पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 731, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ें७१४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [संक्षिप्त पद्मपुराण
कैकेयीकुमार भरतरूप, ६८१ असह्यागन्धर्व-कोटिघ्नः—करोड़ों दुःसह गन्धर्वोंका वध करनेवाले, ६८२ लवborderान्तकः—लवणासुरको मारनेवाले शत्रुघ्नरूप, ६८३ शत्रुघ्नः—शत्रुओंका वध करनेवाले सुमित्राके छोटे कुमार, ६८४ वैद्यराट्—वैद्योंके राजा धन्वन्तरिरूप, ६८५ आयुर्वेदगर्भौषधीपतिः—आयुर्वेदके भीतर वर्णित ओषधियोंके स्वामी ॥ २४१ ॥
नित्यामृतकरो धन्वन्तरिर्यज्ञो जगद्धरः ।
सूर्यारिघ्नः सुराजीवो दक्षिRowणेशो द्विजप्रियः ॥ २४२ ॥
६८६ नित्यामृतकरः—हाथोंमें सदा अमृत लिये रहनेवाले, ६८७ धन्वन्तरिः—धन्वन्तरि नामसे प्रसिद्ध एक वैद्य, जो समुद्रसे प्रकट हुए और भगवान् नारायणके अंश थे, ६८८ यज्ञः—यज्ञस्वरूप, ६८९ जगद्धरः—संसारके पालक, ६९० सूर्यारिघ्नः—सूर्यके शत्रु (केतु) को मारनेवाले, ६९१ सुराजीवः—अमृतके द्वारा देवताओंको जीवन प्रदान करनेवाले, ६९२ दक्षिणेशः—दक्षिण दिशाके स्वामी धर्मराजरूप, ६९३ द्विजप्रियः—ब्राह्मणोंके प्रियतम ॥ २४२ ॥
छिन्नमूर्धापदेशार्कः शेषाङ्गस्थापितामरः ।
विश्वार्थाशेषकृद्राहुशिरश्छेताक्षताकृतिः ॥ २४३ ॥
६९४ छिन्नमूर्धापदेशार्कः—जिसका मस्तक कटा हुआ है तथा जो कहनेमात्रके लिये सूर्य—'स्वर्भानु' नाम धारण करता है, ऐसा राहु नामक ग्रह,* ६९५ शेषाङ्गस्थापितामरः—जिसके शेष अङ्गोंमें अमरत्वकी स्थापना हुई है, ऐसा राहु, ६९६ विश्वार्थाशेषकृत्—संसारके सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले भगवान्, ६९७ राहुशिरश्छेत्ता—राहुका मस्तक काटनेवाले, ६९८ अक्षताकृतिः—स्वयं किसी प्रकारकी भी क्षतिसे रहित शरीरवाले ॥ २४३ ॥
वाजपेयादिनामाग्नर्वेिधर्मपरायणः ।
श्वेतद्वीपपतिः सांख्यप्रणेता सर्वसिद्धिराट् ॥ २४४ ॥
६९९ वाजपेयादिनामाग्निः—वाजपेय आदि नाम धारण करनेवाले अग्नि देवता, ७०० वेदधर्मपरायणः—वेदोक्त धर्मके परम आश्रय, ७०१ श्वेतद्वीपपतिः—श्वेतद्वीपके स्वामी, ७०२ सांख्यप्रणेता—सांख्यशास्त्रकी रचना करनेवाले कपिलस्वरूप, ७०३ सर्वसिद्धिराट्—सम्पूर्ण सिद्धियोंके राजा ॥ २४४ ॥
विश्वप्रकाशितज्ञानयोगमोहतमिस्रहा ।
देवहूत्यात्मजः सिद्धः कपिलः कर्दमात्मजः ॥ २४५ ॥
७०४ विश्वप्रकाशितज्ञानयोगमोहतमिस्रहा—संसारमें ज्ञानयोगका प्रकाश करके मोहरूपी अन्धकारका नाश करनेवाले, ७०५ देवहूत्यात्मजः—मनुकुमारी देवहूतिके पुत्र, ७०६ सिद्धः—सब प्रकारकी सिद्धियोंसे परिपूर्ण, ७०७ कपिलः—कपिल नामसे प्रसिद्ध भगवान्के अवतार, ७०८ कर्दमात्मजः—कर्दम ऋषिके सुयोग्य पुत्र ॥ २४५ ॥
योगस्वामी ध्यानभङ्गसगरात्मजभस्मकृत् ।
धर्मो वृषेन्द्रः सुरभीपतिः शुद्धात्मभावितः ॥ २४६ ॥
७०९ योगस्वामी—सांख्ययोगके स्वामी, ७१० ध्यानभङ्गसगरात्मजभस्मकृत्—ध्यान भङ्ग होनेसे सगर-पुत्रोंको भस्म कर डालनेवाले, ७११ धर्मः—जगत्को धारण करनेवाले धर्मके स्वरूप, ७१२ वृषेन्द्रः—श्रेष्ठ वृषभकी आकृति धारण करनेवाले, ७१३ सुरभीपतिः—सुरभी गौके स्वामी, ७१४ शुद्धात्मभावितः—शुद्ध अन्तःकरणमें चिन्तन किये जानेवाले ॥ २४६ ॥
शम्भुस्त्रिपुरदाहैकस्थैर्यविश्वरथोध्वहः ।
भक्तशम्भुजितो दैत्यामृतवापीसमस्तपः ॥ २४७ ॥
७१५ शम्भुः—कल्याणकी उत्पत्तिके स्थानभूत, शिवस्वरूप, ७१६ त्रिपुरदाहैकस्थैर्यविश्वरथोध्वहः—त्रिपुरका दाह करनेके समय एकमात्र स्थिर रहनेवाले और विश्वमय रथका वहन करनेवाले, ७१७ भक्तशम्भुजितः—अपने भक्त शिवके द्वारा पराजित,
* राहुका एक नाम 'स्वर्भानु' भी है; इस प्रकार कहनेके लिये तो वह भानु है, पर वास्तवमें अन्धकाररूप है। प्रत्येक ग्रह भगवान्की दिव्य विभूति है, इसलिये वह भी भगवत्स्वरूप ही है।