भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७१६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


वातासुरारिः केशिघ्नो धेनुकारिर्गवीश्वरः ।
दामोदरो गोपदेवो यशोदानन्ददायकः ॥ २५५ ॥
७५४ वातासुरारिः—तृणावर्तके शत्रु, ७५५ केशिघ्नः—केशी नामक दैत्यको मारनेवाले, ७५६ धेनुकारिः—धेनुकासुरके शत्रु, ७५७ गवीश्वरः—गौओंके स्वामी, ७५८ दामोदरः—उदरमें यशोदा मैयाद्वारा रस्सी बाँधी जानेके कारण दामोदर नाम धारण करनेवाले, ७५९ गोपदेवः—ग्वालोंके इष्टदेव, ७६० यशोदानन्ददायकः—यशोदा मैयाको आनन्द देनेवाले ॥ २५५ ॥

कालीयमर्दनः सर्वगोपगोपीजनप्रियः ।
लीलागोवर्धनधरो गोविन्दो गोकुलोत्सवः ॥ २५६ ॥
७६१ कालीयमर्दनः—कालिय नागका मान-मर्दन करनेवाले, ७६२ सर्वगोपगोपीजनप्रियः—समस्त गोपों और गोपियोंके प्रियतम, ७६३ लीलागोवर्धनधरः—अनायास ही गोवर्धन पर्वतको अँगुलीपर उठा लेनेवाले, ७६४ गोविन्दः—इन्द्रकी वर्षासे गौओंकी रक्षा करनेके कारण कामधेनुद्वारा 'गोविन्द' पदपर अभिषिक्त भगवान् श्रीकृष्ण, ७६५ गोकुलोत्सवः—गोकुलनिवासियोंको निरन्तर आनन्द प्रदान करनेके कारण उत्सवरूप ॥ २५६ ॥

अरिष्टमथनः कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदः ।
सद्यःकुवलयापीडघाती चाणूरमर्दनः ॥ २५७ ॥
७६६ अरिष्टमथनः—अरिष्टासुरको नष्ट करनेवाले, ७६७ कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदः—प्रेमविभोर गोपीको मुक्ति प्रदान करनेवाले, ७६८ सद्यःकुवलयापीडघाती—कुवलयापीड नामक हाथीको शीघ्र मार गिरानेवाले, ७६९ चाणूरमर्दनः—चाणूरनामक मल्लको कुचल डालनेवाले ॥ २५७ ॥

कंसारिरुग्रसेनादिराज्यव्यापारितामरः ।
सुधर्माङ्कितभूलोको जरासंधबलान्तकः ॥ २५८ ॥
७७० कंसारिः—मथुराके राजा कंसके शत्रु, ७७१ उग्रसेनादिराज्यव्यापारितामरः—राज्य-सम्बन्धी कार्योंमें उग्रसेन आदिके रूपमें देवताओंको ही नियुक्त करनेवाले, ७७२ सुधर्माङ्कितभूलोकः—देवोचित सुधर्मा नामक सभासे भूलोकको भी सुशोभित करनेवाले, ७७३ जरासंधबलान्तकः—जरासंधकी सेनाका संहार करनेवाले ॥ २५८ ॥

त्यक्तभग्नजरासंधो भीमसेनयशःप्रदः ।
सांदीपनिमृतापत्यदाता कालान्तकादिजित् ॥ २५९ ॥
७७४ त्यक्तभग्नजरासंधः—युद्धसे भगे हुए जरासंधको जीवित छोड़ देनेवाले, ७७५ भीमसेनयशःप्रदः—युक्तिसे जरासंधका वध कराकर भीमसेनको यश प्रदान करनेवाले, ७७६ सांदीपनिमृतापत्यदाता—अपने विद्यागुरु सांदीपनिके मरे हुए पुत्रको पुनः ला देनेवाले, ७७७ कालान्तकादिजित्—काल और अन्तक आदिपर विजय पानेवाले ॥ २५९ ॥

समस्तनारकत्राता सर्वभूपतिकोटिजित् ।
रुक्मिणीरमणो रुक्मिशासनो नरकान्तकः ॥ २६० ॥
७७८ समस्तनारकत्राता—शरणमें आनेपर नरकमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंका भी उद्धार करनेवाले, ७७९ सर्वभूपतिकोटिजित्—रुक्मिणीके विवाहमें करोड़ोंकी संख्यामें आये हुए समस्त राजाओंको परास्त करनेवाले, ७८० रुक्मिणीरमणः—रुक्मिणीके साथ रमण करनेवाले, ७८१ रुक्मिशासनः—रुक्मीको दण्ड देनेवाले, ७८२ नरकान्तकः—नरकासुरका विनाश करनेवाले ॥ २६० ॥

समस्तसुन्दरीकान्तो मुरारिर्गरुडध्वजः ।
एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वरः ॥ २६१ ॥
७८३ समस्तसुन्दरीकान्तः—समस्त सुन्दरियाँ जिन्हें पानेकी इच्छा करती हैं, ७८४ मुरारिः—मुर नामक दानवके शत्रु, ७८५ गरुडध्वजः—गरुड़के चिह्नसे चिह्नित ध्वजावाले, ७८६ एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वरः—अकेले ही रुद्र, सूर्य और वायु आदि समस्त लोकपालोंको जीतनेवाले ॥ २६१ ॥

देवेन्द्रदर्पहा कल्पद्रुमालंकृतभूतलः ।
बाणबाहुसहस्रच्छिन्नन्द्यादिगणकोटिजित् ॥ २६३ ॥
७८७ देवेन्द्रदर्पहा—देवराज इन्द्रका अभिमान चूर्ण करनेवाले, ७८८ कल्पद्रुमालंकृतभूतलः—कल्पवृक्षको स्वर्गसे लाकर उसके द्वारा भूतलकी शोभा