भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


५५१ द्रोणाचार्यगुरुः — आचार्य द्रोणके गुरु, ५५२ विश्वजैत्रधन्वा — विश्वविजयी धनुष धारण करनेवाले, ५५३ कृतान्तजित् — कालको भी परास्त करनेवाले, ५५४ अद्वितीयतपोमूर्तिः — अद्वितीय तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप, ५५५ ब्रह्मचर्यैकदक्षिरणः — ब्रह्मचर्यपालनमें एकमात्र दक्ष ॥ २१३ ॥

मनुश्रेष्ठः सतां सेतुर्महीयान् वृषभो विराद् ।
आदिराजः क्षितिपिता सर्वरत्नैकदोहकृत् ॥ २१४ ॥

५५६ मनुश्रेष्ठः — मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजा पृथु, ५५७ सतां सेतुः — सेतुके समान सत्पुरुषोंकी मर्यादाके रक्षक, अथवा सत्पुरुषोंके लिये सेतुरूप, ५५८ महीयान् — बड़ोंसे भी बड़े महापुरुष, ५५९ वृषभः — कामनाओंकी वर्षा करनेवाले श्रेष्ठ राजा, ५६० विराद् — तेजस्वी राजा, ५६१ आदिराजः — मनुष्योंमें सबसे प्रथम राजाके पदसे विभूषित, ५६२ क्षितिपिता — पृथ्वीको अपनी कन्याके रूपमें स्वीकार करनेवाले, ५६३ सर्वरत्नैकदोहकृत् — गोरूपधारिणी पृथ्वीसे समस्त रत्नोंके एकमात्र दुहनेवाले ॥ २१४ ॥

पृथुर्जन्माद्येकदक्षो गीःश्रीकीर्तिस्वयंवृतः ।
जगद्वृत्तिप्रदश्चक्रवर्तिश्रेष्ठोऽद्वयास्त्रधृक् ॥ २१५ ॥

५६४ पृथुः — अपने यशसे प्रख्यात पृथु नामक राजा, ५६५ जन्माद्येकदक्षः — उत्पत्ति, पालन और संहारमें एकमात्र कुशल, ५६६ गीःश्रीकीर्तिस्वयंवृतः — वाणी, लक्ष्मी और कीर्तिके द्वारा स्वयं वरण किये हुए, ५६७ जगद्वृत्तिप्रदः — संसारको जीविका प्रदान करनेवाले, ५६८ चक्रवर्तिश्रेष्ठः — चक्रवर्ती राजाओंमें श्रेष्ठ, ५६९ अद्वयास्त्रधृक् — अद्वितीय शस्त्रधारी वीर ॥ २१५ ॥

सनकादिमुनिप्राप्यभगवद्भक्तिवर्धनः ।
वर्णाश्रमादिधर्माणां कर्ता वक्ता प्रवर्तकः ॥ २१६ ॥

५७० सनकादिमुनिप्राप्यभगवद्भक्तिवर्धनः — सनकादि मुनियोंसे प्राप्त होने योग्य भगवद्भक्तिका विस्तार करनेवाले, ५७१ वर्णाश्रमादिधर्माणां कर्ता — वर्ण और आश्रम आदिके धर्मोंके बनानेवाले, ५७२ वक्ता — वर्ण और आश्रम आदिके धर्मोंका उपदेश करनेवाले, ५७३ प्रवर्तकः — उक्त धर्मोंका प्रचार करनेवाले ॥ २१६ ॥

सूर्यवंशध्वजो रामो राघवः सद्गुणार्णवः ।
काकुत्स्थो वीरराजार्यो राजधर्मधुरन्धरः ॥ २१७ ॥

५७४ सूर्यवंशध्वजः — सूर्यवंशकी कीर्ति-पताका फहरानेवाले श्रीरघुनाथजी, ५७५ रामः — योगीजनोंने रमण करनेके लिये नित्यानन्दस्वरूप परमात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी, ५७६ राघवः — रघुकुलमें जन्म ग्रहण करनेवाले, ५७७ सद्गुणार्णवः — उत्तम गुणोंके सागर, ५७८ काकुत्स्थः — ककुत्स्थ-पदवी धारण करनेवाले राजा पुरञ्जयकी कुल-परम्परामें अवतीर्ण, ५७९ वीरराजार्यः — वीर राजाओंमें श्रेष्ठ, ५८० राजधर्मधुरन्धरः — राजधर्मका भार वहन करनेवाले ॥ २१७ ॥

नित्यस्वस्थाश्रयः सर्वभद्रग्राही शुभैकदृक् ।
नररत्नं रत्नगर्भो धर्माध्यक्षो महानिधिः ॥ २१८ ॥

५८१ नित्यस्वस्थाश्रयः — सदा अपने स्वरूपमें स्थित रहनेवाले महात्माओंके आश्रय, ५८२ सर्वभद्रग्राही — समस्त कल्याणोंकी प्राप्ति करानेवाले, ५८३ शुभैकदृक् — एकमात्र शुभकी ओर ही दृष्टि रखनेवाले, ५८४ नररत्नम् — मनुष्योंमें श्रेष्ठ, ५८५ रत्नगर्भः — अपनी माताके गर्भके रत्न अथवा अपने भीतर रत्नमय गुणोंको धारण करनेवाले, ५८६ धर्माध्यक्षः — धर्मके साक्षी, ५८७ महानिधिः — अखिल भूमण्डलके सम्राट् होनेके कारण बहुत बड़े कोषवाले ॥ २१८ ॥

सर्वश्रेष्ठाश्रयः सर्वशस्त्रास्त्रग्रामवीर्यवान् ।
जगदीशो दाशरथिः सर्वरत्नाश्रयो नृपः ॥ २१९ ॥

५८८ सर्वश्रेष्ठाश्रयः — सबसे श्रेष्ठ आश्रय, ५८९ सर्वशस्त्रास्त्रग्रामवीर्यवान् — समस्त अस्त्र-शस्त्रोंके समुदायकी शक्ति रखनेवाले, ५९० जगदीशः — सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, ५९१ दाशरथिः — अयोध्याके चक्रवर्ती नरेश महाराज दशरथके प्राणाधिक प्रियतम पुत्र, ५९२ सर्वरत्नाश्रयो नृपः — सम्पूर्ण रत्नोंके आश्रयभूत राजा ॥ २१९ ॥