पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७१३
नाम-निशान मिट जाता, ६५० सर्वामराचितः—सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित ॥ २३३ ॥
ब्रह्मसूर्येन्द्ररुद्रादिवृन्दर्पितसतीप्रियः ।
अयोध्याखिलराजाग्र्यः सर्वभूतमनोहरः ॥ २३४ ॥
६५१ ब्रह्मसूर्येन्द्ररुद्रादिवृन्दार्पितसतीप्रियः—ब्रह्मा, सूर्य, इन्द्र तथा रुद्र आदि देवताओंके समूह-द्वारा शुद्ध प्रमाणित करके समर्पित की हुई सती सीताके प्रियतम, ६५२ अयोध्याखिलराजाग्र्यः—अयोध्यापुरीके सम्पूर्ण राजाओंमें अग्रगण्य, ६५३ सर्वभूतमनोहरः—अपने सौन्दर्य-माधुर्यके कारण सम्पूर्ण प्राणियोंका मन हरनेवाले ॥ २३४ ॥
स्वाम्यतुल्यकृपादण्डो हीनोत्कृष्टैकसत्प्रियः ।
श्वपक्ष्यादिन्यायदर्शी हीनार्थाधिकसाधकः ॥ २३५ ॥
६५४ स्वाम्यतुल्यकृपादण्डः—प्रभुताके अनुरूप ही कृपा करने और दण्ड देनेवाले, ६५५ हीनोत्कृष्टैकसत्प्रियः—ऊँच-नीच—सबके सच्चे प्रेमी, ६५६ श्वपक्ष्यादिन्यायदर्शी—कुत्ते और पक्षी आदिके प्रति भी न्याय प्रदर्शित करनेवाले, ६५७ हीनार्थाधिकसाधकः—असहाय पुरुषोंके कार्यकी अधिक सिद्धि करनेवाले ॥ २३५ ॥
वधव्याजानुचितकृत्तारकोऽखिलतुल्यकृत् ।
पावित्र्याधिक्यमुक्तात्मा प्रियात्यक्तः स्मरारिजित् ॥ २३६ ॥
६५८ वधव्याजानुचितकृत्तारकः—अनुचित कर्म करनेवाले लोगोंका वधके बहाने उद्धार करनेवाले, ६५९ अखिलतुल्यकृत्—सबके साथ उसकी योग्यताके अनुरूप बर्ताव करनेवाले, ६६० पावित्र्याधिक्यमुक्तात्मा—अधिक पवित्रताके कारण नित्यमुक्त स्वभाववाले, ६६१ प्रियात्यक्तः—प्रिय पत्नी सीतासे कुछ कालके लिये वियुक्त, ६६२ स्मरारिजित्—कामदेवके शत्रु भगवान् शिवको भी जीतनेवाले ॥ २३६ ॥
साक्षात्कुशलवच्छद्मद्रावितो ह्यपराजितः ।
कोसलेन्द्रो वीरबाहुः सत्यार्थत्यक्तसोदरः ॥ २३७ ॥
६६३ साक्षात्कुशलवच्छद्मद्रावितः—कुश और लवके रूपमें स्वयं अपने-आपसे युद्धमें हार जानेवाले, ६६४ अपराजितः—वास्तवमें कभी किसीके द्वारा भी परास्त न होनेवाले, ६६५ कोसलेन्द्रः—कोसल देशके ऐश्वर्यशाली सम्राट्, ६६६ वीरबाहुः—शक्तिशालिनी भुजाओंसे युक्त, ६६७ सत्यार्थत्यक्तसोदरः—सत्यकी रक्षाके लिये अपने भाई लक्ष्मणका त्याग करनेवाले ॥ २३७ ॥
शरसंधाननिर्धूतधरणीमण्डलो जयः ।
ब्रह्मादिकामसांनिध्यसनाथीकृतदैवतः ॥ २३८ ॥
६६८ शरसंधाननिर्धूतधरणीमण्डलः—बाणोंके संधानसे समस्त भूमण्डलको कँपा देनेवाले, ६६९ जयः—विजयशील, ६७० ब्रह्मादिकामसांनिध्यसनाथीकृतदैवतः—ब्रह्मा आदिकी कामनाके अनुसार समीपसे दर्शन देकर समस्त देवताओंको सनाथ करनेवाले ॥ २३८ ॥
ब्रह्मलोकाप्तचाण्डालद्यशेषप्राणिसार्थकः ।
स्वर्नीतगर्दभश्वादिश्चिरायोध्यावनैककृत् ॥ २३९ ॥
६७१ ब्रह्मलोकाप्तचाण्डालद्यशेषप्राणिसार्थकः—चाण्डाल आदि समस्त प्राणियोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाकर कृतार्थ करनेवाले, ६७२ स्वर्नीतगर्दभश्वादिः—गदहे और कुत्ते आदिको भी स्वर्गलोकमें ले जानेवाले, ६७३ चिरायोध्यावनैककृत्—चिरकालतक अयोध्याकी एकमात्र रक्षा करनेवाले ॥ २३९ ॥
रामो द्वितीयसौमित्रिलक्ष्मणः प्रहतेन्द्रजित् ।
विष्णुभक्तः सरामाङ्घ्रिपादुकाराज्यनिर्वृतिः ॥ २४० ॥
६७४ रामः—मुनियोंका मन रमानेवाले भगवान् श्रीराम, ६७५ द्वितीयसौमित्रिः—सुमित्राकुमार लक्ष्मणको साथ रखनेवाले, ६७६ लक्ष्मणः—शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न लक्ष्मणरूप, ६७७ प्रहतेन्द्रजित्—लक्ष्मणरूपसे मेघनादका वध करनेवाले, ६७८ विष्णुभक्तः—विष्णुके अवतारभूत भगवान् श्रीरामके भक्त भरतरूप, ६७९ सरामाङ्घ्रिपादुकाराज्यनिर्वृतिः—श्रीरामचन्द्रजीकी चरणपादुकाके साथ मिले हुए राज्यसे संतुष्ट होनेवाले भरतरूप ॥ २४० ॥
भरतोऽसह्यगन्धर्वकोटिघ्नो लव Nautilus: ।
शत्रुघ्नो वैद्यराडायुर्वेदगर्भोष्षधीपतिः ॥ २४१ ॥
६८० भरतः—प्रजाका भरण-पोषण करनेवाले