पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 729, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ें७९२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
*************************************************************************************
६२४ सुग्रीवराज्यदः—सुग्रीवको राज्य देनेवाले, ६२५ अहीनमनसैवाभयप्रदः—उदार चित्तसे अभय-दान देनेवाले, ६२६ हनुमद्रुद्रमुख्येशः—हनुमान्जी तथा भगवान् शङ्करके प्रधान आराध्यदेव, ६२७ समस्तकपिदेहभृत्—सम्पूर्ण वानरोंके शरीरोंका पोषण करनेवाले ॥ २२७ ॥
सनागदैत्यबाणैकव्याकुलीकृतसागरः ।
सम्लेच्छकोटिबाणैकशुष्कनिर्दग्धसागरः ॥ २२८ ॥
६२८ सनागदैत्यबाणैकव्याकुलीकृतसागरः—एक ही बाणसे नाग और दैत्योंसहित समुद्रको क्षुब्ध कर देनेवाले, ६२९ सम्लेच्छकोटिबाणैकशुष्कनिर्दग्धसागरः—एक ही बाणसे करोड़ों म्लेच्छोंसहित समुद्रको सुखा देने और जला डालनेवाले ॥ २२८ ॥
समुद्राद्भुतपूर्वैकबद्धसेतुर्यशोनिधिः ।
असाध्यसाधको लङ्कासमूलोत्साददक्षिणः ॥ २२९ ॥
६३० समुद्राद्भुतपूर्वैकबद्धसेतुः—समुद्रमें पहले-पहल एक अद्भुत पुल बाँधनेवाले, ६३१ यशोनिधिः—सुयशके भंडार, ६३२ असाध्यसाधकः—असम्भवको भी सम्भव कर दिखानेवाले, ६३३ लङ्कासमूलोत्साददक्षिणः—लङ्काको जड़से नष्ट कर डालनेमें दक्ष ॥ २२९ ॥
वरदृप्तजगच्छल्यपौलस्त्यकुलकृन्तनः ।
रावणिघ्नः प्रहस्तच्छित्कुम्भकर्णभिदुग्रहा ॥ २३० ॥
६३४ वरदृप्तजगच्छल्यपौलस्त्यकुलकृन्तनः—वर पाकर घमंडसे भरे हुए तथा संसारके लिये कण्टकरूप रावणके कुलका उच्छेद करनेवाले, ६३५ रावणिघ्नः—लक्ष्मणरूपसे रावणके पुत्र मेघनादका वध करनेवाले, ६३६ प्रहस्तच्छित्—प्रहस्तका मस्तक काटनेवाले, ६३७ कुम्भकर्णभित्—कुम्भकर्णको विदीर्ण करनेवाले, ६३८ उग्रहा—भयङ्कर राक्षसोंका वध करनेवाले ॥ २३० ॥
रावणैकशिरश्छेत्ता निःशङ्केन्द्रैकराज्यदः ।
स्वर्गास्वर्गत्वविच्छेदी देवेन्द्रानिन्द्रताहरः ॥ २३१ ॥
६३९ रावणैकशिरश्छेत्ता—रावणके सिर काटनेवाले एकमात्र वीर, ६४० निःशङ्केन्द्रैकराज्यदः—निःशङ्क होकर इन्द्रको एकमात्र राज्य देनेवाले, ६४१ स्वर्गास्वर्गत्वविच्छेदी—स्वर्गकी अस्वर्गताको मिटा डालनेवाले,* ६४२ देवेन्द्रानिन्द्रताहरः—देवराज इन्द्रकी अनिन्द्रता दूर करनेवाले† ॥ २३१ ॥
रक्षोदेवत्वहृद्धर्मधर्मत्वघ्नः पुरुष्टुतः ।
नतिमात्रदशास्यारिश्चात्तराज्यविभीषणः ॥ २३२ ॥
६४३ रक्षोदेवत्वहृत्—राक्षसलोग जो देवताओंको हटाकर स्वयं देवता बन बैठे थे, उनके उस देवत्वको हर लेनेवाले, ६४४ धर्माधर्मत्वघ्नः—धर्मकी अधर्मताका नाश करनेवाले, (राक्षसोंके कारण धर्म भी अधर्मरूपमें परिणत हो रहा था, भगवान् रामने उन्हें मारकर धर्मको पुनः अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित किया), ६४५ पुरुष्टुतः—बहुत लोगोंके द्वारा स्तुत होनेवाले, ६४६ नतिमात्रदशास्यारिः—नत मस्तक होनेतक ही रावणको शत्रु माननेवाले, ६४७ दत्तराज्यविभीषणः—विभीषणको राज्य प्रदान करनेवाले ॥ २३२ ॥
सुधावृष्टिमृताशेषस्वसैन्योज्जीवनैककृत् ।
देवब्राह्मणनामैकधाता सर्वामरार्चितः ॥ २३३ ॥
६४८ सुधावृष्टिमृताशेषस्वसैन्योज्जीवनैककृत्—सुधाकी वर्षा कराकर अपने समस्त मरे हुए सैनिकोंको जीवन प्रदान करनेवाले, ६४९ देवब्राह्मणनामैकधाता—देवता और ब्राह्मणके नामोंके एकमात्र रक्षक, वे यदि न होते तो देवताओं एवं ब्राह्मणोंका
* राक्षसोंने 'स्वर्ग'का वैभव लूटकर उसे 'अस्वर्ग' बना दिया था, भगवान् रामने रावणको मारकर पुनः उसे अपनी प्रतिष्ठाके अनुरूप बनाया, स्वर्गकी अस्वर्गता दूर कर दी।
† रावणने इन्द्रको इन्द्रपदसे हटा दिया था, वे 'अनिन्द्र' (इन्द्रपदसे च्युत) हो गये थे; श्रीरामने उनकी अनिन्द्रता दूर की—उन्हें पुनः इन्द्रके सिंहासनपर बिठाया।