भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 728, कुल 1018 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 728

उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७११


समस्तधर्मसूः सर्वधर्मद्रष्टाखिलार्तिहा।
अतीन्द्रो ज्ञानविज्ञानपारद्रष्टा क्षमाम्बुधिः ॥ २२० ॥

५९३ समस्तधर्मसूः—समस्त धर्मोंको उत्पन्न करनेवाले, ५९४ सर्वधर्मद्रष्टा—सम्पूर्ण धर्मोंपर दृष्टि रखनेवाले, ५९५ अखिलार्तिहा—सबकी पीड़ा दूर करनेवाले अथवा समस्त पीड़ाओंके नाशक, ५९६ अतीन्द्रः—इन्द्रसे भी बढ़कर ऐश्वर्यशाली, ५९७ ज्ञानविज्ञानपारद्रष्टा—ज्ञान और विज्ञानके पारंगत, ५९८ क्षमाम्बुधिः—क्षमाके सागर ॥ २२० ॥

सर्वप्रकृष्टः शिष्टेष्टो हर्षशोकाद्यनाकुलः।
पित्राज्ञयात्यक्तसाम्राज्यः सपत्नोदयनिर्भयः ॥ २२१ ॥

५९९ सर्वप्रकृष्टः—सबसे श्रेष्ठ, ६०० शिष्टेष्टः—शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, ६०१ हर्ष-शोकाद्यनाकुलः—हर्ष और शोक आदिसे विचलित न होनेवाले, ६०२ पित्राज्ञयात्यक्तसाम्राज्यः—पिताकी आज्ञासे समस्त भूमण्डलका साम्राज्य त्याग देनेवाले, ६०३ सपत्नोदयनिर्भयः—शत्रुओंके उदयसे भयभीत न होनेवाले ॥ २२१ ॥

गुहादेशार्पितैश्वर्यः शिवस्पर्धजटाधरः।
चित्रकूटाप्तरत्नाद्रिर्जगदीश्रो वनेचरः ॥ २२२ ॥

६०४ गुहादेशार्पितैश्वर्यः—वनवासके समय पर्वतकी कन्दराओंको ऐश्वर्य समर्पित करनेवाले—अपने निवाससे गुफाओंको भी ऐश्वर्य-सम्पन्न बनानेवाले, ६०५ शिवस्पर्धजटाधरः—शङ्करजीकी जटाओंसे होड़ लगानेवाली जटाएँ धारण करनेवाले, ६०६ चित्रकूटाप्तरत्नाद्रिः—चित्रकूटको निवास-स्थल बनाकर उसे रत्नमय पर्वत (मेरुगिरि) की महत्ता प्राप्त करानेवाले, ६०७ जगदीशः—सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर, ६०८ वनेचरः—वनमें विचरनेवाले ॥ २२२ ॥

यथेष्टामोघसर्वास्त्रो देवेन्द्रतनयाक्षिहा।
ब्रह्मेन्द्रादिनतैषीको मारीचघ्नो विराधहा ॥ २२३ ॥

६०९ यथेष्टामोघसर्वास्त्रः—जिनके सभी अस्त्र इच्छानुसार चलनेवाले एवं अचूक हैं, ६१० देवेन्द्र-तनयाक्षिहा—देवराजके पुत्र जयन्तकी आँख फोड़नेवाले, ६११ ब्रह्मेन्द्रादिनतैषीकः—जिनके चलाये हुए सींकके बाणको ब्रह्मा आदि देवताओंने भी मस्तक झुकाया था, ऐसे प्रभावशाली भगवान् श्रीराम, ६१२ मारीचघ्नः—मायामय मृगका रूप धारण करनेवाले मारीच नामक राक्षसके नाशक, ६१३ विराधहा—विराधका वध करनेवाले ॥ २२३ ॥

ब्रह्मशापाहताशेषदण्डकारण्यपावनः ।
चतुर्दशसहस्रोग्ररक्षोग्रैकशरैकधुक् ॥ २२४ ॥

६१४ ब्रह्मशापाहताशेषदण्डकारण्यपावनः—ब्राह्मण (शुक्राचार्य) के शापसे नष्ट हुए दण्डकारण्यको अपने निवाससे पुनः पावन बनानेवाले ६१५ चतुर्दशसहस्रोग्ररक्षोग्रैकशरैकधुक्—चौदह हजार भयङ्कर राक्षसोंको मारनेकी शक्तिसे युक्त एकमात्र बाण धारण करनेवाले ॥ २२४ ॥

खरारिस्त्रिशिरोहन्ता दूषणघ्नो जनार्दनः ।
जटायुषोऽग्निगतिदोगस्त्यसर्वस्वमन्त्रराट् ॥ २२५ ॥

६१६ खरारिः—खर नामक राक्षसके शत्रु, ६१७ त्रिशिरोहन्ता—त्रिशिराका वध करनेवाले, ६१८ दूषणघ्नः—दूषण नामक राक्षसके प्राण लेनेवाले, ६१९ जनार्दनः—भक्तलोग जिनसे अभ्युदय एवं निःश्रेयसरूप परम पुरुषार्थकी याचना करते हैं, ६२० जटायुषोऽग्निगतिदः—जटायुका दाह-संस्कार करके उन्हें उत्तम गति प्रदान करनेवाले, ६२१ अगस्त्यसर्वस्वमन्त्रराट्—जिनका नाम महर्षि अगस्त्यका सर्वस्व एवं मन्त्रोंका राजा है ॥ २२५ ॥

लीलाधनुष्कोट्यपास्तदुन्दुभ्यस्थिमहाचलः ।
सप्ततालव्यधाकृष्टध्वस्तपातालदानवः ॥ २२६ ॥

६२२ लीलाधनुष्कोट्यपास्तदुन्दुभ्यस्थि-महाचलः—खेल-खेलमें ही दुन्दुभि नामक दानवकी हड्डियोंके महान् पर्वतको धनुषकी नोकसे उठाकर दूर फेंक देनेवाले, ६२३ सप्ततालव्यधाकृष्टध्वस्त-पातालदानवः—सात तालवृक्षोंके वेधसे आकृष्ट होकर आये हुए पातालवासी दानवका विनाश करनेवाले ॥ २२६ ॥

सुग्रीवराज्यदोऽहीनमनसैवाभयप्रदः ।
हनुमद्प्रमुखेशः समस्तकपिदेहभृत् ॥ २२७ ॥