भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७१७ ************************************************************************************

बढ़ानेवाले, ७८९ बाणबाहुसहस्रच्छित्—बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका उच्छेद करनेवाले, ७९० नन्द्यादिगणकोटिजित्—नन्दी आदि करोड़ों शिवगणोंको परास्त करनेवाले ॥ २६२ ॥
लीलाजितमहादेवो महादेवैकपूजितः ।
इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः पाण्डवैकधृक् ॥ २६३ ॥
७९१ लीलाजितमहादेवः—अनायास ही महादेवजीपर विजय पानेवाले, ७९२ महादेवैकपूजितः—महादेवजीके द्वारा एकमात्र पूजित, ७९३ इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः—इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये अर्जुनको अखण्ड विजय प्रदान करनेवाले, ७९४ पाण्डवैकधृक्—पाण्डवोंके एकमात्र रक्षक ॥ २६३ ॥
काशिराजशिरश्छेत्ता रुद्रशक्त्येकमर्दनः ।
विश्वेश्वरप्रसादाढ्यः काशिराजसुतार्दनः ॥ २६४ ॥
७९५ काशिराजशिरश्छेत्ता—काशिराजका मस्तक काट देनेवाले, ७९६ रुद्रशक्त्येकमर्दनः—रुद्रकी शक्तिके एकमात्र मर्दन करनेवाले, ७९७ विश्वेश्वरप्रसादाढ्यः—काशीविश्वनाथकी प्रसन्नता प्राप्त करनेवाले, ७९८ काशिराजसुतार्दनः—काशीनरेशके पुत्रको पीड़ा देनेवाले ॥ २६४ ॥
शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसीकाशीनिर्दग्धनायकः ।
काशीशगणकोटिघ्नो लोकशिक्षाद्विजार्चकः ॥ २६५ ॥
७९९ शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसी—शङ्करजीकी प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, ८०० काशीनिर्दग्धनायकः—जिन्होंने काशीको जलाकर अनाथ-सी कर दिया था, वे भगवान् श्रीकृष्ण, ८०१ काशीशगणकोटिघ्नः—काशीपति विश्वेश्वरके करोड़ों गणोंका नाश करनेवाले, ८०२ लोकशिक्षाद्विजार्चकः—लोकको शिक्षा देनेके लिये सुदामा आदि ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले ॥ २६५ ॥
शिवतीव्रतपोवश्यः पुराशिववरप्रदः ।
शङ्करैकप्रतिष्ठाधृक्स्वांशशङ्करपूजकः ॥ २६६ ॥
८०३ शिवतीव्रतपोवश्यः—शिवजीकी तीव्र तपस्याके वशीभूत होनेवाले, ८०४ पुराशिववरप्रदः—पूर्वकालमें शिवजीको वरदान देनेवाले, ८०५ शङ्करैकप्रतिष्ठाधृक्—भगवान् शङ्करकी एकमात्र प्रतिष्ठा करनेवाले, ८०६—स्वांशशङ्करपूजकः—अपने अंशभूत शङ्करकी पूजा करनेवाले ॥ २६६ ॥
शिवकन्याव्रतपतिः कृष्णरूपशिवारिहा ।
महालक्ष्मीवपुर्गौरीत्राता वैदलवृत्रहा ॥ २६७ ॥
८०७ शिवकन्याव्रतपतिः—शिवकी कन्याके व्रतकी रक्षा करनेवाले, ८०८ कृष्णरूपशिवारिहा—कृष्णरूपसे शिवके शत्रु (भस्मासुर) का संहार करनेवाले, ८०९ महालक्ष्मीवपुर्गौरीत्राता—महालक्ष्मीका शरीर धारण करनेवाली पार्वतीके रक्षक, ८१० वैदलवृत्रहा—वैदलवृत्र नामक दैत्यका वध करनेवाले ॥ २६७ ॥
स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत् ।
यमुनापतिरानीतपरलीनद्विजात्मजः ॥ २६८ ॥
८११ स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत्—अपने तेजःस्वरूप राजा मुचुकुन्दके द्वारा केवल कालयवनका नाश कराकर उन्हें अभीष्ट वरदान देनेवाले, ८१२ यमुनापतिः—सूर्यकन्या यमुनाको पत्नीरूपसे ग्रहण करनेवाले, ८१३ आनीतपरलीनद्विजात्मजः—मरे हुए ब्राह्मण-पुत्रोंको पुनः लानेवाले ॥ २६८ ॥
श्रीदामरङ्कभक्तार्थभूम्यानीतेन्द्रवैभवः ।
दुर्वृत्तशिशुपालैकमुक्तदो द्वारकेश्वरः ॥ २६९ ॥
८१४ श्रीदामरङ्कभक्तार्थभूम्यानीतेन्द्रवैभवः—अपने दीन भक्त श्रीदामा (सुदामा) के लिये पृथ्वीपर इन्द्रके समान वैभव उपस्थित करनेवाले, ८१५ दुर्वृत्तशिशुपालैकमुक्तदो—दुराचारी शिशुपालको एकमात्र मोक्ष प्रदान करनेवाले, ८१६ द्वारकेश्वरः—द्वारकाके स्वामी ॥ २६९ ॥
आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकृत् ।
अक्रूरोद्धवमुख्यैकभक्तः स्वच्छन्दमुक्तिदः ॥ २७० ॥
८१७ आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकृत्—द्वारकामें चाण्डाल आदितकके लिये सुलभ होनेवाली करोड़ों निधियोंका संग्रह करनेवाले, ८१८ अक्रूरोद्धवमुख्यैकभक्तः—अक्रूर और उद्धव आदि प्रधान भक्तोंके साथ रहनेवाले, ८१९ स्वच्छन्द-