पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७१६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
वातासुरारिः केशिघ्नो धेनुकारिर्गवीश्वरः ।
दामोदरो गोपदेवो यशोदानन्ददायकः ॥ २५५ ॥
७५४ वातासुरारिः—तृणावर्तके शत्रु, ७५५ केशिघ्नः—केशी नामक दैत्यको मारनेवाले, ७५६ धेनुकारिः—धेनुकासुरके शत्रु, ७५७ गवीश्वरः—गौओंके स्वामी, ७५८ दामोदरः—उदरमें यशोदा मैयाद्वारा रस्सी बाँधी जानेके कारण दामोदर नाम धारण करनेवाले, ७५९ गोपदेवः—ग्वालोंके इष्टदेव, ७६० यशोदानन्ददायकः—यशोदा मैयाको आनन्द देनेवाले ॥ २५५ ॥
कालीयमर्दनः सर्वगोपगोपीजनप्रियः ।
लीलागोवर्धनधरो गोविन्दो गोकुलोत्सवः ॥ २५६ ॥
७६१ कालीयमर्दनः—कालिय नागका मान-मर्दन करनेवाले, ७६२ सर्वगोपगोपीजनप्रियः—समस्त गोपों और गोपियोंके प्रियतम, ७६३ लीलागोवर्धनधरः—अनायास ही गोवर्धन पर्वतको अँगुलीपर उठा लेनेवाले, ७६४ गोविन्दः—इन्द्रकी वर्षासे गौओंकी रक्षा करनेके कारण कामधेनुद्वारा 'गोविन्द' पदपर अभिषिक्त भगवान् श्रीकृष्ण, ७६५ गोकुलोत्सवः—गोकुलनिवासियोंको निरन्तर आनन्द प्रदान करनेके कारण उत्सवरूप ॥ २५६ ॥
अरिष्टमथनः कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदः ।
सद्यःकुवलयापीडघाती चाणूरमर्दनः ॥ २५७ ॥
७६६ अरिष्टमथनः—अरिष्टासुरको नष्ट करनेवाले, ७६७ कामोन्मत्तगोपीविमुक्तिदः—प्रेमविभोर गोपीको मुक्ति प्रदान करनेवाले, ७६८ सद्यःकुवलयापीडघाती—कुवलयापीड नामक हाथीको शीघ्र मार गिरानेवाले, ७६९ चाणूरमर्दनः—चाणूरनामक मल्लको कुचल डालनेवाले ॥ २५७ ॥
कंसारिरुग्रसेनादिराज्यव्यापारितामरः ।
सुधर्माङ्कितभूलोको जरासंधबलान्तकः ॥ २५८ ॥
७७० कंसारिः—मथुराके राजा कंसके शत्रु, ७७१ उग्रसेनादिराज्यव्यापारितामरः—राज्य-सम्बन्धी कार्योंमें उग्रसेन आदिके रूपमें देवताओंको ही नियुक्त करनेवाले, ७७२ सुधर्माङ्कितभूलोकः—देवोचित सुधर्मा नामक सभासे भूलोकको भी सुशोभित करनेवाले, ७७३ जरासंधबलान्तकः—जरासंधकी सेनाका संहार करनेवाले ॥ २५८ ॥
त्यक्तभग्नजरासंधो भीमसेनयशःप्रदः ।
सांदीपनिमृतापत्यदाता कालान्तकादिजित् ॥ २५९ ॥
७७४ त्यक्तभग्नजरासंधः—युद्धसे भगे हुए जरासंधको जीवित छोड़ देनेवाले, ७७५ भीमसेनयशःप्रदः—युक्तिसे जरासंधका वध कराकर भीमसेनको यश प्रदान करनेवाले, ७७६ सांदीपनिमृतापत्यदाता—अपने विद्यागुरु सांदीपनिके मरे हुए पुत्रको पुनः ला देनेवाले, ७७७ कालान्तकादिजित्—काल और अन्तक आदिपर विजय पानेवाले ॥ २५९ ॥
समस्तनारकत्राता सर्वभूपतिकोटिजित् ।
रुक्मिणीरमणो रुक्मिशासनो नरकान्तकः ॥ २६० ॥
७७८ समस्तनारकत्राता—शरणमें आनेपर नरकमें पड़े हुए समस्त प्राणियोंका भी उद्धार करनेवाले, ७७९ सर्वभूपतिकोटिजित्—रुक्मिणीके विवाहमें करोड़ोंकी संख्यामें आये हुए समस्त राजाओंको परास्त करनेवाले, ७८० रुक्मिणीरमणः—रुक्मिणीके साथ रमण करनेवाले, ७८१ रुक्मिशासनः—रुक्मीको दण्ड देनेवाले, ७८२ नरकान्तकः—नरकासुरका विनाश करनेवाले ॥ २६० ॥
समस्तसुन्दरीकान्तो मुरारिर्गरुडध्वजः ।
एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वरः ॥ २६१ ॥
७८३ समस्तसुन्दरीकान्तः—समस्त सुन्दरियाँ जिन्हें पानेकी इच्छा करती हैं, ७८४ मुरारिः—मुर नामक दानवके शत्रु, ७८५ गरुडध्वजः—गरुड़के चिह्नसे चिह्नित ध्वजावाले, ७८६ एकाकिजितरुद्रार्कमरुदाद्यखिलेश्वरः—अकेले ही रुद्र, सूर्य और वायु आदि समस्त लोकपालोंको जीतनेवाले ॥ २६१ ॥
देवेन्द्रदर्पहा कल्पद्रुमालंकृतभूतलः ।
बाणबाहुसहस्रच्छिन्नन्द्यादिगणकोटिजित् ॥ २६३ ॥
७८७ देवेन्द्रदर्पहा—देवराज इन्द्रका अभिमान चूर्ण करनेवाले, ७८८ कल्पद्रुमालंकृतभूतलः—कल्पवृक्षको स्वर्गसे लाकर उसके द्वारा भूतलकी शोभा
उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७१७ ************************************************************************************
बढ़ानेवाले, ७८९ बाणबाहुसहस्रच्छित्—बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका उच्छेद करनेवाले, ७९० नन्द्यादिगणकोटिजित्—नन्दी आदि करोड़ों शिवगणोंको परास्त करनेवाले ॥ २६२ ॥
लीलाजितमहादेवो महादेवैकपूजितः ।
इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः पाण्डवैकधृक् ॥ २६३ ॥
७९१ लीलाजितमहादेवः—अनायास ही महादेवजीपर विजय पानेवाले, ७९२ महादेवैकपूजितः—महादेवजीके द्वारा एकमात्र पूजित, ७९३ इन्द्रार्थार्जुननिर्भङ्गजयदः—इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये अर्जुनको अखण्ड विजय प्रदान करनेवाले, ७९४ पाण्डवैकधृक्—पाण्डवोंके एकमात्र रक्षक ॥ २६३ ॥
काशिराजशिरश्छेत्ता रुद्रशक्त्येकमर्दनः ।
विश्वेश्वरप्रसादाढ्यः काशिराजसुतार्दनः ॥ २६४ ॥
७९५ काशिराजशिरश्छेत्ता—काशिराजका मस्तक काट देनेवाले, ७९६ रुद्रशक्त्येकमर्दनः—रुद्रकी शक्तिके एकमात्र मर्दन करनेवाले, ७९७ विश्वेश्वरप्रसादाढ्यः—काशीविश्वनाथकी प्रसन्नता प्राप्त करनेवाले, ७९८ काशिराजसुतार्दनः—काशीनरेशके पुत्रको पीड़ा देनेवाले ॥ २६४ ॥
शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसीकाशीनिर्दग्धनायकः ।
काशीशगणकोटिघ्नो लोकशिक्षाद्विजार्चकः ॥ २६५ ॥
७९९ शम्भुप्रतिज्ञाविध्वंसी—शङ्करजीकी प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, ८०० काशीनिर्दग्धनायकः—जिन्होंने काशीको जलाकर अनाथ-सी कर दिया था, वे भगवान् श्रीकृष्ण, ८०१ काशीशगणकोटिघ्नः—काशीपति विश्वेश्वरके करोड़ों गणोंका नाश करनेवाले, ८०२ लोकशिक्षाद्विजार्चकः—लोकको शिक्षा देनेके लिये सुदामा आदि ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले ॥ २६५ ॥
शिवतीव्रतपोवश्यः पुराशिववरप्रदः ।
शङ्करैकप्रतिष्ठाधृक्स्वांशशङ्करपूजकः ॥ २६६ ॥
८०३ शिवतीव्रतपोवश्यः—शिवजीकी तीव्र तपस्याके वशीभूत होनेवाले, ८०४ पुराशिववरप्रदः—पूर्वकालमें शिवजीको वरदान देनेवाले, ८०५ शङ्करैकप्रतिष्ठाधृक्—भगवान् शङ्करकी एकमात्र प्रतिष्ठा करनेवाले, ८०६—स्वांशशङ्करपूजकः—अपने अंशभूत शङ्करकी पूजा करनेवाले ॥ २६६ ॥
शिवकन्याव्रतपतिः कृष्णरूपशिवारिहा ।
महालक्ष्मीवपुर्गौरीत्राता वैदलवृत्रहा ॥ २६७ ॥
८०७ शिवकन्याव्रतपतिः—शिवकी कन्याके व्रतकी रक्षा करनेवाले, ८०८ कृष्णरूपशिवारिहा—कृष्णरूपसे शिवके शत्रु (भस्मासुर) का संहार करनेवाले, ८०९ महालक्ष्मीवपुर्गौरीत्राता—महालक्ष्मीका शरीर धारण करनेवाली पार्वतीके रक्षक, ८१० वैदलवृत्रहा—वैदलवृत्र नामक दैत्यका वध करनेवाले ॥ २६७ ॥
स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत् ।
यमुनापतिरानीतपरलीनद्विजात्मजः ॥ २६८ ॥
८११ स्वधाममुचुकुन्दैकनिष्कालयवनेष्टकृत्—अपने तेजःस्वरूप राजा मुचुकुन्दके द्वारा केवल कालयवनका नाश कराकर उन्हें अभीष्ट वरदान देनेवाले, ८१२ यमुनापतिः—सूर्यकन्या यमुनाको पत्नीरूपसे ग्रहण करनेवाले, ८१३ आनीतपरलीनद्विजात्मजः—मरे हुए ब्राह्मण-पुत्रोंको पुनः लानेवाले ॥ २६८ ॥
श्रीदामरङ्कभक्तार्थभूम्यानीतेन्द्रवैभवः ।
दुर्वृत्तशिशुपालैकमुक्तदो द्वारकेश्वरः ॥ २६९ ॥
८१४ श्रीदामरङ्कभक्तार्थभूम्यानीतेन्द्रवैभवः—अपने दीन भक्त श्रीदामा (सुदामा) के लिये पृथ्वीपर इन्द्रके समान वैभव उपस्थित करनेवाले, ८१५ दुर्वृत्तशिशुपालैकमुक्तदो—दुराचारी शिशुपालको एकमात्र मोक्ष प्रदान करनेवाले, ८१६ द्वारकेश्वरः—द्वारकाके स्वामी ॥ २६९ ॥
आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकृत् ।
अक्रूरोद्धवमुख्यैकभक्तः स्वच्छन्दमुक्तिदः ॥ २७० ॥
८१७ आचाण्डालादिकप्राप्यद्वारकानिधिकोटिकृत्—द्वारकामें चाण्डाल आदितकके लिये सुलभ होनेवाली करोड़ों निधियोंका संग्रह करनेवाले, ८१८ अक्रूरोद्धवमुख्यैकभक्तः—अक्रूर और उद्धव आदि प्रधान भक्तोंके साथ रहनेवाले, ८१९ स्वच्छन्द-
७१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
मुक्तिदः—इच्छानुसार मुक्ति देनेवाले ॥ २७० ॥ सबालस्त्रीजलक्रीडामृतवापीकृतार्णवः । ब्रह्मास्त्रदग्धगर्भस्थपरीक्षित्जीवनैककृत् ॥ २७१ ॥
८२० सबालस्त्रीजलक्रीडामृतवापीकृतार्णवः— बालकों और स्त्रियोंके जल-विहार करनेके लिये समुद्रको अमृतमयी बावलीके समान बना देनेवाले, ८२१ ब्रह्मास्त्रदग्धगर्भस्थपरीक्षित्जीवनैककृत्—अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे दग्ध हुए गर्भस्थ परीक्षित्को एकमात्र जीवन-दान देनेवाले ॥ २७१ ॥
परलीनद्विजसुतानेताऽर्जुनमदापहः । गूढमुद्राकृतिग्रस्तभीष्माद्यखिलकौरवः ॥ २७२ ॥
८२२ परलीनद्विजसुतानेता—नष्ट हुए ब्राह्मणकुमारोंको पुनः ले आनेवाले, ८२३ अर्जुनमदापहः—अर्जुनका घमंड दूर करनेवाले, ८२४ गूढमुद्राकृतिग्रस्तभीष्माद्यखिलकौरवः—गम्भीर मुद्रावाली आकृति बनाकर भीष्म आदि समस्त कौरवोंको कालका ग्रास बनानेवाले ॥ २७२ ॥
यथार्थखण्डिताशेषदिव्यास्त्रपार्थमोपहृत् । गर्भशापच्छलध्वस्तयादवोर्वीभरापहः ॥ २७३ ॥
८२५ यथार्थखण्डिताशेषदिव्यास्त्रपार्थमोपहृत्— समस्त दिव्यास्त्रोंका भलीभाँति खण्डन करनेवाले अर्जुनके मोहको हरनेवाले, ८२६ गर्भशापच्छलध्वस्तयादवोर्वीभरापहः— स्त्रीरूप धारण करके गये हुए साम्बके गर्भको मुनियोंद्वारा शाप दिलानेके बहाने पृथ्वीके भारभूत समस्त यादवोंका संहार करनेवाले ॥ २७३ ॥
जराव्याधारिगतिदः स्मृतमात्राखिलेष्टदः । कामदेवो रतिपतिर्मन्मथः शम्बरान्तकः ॥ २७४ ॥
८२७ जराव्याधारिगतिदः—शत्रुका काम करनेवाले जरा नामक व्याधको उत्तम गति प्रदान करनेवाले, ८२८ स्मृतमात्राखिलेष्टदः—स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोंको देनेवाले, ८२९ कामदेवः—कामदेवस्वरूप, ८३० रतिपतिः—रतिके स्वामी, ८३१ मन्मथः—विचारशक्तिका नाश करनेवाले कामदेवस्वरूप, ८३२ शम्बरान्तकः—शम्बरासुरके प्राणहन्ता ॥ २७४ ॥
अनङ्गो जितगौरीशो रतिकान्तः सदेप्सितः । पुष्पेषुर्विश्वविजयी स्मरः कामेश्वरीप्रियः ॥ २७५ ॥
८३३ अनङ्गः—अङ्गरहित, ८३४ जितगौरीशः—गौरीपति शङ्करको भी जीतनेवाले, ८३५ रतिकान्तः—रतिके प्रियतम, ८३६ सदेप्सितः—कामी पुरुषोंको सदा अभीष्ट, ८३७ पुष्पेषुः—पुष्पमय बाणवाले, ८३८ विश्वविजयी—सम्पूर्ण जगत्पर विजय पानेवाले, ८३९ स्मरः—विषयोंके स्मरणमात्रसे मनमें प्रकट हो जानेवाले, ८४० कामेश्वरीप्रियः— कामेश्वरी-रतिके प्रेमी ॥ २७५ ॥
उषापतिर्विश्वकेतुर्विश्वतृप्तोऽधिपूरुषः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्युगविधायकः ॥ २७६ ॥
८४१ उषापतिः—बाणासुरकी कन्या उषाके स्वामी अनिरुद्धरूप, ८४२ विश्वकेतुः—विश्वमें विजय-पताका फहरानेवाले, ८४३ विश्वतृप्तः—सब ओरसे तृप्त, ८४४ अधिपूरुषः—अन्तर्यामी साक्षी चेतन, ८४५ चतुरात्मा—मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप चार अन्तःकरणवाले, ८४६ चतुर्व्यूहः— वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंसे युक्त, ८४७ चतुर्युगविधायकः—सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चार युगोंका विधान करनेवाले ॥ २७६ ॥
चतुर्वेदैकविश्वात्मा सर्वोत्कृष्टांशकोटिसूः । आश्रमात्मा पुराणर्षिर्व्यासः शाखासहस्रकृत् ॥ २७७ ॥
८४८ चतुर्वेदैकविश्वात्मा—चारों वेदोंद्वारा प्रतिपादित एकमात्र सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, ८४९ सर्वोत्कृष्टांशकोटिसूः—सबसे श्रेष्ठ कोटि-कोटि अंशोंको जन्म देनेवाले, ८५० आश्रमात्मा—आश्रमधर्मरूप, ८५१ पुराणर्षिः—पुराणोंके प्रकाशक ऋषि, ८५२ व्यासः—वेदोंका विस्तार करनेवाले, ८५३ शाखासहस्रकृत्—सामवेदकी सहस्र शाखाओंका सम्पादन करनेवाले ॥ २७७ ॥
महाभारतनिर्माता कवीन्द्रो बादरायणः । कृष्णद्वैपायनः सर्वपुरुषार्थकबोधकः ॥ २७८ ॥
...] उत्तराखण्ड ] • नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन • ७१९
८५४ महाभारतनिर्माता—महाभारत ग्रन्थके रचयिता, ८५५ कवीन्द्रः—कवियोंके राजा, ८५६ बादरायणः—बदरी-वनमें उत्पन्न भगवान् वेदव्यास-रूप, ८५७ कृष्णद्वैपायनः—द्वीपमें उत्पन्न श्याम वर्णवाले व्यासजी, ८५८ सर्वपुरुषार्थैकबोधकः—समस्त पुरुषार्थोंके एकमात्र बोध करानेवाले ॥ २७८ ॥ वेदान्तकर्ता ब्रह्मैकव्यञ्जकः पुरुवंशकृत् । बुद्धो ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः ॥ २७९ ॥ ८५९ वेदान्तकर्ता—वेदान्तसूत्रोंके रचयिता, ८६० ब्रह्मैकव्यञ्जकः—एक अद्वितीय ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करानेवाले, ८६१ पुरुवंशकृत्—पुरुवंशकी परम्परा सुरक्षित रखनेवाले, ८६२ बुद्धः—भगवान्के अवतार बुद्धदेव, ८६३ ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः—ध्यानके द्वारा समस्त देव-देवियोंको जीतकर जगत्के प्रियतम बननेवाले ॥ २७९ ॥ निरायुधो जगज्जैत्रः श्रीधनो दुष्टमोहनः । दैत्यवेदबहिष्कर्ता वेदार्थश्रुतिगोपकः ॥ २८० ॥ ८६४ निरायुधः—अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करनेवाले, ८६५ जगज्जैत्रः—सम्पूर्ण जगत्को वशमें करनेवाले, ८६६ श्रीधनः—शोभाके धनी, ८६७ दुष्टमोहनः—दुष्टोंको मोहित करनेवाले, ८६८ दैत्यवेदबहिष्कर्ता—दैत्योंको वेदसे बहिष्कृत करनेवाले, ८६९ वेदार्थश्रुतिगोपकः—वेदोंके अर्थ और श्रुतियोंको गुप्त रखनेवाले ॥ २८० ॥ शौद्धोदनिर्दिष्टदिष्टः सुखदः सदसस्पतिः । यथायोग्याखिलकृपः सर्वशून्योऽखिलेष्टदः ॥ २८१ ॥ ८७० शौद्धोदनिः—कपिलवस्तुके राजा शुद्धोदनके पुत्र, ८७१ दृष्टदिष्टः—दैवके विधानको प्रत्यक्ष देखनेवाले, ८७२ सुखदः—सबको सुख देनेवाले, ८७३ सदसस्पतिः—सत्पुरुषोंकी सभाके अध्यक्ष, ८७४ यथायोग्याखिलकृपः—यथायोग्य सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा रखनेवाले, ८७५ सर्वशून्यः—सम्पूर्ण पदार्थोंको शून्यरूप ही माननेवाले, ८७६ अखिलेष्टदः—सबको सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ देनेवाले ॥ २८१ ॥ चतुष्कोटिपृथक्तत्त्वप्रज्ञापारमितेश्वरः । पाखण्डवेदमार्गेशः पाखण्डश्रुतिगोपकः ॥ २८२ ॥ ८७७ चतुष्कोटिपृथक्—स्थावर आदि चार श्रेणियोंमें विभक्त हुई सृष्टिसे पृथक्, ८७८ तत्त्व-प्रज्ञापारमितेश्वरः—तत्त्वभूत प्रज्ञापारमिता<sup>१</sup> (बुद्धिकी पराकाष्ठा) के ईश्वर, ८७९ पाखण्डवेदमार्गेशः—पाखण्ड-वेदमार्गके स्वामी, ८८० पाखण्ड-श्रुतिगोपकः—पाखण्डके द्वारा प्रतिपादित वेदकी श्रुतियोंके रक्षक ॥ २८२ ॥ कल्की विष्णुयशःपुत्रः कलिकालविलोपकः । समस्तम्लेच्छदुष्टघ्नः सर्वशिष्टद्विजातिकृत् ॥ २८३ ॥ ८८१ कल्की—कलियुगके अन्तमें होनेवाला भगवान्का एक अवतार, ८८२ विष्णुयशःपुत्रः—श्रीविष्णुयशाके पुत्र भगवान् कल्कि, ८८३ कलिकाल-विलोपकः—कलियुगका लोप करके सत्ययुगका प्रवेश करानेवाले, ८८४ समस्तम्लेच्छदुष्टघ्नः—सम्पूर्ण म्लेच्छों और दुष्टोंका वध करनेवाले, ८८५ सर्वशिष्टद्विजातिकृत्—सबको श्रेष्ठ द्विज बनानेवाले अथवा समस्त साधु द्विजातियोंके रक्षक ॥ २८३ ॥ सत्यप्रवर्तको देवद्विजदीर्घक्षुधापहः । अश्ववारादिक्रान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशनः ॥ २८४ ॥ ८८६ सत्यप्रवर्तकः—सत्ययुगकी प्रवृत्ति करानेवाले, ८८७ देवद्विजदीर्घक्षुधापहः—[यज्ञ और ब्राह्मण-भोजन आदिका प्रचार करके] देवताओं और ब्राह्मणोंकी बढ़ी हुई भूखको शान्त करनेवाले, ८८८ अश्ववारादिः—घुड़सवारोंमें श्रेष्ठ, ८८९ एकान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशनः—पृथ्वीकी दुर्गतिका पूर्णतया नाश करनेवाले ॥ २८४ ॥ सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृन्नष्टनिःशेषधर्मवित् । अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजः ॥ २८५ ॥
१-दस पारमिताओंमेंसे एकका नाम प्रज्ञापारमिता है।
७२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
८९० सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृत्—पृथ्वीको शीघ्र ही अनन्त लक्ष्मीसे परिपूर्ण करनेवाले, ८९१ नष्टनिःशेषधर्मवित्—नष्ट हुए सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता, ८९२ अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजः—अनन्त सुवर्णकी दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान कराकर सम्पूर्ण ब्राह्मणोंको स्वर्णसे सम्पन्न करनेवाले ॥ २८५ ॥
असाध्यैकजगच्छास्ता विश्वबन्धो जयध्वजः ।
आत्मतत्त्वाधिपः कर्तृश्रेष्ठो विधिर्मापतिः ॥ २८६ ॥
८९३ असाध्यैकजगच्छास्ता—किसीके वशमें न होनेवाले सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र शासक, ८९४ विश्वबन्धः—समस्त विश्वको अपनी मायासे बाँध रखनेवाले, ८९५ जयध्वजः—सर्वत्र अपनी विजयपताका फहरानेवाले, ८९६ आत्मतत्त्वाधिपः—आत्मतत्त्वके स्वामी, ८९७ कर्तृश्रेष्ठः—कर्ताओंमें श्रेष्ठ, ८९८ विधिः—शास्त्रीय विधिरूप, ८९९ उमापतिः—उमाके स्वामी ॥ २८६ ॥
भर्तृश्रेष्ठः प्रजेशाम्र्यो मरीचिर्जनकाग्रणीः ।
कश्यपो देवराडिन्द्रः प्रह्लादो दैत्यराट् शशी ॥ २८७ ॥
९०० भर्तृश्रेष्ठः—भरण-पोषण करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९०१ प्रजेशाम्र्यः—प्रजापतियोंमें अग्रगण्य, ९०२ मरीचिः—मरीचि नामक प्रजापतिरूप, ९०३ जनकाग्रणीः—जन्म देनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, ९०४ कश्यपः—सर्वद्रष्टा कश्यप मुनिरूप, ९०५ देवराट्—देवताओंके राजा, ९०६ इन्द्रः—परम ऐश्वर्यशाली इन्द्रस्वरूप, ९०७ प्रह्लादः—भगवद्भक्तिके प्रभावसे अत्यन्त आह्लादपूर्ण रानी कयाधूके पुत्ररूप, ९०८ दैत्यराट्—दैत्योंके स्वामी प्रह्लादरूप, ९०९ शशी—खरगोशका चिह्न धारण करनेवाले चन्द्रमारूप ॥ २८७ ॥
नक्षत्रेशो रविस्तेजःश्रेष्ठः शुक्रः कवीश्वरः ।
महर्षिराड्भृगुर्विष्णुरादित्येशो बलिश्वराट् ॥ २८८ ॥
९१० नक्षत्रेशः—नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमारूप, ९११ रविः—सूर्यस्वरूप, ९१२ तेजःश्रेष्ठः—तेजस्वियोंमें सबसे श्रेष्ठ, ९१३ शुक्रः—भृगुके पुत्र शुक्राचार्यस्वरूप, ९१४ कवीश्वरः—कवियोंके स्वामी, ९१५ महर्षिराट्—महर्षियोंमें अधिक तेजस्वी, ९१६ भृगुः—ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति भृगुस्वरूप, ९१७ विष्णुः—बारह आदित्योंमेंसे एक, ९१८ आदित्येशः—बारह आदित्योंके स्वामी, ९१९ बलिश्वराट्—बलिको इन्द्र बनानेवाले ॥ २८८ ॥
वायुर्वह्निः शुचिश्रेष्ठः शङ्करो रुद्रराड्गुरुः ।
विद्वत्तमश्चित्ररथो गन्धर्वाग्र्योऽक्षरोत्तमः ॥ २८९ ॥
९२० वायुः—वायुतत्त्वके अधिष्ठाता देवता, ९२१ वह्निः—अग्नितत्त्वके अधिष्ठाता देवता, ९२२ शुचिश्रेष्ठः—पवित्रोंमें श्रेष्ठ, ९२३ शङ्करः—सबका कल्याण करनेवाले शिवरूप, ९२४ रुद्रराट्—ग्यारह रुद्रोंके स्वामी, ९२५ गुरुः—गुरु नामसे प्रसिद्ध अङ्गिरापुत्र बृहस्पतिरूप, ९२६ विद्वत्तमः—सर्वश्रेष्ठ विद्वान्, ९२७ चित्ररथः—विचित्र रथवाले गन्धर्वोंके राजा, ९२८ गन्धर्वाग्र्यः—गन्धर्वोंमें अग्रगण्य चित्रथरूप, ९२९ अक्षरोत्तमः—अक्षरोंमें उत्तम 'ॐ'कारस्वरूप ॥ २८९ ॥
वर्णादिरग्र्यस्त्री गौरी शक्त्यग्र्या श्रीश्च नारदः ।
देवर्षिराट्पाण्डवाग्र्योऽर्जुनो वादः प्रवादराट् ॥ २९० ॥
९३० वर्णादिः—समस्त अक्षरोंके आदिभूत अकारस्वरूप, ९३१ अग्र्यस्त्री—स्त्रियोंमें अग्रगण्य सती पार्वतीरूप, ९३२ गौरी—गौरवर्णा उमारूप, ९३३ शक्त्यग्र्या—भगवान्की अन्तरङ्गा शक्तियोंमें सर्वश्रेष्ठ भगवती लक्ष्मीरूप, ९३४ श्रीः—भगवान् विष्णुका आश्रय लेनेवाली लक्ष्मी, ९३५ नारदः—सबको ज्ञान देनेवाले देवर्षि नारदरूप, ९३६ देवर्षिराट्—देवर्षियोंके राजा, ९३७ पाण्डवाग्र्यः—पाण्डवोंमें अपने गुणोंके कारण श्रेष्ठ अर्जुनरूप, ९३८ अर्जुनः—अर्जुन नामसे प्रसिद्ध कुन्तीके तृतीय पुत्र, ९३९ वादः—तत्त्वनिर्णयके उद्देश्यसे शुद्ध नीयतके साथ किये जानेवाले शास्त्रार्थरूप, ९४० प्रवादराट्—उत्तम वाद करनेवालोंमें श्रेष्ठ ॥ २९० ॥
पावनः पावनेशानो वरुणो यादसां पतिः ।
गङ्गा तीर्थोत्तमो द्यूतं छलकाग्र्यं वरोषधम् ॥ २९१ ॥
९४१ पावनः—सबको पवित्र करनेवाले, ९४२
उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७२१
पावनेशः—पावन वस्तुओंके ईश्वर, ९४३ वरुणः—जलके अधिष्ठाता देवता वरुणरूप, ९४४ यादसां पतिः—जल-जन्तुओंके स्वामी, ९४५ गङ्गा—भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई परम पवित्र नदी, जो भूतलमें भागीरथीके नामसे विख्यात एवं भगवद्विभूति है, ९४६ तीर्थोत्तमः—तीर्थोंमें उत्तम गङ्गारूप, ९४७ द्यूतम्—छल करनेवालोंमें द्यूतरूप भगवान्की विभूति, ९४८ छलकाग्र्यम्—छलकी पराकाष्ठा जूआरूप, ९४९ वरौषधम्—जीवनकी रक्षा करनेवाली श्रेष्ठ ओषधि— अन्नरूप ॥ २९१ ॥
अन्नं सुदर्शनोऽस्त्राग्र्यं वज्रं प्रहरणोत्तमम् ।
उच्चैःश्रवा वाजिराज ऐरावत इभेश्वरः ॥ २९२ ॥
९५० अन्नम्—प्राणियोंकी क्षुधा दूर करनेवाला धरतीसे उत्पन्न खाद्य पदार्थ, ९५१ सुदर्शनः—देखनेमें सुन्दर तेजस्वी अस्त्र—सुदर्शनचक्ररूप, ९५२ अस्त्राग्र्यम्—समस्त अस्त्रोंमें श्रेष्ठ सुदर्शन, ९५३ वज्रम्—इन्द्रके आयुधस्वरूप, ९५४ प्रहरणोत्तमम्—प्रहार करनेयोग्य आयुधोंमें उत्तम वज्ररूप, ९५५ उच्चैःश्रवाः—ऊँचे कानोंवाला दिव्य अश्व, जो समुद्रसे उत्पन्न हुआ था, ९५६ वाजिराजः—घोड़ोंके राजा उच्चैःश्रवारूप, ९५७ ऐरावतः—समुद्रसे उत्पन्न इन्द्रका वाहन ऐरावत नामक हाथी, ९५८ इभेश्वरः—हाथियोंके राजा ऐरावतस्वरूप ॥ २९२ ॥
अरुन्धत्येकपत्नीशो ह्यश्वत्थोऽशेषवृक्षराट् ।
अध्यात्मविद्या विद्याग्र्यः प्रणवश्छन्दसां वरः ॥ २९३ ॥
९५९ अरुन्धती—पतिव्रताओंमें श्रेष्ठ अरुन्धती-स्वरूप, ९६० एकपत्नीशः—पतिव्रता अरुन्धतीके स्वामी महर्षि वसिष्ठरूप, ९६१ अश्वत्थः—पीपलके वृक्षरूप, ९६२ अशेषवृक्षराट्—सम्पूर्ण वृक्षोंके राजा अश्वत्थरूप, ९६३ अध्यात्मविद्या—आत्मतत्त्वका बोध करानेवाली ब्रह्मविद्यास्वरूप, ९६४ विद्याग्र्यः—विद्याओंमें अग्रगण्य प्रणवरूप, ९६५ प्रणवः—ओंकाररूप, ९६६ छन्दसां वरः—वेदोंका आदिभूत ओंकार, अथवा मन्त्रोंमें श्रेष्ठ प्रणव ॥ २९३ ॥
मेरुर्गिरिपतिर्मार्गो मासाग्र्यः कालसत्तमः ।
दिनाद्यात्मा पूर्वसिद्धः कपिलः साम वेदराट् ॥ २९४ ॥
९६७ मेरुः—मेरु नामक दिव्य पर्वतरूप, ९६८ गिरिपतिः—पर्वतोंके स्वामी, ९६९ मार्गः—मार्गशीर्ष (अगहन) का महीना, ९७० मासाग्र्यः—मासोंमें अग्रगण्य मार्गशीर्षस्वरूप, ९७१ कालसत्तमः—समयोंमें सर्वश्रेष्ठ-ब्रह्मवेला, ९७२ दिनाद्यात्मा—दिन और रात्रि दोनोंका सम्मिलित रूप—प्रभात या ब्रह्मवेला, ९७३ पूर्वसिद्धः—आदि सिद्ध महर्षि कपिलरूप, ९७४ कपिलः—कपिल वर्णवाले एक मुनि, जो भगवान्के अवतार हैं, ९७५ साम—सहस्र शाखाओंसे विशिष्ट सामवेद, ९७६ वेदराट्—वेदोंके राजा सामवेदरूप ॥ २९४ ॥
तार्क्ष्यः खगेन्द्र ऋत्वग्र्यो वसन्तः कल्पपादपः ।
दातृश्रेष्ठः कामधेनुरार्तिघ्नाग्र्यः सुहृत्तमः ॥ २९५ ॥
९७७ तार्क्ष्यः—तार्क्ष (कश्यप) ऋषिके पुत्र गरुड़रूप, ९७८ खगेन्द्रः—पक्षियोंके राजा गरुड़, ९७९ ऋत्वग्र्यः—ऋतुओंमें श्रेष्ठ वसन्तरूप, ९८० वसन्तः—चैत्र और वैशाख मास, ९८१ कल्पपादपः—कल्पवृक्षस्वरूप, ९८२ दातृश्रेष्ठः—मनोवाञ्छित वस्तु देनेवालोंमें श्रेष्ठ कल्पवृक्ष, ९८३ कामधेनुः—अभीष्ट पूर्ण करनेवाली गोरूप, ९८४ आर्तिघ्नाग्र्यः—पीड़ा दूर करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९८५ सुहृत्तमः—परम हितैषी ॥ २९५ ॥
चिन्तामणिर्गुरुश्रेष्ठो माता हिततमः पिता ।
सिंहो मृगेन्द्रो नागेन्द्रो वासुकिन्नृवरो नृपः ॥ २९६ ॥
९८६ चिन्तामणिः—मनमें चिन्तन की हुई इच्छाको पूर्ण करनेवाली भगवत्स्वरूप दिव्य मणि, ९८७ गुरुश्रेष्ठः—गुरुओंमें श्रेष्ठ मातारूप, ९८८ माता—जन्म देनेवाली जननी, ९८९ हिततमः—सबसे बड़े हितकारी, ९९० पिता—जन्मदाता, ९९१ सिंहः—मृगोंके राजा सिंहरूप, ९९२ मृगेन्द्रः—समस्त वनके जन्तुओंका स्वामी सिंहरूप, ९९३ नागेन्द्रः—नागोंके राजा, ९९४ वासुकिः—नागराज वासुकिरूप, ९९५ नृवरः—मनुष्योंमें श्रेष्ठ, ९९६ नृपः—मनुष्योंका पालन करनेवाले राजारूप ॥ २९६ ॥
७२२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण *********************************************************************************
वर्णेशो ब्राह्मणश्चेतः करणाग्र्यं नमो नमः।
इत्येतद्वासुदेवस्य विष्णोर्नामसहस्रकम्॥ २९७॥*
९९७ वर्णेशः— समस्त वर्णोंके स्वामी ब्राह्मण-रूप, ९९८ ब्राह्मणः— ब्राह्मण माता-पितासे उत्पन्न एवं ब्रह्मज्ञानी, ९९९ चेतः— परमात्मचिन्तनकी योग्यतावाले चित्तरूप, १००० करणाग्र्यम्— इन्द्रियोंका प्रेरक होनेके कारण उनमें सबसे श्रेष्ठ चित्त—इस प्रकार ये सबके हृदयमें वास करनेवाले भगवान् विष्णुके सहस्र नाम हैं। इन सब नामोंको मेरा बारम्बार नमस्कार है॥ २९७॥
यह विष्णुसहस्रनामस्तोत्र समस्त अपराधोंको शान्त करनेवाला, परम उत्तम तथा भगवान्में भक्तिको बढ़ानेवाला है। इसका कभी नाश नहीं होता। ब्रह्मलोक आदिका तो यह सर्वस्व ही है। विष्णुलोकतक पहुँचनेके लिये यह अद्वितीय सीढ़ी है। इसके सेवनसे सब दुःखोंका नाश हो जाता है। यह सब सुखोंको देनेवाला तथा शीघ्र ही परम मोक्ष प्रदान करनेवाला है। काम, क्रोध आदि जितने भी अन्तःकरणके मल हैं, उन सबका इससे शोधन होता है। यह परम शान्तिदायक एवं महापातकी मनुष्योंको भी पवित्र बनानेवाला है। समस्त प्राणियोंको यह शीघ्र ही सब प्रकारके अभीष्ट फल दान करता है। समस्त विघ्नोंकी शान्ति और सम्पूर्ण अरिष्टोंका विनाश करनेवाला है। इसके सेवनसे भयङ्कर दुःख शान्त हो जाते हैं। दुःसह दरिद्रताका नाश हो जाता है तथा तीनों प्रकारके ऋण दूर हो जाते हैं। यह परम गोपनीय तथा धन-धान्य और यशकी वृद्धि करनेवाला है। सब प्रकारके ऐश्वर्यों, समस्त सिद्धियों और सम्पूर्ण धर्मोंको देनेवाला है। इससे कोटि-कोटि तीर्थ, यज्ञ, तप, दान और व्रतोंका फल प्राप्त होता है। यह संसारकी जड़ता दूर करनेवाला और सब प्रकारकी विद्याओंमें प्रवृत्ति करानेवाला है। जो राज्यसे भ्रष्ट हो गये हैं, उन्हें यह राज्य दिलाता और रोगियोंके सब रोगोंको हर लेता है। इतना ही नहीं, यह स्तोत्र वन्ध्या स्त्रियोंको पुत्र और रोगसे क्षीण हुए पुरुषोंको तत्काल जीवन देनेवाला है। यह परम पवित्र, मङ्गलमय तथा आयु बढ़ानेवाला है। एक बार भी इसका श्रवण, पठन अथवा जप करनेसे अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेद, कोटि-कोटि मन्त्र, पुराण, शास्त्र तथा स्मृतियोंका श्रवण और पाठ हो जाता है। प्रिये ! जो इसके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षरका भी नित्य जप या पाठ करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथ तत्काल सिद्ध हो जाते हैं। सब कार्योंकी सिद्धिसे शीघ्र ही विश्वास पैदा करानेवाला इसके समान दूसरा कोई साधन नहीं है।
कल्याणी ! तुम्हें इस स्तोत्रको सदा गुप्त रखना चाहिये और अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये केवल इसीका पाठ करना चाहिये। जिसका हृदय संशयसे दूषित हो, जो भगवान् विष्णुका भक्त न हो, जिसमें श्रद्धा और भक्तिका अभाव हो तथा जो भगवान् विष्णुको साधारण देवता समझता हो, ऐसे पुरुषको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो अपना पुत्र, शिष्य अथवा सुहृद् हो, उसे उसका हित करनेकी इच्छासे इस श्रीविष्णु-सहस्रनामका उपदेश देना चाहिये। अल्पबुद्धि पुरुष इसे नहीं ग्रहण करेंगे। देवर्षि नारद मेरे प्रसादसे कलियुगमें तत्काल फल देनेवाले इस स्तोत्रको ग्रहण करके कल्पग्राम (कलापग्राम) में ले जायेंगे, जिससे भाग्यहीन लोगोंका दुःख दूर हो जायगा। भगवान् विष्णुसे बढ़कर कोई धाम नहीं है, श्रीविष्णुसे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है, श्रीविष्णुसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और श्रीविष्णुसे भिन्न कोई मन्त्र नहीं है। भगवान् श्रीविष्णुसे भिन्न कोई सत्य नहीं है, श्रीविष्णुसे बढ़कर जप नहीं है, श्रीविष्णुसे उत्तम ध्यान नहीं है तथा श्रीविष्णुसे श्रेष्ठ कोई गति नहीं है। जिस पुरुषकी भगवान् जनार्दनके चरणोंमें भक्ति है, उसे अनेक मन्त्रोंके जप, बहुत विस्तारवाले शास्त्रोंके स्वाध्याय तथा सहस्रों वाजपेय यज्ञोंके अनुष्ठान करनेकी क्या आवश्यकता है? मैं सत्य-सत्य कहता हूँ—भगवान् विष्णु सर्वतीर्थमय हैं, भगवान् विष्णु सर्वशास्त्रमय हैं
* पद्मपुराण, उत्तरखण्डका ७२ वाँ अध्याय।
उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७२३
तथा भगवान् विष्णु सर्वयज्ञमय हैं।* यह सब मैंने सम्पूर्ण विश्वका सर्वस्वभूत सार-तत्त्व बतलाया है।
पार्वती बोलीं— जगत्पते! आज मैं धन्य हो गयी। आपने मुझपर बड़ा अनुग्रह किया। मैं कृतार्थ हो गयी, क्योंकि आपके मुखसे यह परम दुर्लभ एवं गोपनीय स्तोत्र मुझे सुननेको मिला है। देवेश! मुझे तो संसारकी अवस्था देखकर आश्चर्य होता है। हाय! कितने महान् कष्टकी बात है कि सम्पूर्ण सुखोंके दाता श्रीहरिके विद्यमान रहते हुए भी मूर्ख मनुष्य संसारमें क्लेश उठा रहे हैं।† भला, लक्ष्मीके प्रियतम भगवान् मधुसूदनसे बढ़कर दूसरा कौन देवता है। आप-जैसे योगेश्वर भी जिनके तत्त्वका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं, उन श्रीपुरुषोत्तमसे बड़ा दूसरा कौन-सा पद है। उनको जाने बिना ही अपनेको ज्ञानी माननेवाले मूढ़ मनुष्य दूसरे किस देवताकी आराधना करते हैं। अहो! सर्वेश्वर भगवान् विष्णु सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंसे भी उत्तम हैं। स्वामिन्! जो आपके भी आदिगुरु हैं, उन्हें मूढ़ मनुष्य सामान्य दृष्टिसे देखते हैं; किन्तु प्रभो! सर्वेश्वर! यदि मैं अर्थ-कामादिमें आसक्त होने या केवल आपमें ही मन लगाये रहनेके कारण अथवा प्रमादवश ही समूचे सहस्रनामस्तोत्रका पाठ न कर सकूँ, तो उस अवस्थामें जिस किसी भी एक नामसे मुझे सम्पूर्ण सहस्रनामका फल प्राप्त हो जाय, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।‡
महादेवजी बोले— सुमुखि! मैं तो 'राम! राम! राम!' इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्रीरामानाममें ही निरन्तर रमण किया करता हूँ। रामनाम सम्पूर्ण सहस्रनामके समान है।§ पार्वती! यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र भी प्रतिदिन विशेषरूपसे इस श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करें तो वे धन-धान्यसे युक्त होकर भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होते हैं।$ देवि! जो लोग पूर्वोक्त अङ्गन्याससे युक्त श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं। सुमुखि! बार-बार बहुत कहनेसे क्या लाभ; थोड़ेमें इतना ही जान लो कि भगवान् विष्णुका सहस्रनाम परम मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसके पाठमें उतावली नहीं करनी चाहिये। यदि उतावली की जाती है, तो आयु और धनका नाश होता है। इस पृथ्वीपर जम्बूद्वीपके अंदर जितने भी तीर्थ हैं, वे सब सदा वहीं निवास करते हैं, जहाँ श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ होता है। जहाँ श्रीविष्णुसहस्रनामकी स्थिति होती है, वहीं गङ्गा, यमुना, कृष्णवेणी, गोदावरी, सरस्वती और समस्त तीर्थ निवास करते हैं। यह परम पवित्र स्तोत्र भक्तोंको सदा प्रिय है। भक्तिभावसे भावित चित्तके द्वारा सदा ही इस स्तोत्रका चिन्तन करना चाहिये। जो मनीषी पुरुष परम उत्तम श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका पाठ करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त होकर श्रीहरिके समीप जाते हैं। जो लोग सूर्योदयके समय इसका पाठ और जप करते हैं, उनके बल, आयु और लक्ष्मीकी प्रतिदिन वृद्धि होती है। एक-एक नामका उच्चारण करके श्रीहरिको तुलसीदल अर्पण करनेसे जो पूजा सम्पन्न होती
* नास्ति विष्णोः परं धाम नास्ति विष्णोः परं तपः। नास्ति विष्णोः परो धर्मो नास्ति मन्त्रो ह्यवैष्णवः ॥
नास्ति विष्णोः परं सत्यं नास्ति विष्णोः परो जपः। नास्ति विष्णोः परं ध्यानं नास्ति विष्णोः परा गतिः ॥
किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः शास्त्रैः किं बहुविस्तरैः। वाजपेयसहस्रैर्वा भक्तिर्यस्य जनार्दने ॥
सर्वतीर्थमयो विष्णुः सर्वशास्त्रमयः प्रभुः। सर्वक्रतुमयो विष्णुः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ (७२। ३१३-३१६)
† अहो बत महत्कष्टं समस्तसुखदे हरौ। विद्यमानेऽपि देवेश मूढाः क्लिश्यन्ति संसृतौ ॥ (७२। ३१८)
‡ कामाद्यासक्तचित्तत्वात्किन्तु सर्वेश्वर प्रभो। तन्मयत्वात्प्रमादाद्वा शक्नोमि पठितुं न चेत् ॥
विष्णोः सहस्रनामैतत्प्रत्यहं वृषभध्वज। नाम्रैकेन तु येन स्यात्तत्फलं ब्रूहि मे प्रभो ॥ (७२। ३३३-३३४)
§ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ (७२। ३३५)
$ ब्राह्मणा वा क्षत्रिया वा वैश्या वा गिरिकन्यके। शूद्रा वाथ विशेषेण पठन्त्यनुदिनं यदि ॥
धनधान्यसमायुक्ता यान्ति विष्णोः परं पदम्। ..................................... (७३। १-३)
सं०प०पु० २४—
७२४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
है, उसे कोटि यज्ञोंकी अपेक्षा भी अधिक फल देनेवाली समझना चाहिये। पार्वती ! जो द्विज रास्ता चलते हुए भी श्रीविष्णुसहस्रनामका पाठ करते हैं, उन्हें मार्गजनित दोष नहीं प्राप्त होते। जो लोग भगवान् केशवके इस माहात्म्यका श्रवण करते हैं, वे मनुष्योंमें श्रेष्ठ, पवित्र एवं पुण्यस्वरूप हैं।
गृहस्थ-आश्रमकी प्रशंसा तथा दान-धर्मकी महिमा
श्रीमहादेवजी कहते हैं— देवि ! सुनो, अब मैं धर्मके उत्तम माहात्म्यका वर्णन करूँगा, जिसका श्रवण करनेसे इस पृथ्वीपर फिर कभी जन्म नहीं होता। धर्मसे अर्थ, काम और मोक्ष—तीनोंकी प्राप्ति होती है; अतः जो धर्मके लिये चेष्टा करता है, वही विशेषरूपसे विद्वान् माना गया है।* जो कभी कुत्सित कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता, वह घरपर भी पाँचों इन्द्रियोंका संयमरूप तप कर सकता है। जिसकी आसक्ति दूर हो गयी है, उसके लिये घर भी तपोवनके ही समान है; अतः गृहस्थाश्रमको स्वधर्म बताया गया है।† गिरिराजकिशोरी ! जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें नहीं किया है, उनके लिये इस गृहस्थ आश्रमको पार करना कठिन है; वे इस शुभ एवं श्रेष्ठतम आश्रमका विनाश कर डालते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंने मनीषी पुरुषोंके लिये गृहस्थ-धर्मको बहुत उत्तम बताया है। साधु पुरुष वनमें तपस्या करके जब भूखसे पीड़ित होता है, तब सदा अन्नदाता गृहस्थके ही घर आता है। वह गृहस्थ जब भक्तिपूर्वक उस भूखे अतिथिको अन्न देता है तो उसकी तपस्यामें हिस्सा बँटा लेता है; अतः मनुष्य समस्त आश्रमोंमें श्रेष्ठ इस गृहस्थाश्रमका सदा पालन करता है और इसीमें मानवोचित भोगोंका उपभोग करके अन्तमें स्वर्गको जाता है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। देवि ! सदा गृहस्थ-धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंके पास पाप कैसे आ सकता है। गृहस्थाश्रम परम पवित्र है। घर सदा तीर्थके समान पावन है। इस पवित्र गृहस्थाश्रममें रहकर विशेषरूपसे दान देना चाहिये। यहाँ देवताओंका पूजन होता है, अतिथियोंको भोजन दिया जाता है और [थके-माँदे] राहगीरोंको ठहरनेका स्थान मिलता है; अतः गृहस्थाश्रम परम धन्य है।‡ ऐसे गृहस्थाश्रममें रहकर जो लोग ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उन्हें आयु, धन और संतानकी कभी कमी नहीं होती।
शुभ समय आनेपर चन्द्रदेवकी पूजा करके नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका अनुष्ठान करनेके पश्चात् अपनी शक्तिके अनुसार दान देना चाहिये। दानसे मनुष्य निस्संदेह अपने पापोंका नाश कर डालता है। दानके प्रभावसे इस लोकमें अभीष्ट भोगोंका उपभोग करके मनुष्य सनातन श्रीविष्णुको प्राप्त होता है। जो अभक्ष्य-भक्षणमें प्रवृत्त रहनेवाला, गर्भस्थ बालककी हत्या करनेवाला, गुरु-पत्नीके साथ सम्भोग करनेवाला तथा झूठ बोलनेवाला है, ये सभी नीच योनियोंमें जन्म लेते हैं। जो यज्ञ करानेके योग्य नहीं है ऐसे मनुष्यसे जो यज्ञ कराता, लोकनिन्दित पुरुषसे याचना करता, सदा कोपसे युक्त रहता, साधुओंको पीड़ा देता, विश्वासघात करता, अपवित्र रहता और धर्मकी निन्दा करता है—इन पापोंसे युक्त होनेपर मनुष्यकी आयु शीघ्र नष्ट हो जाती है, ऐसा जानकर [पापका सर्वथा त्याग करके] विशेषरूपसे दान करना उचित है।
* धर्मादर्थं च कामं च मोक्षं च त्रितयं लभेत्। तस्माद्धर्मं समीहेत विद्वान् स बहुधा स्मृतः ॥ (७५। २)
† गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपस्त्वकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते। निवृत्तरागस्य तपोवनं गृहं गृहाश्रमोऽतो गदितः स्वधर्मः ॥ (७५। ८)
‡ गृहाश्रमः पुण्यतमः सर्वदा तीर्थवद्गृहम्। अस्मिन् गृहाश्रमे पुण्ये दानं देयं विशेषतः ॥
देवानां पूजनं यत्र अतिथीनां तु भोजनम्। पथिकानां च शरणमतो धन्यतमो मतः ॥ (७५। १२-१३)
· उत्तरखण्ड ] * गण्डकी नदीका माहात्म्य तथा अभ्युदय एवं और्ध्वदैहिक नामक स्तोत्रका वर्णन * ७२५
गण्डकी नदीका माहात्म्य तथा अभ्युदय एवं और्ध्वदैहिक नामक स्तोत्रका वर्णन
**श्रीमहादेवजी कहते हैं—**देवि ! अब मैं गण्डकी नदीके माहात्म्यका विधिपूर्वक वर्णन करूँगा। पार्वती ! गङ्गाका जैसा माहात्म्य है, वैसा ही गण्डकी नदीका भी बताया गया है। जहाँसे नाना प्रकारकी शालग्राम-शिला प्रकट होती है, उस गण्डकी नदीकी महिमाका बड़े-बड़े मुनियोंने वर्णन किया है। अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज—सभी प्राणी उसके दर्शनमात्रसे पवित्र हो जाते हैं। महानदी गण्डकी उत्तरमें प्रकट हुई है। गिरिजें ! वह स्मरण करनेपर निश्चय ही सब पापोंका नाश कर देती है। वहाँ कल्याण प्रदान करनेवाले भगवान् नारायण सदा विद्यमान रहते हैं, ऋषियोंका भी वहाँ निवास है तथा सम्पूर्ण देवता, रुद्र, नाग और यक्ष विशेषरूपसे वहाँ रहा करते हैं। उस स्थलपर भगवान्की अनेक रूपवाली और सुखदायिनी चौबीस अवतारोंकी मूर्तियाँ उपलब्ध होती हैं। एक मत्स्यरूप है, दूसरी कच्छपरूप; इसी प्रकार वाराह, नृसिंह और वामनकी भी कल्याणदायिनी मूर्तियाँ हैं। श्रीराम, परशुराम तथा श्रीकृष्णकी भी मोक्षदायिनी मूर्ति देखी जाती है। श्रीविष्णुनामसे प्रसिद्ध उस स्थलपर उपर्युक्त मूर्तियोंके सिवा बुद्धकी मूर्ति भी बतायी गयी है। कल्कि और महर्षि कपिलकी भी पुण्यमयी मूर्ति उपलब्ध होती है, इनके सिवा और भी भाँति-भाँतिके आकार-वाली बहुत-सी मूर्तियाँ देखी जाती हैं। उन सबके अनेक रूप हैं और उनकी संख्या भी बहुत है। वह गण्डकी नामकी गङ्गा परम पुण्यमयी तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली है। उस भूमिपर आज भी मेरे साथ भगवान् हृषीकेश नियमपूर्वक निवास करते हैं, उसके जलका स्पर्श करनेमात्रसे मनुष्य भ्रूणहत्या, बालहत्या और गोहत्या आदि समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
गण्डकी नदीके जलका दर्शन करनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जातिके मनुष्य—सभी निश्चय ही मुक्त हो जाते हैं; विशेषतः पापियोंके लिये तो यह त्रिवेणीके समान पुण्यमयी है। जहाँ ब्रह्महत्यारेकी भी मुक्ति हो जाती है, वहाँ औरोंके लिये क्या कहना है ? पार्वती ! मैं सदा हर समय वहाँ जाता रहता हूँ; वह तीर्थोंमें तीर्थराज है—यह बात ब्रह्माजीने कही थी। मुनियोंने वहाँ स्नान और दानका विधान किया है। भगवान् विष्णुद्वारा पूर्वकालमें निर्मित हुआ वह क्षेत्र महांन्-से-महान् है। वह वैष्णव पुरुषोंको उत्तम गति प्रदान करनेवाला और परम पावन माना गया है। देवि ! इस संसारमें मनुष्यका जन्म सदा दुर्लभ है; उसमें भी गण्डकी नदीका तीर्थ और वहाँ भी श्रीविष्णुक्षेत्र अत्यन्त दुर्लभ है। अतः श्रेष्ठ द्विजोंको आषाढ़ मासमें वहाँकी यात्रा करनी चाहिये। वरानने ! मैं बारंबार कहता हूँ कि गण्डकीके समान कोई तीर्थ, द्वादशीके तुल्य कोई व्रत और श्रीविष्णुसे भिन्न कोई देवता नहीं है। जो नरश्रेष्ठ गण्डकी नदीका माहात्म्य श्रवण करते हैं, वे इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीविष्णुधामको जाते हैं।
महादेव उवाच—
शृणु सुन्दरि वक्ष्यामि स्तोत्रं चाभ्युदयं ततः।
यच्छ्रुत्वा मुच्यते पापी ब्रह्महा नात्र संशयः ॥ १ ॥
धाता वै नारदं प्राह तदहं तु ब्रवीमि ते।
तमुवाच ततो देवः स्वयम्भूरमितद्युतिः ॥ २ ॥
प्रगृह्य रुचिरं बाहुं स्मारये चौर्ध्वदेहिकम्।
**महादेवजी कहते हैं—**सुन्दरी ! सुनो, अब मैं अभ्युदयकारी स्तोत्रका वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर ब्रह्महत्यारा भी निस्सन्देह मुक्त हो जाता है। ब्रह्माजीने देवर्षि नारदसे इस स्तोत्रका वर्णन किया था, वही मैं तुम्हें बताता हूँ। [पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जब रावणका वध कर चुके, उस समय समस्त देवता उनकी स्तुति करनेके लिये आये। उसी अवसरपर] अमित-तेजस्वी भगवान् ब्रह्माने श्रीरघुनाथजीकी सुन्दर बाँह हाथमें लेकर जो उनकी स्तुति की थी, वह 'और्ध्वदैहिक स्तोत्र' के नामसे प्रसिद्ध है। आज मैं उसीको स्मरण करके तुमसे कहता हूँ।
भवान्नारायणः श्रीमान् देवश्चक्रायुधो हरिः ॥ ३ ॥
शार्ङ्गधारी हृषीकेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
अजितः खड्गभिज्जिष्णुः कृष्णश्चैव सनातनः ॥ ४ ॥
७२६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यभवदात्मकः।
अक्षरं ब्रह्म सत्यं तु आदौ चान्ते च राघव ॥ ५॥
लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वाक्सेनश्चतुर्भुजः।
सेनानी रक्षणस्त्वं च वैकुण्ठस्त्वं जगत्प्रभो ॥ ६॥
श्रीब्रह्माजी बोले— श्रीरघुनन्दन ! आप समस्त जीवोंके आश्रयभूत नारायण, लक्ष्मीसे युक्त, स्वयंप्रकाश एवं सुदर्शन नामक चक्र धारण करनेवाले श्रीहरि हैं। शार्ङ्ग नामक धनुषको धारण करनेवाले भी आप ही हैं। आप ही इन्द्रियोंके स्वामी एवं पुराणप्रतिपादित पुरुषोत्तम हैं। आप कभी किसीसे भी परास्त नहीं होते। शत्रुओंकी तलवारोंको टूक-टूक करनेवाले, विजयी और सदा एकरस रहनेवाले—सनातन देवता सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण भी आप ही हैं। आप एक दाँतवाले भगवान् वराह हैं। भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों काल आपके ही रूप हैं। श्रीरघुनन्दन ! इस विश्वके आदि, मध्य और अन्तमें जो सत्यस्वरूप अविनाशी परब्रह्म स्थित है, वह आप ही हैं। आप ही लोकोंके परम धर्म हैं। आपको युद्धके लिये तैयार होते देख दैत्योंकी सेना चारों ओर भाग खड़ी होती है, इसीलिये आप विष्वाक्सेन कहलाते हैं। आप ही चार भुजा धारण करनेवाले श्रीविष्णु हैं।
प्रभवश्चाव्ययस्त्वं च उपेन्द्रो मधुसूदनः।
पृश्निगर्भो धृतार्चिस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् ॥ ७॥
शरण्यं शरणं च त्वामाहुः सेन्द्रा महर्षयः।
ऋक्सामश्रेष्ठो वेदात्मा शतजिह्वो महर्षभः ॥ ८॥
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारः परन्तपः।
शतधन्वा वसुः पूर्वं वसूनां त्वं प्रजापतिः ॥ ९॥
आप सबकी उत्पत्तिके स्थान और अविकारी हैं। इन्द्रके छोटे भाई वामन एवं मधु दैत्यके प्राणहन्ता श्रीविष्णु भी आप ही हैं। आप अदिति या देवकीके गर्भमें अवतीर्ण होनेके कारण पृश्निगर्भ कहलाते हैं। आपने महान् तेज धारण कर रखा है। आपकी ही नाभिसे विराट् विश्वकी उत्पत्तिका कारणभूत कमल प्रकट हुआ था। आप शान्तस्वरूप होनेके कारण युद्धका अन्त करनेवाले हैं। इन्द्र आदि देवता तथा सम्पूर्ण महर्षिगण आपको ही सबका आश्रय एवं शरणदाता कहते हैं। ऋग्वेद और सामवेदमें आप ही सबसे श्रेष्ठ बताये गये हैं। आप सैकड़ों विधिवाक्यरूप जिह्वाओंसे युक्त वेदस्वरूप महान् वृषभ हैं। आप ही यज्ञ, आप ही वषट्कार और आप ही ॐकार हैं। आप शत्रुओंको ताप देनेवाले तथा सैकड़ों धनुष धारण करनेवाले हैं। आप ही वसु, वसुओंके भी पूर्ववर्ती एवं प्रजापति हैं।
त्रयाणामपि लोकानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः।
रुद्राणामष्टमो रुद्रः साध्यानामपि पञ्चमः ॥ १०॥
अश्विनौ चापि कर्णौ ते सूर्यचन्द्रौ च चक्षुषी।
अन्ते चादौ च मध्ये च दृश्यसे त्वं परन्तप ॥ ११॥
प्रभवो निधनं चासि न विदुः को भवानिति।
दृश्यसे सर्वलोकेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ १२॥
दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु गुहासु च।
सहस्रनयनः श्रीमाञ्शतशीर्षः सहस्रपात् ॥ १३॥
आप तीनों लोकोंके आदिकर्ता और स्वयं ही अपने प्रभु (परम स्वतन्त्र) हैं। आप रुद्रोंमें आठवें रुद्र और साध्योंमें पाँचवें साध्य हैं। दोनों अश्विनीकुमार आपके कान तथा सूर्य और चन्द्रमा नेत्र हैं। परंतप ! आप ही आदि, मध्य और अन्तमें दृष्टिगोचर होते हैं। सबकी उत्पत्ति और लयके स्थान भी आप ही हैं। आप कौन हैं—इस बातको ठीक-ठीक कोई भी नहीं जानते। सम्पूर्ण लोकोंमें, गौओंमें और ब्राह्मणोंमें आप ही दिखायी देते हैं तथा समस्त दिशाओंमें, आकाशमें, पर्वतोंमें और गुफाओंमें भी आपकी ही सत्ता है। आप शोभासे सम्पन्न हैं। आपके सहस्रों नेत्र, सैकड़ों मस्तक और सहस्रों चरण हैं।
त्वं धारयसि भूतानि वसुधां च सपर्वताम्।
अन्तःपृथिव्यां सलिले दृश्यसे त्वं महोरगः ॥ १४॥
त्रीँल्लोकान्धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान्।
आप सम्पूर्ण प्राणियोंको तथा पर्वतोंसहित पृथ्वीको भी धारण करते हैं। पृथ्वीके भीतर पाताललोकमें और क्षीरसागरके जलमें आप ही महान् सर्प—शेषनागके रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं। राम ! आप उस स्वरूपसे देवता, गन्धर्व और दानवोंके सहित तीनों लोकोंको धारण करते हैं।
उत्तरखण्ड ] * गण्डकी नदीका माहात्म्य तथा अभ्युदय एवं और्ध्वदैहिक नामक स्तोत्रका वर्णन * [ ७२७
अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥ १५ ॥
देवा रोमाणि गात्रेषु निर्मितास्ते स्वमायया ।
निमेषस्ते स्मृता रात्रिरुन्मेषो दिवसस्तथा ॥ १६ ॥
श्रीराम ! मैं (ब्रह्मा) आपका हृदय हूँ, सरस्वती देवी जिह्वा हैं तथा आपके द्वारा अपनी मायासे उत्पन्न किये हुए देवता आपके अङ्गोंमें रोम हैं। आपका आँख मूँदना रात्रि और आँख खोलना दिन है।
संस्कारस्तेऽभवद्देहो नैतदस्ति विना त्वया ।
जगत्सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं च वसुधातलम् ॥ १७ ॥
अग्निः कोपः प्रसादस्ते शेषः श्रीमांश्च लक्ष्मणः ।
शरीर और संस्कारकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। आपके बिना इस जगत्की स्थिति नहीं है। सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है, पृथ्वी आपकी स्थिरता है, अग्नि आपका कोप है और शेषावतार श्रीमान् लक्ष्मण आपके प्रसाद हैं।
त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥ १८ ॥
त्वयेन्द्रश्च कृतो राजा बलिर्बद्धो महासुरः ।
लोकान् संहृत्य कालस्त्वं निवेश्यात्मनि केवलम् ॥ १९ ॥
करोष्येकार्णवं घोरं दृश्यादृश्ये च नान्यथा ।
पूर्वकालमें वामनरूप धारण कर आपने अपने तीन पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे तथा महान् असुर बलिको बाँधकर इन्द्रको स्वर्गका राजा बनाया था। आप ही कालरूपसे समस्त लोकोंका संहार करके अपने भीतर लीनकर सब ओर केवल भयङ्कर एकार्णवका दृश्य उपस्थित करते हैं। उस समय दृश्य और अदृश्यमें कुछ भेद नहीं रह जाता।'
त्वया सिंहवपुः कृत्वा परमं दिव्यमद्भुतम् ॥ २० ॥
भयदः सर्वभूतानां हिरण्यकशिपुर्हतः ।
आपने नृसिंहावतारके समय परम अद्भुत एवं दिव्य सिंहका शरीर धारण करके समस्त प्राणियोंको भय देनेवाले हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था।
त्वमश्ववदनो भूत्वा पातालतलमाश्रितः ॥ २१ ॥
संहृतं परमं दिव्यं रहस्यं वै पुनः पुनः ।
आपने ही हयग्रीव अवतार धारण करके पातालके भीतर प्रवेशकर दैत्योंद्वारा अपहरण किये हुए वेदोंके परम रहस्य और यज्ञ-यागादिके प्रकरणोंको पुनः प्राप्त किया।
यत्परं श्रूयते ज्योतिर्यत्परं श्रूयते परम् ॥ २२ ॥
यत्परं परतश्चैव परमात्मेति कथ्यते ।
परो मन्त्रः परं तेजस्त्वमेव हि निगद्यसे ॥ २३ ॥
जो परम ज्योतिःस्वरूप तत्त्व सुना जाता है, जो परम उत्कृष्ट परब्रह्मके नामसे श्रवणगोचर होता है, जिसे परात्पर परमात्मा कहा जाता है तथा जो परम मन्त्र और परम तेज है, उसके रूपमें आपके ही स्वरूपका प्रतिपादन किया जाता है।
हव्यं कव्यं पवित्रं च प्राप्तिः स्वर्गापवर्गयोः ।
स्थित्युत्पत्तिविनाशांस्ते त्वामाहुः प्रकृतेः परम् ॥ २४ ॥
यज्ञश्च यजमानश्च होता चाध्वर्युुरेव च ।
भोक्ता यज्ञफलानां च त्वं वै वेदैश्च गीयसे ॥ २५ ॥
हव्य (यज्ञ), कव्य (श्राद्ध), पवित्र, स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति, संसारकी उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार—ये सब आपके ही कार्य हैं। ज्ञानी पुरुष आपको प्रकृतिसे पर बतलाते हैं। वेदोंके द्वारा आप ही यज्ञ, यजमान, होता, अध्वर्यु तथा यज्ञफलोंके भोक्ता कहे जाते हैं।
सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ।
वधार्थं रावणस्य त्वं प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ॥ २६ ॥
सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं और आप स्वयंप्रकाश विष्णु, कृष्ण एवं प्रजापति हैं। आपने रावणका वध करनेके लिये ही मानव-शरीरमें प्रवेश किया है।
तदिदं च त्वया कार्यं कृतं कर्मभृतां वर ।
निहतो रावणो राम प्रहृष्टा देवताः कृताः ॥ २७ ॥
कर्म करनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ! आपने हमारा यह कार्य पूरा कर दिया। रावण मारा गया, इससे सम्पूर्ण देवताओंको आपने बहुत प्रसन्न कर दिया है।
अमोघं देव वीर्यं ते नमोऽमोघपराक्रम ।
अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः ॥ २८ ॥
देव ! आपका बल अमोघ है। अचूक पराक्रम कर दिखानेवाले श्रीराम ! आपको नमस्कार है। राम ! आपके दर्शन और स्तवन भी अमोघ हैं।
अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ।
ये च त्वां देव संभक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् ॥ २९ ॥
देव ! जो मनुष्य इस पृथ्वीपर आप पुराण
७२८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
पुरुषोत्तमका भलीभाँति भजन करते हुए निरन्तर आपके चरणोंमें भक्ति रखेंगे, वे जीवनमें कभी असफल न होंगे।
इममर्षि स्तवं पुण्यमितिहासं पुरातनम्।
ये नराः कीर्तयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ॥ ३० ॥*
जो लोग परम ऋषि ब्रह्माजीके मुखसे निकले हुए इस पुरातन इतिहासरूप पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा।
यह महात्मा श्रीरघुनाथजीका स्तोत्र है, जो सब स्तोत्रोंमें श्रेष्ठ है। जो प्रतिदिन तीनों समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह महापातकी होनेपर भी मुक्त हो जाता है। श्रेष्ठ द्विजोंको चाहिये कि वे संध्याके समय विशेषतः श्राद्धके अवसरपर भक्तिभावसे मन लगाकर प्रयत्नपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करें। यह परम गोपनीय स्तोत्र है। इसे कहीं और कभी भी अनधिकारी व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये। इसके पाठसे मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। निश्चय ही उसे सनातन गति प्राप्त होती है। नरश्रेष्ठ ब्राह्मणोंको श्राद्धमें पहले तथा पिण्ड-पूजाके बाद भी इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये; इससे श्राद्ध अक्षय हो जाता है। यह परम पवित्र स्तोत्र मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करनेवाला है। जो एकाग्र चित्तसे इस स्तोत्रको लिखकर अपने घरमें रखता है, उसकी आयु, सम्पत्ति तथा बलकी प्रतिदिन वृद्धि होती है। जो बुद्धिमान् पुरुष कभी इस स्तोत्रको लिखकर ब्राह्मणको देता है, उसके पूर्वज मुक्त होकर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होते हैं। चारों वेदोंका पाठ करनेसे जो फल होता है, वही फल मनुष्य इस स्तोत्रका पाठ और जप करके पा लेता है। अतः भक्तिमान् पुरुषको यत्नपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। इसके पढ़नेसे मनुष्य सब कुछ पाता है और सुखपूर्वक रहकर उत्तरोत्तर उन्नतिको प्राप्त होता है।
ऋषिपञ्चमी-व्रतकी कथा, विधि और महिमा
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! एक समयकी बात है, मैंने जगत्के स्वामी भगवान् श्रीविष्णुसे पूछा था—भगवन् ! सब व्रतोंमें उत्तम व्रत कौन है, जो पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला और सुख-सौभाग्यको देनेवाला हो? उस समय उन्होंने जो कुछ उत्तर दिया, वह सब मैं तुम्हें कहता हूँ; सुनो।
**श्रीविष्णु बोले—**महाबाहु शिव! पूर्वकालमें देवशर्मा नामके एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारगामी विद्वान् थे और सदा स्वाध्यायमें ही लगे रहते थे। प्रतिदिन अग्निहोत्र करते तथा सदा अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन एवं दान-प्रतिग्रहरूप छः कर्मोंमें प्रवृत्त रहते थे। सभी वर्णोंके लोगोंमें उनका बड़ा मान था। वे पुत्र, पशु और बन्धु-बान्धव—सबसे सम्पन्न थे। ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ देवशर्माकी गृहिणीका नाम भद्रा था। वे भादोंके शुक्लपक्षमें पञ्चमी तिथि आनेपर तपस्या (व्रत-पालन) के द्वारा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पिताका एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया करते थे। पहले दिन रात्रिमें सुख और सौभाग्य प्रदान करनेवाले ब्राह्मणोंको निमन्त्रण देते और निर्मल प्रभातकाल आनेपर दूसरे-दूसरे नये बर्तन मँगाते तथा उन सभी बर्तनोंमें अपनी स्त्रीके द्वारा पाक तैयार कराते थे। वह पाक अठारह रसोंसे युक्त एवं पितरोंको संतोष प्रदान करनेवाला होता था। पाक तैयार होनेपर वे पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंको बुलावा भेजकर बुलवाते थे।
एक बार उक्त समयपर निमन्त्रण पाकर समस्त वेदपाठी ब्राह्मण दोपहरमें देवशर्माके घर उपस्थित हुए। विप्रवर देवशर्माने अर्घ्य-पाद्यादि निवेदन करके विधिपूर्वक उनका स्वागत-सत्कार किया। फिर घरके भीतर जानेपर सबको बैठनेके लिये आसन दिया और विशेषतः मिष्टान्नके साथ उत्तम अन्न उन्हें भोजन करनेके
* पद्मपुराण उत्तरखण्डका ७७वाँ अध्याय।
उत्तरखण्ड ] * ऋषिपञ्चमी-व्रतकी कथा, विधि और महिमा * ७२९
लिये परोसा; साथ ही विधिपूर्वक पिण्डदानकी पूर्ति करनेवाला श्राद्ध भी किया। इसके बाद पिताका चिन्तन करते हुए उन्होंने उन ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके वस्त्र, दक्षिणा और ताम्बूल निवेदन किये। फिर उन सबको विदा किया। वे सभी ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले गये। तत्पश्चात् अपने सगोती, बन्धु-बान्धव तथा और भी जो लोग भूखे थे, उन सबको ब्राह्मणने विधिपूर्वक भोजन दिया। इस प्रकार श्राद्धका कार्य समाप्त होनेपर ब्राह्मण जब कुटीके दरवाजेपर बैठे, उस समय उनके घरकी कुतिया और बैल दोनों परस्पर कुछ बातचीत करने लगे। देवि! बुद्धिमान् ब्राह्मणने उन दोनोंकी बातें सुनीं और समझीं। फिर मन-ही-मन वे इस प्रकार सोचने लगे—'ये साक्षात् मेरे पिता हैं, जो मेरे ही घरके पशु हुए हैं तथा यह भी साक्षात् मेरी माता है, जो दैवयोगसे कुतिया हो गयी है। अब मैं इनके उद्धारके लिये निश्चित रूपसे क्या करूँ?' इसी विचारमें पड़े-पड़े ब्राह्मणको रातभर नींद नहीं आयी। वे भगवान् विश्वेश्वरका स्मरण करते रहे। प्रातःकाल होनेपर वे ऋषियोंके समीप गये। वहाँ वसिष्ठजीने उनका भलीभाँति स्वागत किया।
वसिष्ठजी बोले— ब्राह्मणश्रेष्ठ ! अपने आनेका कारण बताओ।
ब्राह्मण बोले— मुनिवर ! आज मेरा जन्म सफल हुआ तथा आज मेरी सम्पूर्ण क्रियाएँ सफल हो गयीं; क्योंकि इस समय मुझे आपका दुर्लभ दर्शन प्राप्त हुआ है। अब मेरा समाचार सुनिये। आज मैंने शास्त्रोक्त विधिसे श्राद्ध किया, ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा समस्त कुटुम्बके लोगोंको भी भोजन दिया है। सबके भोजनके पश्चात् एक कुतिया आयी और मेरे घरमें जहाँ एक बैल रहता है, वहाँ जा उसे पतिरूपसे सम्बोधित करके इस प्रकार कहने लगी—'स्वामिन् ! आज जो घटना घटी है, उसे सुन लीजिये। इस घरमें जो दूधका बर्तन रखा हुआ था, उसे साँपने अपना जहर उगलकर दूषित कर दिया। यह मैंने अपनी आँखों देखा था। देखकर मेरे मनमें बड़ी चिन्ता हुई। सोचने लगी—इस दूधसे जब भोजन तैयार होगा, उस समय सब ब्राह्मण इसको खाते ही मर जायँगे। यों विचारकर मैं स्वयं उस दूधको पीने लगी। इतनेमें बहूकी दृष्टि मुझपर पड़ गयी। उसने मुझे खूब मारा। मेरा अङ्ग-भङ्ग हो गया है। इसीसे मैं लड़खड़ाती हुई चल रही हूँ। क्या करूँ, बहुत दुःखी हूँ।'
कुतियाके दुःखका अनुभव करके बैलने भी उससे कहा—'अब मैं अपने दुःखका कारण बताता हूँ, सुनो; मैं पूर्वजन्ममें इस ब्राह्मणका साक्षात् पिता था। आज इसने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और प्रचुर अन्नका दान किया है; किन्तु मेरे आगे इसने घास और जलतक नहीं रखा। इसी दुःखसे मुझे आज बहुत कष्ट हुआ है।' उन दोनोंका यह कथानक सुनकर मुझे रातभर नींद नहीं आयी। मुनिश्रेष्ठ ! मुझे तभीसे बड़ी चिन्ता हो रही है। मैं वेदका स्वाध्याय करनेवाला हूँ, वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानमें कुशल हूँ; फिर भी मेरे माता और पिताको महान् दुःख सहन करना पड़ रहा है। इसके लिये मैं क्या करूँ ? यही सोचता-विचारता आपके पास आया हूँ। आप ही मेरा कष्ट दूर कीजिये।
ऋषि बोले— ब्रह्मन् ! उन दोनोंने पूर्वजन्ममें जो कर्म किया है, उसे सुनो—ये तुम्हारे पिता परम सुन्दर कुण्डिननगरमें श्रेष्ठ ब्राह्मण रहे हैं। एक समय भादोंके महीनेमें पञ्चमी तिथि आयी थी, तुम्हारे पिता अपने पिताके श्राद्ध आदिमें लगे थे, इसलिये उन्हें पञ्चमीके व्रतका ध्यान न रहा। उनके पिताकी क्षयाह तिथि थी। उस दिन तुम्हारी माता रजस्वला हो गयी थी, तो भी उसने ब्राह्मणोंके लिये सारा भोजन स्वयं ही तैयार किया। रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिनके समान अपवित्र बतायी गयी है; चौथे दिन स्नानके बाद उसकी शुद्धि होती है। तुम्हारी माताने इसका विचार नहीं किया, अतः उसी पापसे उसको अपने ही घरकी कुतिया होना पड़ा है तथा तुम्हारे पिता भी इसी कर्मसे बैल हुए हैं।
ब्राह्मणने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुने ! मुझे कोई ऐसा व्रत, दान, यज्ञ और तीर्थ बतलाइये, जिसके सेवनसे मेरे माता-पिताकी मुक्ति हो जाय।
७३० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
**ऋषि बोले—**भादोंके शुक्लपक्षमें जो पञ्चमी आती है, उसका नाम ऋषिपञ्चमी है। उस दिन नदी, कुएँ, पोखरे अथवा ब्राह्मणके घरपर जाकर स्नान करे। फिर अपने घर आकर गोबरसे लीपकर मण्डल बनाये; उसमें कलशकी स्थापना करे। कलशके ऊपर एक पात्र रखकर उसे तिन्नीके चावलसे भर दे। उस पात्रमें यज्ञोपवीत, सुवर्ण तथा फलके साथ ही सुख और सौभाग्य देनेवाले सात ऋषियोंकी स्थापना करे। 'ऋषिपञ्चमी' के व्रतमें स्थित हुए पुरुषोंको उन सबका आवाहन करके पूजन करना चाहिये। तिन्नीके चावलका ही नैवेद्य लगाये और उसीका भोजन करे। केवल एक समय भोजन करके व्रत करना चाहिये। उस दिन परम भक्तिके साथ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक ऋषियोंका पूजन करना उचित है। पूजनके समय ब्राह्मणको दक्षिणा और घीके साथ विधिपूर्वक भोजन-सामग्रीका दान देना चाहिये तथा समस्त ऋषियोंकी प्रसन्नता ही इस दानका उद्देश्य होना चाहिये। फिर विधिपूर्वक माहात्म्य-कथा सुनकर ऋषियोंकी प्रदक्षिणा करे और सबको पृथक्-पृथक् धूप-दीप तथा नैवेद्य निवेदन करके अर्घ्य प्रदान करे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
'ऋषयः सन्तु मे नित्यं व्रतसंपूर्तिकारिणः।
पूजां गृह्णन्तु महत्तामृषिभ्योऽस्तु नमो नमः॥
पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुः प्राचेतसस्तथा।
वसिष्ठोमारिचात्रेया अर्घ्यं गृह्णन्तु वो नमः॥
(७८। ५९-६०)
'ऋषिगण सदा मेरे व्रतको पूर्ण करनेवाले हों। वे मेरी दी हुई पूजा स्वीकार करें। सब ऋषियोंको मेरा नमस्कार है। पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्राचेतस, वसिष्ठ, मारीच और आत्रेय—ये मेरा अर्घ्य ग्रहण करें। आप सब ऋषियोंको मेरा प्रणाम है।'
इस प्रकार मनोरम धूप-दीप आदिके द्वारा ऋषियोंकी पूजा करनी चाहिये। इस व्रतके प्रभावसे पितरोंकी मुक्ति होती है। वत्स! पूर्वकर्मके परिणामसे अथवा रजके संसर्गदोषसे जो कष्ट होता है, उससे इस व्रतका अनुष्ठान करनेपर निःसंदेह छुटकारा मिल जाता है।
**महादेवजी कहते हैं—**यह सुनकर देवशर्माने पिता-माताकी मुक्तिके लिये 'ऋषिपञ्चमी' व्रतका अनुष्ठान किया। उस व्रतके प्रभावसे वे दोनों पति-पत्नी पुत्रको आशीर्वाद देते हुए मुक्तिमार्गसे चले गये। 'ऋषिपञ्चमी' का यह पवित्र व्रत ब्राह्मणके लिये बताया गया, किन्तु जो नरश्रेष्ठ इसका अनुष्ठान करते हैं, वे सभी पुण्यके भागी होते हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष इस परम उत्तम ऋषि-व्रतका पालन करते हैं, वे इस लोकमें प्रचुर भोगोंका उपभोग करके अन्तमें भगवान् श्रीविष्णुके सनातन लोकको प्राप्त होते हैं।
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न्याससहित अपामार्जन नामक स्तोत्र और उसकी महिमा
**पार्वती बोलीं—**भगवन्! सभी प्राणी विष और रोग आदिके उपद्रवसे ग्रस्त तथा दुष्ट ग्रहोंसे हर समय पीड़ित रहते हैं। सुरश्रेष्ठ! जिस उपायका अवलम्बन करनेसे मनुष्योंको अभिचार (मारण-उच्चाटन आदि) तथा कृत्या आदिसे उत्पन्न होनेवाले नाना प्रकारके भयङ्कर रोगोंका शिकार न होना पड़े, उसका मुझसे वर्णन कीजिये।
**महादेवजी बोले—**पार्वती! जिन लोगोंने व्रत, उपवास और नियमोंके पालनद्वारा भगवान् विष्णुको संतुष्ट कर लिया है, वे कभी रोगसे पीड़ित नहीं होते। जिन्होंने कभी व्रत, पुण्य, दान, तप, तीर्थ-सेवन, देव-पूजन तथा अधिक मात्रामें अन्न-दान नहीं किया है, उन्हीं लोगोंको सदा रोग और दोषसे पीड़ित समझना चाहिये। मनुष्य अपने मनसे आरोग्य तथा उत्तम समृद्धि आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब भगवान् विष्णुकी सेवासे निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। श्रीमधुसूदनके संतुष्ट हो जानेपर न कभी मानसिक चिन्ता सताती है, न रोग होता है, न विष तथा ग्रहोंके कष्टमें
उत्तराखण्ड ] * न्याससहित अपामार्जननामक स्तोत्र और उसकी महिमा * ७३१
बाँधना पड़ता है और न कृत्याके ही स्पर्शका भय रहता है। श्रीजनार्दनके प्रसन्न होनेपर समस्त दोषोंका नाश हो जाता है। सभी ग्रह सदाके लिये शुभ हो जाते हैं तथा वह मनुष्य देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष बन जाता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान भाव रखता है और अपने प्रति जैसा बर्ताव चाहता है वैसा ही दूसरोंके प्रति भी करता है, उसने मानो उपवास आदि करके भगवान् मधुसूदनको संतुष्ट कर लिया। ऐसे लोगोंके पास शत्रु नहीं आते, उन्हें रोग या आभिचारिक कष्ट नहीं होता तथा उनके द्वारा कभी पापका कार्य भी नहीं बनता। जिसने भगवान् विष्णुकी उपासना की है, उसे भगवान्के चक्र आदि अमोघ अस्त्र सदा सब आपत्तियोंसे बचाते रहते हैं।
पार्वती बोलीं— भगवन् ! जो लोग भगवान् गोविन्दकी आराधना न करनेके कारण दुःख भोग रहे हैं, उन दुःखी मनुष्योंके प्रति सब प्राणियोंमें सनातन वासुदेवको स्थित देखनेवाले समदर्शी एवं दयालु पुरुषोंका जो कर्तव्य हो, वह मुझे विशेषरूपसे बताइये।
महादेवजी बोले— देवेश्वरि ! बतलाता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। यह उपाय रोग, दोष एवं अशुभको हरनेवाला तथा शत्रुजनित आपत्तिका नाश करनेवाला है। विद्वान् पुरुष शिखामें श्रीधरका, शिखाके निचले भागमें भगवान् श्रीकरका, केशोंमें हृषीकेशका, मस्तकमैं परम पुरुष नारायणका, कानके ऊपरी भागमें श्रीविष्णुका, ललाटमें जलशायीका, दोनों भौंहोंमें श्रीविष्णुका, भौंहोंके मध्य-भागमें श्रीहरिका, नासिकाके अग्रभागमें नरसिंहका, दोनों कानोंमें अर्णवेशय (समुद्रमें शयन करनेवाले भगवान्) का, दोनों नेत्रोंमें पुण्डरीकाक्षका, नेत्रोंके नीचे भूधर (धरणीधर) का, दोनों गालोंमें कल्किनाथका, कानोंके मूल भागमें वामनका, गलेकी दोनों हँसलियोंमें शङ्खधारीका, मुखमें गोविन्दका, दाँतोंकी पङ्क्तिमें मुकुन्दका, जिह्वामें वाणीपतिका, ठोढ़ीमें श्रीरामका, कण्ठमें वैकुण्ठका, बाहुमूलके निचले भाग (काँख) में बलघ्न (बल नामक दैत्यके मारनेवाले) का, कंधोंमें कंसघातीका, दोनों भुजाओंमें अज (जन्मरहित) का, दोनों हाथोंमें शार्ङ्गपाणिका, हाथके अँगूठेमें संकर्षणका, अँगुलियोंमें गोपालका, वक्षःस्थलमें अधोक्षजका, छातीके बीचमें श्रीवत्सका, दोनों स्तनोंमें अनिरुद्धका, उदरमें दामोदरका, नाभिमें पद्मनाभका, नाभिके नीचे केशवका, लिङ्गमें धराधरका, गुदामें गदाग्रजका, कटिमें पीताम्बरधारीका, दोनों जाँघोंमें मधुद्विट् (मधुसूदन) का, पिडलियोंमें मुरारिका, दोनों घुटनोंमें जनार्दनका, दोनों घुट्ठियोंमें फणीशका, दोनों पैरोंकी गतिमें त्रिविक्रमका, पैरके अँगूठेमें श्रीपतिका, पैरके तलवोंमें धरणीधरका, समस्त रोमकूपोंमें विष्वक्सेनका, शरीरके मांसमें मत्स्यावतारका, मेदमें कूर्मावतारका, वसा में वाराहका, सम्पूर्ण हड्डियोंमें अच्युतका, मज्जामें द्विजप्रिय (ब्राह्मणोंके प्रेमी) का, शुक्र (वीर्य) में श्वेतपतिका, सर्वाङ्गमें यज्ञपुरुषका तथा आत्मामें परमात्माका न्यास करे। इस प्रकार न्यास करके मनुष्य साक्षात् नारायण हो जाता है; वह जबतक मुँहसे कुछ बोलता नहीं, तबतक विष्णुरूपसे ही स्थित रहता है।*
* तद् वक्ष्यामि सुरश्रेष्ठे समाहितमनाः शृणु। रोगदोषाशुभहरं विद्विडापदविनाशनम् ॥
शिखायां श्रीधरं न्यस्य शिखाधः श्रीकरं तथा। हृषीकेशं तु केशेषु मूर्ध्नि नारायणं परम् ॥
ऊर्ध्वश्रोत्रे न्यसेद्विष्णुं ललाटे जलशायिनम्। विष्णुं वै भ्रुयुगे न्यस्य भ्रूमध्ये हरिमेव च ॥
नरसिंहं नासिकाग्रे कर्णयोरर्णवेशयम्। चक्षुषोः पुण्डरीकाक्षं तदधो भूधरं न्यसेत् ॥
कपोलयोः कल्किनाथं वामनं कर्णमूलयोः। शङ्खिनं शङ्खयोर्न्यस्य गोविन्दं वदने तथा ॥
मुकुन्दं दन्तपङ्क्तौ तु जिह्वायां वाक्पतिं तथा। रामं हनौ तु विन्यस्य कण्ठे वैकुण्ठमेव च ॥
बलघ्नं बाहुमूलाधश्शंसयोः कंसघातिनम्। अजं भुजद्वये न्यस्य शार्ङ्गपाणिं करद्वये ॥
संकर्षणं कराङ्गुष्ठे गोपमङ्गुलिपङ्क्तिषु। वक्षस्यधोक्षजं न्यस्य श्रीवत्सं तस्य मध्यतः ॥
स्तनयोरनिरुद्धं च दामोदरमथोदरे। पद्मनाभं तथा नाभौ नाभ्यधश्चापि केशवम् ॥
७३२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
शान्ति करनेवाला पुरुष मूलसहित शुद्ध कुशोंको लेकर एकाग्रचित्त हो रोगीके सब अङ्गोंको झाड़े; विशेषतः विष्णुभक्त पुरुष रोग, ग्रह और विषसे पीड़ित मनुष्यकी अथवा केवल विषसे ही कष्ट पानेवाले रोगियोंकी इस प्रकार शुभ शान्ति करे। पार्वती ! कुशसे झाड़ते समय सब रोगोंका नाश करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये।
ॐ परमार्थस्वरूप, अन्तर्यामी, महात्मा, रूपहीन होते हुए भी अनेक रूपधारी तथा व्यापक परमात्माको नमस्कार है। वाराह, नरसिंह और सुखदायी वामन भगवान्का ध्यान एवं नमस्कार करके श्रीविष्णुके उपर्युक्त नामोंका अपने अङ्गोंमें न्यास करे। न्यासके पश्चात् इस प्रकार कहे—'मैं पापके स्पर्शसे रहित, शुद्ध, व्याधि और पापोंका अपहरण करनेवाले गोविन्द, पद्मनाभ, वासुदेव और भूधर नामसे प्रसिद्ध भगवान्को नमस्कार करके जो कुछ कहूँ, वह मेरा सारा वचन सिद्ध हो। तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले भगवान् त्रिविक्रम, सबके हृदयमें रमण करनेवाले राम, वैकुण्ठधामके अधिपति, बदरिकाश्रममें तपस्या करनेवाले भगवान् नर, वाराह, नृसिंह, वामन और उज्ज्वल रूपधारी हयग्रीवको नमस्कार है। हृषीकेश ! आप सारे अमङ्गलको हर लीजिये। सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णको नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाले आदि चक्रधारी श्रीकेशवको नमस्कार है। कमल-केसरके समान वर्णवाले भगवान्को नमस्कार है। पीले रंगके निर्मल वस्त्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको नमस्कार है। अपनी एक दाढ़पर समूची पृथ्वीको उठा लेनेवाले त्रिमूर्तिपति भगवान् वाराहको नमस्कार है। जिसके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक तीक्ष्ण और कठोर है, ऐसे दिव्य सिंहका रूप धारण करनेवाले भगवान् नृसिंह ! आपको नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदसे लक्षित होनेवाले परमात्मन् ! अत्यन्त लघु शरीरवाले कश्यपपुत्र वामनका रूप धारण करके भी समूची पृथ्वीको एक ही पगमें नाप लेनेवाले ! आपको बारंबार नमस्कार है। बहुत बड़ी दाढ़वाले भगवान् वाराह ! सम्पूर्ण दुःखों और समस्त पापके फलोंको रौंद डालिये, रौंद डालिये। पापके फलको नष्ट कर डालिये, नष्ट कर डालिये। विकराल मुख और दाँतोंवाले, नखोंसे उद्दीप्त दिखायी देनेवाले, पीड़ाओंके नाशक भगवान् नृसिंह ! आप अपनी गर्जनासे इस रोगीके दुःखोंका भञ्जन कीजिये, भञ्जन कीजिये। इच्छानुसार रूप ग्रहण करके पृथ्वी आदिको धारण करनेवाले भगवान् जनार्दन अपनी ऋक्, यजुः और साममयी वाणीद्वारा इस रोगीके सब दुःखोंकी शान्ति कर दें। एक, दो, तीन या चार दिनका अन्तर देकर आनेवाले हलके या भारी ज्वरको, सदा बने रहनेवाले ज्वरको, किसी दोषके कारण उत्पन्न हुए ज्वरको, सन्निपातसे होनेवाले तथा आगन्तुक ज्वरको विदीर्ण कर उसकी वेदनाका नाश करके भगवान् गोविन्द उसे सदाके लिये शान्त कर दें। नेत्रका कष्ट, मस्तकका कष्ट, उदररोगका कष्ट, अनुच्छ्वास (साँसका रुकना), महाश्वास (साँसका तेज चलना—दमा), परिताप, (ज्वर), वेपथु (कम्प या जूड़ी), गुदारोग, नासिकारोग, पादरोग, कुष्ठरोग, क्षयरोग, कमला आदि रोग, प्रमेह आदि भयङ्कर रोग, वातरोग, मकड़ी और चेचक आदि समस्त रोग भगवान् विष्णुके चक्रकी चोट खाकर नष्ट हो जायें। अच्युत, अनन्त और गोविन्द नामोंके उच्चारणरूपी
मेढ़े धराधरं देवं गुदे चैव गदाग्रजम्। पीताम्बरधरं कट्यामूरुयुगे मधुद्विषम्॥
मुरद्विषं पिण्डकयोर्जानुयुग्मे जनार्दनम्। फणीशं गुल्फयोर्यस्य क्रमयोश्च त्रिविक्रमम्॥
पादाङ्गुष्ठे श्रीपतिं च पादाधो धरणीधरम्। रोमकूपेषु सर्वेषु विष्वक्सेनं न्यसेद्बुधः॥
मत्स्यं मांसे तु विन्यस्य कूर्मं मेदसि विन्यसेत्। वाराहं तु वसामध्ये सर्वास्थिषु तथाच्युतम्॥
द्विजप्रियं तु मज्जायां शुक्रे श्वेतपतिं तथा। सर्वाङ्गे यज्ञपुरुषं परमात्मानमात्मनि॥
एवं न्यासविधिं कृत्वा साक्षान्नारायणो भवेत्। यावन्न व्याहरेत्किंचितावद्विष्णुमयः स्थितः॥ (७९। १६—३०)
उत्तरखण्ड ] * न्याससहित अपामार्जननामक स्तोत्र और उसकी महिमा * ७३३ ************************************************************************
ओषधिसे समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं—यह बात मैं सत्य-सत्य कहता हूँ। स्थावर, जङ्गम अथवा कृत्रिम विष हो या दाँत, नख, आकाश तथा भूत आदिसे प्रकट होनेवाला अत्यन्त दुस्सह विष हो; वह सारा-का-सारा श्रीजनार्दनका नामकीर्तन करनेपर इस रोगीके शरीरमें शान्त हो जाय। बालकके शरीरमें ग्रह, प्रेतग्रह अथवा अन्यान्य शाकिनी-ग्रहोंका उपद्रव हो या मुखपर चकत्ते निकल आये हों अथवा रेवती, वृद्ध रेवती तथा वृद्धिका नामके भयङ्कर ग्रह, मातृग्रह एवं बालग्रह पीड़ा दे रहे हों; भगवान् श्रीविष्णुका चरित्र उन सबका नाश कर देता है। वृद्धों अथवा बालकोंपर जो कोई भी ग्रह लगे हों, वे श्रीनृसिंहके दर्शनमात्रसे तत्काल शान्त हो जाते हैं। भयानक दाढ़ोंके कारण विकराल मुखवाले भगवान् नृसिंह दैत्योंको भयभीत करनेवाले हैं। उन्हें देखकर सभी ग्रह बहुत दूर भाग जाते हैं। ज्वालाओंसे देदीप्यमान मुखवाले महासिंहरूपधारी नृसिंह ! सुन्दर मुख और नेत्रोंवाले सर्वेश्वर ! आप समस्त दुष्ट ग्रहोंको दूर कीजिये। जो-जो रोग, महान् उत्पात, विष, महान् ग्रह, क्रूरस्वभाववाले भूत, भयङ्कर ग्रह-पीड़ाएँ, हथियारसे कटे हुए घावोंपर होनेवाले रोग, चेचक आदि फोड़े और शरीरके भीतर स्थित रहनेवाले ग्रह हों, उन सबको हे त्रिभुवनकी रक्षा करनेवाले ! दुष्ट दानवोंके विनाशक ! महातेजस्वी सुदर्शन ! आप काट डालिये, काट डालिये। महान् ज्वर, वातरोग, लूता रोग तथा भयानक महाविषको भी आप नष्ट कर दीजिये, नष्ट कर दीजिये। असाध्य अमरशूल विषकी ज्वाला और गर्दभ रोग—ये सब-के-सब शत्रु हैं, 'ॐ ह्रां ह्रां हूं हूं' इस बीजमन्त्रके साथ तीखी धारवाले कुठारसे आप इन शत्रुओंको मार डालें। दूसरोंका दुःख दूर करनेके लिये शरीर धारण करनेवाले परमेश्वर ! आप भगवान्को नमस्कार है। इनके सिवा और भी जो प्राणियोंको पीड़ा देनेवाले दुष्ट ग्रह और रोग हों, उन सबको सबके आत्मा परमात्मा जनार्दन दूर करें। वासुदेव ! आपको नमस्कार है। आप कोई रूप धारण करके ज्वालाओंके कारण अत्यन्त भयानक सुदर्शन नामक चक्र चलाकर सब दुष्टोंको नष्ट कर दीजिये। देववर ! अच्युत ! आप दुष्टोंका संहार कीजिये।
महाचक्र सुदर्शन ! भगवान् गोविन्दके श्रेष्ठ आयुध ! तीखी धार और महान् वेगवाले शस्त्र ! कोटि सूर्यके समान तेज धारण करनेवाले महाज्वालामय सुदर्शन ! भारी आवाजसे सबको भयभीत करनेवाले चक्र ! आप समस्त दुःखों और सम्पूर्ण राक्षसोंका उच्छेद कर डालिये, उच्छेद कर डालिये। हे सुदर्शनदेव ! आप पापोंका नाश और आरोग्य प्रदान कीजिये। महात्मा नृसिंह अपनी गर्जनाओंसे पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर—सब ओर रक्षा करें। अनेक रूप धारण करनेवाले भगवान् जनार्दन भूमिपर और आकाशमें, पीछे-आगे तथा पार्श्वभागमें रक्षा करें। देवता, असुर और मनुष्योंके सहित सम्पूर्ण विश्व श्रीविष्णुमय है। योगेश्वर श्रीविष्णु ही सब वेदोंमें गाये जाते हैं, इस सत्यके प्रभावसे इस रोगीका सारा दुःख दूर हो जाय। समस्त वेदाङ्गोंमें भी परमात्मा श्रीविष्णुका ही गान किया जाता है। इस सत्यके प्रभावसे विश्वात्मा केशव इसको सुख देनेवाले हों। भगवान् वासुदेवके शरीरसे प्रकट हुए कुशोंके द्वारा मैंने इस मनुष्यका मार्जन किया है; इससे शान्ति हो, कल्याण हो और इसके दुःखोंका नाश हो जाय। जिसने गोविन्दके अपामार्जन स्तोत्रसे मार्जन किया है, वह भी यद्यपि साक्षात् श्रीनारायणका ही स्वरूप है; तथापि सब दुःखोंकी शान्ति श्रीहरिके वचनसे ही होती है। श्रीमधुसूदनका स्मरण करनेपर सम्पूर्ण दोष, समस्त ग्रह, सभी विष और सारे भूत शान्त हो जाते हैं। अब यह श्रीहरिके वचनानुसार पूर्ण स्वस्थ हो जाय। शान्ति हो, कल्याण हो और दुःख नष्ट हो जायँ। भगवान् हृषीकेशके नाम-कीर्तनके प्रभावसे सदा ही इसके स्वास्थ्यकी रक्षा रहे। जो पाप जहाँसे इसके शरीरमें आये हों, वे वहीं चले जायँ।
यह परम उत्तम 'अपामार्जन' नामक स्तोत्र है। समस्त प्राणियोंका कल्याण चाहनेवाले श्रीविष्णुभक्त पुरुषोंको रोग और पीड़ाओंके समय इसका प्रयोग करना चाहिये। इससे समस्त दुःखोंका पूर्णतया नाश हो जाता है। यह
७३४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
सब पापोंकी शुद्धिका साधन है। श्रीविष्णुके 'अपामार्जन स्तोत्र'से आर्द्र¹-शुष्क², लघु-स्थूल (छोटे-बड़े) एवं ब्रह्महत्या आदि जितने भी पाप हैं, वे सब उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्यके दर्शनसे अन्धकार दूर हो जाता है। जिस प्रकार सिंहके भयसे छोटे मृग भागते हैं, उसी प्रकार इस स्तोत्रसे सारे रोग और दोष नष्ट हो जाते हैं। इसके श्रवणमात्रसे ही ग्रह, भूत और पिशाच आदिका नाश हो जाता है। लोभी पुरुष धन कमानेके लिये कभी इसका उपयोग न करें। अपामार्जन स्तोत्रका उपयोग करके किसीसे कुछ भी नहीं लेना चाहिये, इसीमें अपना हित है। आदि, मध्य और अन्तका ज्ञान रखनेवाले शान्तचित्त श्रीविष्णुभक्तोंको निःस्वार्थभावसे इस स्तोत्रका प्रयोग करना उचित है; अन्यथा यह सिद्धिदायक नहीं होता। भगवान् विष्णुका जो अपामार्जन नामक स्तोत्र है, यह मनुष्योंके लिये अनुपम सिद्धि है, रक्षाका परम साधन है और सर्वोत्तम ओषधि है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अपने पुत्र पुलस्त्य मुनिको इसका उपदेश किया था; फिर पुलस्त्य मुनिने दाल्भ्यको सुनाया। दाल्भ्यने समस्त प्राणियोंका हित करनेके लिये इसे लोकमें प्रकाशित किया; तबसे श्रीविष्णुका यह अपामार्जन स्तोत्र तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गया। यह सब प्रसङ्ग भक्तिपूर्वक श्रवण करनेसे मनुष्य अपने रोग और दोषोंका नाश करता है।
'अपामार्जन' नामक स्तोत्र परम अद्भुत और दिव्य है। मनुष्यको चाहिये कि पुत्र, काम और अर्थकी सिद्धिके लिये इसका विशेषरूपसे पाठ करे। जो द्विज एक या दो समय बराबर इसका पाठ करते हैं, उनकी आयु, लक्ष्मी और बलकी दिन-दिन वृद्धि होती है। ब्राह्मण विद्या, क्षत्रिय राज्य, वैश्य धन-सम्पत्ति और शूद्र भक्ति प्राप्त करता है। दूसरे लोग भी इसके पाठ, श्रवण और जपसे भक्ति प्राप्त करते हैं। पार्वती ! जो इसका पाठ करता है, उसे सामवेदका फल होता है; उसकी सारी पाप-राशि तत्काल नष्ट हो जाती है। देवि ! ऐसा जानकर एकाग्रचित्तसे इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। इससे पुत्रकी प्राप्ति होती है और घरमें निश्चय ही लक्ष्मी परिपूर्ण हो जाती हैं। जो वैष्णव इस स्तोत्रको भोजपत्रपर लिखकर सदा धारण किये रहता है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। जो इसका एक-एक श्लोक पढ़कर भगवान्को तुलसीदल समर्पित करता है, वह तुलसीसे पूजन करनेपर सम्पूर्ण तीर्थोंके सेवनका फल पा लेता है। यह भगवान् विष्णुका स्तोत्र परम उत्तम और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। सम्पूर्ण पृथ्वीका दान करनेसे मनुष्य श्रीविष्णुलोकमें जाता है; किन्तु जो ऐसा करनेमें असमर्थ हो, वह श्रीविष्णुलोककी प्राप्तिके लिये विशेषरूपसे इस स्तोत्रका जप करे। यह रोग और ग्रहोंसे पीड़ित बालकोंके दुःखकी शान्ति करनेवाला है। इसके पाठमात्रसे भूत, ग्रह और विष नष्ट हो जाते हैं। जो ब्राह्मण कण्ठमें तुलसीकी माला पहनकर इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे वैष्णव जानना चाहिये; वह निश्चय ही श्रीविष्णुधाममें जाता है। इस लोकका परित्याग करनेपर उसे श्रीविष्णुधामकी प्राप्ति होती है। जो मोह-मायासे दूर हो दम्भ और तृष्णाका त्याग करके इस दिव्य स्तोत्रका पाठ करता है, वह परम मोक्षको प्राप्त होता है। इस भूमण्डलमें जो ब्राह्मण भगवान् विष्णुके भक्त हैं, वे धन्य माने गये हैं; उन्होंने कुलसहित अपने आत्माका उद्धार कर लिया—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जिन्होंने भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण कर ली है, संसारमें वे परम धन्य हैं। उनकी सदा भक्ति करनी चाहिये, क्योंकि वे भागवत (भगवद्भक्त) पुरुष हैं।
१-स्वेच्छासे किये हुए पाप। २-अनिच्छासे किये हुए पाप।
उत्तरखण्ड ] * श्रीविष्णुकी महिमा—भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा * ७३५
श्रीविष्णुकी महिमा—भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा
श्रीपार्वती बोलीं— विश्वेश्वर ! प्रभो ! भगवान् श्रीविष्णुका माहात्म्य अद्भुत है, जिसे सुनकर फिर कभी संसार-बन्धन नहीं प्राप्त होता। आप पुनः उसका वर्णन कीजिये।
महादेवजीने कहा— सुन्दरी ! मैं भगवान् श्रीविष्णुके उत्तम माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, सुनो; इसे सुनकर मनुष्य पुण्य प्राप्त करता है और अन्तमें उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। महाप्राज्ञ देवव्रत, जो इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष थे, कुरुक्षेत्रकी पुण्यभूमिमें ध्यानयोगपरायण हो रहे थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके आश्रय थे। उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था। उनमें पापका लेश भी नहीं था। वे सत्यप्रतिज्ञ थे और क्रोधको जीतकर समतामें प्रतिष्ठित हो चुके थे। संसारके स्वामी और सबको शरण देनेवाले भक्तवत्सल भगवान् नारायणमें मन, वाणी, शरीर और क्रियाके द्वारा वे परम निष्ठाको प्राप्त थे। ऐसे शान्तचित्त तथा समस्त गुणोंके आश्रयभूत कुरु-पितामह भीष्मको पृथ्वीपर मस्तक झुकाकर राजा युधिष्ठिरने प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा।
युधिष्ठिर बोले— समस्त शास्त्र-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ, धर्मके ज्ञाता पितामह ! कोई तो धर्मको सबसे श्रेष्ठ बतलाते हैं और कोई धनको। कोई दानकी प्रशंसा करते हैं, तो कोई संग्रहके गीत गाते हैं। कुछ लोग सांख्यके समर्थक हैं, तो दूसरे लोग योगके। कोई यथार्थ ज्ञानको उत्तम मानते हैं, तो कोई वैराग्यको। कुछ लोग अग्निष्टोम आदि कर्मको ही सबसे श्रेष्ठ समझते हैं, तो कुछ लोग उस आत्मज्ञानको बड़ा मानते हैं, जिसे पाकर मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें समबुद्धि हो जाती है। कुछ लोगोंके मतमें मनीषी पुरुषोंद्वारा बताये हुए यम और नियम ही सबसे उत्तम हैं। कुछ लोग दयाको श्रेष्ठ बताते हैं, तो कुछ तपस्वी महात्मा अहिंसाको ही सर्वोत्तम कहते हैं। कुछ मनुष्य शौचाचारको श्रेष्ठ बतलाते हैं, तो कुछ देवार्चनको। इस विषयमें पाप-कर्मोंसे मोहित चित्तवाले मानव चक्कर खा जाते हैं—वे कुछ निर्णय नहीं कर पाते। इन सबमें जो सर्वोत्तम कृत्य हो, जिसका महात्मा पुरुष भी अनुष्ठान कर सकें, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।
भीष्मजी बोले— धर्मनन्दन ! सुनो, यह अत्यन्त गूढ़ विषय है, जो संसारबन्धनसे मोक्ष दिलानेवाला है। यह विषय तुम्हें भलीभाँति सुनना और जानना चाहिये। पुण्डरीक नामके एक परम बुद्धिमान् और वेदविद्यासे सम्पन्न ब्राह्मण थे, जो ब्रह्मचर्य-आश्रममें निवास करते हुए सदा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन रहा करते थे। वे जितेन्द्रिय, क्रोधजयी, संध्योपासनमें तत्पर, वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञानमें निपुण और शास्त्रोंकी व्याख्या करनेमें कुशल थे। प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल समिधाओंसे अग्निको प्रज्वलित करके उत्तम हविष्यसे होम किया करते थे। जगत्पति भगवान् विष्णुका ध्यान करके विधिपूर्वक उनकी आराधनामें लगे रहते थे। तपस्या और स्वाध्यायमें तत्पर रहकर वे साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्रकी भाँति जान पड़ते थे। जल, समिधा और फूल आदि लाकर निरन्तर गुरुकी पूजामें प्रवृत्त रहते थे। उनके मनमें माता-पिताके प्रति भी पूर्ण सेवाका भाव था। वे भिक्षाका आहार करते और दम्भ-द्वेषसे दूर रहते