्योतिर्यत्परं श्रूयते परम् ॥ २२ ॥
यत्परं परतश्चैव परमात्मेति कथ्यते ।
परो मन्त्रः परं तेजस्त्वमेव हि निगद्यसे ॥ २३ ॥
जो परम ज्योतिःस्वरूप तत्त्व सुना जाता है, जो परम उत्कृष्ट परब्रह्मके नामसे श्रवणगोचर होता है, जिसे परात्पर परमात्मा कहा जाता है तथा जो परम मन्त्र और परम तेज है, उसके रूपमें आपके ही स्वरूपका प्रतिपादन किया जाता है।

हव्यं कव्यं पवित्रं च प्राप्तिः स्वर्गापवर्गयोः ।
स्थित्युत्पत्तिविनाशांस्ते त्वामाहुः प्रकृतेः परम् ॥ २४ ॥
यज्ञश्च यजमानश्च होता चाध्वर्युुरेव च ।
भोक्ता यज्ञफलानां च त्वं वै वेदैश्च गीयसे ॥ २५ ॥
हव्य (यज्ञ), कव्य (श्राद्ध), पवित्र, स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति, संसारकी उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार—ये सब आपके ही कार्य हैं। ज्ञानी पुरुष आपको प्रकृतिसे पर बतलाते हैं। वेदोंके द्वारा आप ही यज्ञ, यजमान, होता, अध्वर्यु तथा यज्ञफलोंके भोक्ता कहे जाते हैं।

सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ।
वधार्थं रावणस्य त्वं प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ॥ २६ ॥
सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं और आप स्वयंप्रकाश विष्णु, कृष्ण एवं प्रजापति हैं। आपने रावणका वध करनेके लिये ही मानव-शरीरमें प्रवेश किया है।

तदिदं च त्वया कार्यं कृतं कर्मभृतां वर ।
निहतो रावणो राम प्रहृष्टा देवताः कृताः ॥ २७ ॥
कर्म करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ! आपने हमारा यह कार्य पूरा कर दिया। रावण मारा गया, इससे सम्पूर्ण देवताओंको आपने बहुत प्रसन्न कर दिया है।

अमोघं देव वीर्यं ते नमोऽमोघपराक्रम ।
अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः ॥ २८ ॥
देव ! आपका बल अमोघ है। अचूक पराक्रम कर दिखानेवाले श्रीराम ! आपको नमस्कार है। राम ! आपके दर्शन और स्तवन भी अमोघ हैं।

अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ।
ये च त्वां देव संभक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ॥ २९ ॥
देव ! जो मनुष्य इस पृथ्वीपर आप पुराण