भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७१५ *********************************************************************************************************

७१८ दैत्यामृतवापीसमस्तपः—त्रिपुरनिवासी दैत्योंकी अमृतसे भरी हुई सारी बावलीको गोरूपसे पी जानेवाले ॥ २४७ ॥
महाप्रलयविश्वैकनिलयोऽखिलनागराट् ।
शेषदेवः सहस्राक्षः सहस्रास्यशिरोभुजः ॥ २४८ ॥

७१९ महाप्रलयविश्वैकनिलयः—महाप्रलयके समय सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र निवासस्थान, ७२० अखिलनागराट्—सम्पूर्ण नागोंके राजा शेषनागस्वरूप, ७२१ शेषदेवः—प्रलयकालमें भी शेष रहनेवाले देवता, ७२२ सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रवाले, ७२३ सहस्रास्यशिरोभुजः—सहस्रों मुख, मस्तक और भुजाओंवाले ॥ २४८ ॥
फणामणिकणाकारयोजिताच्छाम्बुदक्षितिः ।
कालाग्निरुद्रजनको मुशलास्त्रो हलायुधः ॥ २४९ ॥

७२४ फणामणिकणाकारयोजिताच्छाम्बुदक्षितिः—फनोंकी मणियोंके कणोंके आकारसे पृथ्वीपर श्वेत बादलोंकी घटा-सी छा देनेवाले, ७२५ कालाग्निरुद्रजनकः—भयङ्कर कालाग्नि एवं संहारमूर्ति रुद्रको प्रकट करनेवाले, ७२६ मुशलास्त्रः—मुशलको अस्त्ररूपमें ग्रहण करनेवाले शेषावतार बलरामरूप, ७२७ हलायुधः—हलरूपी आयुधवाले ॥ २४९ ॥
नीलाम्बरो वारुणीशो मनोवाक्कायदोषहा ।
असंतोषदृष्टिमात्रपातितैकदशाननः ॥ २५० ॥

७२८ नीलाम्बरः—नीलवस्त्रधारी, ७२९ वारुणीशः—वारुणीके स्वामी, ७३० मनोवाक्कायदोषहा—मन, वाणी और शरीरके दोष दूर करनेवाले, ७३१ असंतोषदृष्टिमात्रपातितैकदशाननः—असंतोषपूर्ण दृष्टि डालनेमात्रसे ही पातालमें गये हुए रावणको गिरा देनेवाले शेषनागरूप ॥ २५० ॥
बिलसंयमनो घोरो रौहिणेयः प्रलम्बहा ।
मुष्टिकघ्नो द्विविदहा कालिन्दीकर्षणो बलः ॥ २५१ ॥

७३२ बिलसंयमनः—सातों पाताललोकोंको काबूमें रखनेवाले, ७३३ घोरः—प्रलयके समय भयङ्कर आकृति धारण करनेवाले, ७३४ रौहिणेयः—रोहिणीके पुत्र, ७३५ प्रलम्बहा—प्रलम्ब दानवको मारनेवाले, ७३६ मुष्टिकघ्नः—मुष्टिकके प्राण लेनेवाले, ७३७ द्विविदहा—द्विविद नामक वीर वानरका वध करनेवाले, ७३८ कालिन्दीकर्षणः—यमुनाकी धाराको खींचनेवाले, ७३९ बलः—बलके मूर्तिमान् स्वरूप ॥ २५१ ॥
रेवतीरमणः पूर्वभक्तिखेदाच्युताग्रजः ।
देवकीवसुदेवाह्वकश्यपादितिनन्दनः ॥ २५२ ॥

७४० रेवतीरमणः—अपनी पत्नी रेवतीके साथ रमण करनेवाले, ७४१ पूर्वभक्तिखेदाच्युताग्रजः—पूर्वजन्ममें लक्ष्मणरूपसे भगवान्‌की निरन्तर सेवा करते-करते थके रहनेके कारण दूसरे जन्ममें भगवान्‌की इच्छासे उनके ज्येष्ठ बन्धुके रूपमें अवतार लेनेवाले बलरामरूप, ७४२ देवकीवसुदेवाह्वकश्यपादितिनन्दनः—वसुदेव और देवकीके नामसे प्रसिद्ध महर्षि कश्यप और अदितिको पुत्ररूपसे आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण ॥ २५२ ॥
वार्ष्णेयः सात्वतां श्रेष्ठः शौरिर्यदुकुलेश्वरः ।
नराकृतिः परं ब्रह्म सव्यसाचिवरप्रदः ॥ २५३ ॥

७४३ वार्ष्णेयः—वृष्णिकुलमें उत्पन्न, ७४४ सात्वतां श्रेष्ठः—सात्वत कुलमें सर्वश्रेष्ठ, ७४५ शौरिः—शूरसेनके कुलमें अवतीर्ण, ७४६ यदुकुलेश्वरः—यदुकुलके स्वामी, ७४७ नराकृतिः—मानव-शरीर धारण करनेवाले श्रीकृष्ण, ७४८ परं ब्रह्म—वस्तुतः परमात्मा, ७४९ सव्यसाचिवरप्रदः—अर्जुनको वर देनेवाले ॥ २५३ ॥
ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः ।
पूतनाघ्नः शकटभिद्यमलार्जुनभञ्जनकः ॥ २५४ ॥

७५० ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः—ब्रह्मा आदि भी जिन्हें देखनेकी इच्छा रखते हैं तथा जो सम्पूर्ण जगत्‌को आश्चर्यमें डालनेवाली हैं, ऐसी ललित बाललीलाओंसे युक्त श्रीकृष्ण, ७५१ पूतनाघ्नः—पूतनाके प्राण लेनेवाले, ७५२ शकटभित्—लातके हलके आघातसे छकड़ेको चकनाचूर कर देनेवाले, ७५३ यमलार्जुनभञ्जनकः—यमलार्जुन नामसे प्रसिद्ध दो जुड़वें वृक्षोंको तोड़ डालनेवाले ॥ २५४ ॥