पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०९
विश्ववृक्षः—संसार-वृक्षरूप, ५१२ महाबलः—महान् बलसे युक्त, ५१३ राहुमूर्धापराङ्गच्छित्—राहुके मस्तक और धड़को काटकर अलग करनेवाले, ५१४ भृगुपत्नीशिरोहरः—भृगुपत्नीके मस्तकका अपहरण करनेवाले ॥ २०५ ॥
पापात्रस्तः सदापुण्यो दैत्याशानित्यखण्डकः।
पूरिताखिलदेवाशो विश्वार्थैकावतारकृत् ॥ २०६ ॥
५१५ पापात्रस्तः—पापसे डरनेवाले, ५१६ सदापुण्यः—निरन्तर पुण्यमें प्रवृत्त, ५१७ दैत्याशानित्यखण्डकः—धर्मविरोधी दैत्योंकी आशाका सदा खण्डन करनेवाले, ५१८ पूरिताखिलदेवाशः—सम्पूर्ण देवताओंकी आशा पूर्ण करनेवाले, ५१९ विश्वार्थैकावतारकृत्—एकमात्र विश्वका कल्याण करनेके लिये अवतार लेनेवाले ॥ २०६ ॥
स्वमायानित्यगुप्तात्मा भक्तचिन्तामणिः सदा।
वरदः कार्तवीर्यादिराजराज्यप्रदोऽनघः ॥ २०७ ॥
५२० स्वमायानित्यगुप्तात्मा—अपनी मायासे निरन्तर अपने स्वरूपको छिपाये रखनेवाले, ५२१ सदा भक्तचिन्तामणिः—सदा भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये चिन्तामणिके समान, ५२२ वरदः—भक्तोंको वर प्रदान करनेवाले, ५२३ कार्तवीर्यादिराजराज्यप्रदः—कृतवीर्य-पुत्र अर्जुन आदि राजाओंको राज्य देनेवाले, ५२४ अनघः—स्वभावतः पापसे रहित ॥ २०७ ॥
विश्वश्लाघ्योऽमिताचारो दत्तात्रेयो मुनीश्वरः।
पराशक्तिसदाश्लिष्टो योगानन्दसदोन्मदः ॥ २०८ ॥
५२५ विश्वश्लाघ्यः—समस्त संसारके लिये प्रशंसनीय, ५२६ अमिताचारः—अपरिमित आचारवाले, ५२७ दत्तात्रेयः—अत्रिकुमार दत्त, जो भगवान्के अवतार हैं, ५२८ मुनीश्वरः—मुनियोंके स्वामी, ५२९ पराशक्तिसदाश्लिष्टः—सदा पराशक्तिसे युक्त, ५३० योगानन्दसदोन्मदः—निरन्तर योगजनित आनन्दमें विभोर रहनेवाले ॥ २०८ ॥
समस्तेन्द्रारितेजोहत्परमामृतपद्मपः ।
अनसूयागर्भरत्नं भोगमोक्षसुखप्रदः ॥ २०९ ॥
५३१ समस्तेन्द्रारितेजोहत्—इन्द्रसे शत्रुता रखनेवाले सम्पूर्ण दैत्योंका तेज हर लेनेवाले, ५३२ परमामृतपद्मपः—परम अमृतमय कमलका रस पान करनेवाले, ५३३ अनसूयागर्भरत्नम्—अत्रिपत्नी अनसूयाजीके गर्भके रत्न, ५३४ भोगमोक्षसुखप्रदः—भोग और मोक्षका सुख प्रदान करनेवाले ॥ २०९ ॥
जामदग्निकुलादित्यो रेणुकाद्भुतशक्तिधृक्।
मातृहत्यादिनिर्लेपः स्कन्दजिद्विप्रराज्यदः ॥ २१० ॥
५३५ जामदग्निकुलादित्यः—मुनिवर जमदग्निके वंशको सूर्यके समान प्रकाशित करनेवाले परशुरामजी, ५३६ रेणुकाद्भुतशक्तिधृक्—माता रेणुकाकी अद्भुत शक्ति धारण करनेवाले, ५३७ मातृहत्यादिनिर्लेपः—मातृहत्या आदि दोषोंसे निर्लिप्त रहनेवाले परशुरामजी, ५३८ स्कन्दजित्—कार्तिकेयजीको जीतनेवाले, ५३९ विप्रराज्यदः—ब्राह्मणोंको राज्य देनेवाले ॥ २१० ॥
सर्वक्षत्रान्तकृद्वीरदर्पहा कार्तवीर्यजित्।
सप्तद्वीपवतीदाता शिवार्चकयशःप्रदः ॥ २११ ॥
५४० सर्वक्षत्रान्तकृत्—समस्त क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले, ५४१ वीरदर्पहा—बड़े-बड़े वीरोंका दर्प दलन करनेवाले, ५४२ कार्तवीर्यजित्—कृतवीर्य-पुत्र अर्जुनको परास्त करनेवाले, ५४३ सप्तद्वीपवतीदाता—ब्राह्मणोंको सातों द्वीपोंसे युक्त पृथिवीका दान करनेवाले, ५४४ शिवार्चकयशःप्रदः—शिवकी पूजा करनेवालेको यश देनेवाले ॥ २११ ॥
भीमः परशुरामश्च शिवाचार्यैकविश्वभूः।
शिवाखिलज्ञानकोशो भीष्माचार्योऽग्निदैवतः ॥ २१२ ॥
५४५ भीमः—भयङ्कर पराक्रम करनेवाले, ५४६ परशुरामः—परशुरामरूपधारी भगवान्, ५४७ शिवाचार्यैकविश्वभूः—भगवान् शङ्करको गुरु बनाकर विद्या सीखनेवाले संसारमें एकमात्र पुरुष, ५४८ शिवाखिलज्ञानकोशः—भगवान् शङ्करसे सम्पूर्ण ज्ञानका कोष प्राप्त करनेवाले, ५४९ भीष्माचार्यः—पाण्डवोंके पितामह भीष्मजीके आचार्य, ५५० अग्निदैवतः—अग्निदेवताके उपासक ॥ २१२ ॥
द्रोणाचार्यगुरुर्विश्वजैत्रधन्वा कृतान्तजित्।
अद्वितीयतपोमूर्तिर्ब्रह्मचर्यैकदक्षिणः ॥ २१३ ॥