पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६८८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
इच्छानुसार भ्रमण करनेवाले द्विजश्रेष्ठ मुद्गल मुनि चले गये।
द्विजवर! जहाँ गोपीचन्दन रहता है, वह घर तीर्थ-स्वरूप है—यह भगवान् श्रीविष्णुका कथन है। जिस ब्राह्मणके घरमें गोपीचन्दन मौजूद रहता है, वहाँ कभी शोक, मोह तथा अमङ्गल नहीं होते। जिसके घरमें रात-दिन गोपीचन्दन प्रस्तुत रहता है, उसके पूर्वज सुखी होते हैं तथा सदा उसकी संतति बढ़ती है। गोपीतालाबसे उत्पन्न होनेवाली मिट्टी परम पवित्र एवं शरीरका शोधन करनेवाली है। देहमें उसका लेप करनेसे सारे रोग नष्ट होते हैं तथा मानसिक चिन्ताएँ भी दूर हो जाती हैं। अतः पुरुषोंद्वारा शरीरमें धारण किया हुआ गोपीचन्दन सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसका ध्यान और पूजन करना चाहिये। यह मल-दोषका विनाश करनेवाला है। इसके स्पर्शमात्रसे मनुष्य पवित्र हो जाता है। वह अन्तकालमें मनुष्योंके लिये मुक्तिदाता एवं परम पावन है। द्विजश्रेष्ठ! मैं क्या बताऊँ, गोपीचन्दन मोक्ष प्रदान करनेवाला है। भगवान् विष्णुका प्रिय तुलसीकाष्ठ, उसके मूलकी मिट्टी, गोपीचन्दन तथा हरिचन्दन— इन चारोंको एकमें मिलाकर विद्वान् पुरुष अपने शरीरमें लगाये। जो ऐसा करता है, उसके द्वारा जम्बूद्वीपके समस्त तीर्थोंका सदाके लिये सेवन हो जाता है। जो गोपीचन्दनको घिसकर उसका तिलक लगाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। जिस पुरुषने गोपीचन्दन धारण कर लिया, उसने मानो गयामें जाकर अपने पिताका श्राद्ध-तर्पण आदि सब कुछ कर लिया।
वैष्णवोंके लक्षण और महिमा तथा श्रवणद्वादशी-व्रतकी विधि और माहात्म्य-कथा
महादेवजी कहते हैं— नारद! सुनो, अब मैं वैष्णवोंके लक्षण बताऊँगा, जिन्हें सुनकर लोग ब्रह्महत्या आदि पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। भक्त भगवान् विष्णुका होकर रहा है, इसलिये वह वैष्णव कहलाता है। समस्त वर्णोंकी अपेक्षा वैष्णवको श्रेष्ठ कहा गया है। जिनका आहार अत्यन्त पवित्र है, उन्हींके वंशमें वैष्णव पुरुष जन्म धारण करता है। ब्रह्मन्! जिनके भीतर क्षमा, दया, तपस्या और सत्यकी स्थिति है, उन वैष्णवोंके दर्शनमात्रके आगसे रूईकी भाँति सारा पाप नष्ट हो जाता है। जो हिंसासे दूर रहता है, जिसकी मति सदा भगवान् विष्णुमें लगी रहती है, जो अपने कण्ठमें तुलसीकाष्ठकी माला धारण करता है, प्रतिदिन अपने अङ्गोंमें बारह तिलक लगाये रहता है तथा विद्वान् होकर धर्म और अधर्मका ज्ञान रखता है, वह मनुष्य वैष्णव कहलाता है। जो सदा वेद-शास्त्रके अभ्यासमें लगे रहते, प्रतिदिन यज्ञोंका अनुष्ठान करते तथा बारम्बार वर्षके चौबीस उत्सव मनाते रहते हैं, उनका कुल परम धन्य है; उन्हींका यश विस्तारको प्राप्त होता है तथा वे ही लोग संसारमें धन्यतम एवं भगवद्भक्त हैं। ब्रह्मन्! जिसके कुलमें एक ही भगवद्भक्त पुरुष उत्पन्न हो जाता है, उसका कुल बारम्बार उस पुरुषके द्वारा उद्धारको प्राप्त होता रहता है। वैष्णवोंके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है। महामुने! इस लोकमें जो वैष्णव पुरुष देखे जाते हैं, तत्त्ववेत्ता पुरुषोंको उन्हें विष्णुके समान ही जानना चाहिये। जिसने भगवान् विष्णुकी पूजा की, उसके द्वारा सबका पूजन हो गया। जिसने वैष्णवोंकी पूजा की, उसने महादान कर लिया। जो वैष्णवोंको सदा फल, पत्र, साग, अन्न अथवा वस्त्र दिया करते हैं, वे इस भूमण्डलमें धन्य हैं। ब्रह्मन्! वैष्णवोंके विषयमें अब और क्या कहा जाय। बारम्बार अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है; उनका दर्शन और स्पर्श—सब कुछ सुखद है। जैसे भगवान् विष्णु हैं, वैसा ही उनका भक्त वैष्णव पुरुष भी है। इन दोनोंमें कभी अन्तर नहीं रहता। ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष सदा वैष्णवोंकी पूजा करे। जो इस पृथ्वीपर एक ही वैष्णव ब्राह्मणको भोजन करा देता है, उसने सहस्रों ब्राह्मणोंको भोजन करा दिया—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
नारदजीने कहा— सुरश्रेष्ठ! जो सदा उपवास
उत्तराखण्ड ] * वैष्णवोंके लक्षण और महिमा तथा श्रवणद्वादशी-व्रतकी विधि और माहात्म्य-कथा * ६८९
करनेमें असमर्थ हैं, उनके लिये कोई एक ही द्वादशीका व्रत, जो पुण्यजनक हो, बताइये।
महादेवजी बोले—भाद्रपद मासके शुक्लपक्षमें जो श्रवण नक्षत्रसे युक्त द्वादशी होती है, वह सब कुछ देनेवाली पुण्यमयी तथा उपवास करनेपर महान् फल देनेवाली है। जो नदियोंके संगममें नहाकर उक्त द्वादशीको उपवास करता है, वह अनायास ही बारह द्वादशियोंका फल पा लेता है। बुधवार और श्रवण नक्षत्रसे युक्त जो द्वादशी होती है, उसका महत्त्व बहुत बड़ा है। उस दिन किया हुआ सब कुछ अक्षय हो जाता है। श्रवण-द्वादशीके दिन विद्वान् पुरुष जलपूर्ण कलशकी स्थापना करके उसके ऊपर एक पात्र रखे और उसमें श्रीजनार्दनकी स्थापना करे। तत्पश्चात् उनके आगे घीमें पका हुआ नैवेद्य निवेदन करे; साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार जलसे भरे हुए अनेक नये घड़ोंका दान करे। इस प्रकार श्रीगोविन्दकी पूजा करके उनके समीप रात्रिमें जागरण करे। फिर निर्मल प्रभातकाल आनेपर स्नान करके फूल, धूप, नैवेद्य, फल और सुन्दर वस्त्र आदिके द्वारा भगवान् गरुड़ध्वजकी पूजा करे। तदनन्तर पुष्पाञ्जलि दे और इस मन्त्रको पढ़े—
नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंयुत।
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव॥
(७०।१०)
'बुधवार और श्रवण नक्षत्रसे युक्त भगवान् गोविन्द! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। मेरी पापराशिका नाश करके आप मुझे सब प्रकारके सुख प्रदान करें।'
तत्पश्चात् वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी, विशेषतः पुराणोंके ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मणको विधिपूर्वक पवित्र अन्नका दान करे। इस प्रकार श्रेष्ठ पुरुष किसी नदीके किनारे एकचित्त होकर उक्त विधिसे सब कार्य पूर्ण करे। इस विषयमें जानकार लोग यह प्राचीन इतिहास कहा करते हैं—एक महान् वनमें जो घटना घटित हुई थी, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो।
विद्वन्! दाशेरक नामका जो देश है, उसके पश्चिम भागमें मरु (मारवाड़) प्रदेश है, जो समस्त प्राणियोंके लिये भय उत्पन्न करनेवाला है। वहाँकी भूमि तपी हुई बालूसे भरी रहती है। वहाँ बड़े-बड़े साँप हैं, जो महादुष्ट होते हैं। वह भूमि थोड़ी छायावाले वृक्षोंसे व्याप्त है। शमी, खैर, पलाश, करील और पीलू—ये ही वहाँके वृक्ष हैं। मजबूत काँटोंसे घिरे हुए वहाँके वृक्ष बड़े भयङ्कर दिखायी देते हैं; तथापि कर्मबन्धनसे बँधे होनेके कारण वहाँ भी सब जीव जीवन धारण करते हैं। विद्वन्! उस देशमें न तो पर्याप्त जल है और न जल धारण करनेवाले बादल ही वहाँ दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे देशमें कोई बनिया भाग्यवश अपने साथियोंसे बिछुड़कर इधर-उधर भटक रहा था। उसके हृदयमें भ्रम छा गया था। वह भूख, प्यास और परिश्रमसे पीड़ित हो रहा था। कहाँ गाँव है? कहाँ जल है? मैं कहाँ जाऊँगा ? यह कुछ भी उसे जान नहीं पड़ता था। इसी समय उसने कुछ प्रेत देखे, जो भूख-प्याससे व्याकुल एवं भयङ्कर दिखायी देते थे। उनमें एक प्रेत ऐसा था, जो दूसरे प्रेतके कंधेपर चढ़कर चलता था तथा और बहुत-से प्रेत उसे चारों ओरसे घेरे हुए थे। प्रेतोंकी भयानक आवाजके साथ वह
६९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
भयङ्कर प्रेत उधर ही आ रहा था। वह उस भयानक जंगलमें मनुष्यको आया देख प्रेतके कंधेसे पृथ्वीपर उतर पड़ा और बनियेके पास आकर उसे प्रणाम करके इस प्रकार बोला—'इस घोर प्रदेशमें आपका कैसे प्रवेश हुआ?' यह सुनकर उस बुद्धिमान् बनियेने कहा—'दैवयोगसे तथा पूर्वजन्मके किये हुए कर्मकी प्रेरणासे मैं अपने साथियोंसे बिछुड़ गया हूँ। इस प्रकार मेरा यहाँ प्रवेश सम्भव हुआ है। इस समय मुझे बड़े जोरकी भूख और प्यास सता रही है।'
तब उस प्रेतने उस समय अपने अतिथिको उत्तम अन्न प्रदान किया। उसके खानेमात्रसे बनियेको बड़ी तृप्ति हुई। वह एक ही क्षणमें प्यास और संतापसे रहित हो गया। इसके बाद वहाँ बहुत-से प्रेत आ पहुँचे। प्रधान प्रेतने क्रमशः उन सबको अन्नका भाग दिया। दही, भात और जलसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता और तृप्ति हुई। इस प्रकार अतिथि और प्रेतसमुदायको तृप्त करके उसने स्वयं भी बचे हुए अन्नका सुखपूर्वक भोजन किया। उसके भोजन कर लेनेपर वहाँ जो सुन्दर अन्न और जल प्रस्तुत हुआ था, वह सब अदृश्य हो गया। तब बनियेने उस प्रेतराजसे कहा—'भाई ! इस वनमें तो मुझे यह बड़े आश्चर्यकी बात प्रतीत हो रही है। तुम्हें यह उत्तम अन्न और जल कहाँसे प्राप्त हुआ ? तुमने थोड़े-से ही अन्नसे इन बहुत-से जीवोंको तृप्त कर दिया। इस घोर जंगलमें तुमलोग कैसे निवास करते हो ?'
प्रेत बोला— महाभाग ! मैंने अपना पूर्वजन्म केवल वाणिज्य-व्यवसायमें आसक्त होकर व्यतीत किया है। समूचे नगरमें मेरे समान दूसरा कोई दुरात्मा नहीं था। धनके लोभसे मैंने कभी किसीको भीखतक नहीं दी। उन दिनों एक गुणवान् ब्राह्मण मेरे मित्र थे। एक समय भादोंके महीनेमें, जब श्रवण नक्षत्र और द्वादशीका योग आया था, वे मुझे साथ लेकर तापी नदीके तटपर गये, जहाँ उसका चन्द्रभागा नदीके साथ पवित्र संगम हुआ था, चन्द्रभागा चन्द्रमाकी पुत्री है और तापी सूर्यकी। उन दोनोंके मिले हुए शीत और उष्ण जलमें मैंने ब्राह्मणके साथ प्रवेश किया। श्रवण-द्वादशीके योगमें बहुत-से मनुष्योंको संतुष्ट किया। चन्द्रभागाके उत्तम जलसे भरकर ब्राह्मणको जलपात्र दान किया तथा दही और भातके साथ जलसे भरे हुए बहुत-से पुरवे भी ब्राह्मणोंको दिये। इसके सिवा भगवान् शङ्करके समक्ष श्रेष्ठ ब्राह्मणको छाता, जूते, वस्त्र तथा श्रीहरिकी प्रतिमा भी दान की। उस नदीके तीरपर मैंने धनकी रक्षाके लिये व्रत किया था। उपवासपूर्वक एक मनोहर जलपात्र भी दान किया था। यह सब करके मैं घर लौट आया। तदनन्तर, कुछ कालके बाद मेरी मृत्यु हो गयी। नास्तिक होनेके कारण मुझे प्रेतकी योनिमें आना पड़ा। श्रवण-द्वादशीके योगमें मैंने जलका बड़ा पात्र दान किया था, इसलिये प्रतिदिन मध्याह्नके समय यह मुझे प्राप्त होता है। ये सब ब्राह्मणका धन चुरानेवाले पापी हैं, जो प्रेतभावको प्राप्त हुए हैं। इनमें कुछ परस्त्रीलम्पट और कुछ अपने स्वामीसे द्रोह करनेवाले रहे हैं। इस मरुप्रदेशमें आकर ये मेरे मित्र हो गये हैं। सनातन परमात्मा भगवान् विष्णु अक्षय (अविनाशी) हैं। उनके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह सब अक्षय कहा गया है। उस अक्षय अन्नसे ही ये प्रेत पुनः-पुनः तृप्त होते रहते हैं। आज तुम मेरे अतिथिके रूपमें उपस्थित हुए हो। मैं अन्नसे तुम्हारी पूजा करके प्रेत-भावसे मुक्त हो परमगतिको प्राप्त होऊँगा, परन्तु मेरे बिना ये प्रेत इस भयङ्कर वनमें कर्मानुसार प्राप्त हुई प्रेतयोनिकी दुःसह पीड़ा भोगेंगे; अतः तुम मुझपर कृपा करनेके लिये इन सबके नाम और गोत्र लिखकर ले लो। महामते ! यहाँसे हिमालयपर जाकर तुम खजाना प्राप्त करोगे। तत्पश्चात् गया जाकर इन सबका श्राद्ध कर देना।
महादेवजी कहते हैं— नारद ! बनियेको इस प्रकार आदेश देकर प्रेतने उसे सुखपूर्वक विदा किया। घर आनेपर उसने हिमालयकी यात्रा की और वहाँसे प्रेतका बताया हुआ खजाना लेकर वह लौट आया। उस खजानेका छठा अंश साथ लेकर वह 'गया' तीर्थमें गया। वहाँ पहुँचकर उस परम बुद्धिमान् बनियेने शास्त्रोक्त विधिसे उन प्रेतोंका श्राद्ध किया। एक-एकके नाम और गोत्रका उच्चारण करके उनके लिये पिण्डदान
उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९१ ************************************************************************************************
किया। वह जिस दिन जिसका श्राद्ध करता था, उस दिन वह आकर स्वप्नमें बनियेको प्रत्यक्ष दर्शन देता और कहता कि 'महाभाग ! तुम्हारी कृपासे मैंने प्रेतभावको त्याग दिया और अब मैं परमगतिको प्राप्त हो रहा हूँ।' इस प्रकार वह महामना वैश्य गया-तीर्थमें प्रेतोंका विधिपूर्वक श्राद्ध करके बारम्बार भगवान् विष्णुका ध्यान करता हुआ अपने घर लौट आया। फिर भाद्रपद मासके शुक्लपक्षमें, जब श्रवण-द्वादशीका योग आया, तब वह सब आवश्यक सामग्री साथ लेकर नदीके संगमपर गया और वहाँ स्नान करके उसने द्वादशीका व्रत किया। स्नान, दान और भगवान् विष्णुका पूजन करनेके अनन्तर ब्राह्मणको उपहार भेंट किया। एकचित्त होकर उस बुद्धिमान् वैश्यने शास्त्रोक्त विधिसे सब कार्य सम्पन्न किया। उसके बाद प्रतिवर्ष भादोंका महीना आनेपर श्रवण-द्वादशीके योगमें नदीके संगमपर जाकर वह भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे पूर्वोक्त प्रकारसे स्नान-दान आदि सब कार्य करने लगा। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उसकी मृत्यु हो गयी। उसने सब मनुष्योंके लिये दुर्लभ परमधामको प्राप्त कर लिया। आज भी वह विष्णुदूतोंसे सेवित हो वैकुण्ठधाममें विहार कर रहा है। ब्रह्मन् ! तुम भी इसी प्रकार श्रवण-द्वादशीका व्रत करो। वह इस लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाला, उत्तम बुद्धिको देनेवाला तथा सब पापोंको हरनेवाला उत्तम साधन है। जो श्रवण-द्वादशीके योगमें इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह इसके प्रभावसे विष्णुलोकमें जाता है।
नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन
ऋषियोंने कहा— सूतजी ! आपका हृदय अत्यन्त करुणायुक्त है; अतएव श्रीमहादेवजी और देवर्षि नारदका जो अद्भुत संवाद हुआ था, उसे आपने हमलोगोंसे कहा है। हमलोग श्रद्धापूर्वक सुन रहे हैं। अब आप कृपापूर्वक यह बताइये कि महात्मा नारदने ब्रह्माजीसे भगवन्नामोंकी महिमाका किस प्रकार श्रवण किया था।
सूतजी बोले— द्विजश्रेष्ठ मुनियो ! इस विषयमें मैं पुराना इतिहास सुनाता हूँ। आप सब लोग ध्यान देकर सुनें। इसके श्रवणसे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति बढ़ती है। एक समयकी बात है, चित्तको पूर्ण एकाग्र रखनेवाले नारदजी अपने पिता ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये मेरु पर्वतके शिखरपर गये। वहाँ आसनपर बैठे हुए जगत्पति ब्रह्माजीको प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ नारदजीने इस प्रकार कहा—'विश्वेश्वर ! भगवान्के नामकी जितनी शक्ति है, उसे बताइये। प्रभो ! ये जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी साक्षात् श्रीनारायण हरि हैं, इन अविनाशी परमात्माके नामकी कैसी महिमा है?'
ब्रह्माजी बोले— बेटा ! इस कलियुगमें विशेषतः नामकीर्तनपूर्वक भगवान्की भक्ति जिस प्रकार करनी चाहिये, वह सुनो। जिनके लिये शास्त्रोंमें कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है, उन सभी पापोंकी शुद्धिके
६९२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
लिये एकमात्र विजयशील भगवान् विष्णुका प्रयत्नपूर्वक स्मरण ही सर्वोत्तम साधन देखा गया है, वह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।* अतः श्रीहरिके नामका कीर्तन और जप करना चाहिये। जो ऐसा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। जो मनुष्य 'हरि' इस दो अक्षरोंवाले नामका सदा उच्चारण करते हैं, वे उसके उच्चारणमात्रसे मुक्त हो जाते हैं—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तपस्याके रूपमें किये जानेवाले जो सम्पूर्ण प्रायश्चित्त हैं, उन सबकी अपेक्षा श्रीकृष्णका निरन्तर स्मरण श्रेष्ठ है। जो मनुष्य प्रातः, सायं, रात्रि तथा मध्याह्न आदिके समय 'नारायण' नामका स्मरण करता है, उसके समस्त पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।†
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नारद ! मेरा कथन सत्य है, सत्य है, सत्य है। भगवान्के नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। 'राम-राम-राम-राम' इस प्रकार बारम्बार जप करनेवाला मनुष्य यदि चाण्डाल हो तो भी वह पवित्रात्मा हो जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। उसने नाम-कीर्तन-मात्रसे कुरुक्षेत्र, काशी, गया और द्वारका आदि सम्पूर्ण तीर्थोंका सेवन कर लिया। जो 'कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !' इस प्रकार जप और कीर्तन करता है, वह इस संसारका परित्याग करनेपर भगवान् विष्णुके समीप आनन्द भोगता है। ब्रह्मन् ! जो कलियुगमें प्रसन्नतापूर्वक 'नृसिंह' नामका जप और कीर्तन करता है, वह भगवद्भक्त मनुष्य महान् पापसे छुटकारा पा जाता है। सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञ तथा द्वापरमें पूजन करके मनुष्य जो कुछ पाता है, वही कलियुगमें केवल भगवान् केशवका कीर्तन करनेसे पा लेता है। जो लोग इस बातको जानकर जगदात्मा केशवके भजनमें लीन होते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि—ये दस अवतार इस पृथ्वीपर बताये गये हैं। इनके नामोच्चारण-मात्रसे सदा ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध होता है। जो मनुष्य प्रातःकाल जिस किसी तरह भी श्रीविष्णुनामका कीर्तन, जप तथा ध्यान करता है, वह निस्सन्देह मुक्त होता है, निश्चय ही नरसे नारायण बन जाता है।‡
**सूतजी कहते हैं—**यह सुनकर नारदजीको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे अपने पिता ब्रह्माजीसे बोले—'तात ! तीर्थसेवनके लिये पृथ्वीपर भ्रमण करनेकी क्या आवश्यकता है; जिनके नामका ऐसा माहात्म्य है कि
* दृष्टं परेषां पापानामुक्तानां विशोधनम्। विष्णोर्जिष्णोः प्रयत्नेन स्मरणं पापनाशनम्॥ (७२ । १०)
† ये वदन्ति नरा नित्यं हरिरित्यक्षरद्वयम्। तस्योच्चारणमात्रेण विमुक्तास्ते न संशयः॥
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि तपःकर्मात्मकानि वै। यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्॥
प्रातर्निशि तथा सायं मध्याह्नादिषु संस्मरन्। नारायणमवाप्नोति सद्यः पापक्षयं नरः॥ (७२ । १२—१४)
‡ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं भाषितं मम सुव्रत। नामोच्चारणमात्रेण महापापात्प्रमुच्यते॥
राम रामेति रामेति रामेति च पुनर्जपन्। स चाण्डालोऽपि पूतात्मा जायते नात्र संशयः॥
कुरुक्षेत्रं तथा काशी गया वै द्वारका तथा। सर्वं तीर्थं कृतं तेन नामोच्चारणमात्रतः॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति इति वा यो जपन् पठन्। इहलोकं परित्यज्य मोदते विष्णुसंनिधौ॥
नृसिंहेति मुदा विप्र वर्तते यो जपन् पठन्। महापापात् प्रमुच्येत कलौ भागवतो नरः॥
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥
ये तज्ज्ञात्वा निमग्नाश्च जगदात्मनि केशवे। सर्वपापपरिक्षीणा यान्ति विष्णोः परं पदम्॥
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नृसिंहो वामनस्तथा। रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की ततः स्मृतः॥
एते दशावताराश्च पृथिव्यां परिकीर्तिताः। एतेषां नाममात्रेण ब्रह्महा शुद्ध्यते सदा॥
प्रातः पठञ्जपन् ध्यायन् विष्णोर्नाम यथा तथा। मुच्यते नात्र संदेहः स वै नारायणो भवेत्॥ (७२ । २०—२९)
उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९३
उसे सुननेमात्रसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है, उन भगवान्का ही स्मरण करना चाहिये। जिस मुखमें 'राम-राम' का जप होता रहता है, वही महान् तीर्थ है, वही प्रधान क्षेत्र है तथा वही समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। सुव्रत! भगवान्के कीर्तन करने-योग्य कौन-कौन-से नाम हैं? उन सबको विशेष रूपसे बताइये।
ब्रह्माजीने कहा— बेटा! ये भगवान् विष्णु सर्वत्रव्यापक सनातन परमात्मा हैं। इनका न आदि है न अन्त। ये लक्ष्मीसे युक्त, सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा तथा समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले हैं। जिनसे मेरा प्रादुर्भाव हुआ है, वे भगवान् विष्णु सदा मेरी रक्षा करें। वही कालके भी काल और वही मेरे पूर्वज हैं। उनका कभी विनाश नहीं होता। उनके नेत्र कमलके समान शोभा पाते हैं। वे परम बुद्धिमान्, अविकारी एवं पुरुष (अन्तर्यामी) हैं। सदा शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् विष्णु सहस्रों मस्तकवाले हैं। वे महाप्रभु हैं। सम्पूर्ण भूत उन्हींके स्वरूप हैं। भगवान् जनार्दन साक्षात् विश्वरूप हैं। कैटभ नामक असुरका वध करनेके कारण वे कैटभारि कहलाते हैं। वे ही व्यापक होनेके कारण विष्णु, धारण-पोषण करनेके कारण धाता और जगदीश्वर हैं। नारद! मैं उनका नाम और गोत्र नहीं जानता। तात! मैं केवल वेदोंका वक्ता हूँ, वेदातीत परमात्माका ज्ञाता नहीं, अतः देवर्षे! तुम वहाँ जाओ, जहाँ भगवान् विश्वनाथ रहते हैं। मुनिश्रेष्ठ! वे तुमसे सम्पूर्ण तत्त्वका वर्णन करेंगे। कैलासके स्वामी श्रीमद्महादेवजी ही अन्तर्यामी पुरुष हैं। वे देवताओंके स्वामी और सम्पूर्ण भक्तोंके आराध्यदेव हैं। पाँच मुखोंसे सुशोभित भगवान् उमानाथ सब दुःखोंका विनाश करनेवाले हैं। सम्पूर्ण विश्वके ईश्वर श्रीविश्वनाथजी सदा भक्तोंपर दया करनेवाले हैं। नारद! वहीं जाओ, वे तुम्हें सब कुछ बता देंगे।
सूतजी कहते हैं— पिताकी बात सुनकर देवर्षि नारद कैलास पर्वतपर, जहाँ कल्याणप्रद भगवान् विश्वेश्वर नित्य निवास करते हैं, गये। देवताओं द्वारा पूजित देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् शङ्कर कैलासके शिखरपर विराजमान थे। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ, प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र तथा हाथोंमें त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग, तीक्ष्ण शूल, खड्ग और पिनाक नामका धनुष शोभा पा रहे थे। बैलपर सवारी करनेवाले वरदाता भगवान् भीम अपने अङ्गोंमें भस्म रमाये सर्पोंकी शोभासे युक्त चन्द्रमाका मुकुट पहने करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान हो रहे थे। नारदजीने देवेश्वर शिवको साष्टाङ्ग दण्डवत् किया। उन्हें देखकर महादेवजीके नेत्रकमल खिल उठे। उस समय वैष्णवोंमें सर्वश्रेष्ठ शिवने ब्रह्मचारियोंमें श्रेष्ठ नारदजीसे पूछा—'देवर्षिप्रवर! बताओ, कहाँसे आ रहे हो?'
नारदजीने कहा— भगवन्! एक समय मैं ब्रह्माजीके पास गया था। वहाँ उनके मुखसे मैंने भगवान् विष्णुके पापनाशक माहात्म्यका श्रवण किया। सुरश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने मेरे सामने भगवान्की महिमाका भलीभाँति वर्णन किया। भगवान्के नामकी जितनी शक्ति है, वह भी मैंने उनके मुखसे सुनी है। तत्पश्चात् पहले विष्णुके नामोंके विषयमें प्रश्न किया। तब उन्होंने कहा—'नारद! मैं इस बातको नहीं जानता; इसका ज्ञान महारुद्रको है। वे ही सब कुछ बतायेंगे।' यह सुनकर मैं आपके पास आया हूँ। इस घोर कलियुगमें मनुष्योंकी आयु थोड़ी होगी। वे सदा अधर्ममें तत्पर रहेंगे। भगवान्के नामोंमें उनकी निष्ठा नहीं होगी। कलियुगके ब्राह्मण पाखण्डी, धर्मसे विरक्त, संध्या न करनेवाले, व्रतहीन, दुष्ट और मलिन होंगे; जैसे ब्राह्मण होंगे, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य जातिके लोग भी होंगे। प्रायः मनुष्य भगवान्के भक्त नहीं होंगे। द्विजोंसे बाहर गिने जानेवाले शूद्र कलियुगमें धर्म-अधर्म तथा हिताहितका ज्ञान भी नहीं रखते; ऐसा जानकर मैं आपके निकट आया हूँ। आप कृपा करके विष्णुके सहस्र नामोंका वर्णन कीजिये, जो पुरुषोंके लिये सौभाग्यजनक, परम उत्तम तथा सर्वदा भक्तिभावको बढ़ानेवाले हैं; इसी प्रकार जो ब्राह्मणोंको ब्रह्मज्ञान, क्षत्रियोंको विजय, वैश्योंको धन तथा शूद्रोंको सदा सुख देनेवाले हैं।
६९४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
सुव्रत ! जो सहस्रनाम परम गोपनीय है, उसका वर्णन कीजिये। वह परम पवित्र एवं सदा सर्वतीर्थमय है; अतः मैं उसका श्रवण करना चाहता हूँ। प्रभो ! विश्वेश्वर ! कृपया उस सहस्रनामका उपदेश कीजिये।
नारदजीके वचन सुनकर भगवान् शङ्करके नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे। भगवान् विष्णुके नामका बारम्बार स्मरण करके उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे बोले—'ब्रह्मन् ! भगवान् विष्णुके सहस्रनाम परम गोपनीय हैं। इन्हें सुनकर मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता।' यों कहकर भगवान् शङ्करने नारदजीको विष्णुसहस्रनामका उपदेश दिया, जिसे पूर्वकालमें वे भगवती पार्वतीजीको सुना चुके थे। इस प्रकार नारदजीने कैलास पर्वतपर भगवान् महेश्वरसे श्रीविष्णुसहस्रनामका ज्ञान प्राप्त किया। फिर दैवयोगसे एक बार वे कैलाससे उतरकर नैमिषारण्य नामक तीर्थमें आये। वहाँके ऋषियोंने ऋषिश्रेष्ठ महात्मा नारदको आया देख विशेष-रूपसे उनका स्वागत-सत्कार किया। उन्होंने विष्णुभक्त विप्रवर नारदजीके ऊपर फूल बरसाये, पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया, उनकी आरती उतारी और फल-मूल निवेदन करके पृथ्वीपर साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तत्पश्चात् वे बोले—'महामुने ! हमलोग इस वंशमें जन्म लेकर आज कृतार्थ हो गये; क्योंकि आज हमें परम पवित्र और पापोंका नाश करनेवाला आपका दर्शन प्राप्त हुआ। देवर्षे ! आपके प्रसादसे हमने पुराणोंका श्रवण किया है। ब्रह्मन् ! अब आप यह बताइये कि किस प्रकारसे समस्त पापोंका क्षय हो सकता है। दान, तपस्या, तीर्थ, यज्ञ, योग, ध्यान, इन्द्रिय-निग्रह और शास्त्र-समुदायके बिना ही कैसे मुक्ति प्राप्त हो सकती है ?'
नारदजी बोले—मुनिवरो ! एक समय भगवती पार्वतीने कैलासशिखरपर बैठे हुए अपने प्रियतम देवाधिदेव जगद्गुरु महादेवजीसे इस प्रकार प्रश्न किया।
पार्वती बोलीं— भगवान् ! आप सर्वज्ञ और सर्वपूजित श्रेष्ठ देवता हैं। जन्म और मृत्युसे रहित, स्वयम्भू एवं सर्वशक्तिमान् हैं। स्वामिन् ! आप सदा किसका ध्यान करते हैं ? किस मन्त्रका जप करते हैं ? देवेश्वर ! इसे जाननेकी मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है। सुव्रत ! यदि मैं आपकी प्रियतमा और कृपापात्र हूँ तो मुझसे यथार्थ बात कहिये।
महादेवजी बोले— देवि ! पहले सत्ययुगमें विशुद्ध चित्तवाले सब पुरुष सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर एकमात्र भगवान् विष्णुका तत्त्व जानकर उन्हींके नामोंका जप किया करते थे और उसीके प्रभावसे इस लोक तथा परलोकमें भी परम ऐश्वर्यको प्राप्त करते थे। प्रिये ! तुलादान, अश्वमेध आदि यज्ञ, काशी, प्रयाग आदि तीर्थोंमें किये हुए स्नान आदि शुभकर्म, गयामें किये हुए पितरोंके श्राद्ध-तर्पण आदि, वेदोंके स्वाध्याय आदि, जप, उग्र तप, नियम, यम, जीवोंपर दया, गुरुशुश्रूषा, सत्यभाषण, वर्ण और आश्रमके धर्मोंका पालन, ज्ञान तथा ध्यान आदि साधनोंका कोटि जन्मोंतक भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर भी मनुष्य परम कल्याणमय सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुको नहीं पाते। परन्तु जो दूसरेका भरोसा न करके सर्वभावसे पुराण पुरुषोत्तम श्रीनारायणकी शरण ग्रहण करते हैं, वे उन्हें प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग एकमात्र श्रीभगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करते हैं, वे
उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९५
सुखपूर्वक जिस गतिको प्राप्त करते हैं, उसे समस्त धार्मिक भी नहीं पा सकते। अतः सदा भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये, इन्हें कभी भी भूलना नहीं चाहिये। क्योंकि सभी विधि और निषेध इन्हींके किङ्कर हैं—इन्हींकी आज्ञाका पालन करते हैं।* प्रिये ! अब मैं तुमसे भगवान् विष्णुके मुख्य-मुख्य हजार नामोंका वर्णन करूँगा, जो तीनों लोकोंको मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं।
विनियोग
अस्य श्रीविष्णुर्नामसहस्रस्तोत्रस्य श्रीमहादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, परमात्मा देवता, ह्रीं बीजम्, श्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्, चतुर्वर्गधर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ॥ १९४ ॥
इस श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रके महादेवजी ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, परमात्मा देवता, ह्रीं बीज, श्रीं शक्ति और क्लीं कीलक हैं। चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षकी प्राप्तिके निमित्त जप करनेके लिये इस स्तोत्रका विनियोग (प्रयोग) किया जाता है ॥ १९४ ॥
ॐ वासुदेवाय विद्महे, महाहंसाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ १९५ ॥
हम श्रीवासुदेवका तत्त्व समझनेके लिये ज्ञान प्राप्त करते हैं, महाहंसस्वरूप नारायणके लिये ध्यान करते हैं, श्रीविष्णु हमें प्रेरित करें—हमारी मन, बुद्धिको प्रेरणा देकर इस कार्यमें लगायें ॥ १९५ ॥
'अङ्गन्यासकरन्यासविधिपूर्वं यदा पठेत् ।
तत्फलं कोटिगुणितं भवत्येव न संशयः ॥ १९६ ॥
यदि पहले अङ्गन्यास और करन्यासकी विधि पूर्ण करके सहस्रनामस्तोत्रका पाठ किया जाय तो निस्सन्देह उसका फल कोटिगुना होता है ॥ १९६ ॥
अङ्गन्यास
श्रीवासुदेवः परं ब्रह्मेति हृदयम्। मूलप्रकृतिरिति शिरः। महावराह इति शिखा। सूर्यवंशध्वज इति कवचम्। ब्रह्मादिकाम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशव इति नेत्रम्। पार्थार्थखण्डिताशेष इत्यस्त्रम्। नमो नारायणायेति न्यासं सर्वत्र कारयेत् ॥ १९७ ॥
'श्रीवासुदेवः परं ब्रह्म' (श्रीवासुदेव परब्रह्म हैं)—यह कहकर दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे। 'मूलप्रकृतिः' (मूल प्रकृति) का उच्चारण करके सिरका स्पर्श करे। 'महावराहः' (महान् वराहरूपधारी भगवान् विष्णु)—यह कहकर शिखाका स्पर्श करे। 'सूर्यवंशध्वजः' (सूर्यवंशके ध्वजारूप भगवान् श्रीराम) यों कहकर दोनों हाथोंसे दोनों भुजाओंके मूलभागका स्पर्श करे। 'ब्रह्मादि-काम्यलालित्यजगदाश्चर्यशैशवः' (अवतार धारण करनेपर जिनका शिशुरूप अपने अनुपम सौन्दर्यसे संसारको आश्चर्यमें डाल देता है तथा ब्रह्मा आदि देवता भी उस रूपमें जिनकी झाँकी करनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे भगवान् विष्णु धन्य हैं) यह कहकर नेत्रोंका स्पर्श करे। 'पार्थार्थखण्डिताशेषः' (अर्जुनके लिये महाभारतके समस्त वीरोंका संहार करानेवाले श्रीकृष्ण) यों कहकर ताली बजाये। अन्तमें 'नमो नारायणाय' (श्रीनारायणको नमस्कार है)—ऐसा बोलकर सर्वाङ्गका स्पर्श करे ॥ १९७ ॥†
ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने, विशुद्धसत्त्वाय महाहंसाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥ १९८ ॥
ॐकाररूप सर्वान्तर्यामी महात्मा नारायणको
* स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित्। सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतस्यैव हि किङ्कराः॥ (७२।१००)
† यहाँ अङ्गन्यासकी विधिका उल्लेख किया गया है; इन्हीं मन्त्रोंसे करन्यास भी किया जा सकता है, उसकी विधि इस प्रकार है। 'श्रीवासुदेवः परं ब्रह्म' यह कहकर दोनों हाथोंके अँगूठोंको परस्पर मिलाये; इसी तरह 'मूलप्रकृतिः' कहकर दोनों तर्जिनियोंको, 'महावराहः'का उच्चारण करके दोनों बीचकी अँगुलियोंको, 'सूर्यवंशध्वजः' कहकर दोनों अनामिकाओंको, 'ब्रह्मादिकाम्यलालित्य-जगदाश्चर्यशैशवः'का उच्चारण करके दोनों कनिष्ठिका अँगुलियोंको, 'पार्थार्थखण्डिताशेषः' कहकर दोनों हथेलियोंको तथा 'नमो नारायणाय'का उच्चारण करके हथेलियोंके पृष्ठभागोंको परस्पर स्पर्श कराये।
६९६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
नमस्कार है, विशुद्ध सत्त्वमय महाहंसस्वरूप श्रीविष्णुका हम ध्यान करते हैं; अतः श्रीविष्णु देवता हमें सत्कार्यमें प्रेरित करें ॥ ११८ ॥
ह्रीं कृष्णाय विद्महे, ह्रीं रामाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥ ११९ ॥
'ह्रीं' रूप श्रीकृष्णतत्त्वको समझनेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं; 'ह्रीं' रूप श्रीरामका हम ध्यान करते हैं; वे देव श्रीरघुनाथजी हमें प्रेरित करें ॥ ११९ ॥
शं नृसिंहाय विद्महे, श्रीकण्ठाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ १२० ॥
शम्—कल्याणमय भगवान् नृसिंहका तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, श्रीकण्ठका ध्यान करते हैं; वे श्रीनृसिंहरूप भगवान् विष्णु हमें प्रेरित करें ॥ १२० ॥
ॐ वासुदेवाय विद्महे, देवकीसुताय धीमहि, तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥ १२१ ॥
ॐकाररूप श्रीवासुदेवका तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, श्रीदेवकीनन्दन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं, वे श्रीकृष्ण हमें प्रेरित करें ॥ १२१ ॥
ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय नमः स्वाहा ॥ १२२ ॥
ॐ हां हीं हूं हैं हौं हः क्लीं—सच्चिदानन्दस्वरूप, गोपीजनोंके प्रियतम भगवान् गोविन्दको नमस्कार है; हम उनकी तृप्तिके लिये उत्तम रीतिसे हवन करते हैं—अपना सब कुछ अर्पण करते हैं ॥ १२२ ॥
इति मन्त्र समुच्चार्य यजेद् वा विष्णुमव्ययम् ।
श्रीनिवासं जगन्नाथं ततः स्तोत्रं पठेत् सुधीः ॥
ॐ वासुदेवः परं ब्रह्म परमात्मा परात्परः ॥ १२३ ॥
—उपर्युक्त मन्त्रोंका उच्चारण करके लक्ष्मीके निवासस्थान और संसारके स्वामी अविनाशी भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे; इसके बाद विद्वान् पुरुष सहस्रनामस्तोत्रका पाठ करे। ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १ वासुदेवः—सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें बसानेवाले तथा समस्त भूतोंमें सर्वात्मरूपसे बसनेवाले, चतुर्व्यूहमें वासुदेवस्वरूप, २ परं ब्रह्म—सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म—निर्गुण परमात्मा, ३ परमात्मा—परम श्रेष्ठ, नित्य-शुद्ध-बुद्ध—मुक्तस्वभाव, ४ परात्परः—पर अर्थात् प्रकृतिसे भी परे विराजमान परमात्मा ॥ १२३ ॥
परं धाम परं ज्योतिः परं तत्त्वं परं पदम् ।
परः शिवः परो ध्येयः परं ज्ञानं परा गतिः ॥ १२४ ॥
५ परं धाम—सर्वोत्तम वैकुण्ठधाम, निर्गुण परमात्मा, ६ परं ज्योतिः—सूर्य आदि ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाले सर्वोत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप, ७ परं तत्त्वम्—परम तत्त्व, उपनिषदोंसे जाननेयोग्य सर्वोत्तम रहस्य, ८ परं पदम्—प्राप्त करनेयोग्य सर्वोत्कृष्ट पद, मोक्षस्वरूप, ९ परः शिवः—परम कल्याणरूप, १० परो ध्येयः—ध्यान करनेयोग्य सर्वोत्तम देव, चिन्तनके सर्वश्रेष्ठ आश्रय, ११ परं ज्ञानम्—भ्रान्तिशून्य उत्कृष्ट बोधस्वरूप परमात्मा, १२ परा गतिः—सर्वोत्तम गति, मोक्षस्वरूप ॥ १२४ ॥
परमार्थः परश्रेष्ठः परानन्दः परोदयः ।
परोऽव्यक्तात्परं व्योम परमर्द्धिः परेश्वरः ॥ १२५ ॥
१३ परमार्थः—मोक्षरूप परम पुरुषार्थ, परम सत्य १४ परश्रेष्ठः—श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ, १५ परानन्दः—परम आनन्दमय, असीम आनन्दकी निधि, १६ परोदयः—सर्वाधिक अभ्युदयशाली, १७ अव्यक्तात्परः—अव्यक्तपदवाच्य मूलप्रकृतिसे परे, १८ परं व्योम—नित्य एवं अनन्त आकाशस्वरूप निर्गुण परमात्मा, १९ परमर्द्धिः—सर्वोत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न, २० परेश्वरः—पर अर्थात् ब्रह्मादि देवताओंके भी ईश्वर ॥ १२५ ॥
निरामयो निर्विकारो निर्विकल्पो निराश्रयः ।
निरञ्जनो निरालम्बो निर्लेपो निरवग्रहः ॥ १२६ ॥
२१ निरामयः—रोग-शोकसे रहित, २२ निर्विकारः—उत्पत्तिः, सत्ता, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और विनाश—इन छः विकारोंसे शून्य, २३ निर्विकल्पः—सन्देहरहित, संकल्पशून्य, २४ निराश्रयः—स्वयं ही सबके आश्रय होनेके कारण अन्य किसी आश्रयसे रहित, २५ निरञ्जनः—वासना और आसक्तिरूपी मलसे शून्य, तमोगुणरहित,
उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९७
२६ निरालम्बः—आधारशून्य, स्वयं ही सबके आधार, २७ निर्लेपः—जलसे कमलकी भाँति राग-द्वेषादि दोषोंसे अलिप्त, २८ निरवग्रहः—विघ्न-बाधाओंसे रहित ॥ १२६ ॥
निर्गुणो निष्कलोजनन्तोऽभयोऽचिन्त्योऽचलोऽञ्चितः ।
अतीन्द्रियोऽमितोऽपारो नित्योऽनीहोऽव्ययोऽक्षयः ॥ १२७ ॥
२९ निर्गुणः—सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे रहित परमात्मा, ३० निष्कलः—अवयवशून्य ब्रह्म, ३१ अनन्तः—असीम एवं अविनाशी परमेश्वर, ३२ अभयः—काल आदिके भयसे रहित, ३३ अचिन्त्यः—मनकी गतिसे परे होनेके कारण चिन्तनमें न आनेवाले, ३४ अचलः—अपनी मर्यादासे विचलित न होनेवाले, ३५ अञ्चितः—सबके द्वारा पूजित, ३६ अतीन्द्रियः—इन्द्रियोंके अगोचर, ३७ अमितः—माप या सीमासे रहित, महान्, अपरिच्छिन्न, ३८ अपारः—पाररहित, अनन्त, ३९ नित्यः—सदा रहनेवाले, सनातन, ४० अनीहः—चेष्टारहित ब्रह्म, ४१ अव्ययः—विनाशरहित, ४२ अक्षयः—कभी क्षीण न होनेवाले ॥ १२७ ॥
सर्वज्ञः सर्वगः सर्वः सर्वदः सर्वभावनः ।
सर्वशास्ता सर्वसाक्षी पूज्यः सर्वस्य सर्वदृक् ॥ १२८ ॥
४३ सर्वज्ञः—परोक्ष और अपरोक्ष सबके ज्ञाता, ४४ सर्वगः—कारणरूपसे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, ४५ सर्वः—सर्वरूप, ४६ सर्वदः—भक्तोंको सर्वस्व देनेवाले, ४७ सर्वभावनः—सबको उत्पन्न करनेवाले, ४८ सर्वशास्ता—सबके शासक, ४९ सर्वसाक्षी—भूत, भविष्य और वर्तमान—सबपर दृष्टि रखनेवाले, ५० सर्वस्य पूज्यः—सबके पूजनीय, ५१ सर्वदृक्—सबके द्रष्टा ॥ १२८ ॥
सर्वशक्तिः सर्वसारः सर्वात्मा सर्वतोमुखः ।
सर्ववासः सर्वरूपः सर्वादिः सर्वदुःखहा ॥ १२९ ॥
५२ सर्वशक्तिः—सब प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न, ५३ सर्वसारः—सबके बल, ५४ सर्वात्मा—सबके आत्मा, ५५ सर्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले, विराट्रूप, ५६ सर्ववासः—सम्पूर्ण विश्वके वासस्थान, ५७ सर्वरूपः—सब रूपोंमें स्वयं ही उपलब्ध होनेवाले, विश्वरूप, ५८ सर्वादिः—सबके आदि कारण, ५९ सर्वदुःखहा—सबके दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १२९ ॥
सर्वार्थः सर्वतोभद्रः सर्वकारणकारणम् ।
सर्वातिशयितः सर्वाध्यक्षः सर्वेश्वरेश्वरः ॥ १३० ॥
६० सर्वार्थः—समस्त पुरुषार्थरूप, ६१ सर्वतोभद्रः—सब ओरसे कल्याणरूप, ६२ सर्वकारणकारणम्—विश्वके कारणभूत प्रकृति आदिके भी कारण, ६३ सर्वातिशयितः—सबसे सब बातोंमें बढ़े हुए, ब्रह्मा और शिव आदिसे भी अधिक महिमावाले, ६४ सर्वाध्यक्षः—सबके साक्षी, सबके नियन्ता, ६५ सर्वेश्वरेश्वरः—सम्पूर्ण ईश्वरोंके भी ईश्वर, ब्रह्मादि देवताओंके भी नियामक ॥ १३० ॥
षड्विंशको महाविष्णुर्महागुह्यो महाविभुः ।
नित्योदितो नित्ययुक्तो नित्यानन्दः सनातनः ॥ १३१ ॥
६६ षड्विंशकः—पचीस<sup>१</sup> तत्त्वोंसे विलक्षण छब्बीसवाँ तत्त्व, पुरुषोत्तम, ६७ महाविष्णुः—सब देवताओंमें महान् सर्वव्यापी भगवान् विष्णु, ६८ महागुह्यः—परम गोपनीय तत्त्व, ६९ महाविभुः—प्राकृत आकाश आदि व्यापक तत्त्वोंसे भी महान् एवं व्यापक, ७० नित्योदितः—सूर्य आदिकी भाँति अस्त न होकर नित्य-निरन्तर उदित रहनेवाले, ७१ नित्ययुक्तः—चराचर प्राणियोंसे नित्य संयुक्त अथवा सदा योगमें स्थित रहनेवाले, ७२ नित्यानन्दः—नित्य आनन्दस्वरूप, ७३ सनातनः—सदा एकरस रहनेवाले ॥ १३१ ॥
मायापतिर्योगपतिः कैवल्यपतिरात्मभूः ।
जन्ममृत्युजरातीतः कालातीतो भवातिगः ॥ १३२ ॥
१. पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच इन्द्रियोंके विषय, मन, पाँच भूत, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा)—ये पचीस तत्त्व हैं। इनसे भिन्न सर्वज्ञ परमात्मा छब्बीसवाँ तत्त्व है। इसीलिये इसे 'षड्विंशक' कहा गया है।
६९८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण **********************************************************************
७४ मायापतिः—मायाके स्वामी, ७५ योगपतिः—योगपालक, योगेश्वर, ७६ कैवल्यपतिः—मोक्ष प्रदान करनेका अधिकार रखनेवाले, मुक्तिके स्वामी, ७७ आत्मभूः—स्वतः प्रकट होनेवाले, स्वयम्भू, ७८ जन्ममृत्युजरातीतः—जन्म, मरण और वृद्धावस्था आदि शरीरके धर्मोंसे रहित, ७९ कालातीतः—कालके वशमें न आनेवाले, ८० भवातिगः—भवबन्धनसे अतीत ॥ १३२ ॥
पूर्णः सत्यः शुद्धबुद्धस्वरूपो नित्यचिन्मयः ।
योगप्रियो योगगम्यो भवबन्धैकमोचकः ॥ १३३ ॥
८१ पूर्णः—समस्त ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य और गुणोंसे परिपूर्ण, ८२ सत्यः—भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें सदा समानरूपसे रहनेवाले, सत्यस्वरूप, ८३ शुद्धबुद्धस्वरूपः—स्वाभाविक शुद्ध और ज्ञानसे सम्पन्न, प्रकृतिके संसर्गसे रहित बोधस्वरूप परमात्मा, ८४ नित्यचिन्मयः—नित्य चैतन्यस्वरूप, ८५ योगप्रियः—चित्तवृत्तियोंके निरोधरूप योगके प्रेमी, ८६ योगगम्यः—ध्यान अथवा समाधिके द्वारा अनुभवमें आनेयोग्य, ८७ भवबन्धैकमोचकः—संसार-बन्धनसे एकमात्र छुड़ानेवाले ॥ १३३ ॥
पुराणपुरुषः प्रत्यक्चैतन्यः पुरुषोत्तमः ।
वेदान्तवेद्यो दुर्ज्ञेयस्तापत्रयविवर्जितः ॥ १३४ ॥
८८ पुराणपुरुषः—ब्रह्मा आदि पुरुषोंकी अपेक्षा भी प्राचीन, आदि पुरुष, ८९ प्रत्यक्चैतन्यः—अन्तर्यामी चेतन, ९० पुरुषोत्तमः—क्षर और अक्षर पुरुषोंसे श्रेष्ठ, ९१ वेदान्तवेद्यः—उपनिषदोंके द्वारा जाननेयोग्य, ९२ दुर्ज्ञेयः—कठिनतासे अनुभवमें आनेवाले, ९३ तापत्रयविवर्जितः—आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों तापोंसे रहित ॥ १३४ ॥
ब्रह्मविद्याश्रयोऽनघः स्वप्रकाशः स्वयम्प्रभुः ।
सर्वोपाय उदासीनः प्रणवः सर्वतः समः ॥ १३५ ॥
९४ ब्रह्मविद्याश्रयः—ब्रह्मविद्याके आश्रय, उसके द्वारा जाननेमें आनेवाले ब्रह्म, ९५ अनघः—पापरहित, शुद्ध, ९६ स्वप्रकाशः—अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले, ९७ स्वयम्प्रभुः—दूसरेकी सामर्थ्यकी अपेक्षासे रहित, स्वयं समर्थ, ९८ सर्वोपायः—सर्वसाधनरूप, ९९ उदासीनः—रागद्वेषसे ऊपर उठे हुए, पक्षपातरहित, १०० प्रणवः—ओंकाररूप शब्दब्रह्म, १०१ सर्वतः समः—सब ओर समान दृष्टि रखनेवाले ॥ १३५ ॥
सर्वानवद्यो दुष्प्राप्यस्तुरीयस्तमसः परः ।
कूटस्थः सर्वसंश्लिष्टो वाङ्मनोगोचरातिगः ॥ १३६ ॥
१०२ सर्वानवद्यः—सबकी प्रशंसाके पात्र, सबके द्वारा स्तुत्य, १०३ दुष्प्राप्यः—अनन्य चित्तसे भजन न करनेवालोंके लिये दुर्लभ, १०४ तुरीयः—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत चतुर्थावस्थास्वरूप, १०५ तमसः परः—तमोगुण एवं अज्ञानसे परे, १०६ कूटस्थः—निहाईकी भाँति अविचल रूपसे स्थिर रहनेवाला निर्विकार आत्मा, १०७ सर्वसंश्लिष्टः—सर्वत्र व्यापक होनेके कारण सबसे संयुक्त, १०८ वाङ्मनोगोचरातिगः—वाणी और मनकी पहुँचसे बाहर ॥ १३६ ॥
संकर्षणः सर्वहरः कालः सर्वभयंकरः ।
अनुल्लङ्घ्यश्चित्रगतिमर्हारुद्रो दुरासदः ॥ १३७ ॥
१०९ संकर्षणः—कालरूपसे सबको अपनी ओर खींचनेवाले, चतुर्व्यूहमें सङ्कर्षणरूप, शेषावतार बलराम, ११० सर्वहरः—प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले, १११ कालः—युग, वर्ष, मास, पक्ष आदि रूपसे सम्पूर्ण विश्वको अपना ग्रास बनानेवाले, कालपदवाच्य यमराज, ११२ सर्वभयंकरः—मृत्युरूपसे सबको भय पहुँचानेवाले, ११३ अनुल्लङ्घ्यः—काल आदि भी जिनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकते, ऐसे सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर, ११४ चित्रगतिः—विचित्र लीलाएँ करनेवाले लीलापुरुषोत्तम अथवा विचित्र गतिसे चलनेवाले, ११५ महारुद्रः—महान् दुःखोंको दूर भगानेवाले, ग्यारह रुद्रोंकी अपेक्षा भी महान् महेश्वररूप, ११६ दुरासदः—बड़े-बड़े दानवोंके लिये भी जिनका सामना करना कठिन है, ऐसे दुर्धर्ष वीर ॥ १३७ ॥
उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ६९९
मूलप्रकृतिरानन्दः प्रद्युम्नो विश्वमोहनः।
महामायो विश्वबीजं परशक्तिः सुखैकभूः॥ १३८॥
११७ मूलप्रकृतिः—सम्पूर्ण विश्वके महाकारण-स्वरूप, ११८ आनन्दः—सब ओरसे सुख प्रदान करनेवाले, आनन्दस्वरूप, ११९ प्रद्युम्नः—महान् बलवाले कामदेव, चतुर्व्यूहमें प्रद्युम्नस्वरूप, १२० विश्वमोहनः—अपने अलौकिक रूपलावण्यसे सम्पूर्ण विश्वको मोहित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण, १२१ महामायः—मायावियोंपर भी माया डालनेवाले महान् मायावी, १२२ विश्वबीजम्—जगत्की उत्पत्तिके आदि कारण, १२३ परशक्तिः—महान् सामर्थ्यशाली, १२४ सुखैकभूः—सुखके एकमात्र उत्पत्ति-स्थान ॥ १३८ ॥
सर्वकाम्योऽनन्तलीलः सर्वभूतवशंकरः।
अनिरुद्धः सर्वजीवो हृषीकेशो मनःपतिः॥ १३९॥
१२५ सर्वकाम्यः—सबकी कामनाके विषय, १२६ अनन्तलीलः—जिनकी लीलाओंका अन्त नहीं है—ऐसे भगवान्, १२७ सर्वभूतवशंकरः—सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने वशमें करनेवाले, १२८ अनिरुद्धः—संग्राममें जिनकी गतिको कोई रोक नहीं सकता—ऐसे पराक्रमी, शूरवीर, चतुर्व्यूहमें अनिरुद्धस्वरूप, १२९ सर्वजीवः—सबको जीवन प्रदान करनेवाले, सबके आत्मा, १३० हृषीकेशः—इन्द्रियोंके स्वामी, १३१ मनःपतिः—मनके स्वामी, हृदयेश्वर ॥ १३९ ॥
निरुपाधिप्रियो हंसोऽक्षरः सर्वनियोजकः।
ब्रह्मप्राणेश्वरः सर्वभूतभृद् देहनायकः॥ १४०॥
१३२ निरुपाधिप्रियः—जिनकी बुद्धिसे उपाधिकृत भेदभ्रम दूर हो गये हैं, उन ज्ञानी परमहंसोंके भी प्रियतम, १३३ हंसः—हंसरूप धारण करके सनकादिकोंको उपदेश करनेवाले, १३४ अक्षरः—कभी नष्ट न होनेवाले, आत्मा, १३५ सर्वनियोजकः—सबको विभिन्न कर्मोंमें लगानेवाले, सबके प्रेरक, सबके स्वामी, १३६ ब्रह्मप्राणेश्वरः—ब्रह्माजीके प्राणोंके स्वामी, १३७ सर्वभूतभृत्—सम्पूर्ण भूतोंका भरण-पोषण करनेवाले, १३८ देहनायकः— शरीरका सञ्चालन करनेवाले ॥ १४० ॥
क्षेत्रज्ञः प्रकृतिस्वामी पुरुषो विश्वसूत्रधृक्।
अन्तर्यामी त्रिधामान्तःसाक्षी निर्गुण ईश्वरः॥ १४१॥
१३९ क्षेत्रज्ञः—सम्पूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) में स्थित होकर उनका ज्ञान रखनेवाले, १४० प्रकृतिस्वामी—जगत्की कारणभूता प्रकृतिके स्वामी, १४१ पुरुषः—समस्त शरीरोंमें शयन करनेवाले अन्तर्यामी, १४२ विश्वसूत्रधृक्—संसाररूपी नाटकके सूत्रधार, १४३ अन्तर्यामी—अन्तःकरणमें विराजमान परमेश्वर, १४४ त्रिधामा—भूः-भुवः-स्वःरूप तीन धामवाले, त्रिलोकीमें व्याप्त, १४५ अन्तःसाक्षी—अन्तःकरणके द्रष्टा, १४६ निर्गुणः—गुणातीत, १४७ ईश्वरः—सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न ॥ १४१॥
योगिगम्यः पद्मनाभः शेषशायी श्रियः पतिः।
श्रीशिवोपास्यपादाब्जो नित्यश्रीः श्रीनिकेतनः॥ १४२॥
१४८ योगिगम्यः—योगियोंके अनुभवमें आनेवाले, १४९ पद्मनाभः—अपनी नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले, १५० शेषशायी—शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले, १५१ श्रियःपतिः—लक्ष्मीके स्वामी, १५२ श्रीशिवोपास्यपादाब्जः—पार्वतीसहित भगवान् शिव जिनके चरणकमलोंकी उपासना करते हैं, वे भगवान् विष्णु, १५३ नित्यश्रीः—कभी विलग न होनेवाली लक्ष्मीकी शोभासे युक्त, १५४ श्रीनिकेतनः—भगवती लक्ष्मीके हृदय-मन्दिरमें निवास करनेवाले ॥ १४२ ॥
नित्यवक्षःस्थलस्थश्रीः श्रीनिधिः श्रीधरो हरिः।
वश्यश्रीर्निश्छलश्रीदो विष्णुः क्षीराब्धिमन्दिरः॥ १४३॥
१५५ नित्यवक्षःस्थलस्थश्रीः—जिनके वक्षःस्थलमें लक्ष्मी सदा निवास करती हैं—ऐसे भगवान् विष्णु, १५६ श्रीनिधिः—शोभाके भण्डार, सब प्रकारकी सम्पत्तियोंके आधार, १५७ श्रीधरः—जगज्जननी श्रीको हृदयमें धारण करनेवाले, १५८ हरिः—पापहारी, भक्तोंका मन हर लेनेवाले—१५९ वश्यश्रीः—लक्ष्मीको सदा अपने वशमें रखनेवाले,
७०० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ************************************************************************************************************
१६० निश्चलश्रीदः—स्थिर सम्पत्ति प्रदान करनेवाले, १६१ विष्णुः—सर्वत्र व्यापक, १६२ क्षीराब्धिमन्दिरः—क्षीरसागरको अपना निवासस्थान बनानेवाले ॥ १४३ ॥
कौस्तुभोद्भासितोरस्को माधवो जगदार्तिहा।
श्रीवत्सवक्षा निःसीमकल्याणगुणभाजनम् ॥ १४४ ॥
१६३ कौस्तुभोद्भासितोरस्कः—कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हृदयवाले, १६४ माधवः—जगन्माता लक्ष्मीके स्वामी अथवा मधुवंशमें प्रादुर्भूत भगवान् श्रीकृष्ण, १६५ जगदार्तिहा—समस्त संसारकी पीड़ा दूर करनेवाले, १६६ श्रीवत्सवक्षाः—वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले, १६७ निःसीमकल्याणगुणभाजनम्—सीमारहित कल्याणमय गुणोंके आधार ॥ १४४ ॥
पीताम्बरो जगन्नाथो जगत्त्राता जगत्पिता।
जगद्वन्धुर्जगत्स्रष्टा जगद्धाता जगन्निधिः ॥ १४५ ॥
१६८ पीताम्बरः—पीत वस्त्रधारी, १६९ जगन्नाथः—जगत्के स्वामी, १७० जगत्त्राता—सम्पूर्ण विश्वके रक्षक, १७१ जगत्पिता—समस्त संसारके जन्मदाता, १७२ जगद्वन्धुः—बन्धुकी भाँति जगत्के जीवोंकी सहायता करनेवाले, १७३ जगत्स्रष्टा—जगत्की सृष्टि करनेवाले ब्रह्मारूप, १७४ जगद्धाता—अखिल विश्वका धारण-पोषण करनेवाले विष्णुरूप, १७५ जगन्निधिः—प्रलयके समय सम्पूर्ण जगत्को बीजरूपमें धारण करनेवाले ॥ १४५ ॥
जगदेकस्फुरद्वीर्यो नाहंवादी जगन्मयः।
सर्वाश्चर्यमयः सर्वसिद्धार्थः सर्वरञ्जितः ॥ १४६ ॥
१७६ जगदेकस्फुरद्वीर्यः—संसारमें एकमात्र विख्यात पराक्रमी, १७७ नाहंवादी—अहङ्काररहित, १७८ जगन्मयः—विश्वरूप, १७९ सर्वाश्चर्यमयः—जिनका सब कुछ आश्चर्यमय है—ऐसे अथवा सम्पूर्ण आश्चर्योंसे युक्त, १८० सर्वसिद्धार्थः—पूर्णकाम होनेके कारण जिनके सभी प्रयोजन सदा सिद्ध हैं—ऐसे परमेश्वर, १८१ सर्वरञ्जितः—देवता, दानव और मानव आदि सभी प्राणी जिन्हें रिझानेकी चेष्टामें लगे रहते हैं—ऐसे भगवान् ॥ १४६ ॥
सर्वामोघोद्यमो ब्रह्मरुद्राद्युत्कृष्टचेतनः।
शम्भोः पितामहो ब्रह्मपिता शक्राद्यधीश्वरः ॥ १४७॥
१८२ सर्वामोघोद्यमः—जिनके सम्पूर्ण उद्योग सफल होते हैं, कभी व्यर्थ नहीं जाते—ऐसे भगवान् विष्णु, १८३ ब्रह्मरुद्राद्युत्कृष्टचेतनः—ब्रह्मा और रुद्र आदिसे उत्कृष्ट चेतनावाले, १८४ शम्भोः पितामहः—शङ्करजीके पिता भगवान् ब्रह्माको भी जन्म देनेवाले श्रीविष्णु, १८५ ब्रह्मपिता—ब्रह्माजीको उत्पन्न करनेवाले, १८६ शक्राद्यधीश्वरः—इन्द्र आदि देवताओंके स्वामी ॥ १४७ ॥
सर्वदेवप्रियः सर्वदेवमूर्तिरनुत्तमः।
सर्वदेवैकशरणं सर्वदेवैकदेवता ॥ १४८ ॥
१८७ सर्वदेवप्रियः—सम्पूर्ण देवताओंके प्रिय, १८८ सर्वदेवमूर्तिः—समस्त देवरूप, १८९ अनुत्तमः—जिनसे उत्तम दूसरा कोई नहीं है, सर्वश्रेष्ठ, १९० सर्वदेवैकशरणम्—समस्त देवताओंके एकमात्र आश्रय, १९१ सर्वदेवैकदेवता—सम्पूर्ण देवताओंके एकमात्र आराध्य देव ॥ १४८ ॥
यज्ञभुग्यज्ञफलदो यज्ञेशो यज्ञभावनः।
यज्ञत्राता यज्ञपुमान्वनमाली द्विजप्रियः ॥ १४९ ॥
१९२ यज्ञभुक्—समस्त यज्ञोंके भोक्ता, १९३ यज्ञफलदः—सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाले, १९४ यज्ञेशः—यज्ञोंके स्वामी, १९५ यज्ञभावनः—अपनी वेदमयी वाणीके द्वारा यज्ञोंको प्रकट करनेवाले, १९६ यज्ञत्राता—यज्ञविरोधी असुरोंका वध करके यज्ञोंकी रक्षा करनेवाले, १९७ यज्ञपुमान्—यज्ञपुरुष, यज्ञाधिष्ठाता देवता, १९८ वनमाली—परम मनोहर वनमाला धारण करनेवाले, १९९ द्विजप्रियः—ब्राह्मणोंके प्रेमी और प्रियतम ॥ १४९ ॥
द्विजैकमानदो विप्रकुलदेवोऽसुरान्तकः।
सर्वदुष्टान्तकृत्सर्वसज्जनानन्यपालकः ॥ १५० ॥
२०० द्विजैकमानदः—ब्राह्मणोंको एकमात्र सम्मान देनेवाले, २०१ विप्रकुलदेवः— ब्राह्मणवंशको अपना आराध्यदेव माननेवाले, २०२
उत्तराखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०१
असुरान्तकः—संसारमें अशान्ति फैलानेवाले असुरोंके प्राणहन्ता, २०३ सर्वदुष्टान्तकृत्—समस्त दुष्टोंका अन्त करनेवाले, २०४ सर्वसज्जनानन्यपालकः—सम्पूर्ण साधु पुरुषोंके एकमात्र पालक ॥ १५० ॥
सप्तलोकैकजठरः सप्तलोकैकमण्डनः ।
सृष्टिस्थित्यन्तकृच्चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ॥ १५१ ॥
२०५ सप्तलोकैकजठरः—भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—इन सातों लोकोंको अपने एकमात्र उदरमें स्थापित करनेवाले, २०६ सप्तलोकैकमण्डनः—सातों लोकोंके एकमात्र शृङ्गार—अपनी ही शोभासे समस्त लोकोंको विभूषित करनेवाले, २०७ सृष्टिस्थित्यन्तकृत्—संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले, २०८ चक्री—सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले, २०९ शार्ङ्गधन्वा—शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले, २१० गदाधरः—कौमोदकी नामकी गदा धारण करनेवाले ॥ १५१ ॥
शङ्खभृन्नन्दकी पद्मपाणिर्गरुडवाहनः ।
अनिर्देश्यवपुः सर्वपूज्यस्त्रैलोक्यपावनः ॥ १५२ ॥
२११ शङ्खभृत्—एक हाथमें पाञ्चजन्य नामक शङ्ख लिये रहनेवाले, २१२ नन्दकी—नन्दक नामक खड्ग (तलवार) बाँधनेवाले, २१३ पद्मपाणिः—हाथमें कमल धारण करनेवाले, २१४ गरुडवाहनः—पक्षियोंके राजा विनतानन्दन गरुड़पर सवारी करनेवाले, २१५ अनिर्देश्यवपुः—जिसके दिव्यस्वरूपका किसी प्रकार भी वर्णन या संकेत न किया जा सके—ऐसे अनिर्वचनीय शरीरवाले, २१६ सर्वपूज्यः—देवता, दानव और मनुष्य आदि—सबके पूजनीय, २१७ त्रैलोक्यपावनः—अपने दर्शन और स्पर्श आदिसे त्रिभुवनको पावन बनानेवाले ॥ १५२ ॥
अनन्तकीर्तिर्निःसीमपौरुषः सर्वमङ्गलैः ।
सूर्यकोटिप्रतीकाशो यमकोटिदुरासदः ॥ १५३ ॥
२१८ अनन्तकीर्तिः—शेष और शारदा भी जिनकी कीर्तिका पार न पा सकें—ऐसे अपार सुयशवाले, २१९ निःसीमपौरुषः—असीम पुरुषार्थवाले, अमितपराक्रमी, २२० सर्वमङ्गलः—सबका मङ्गल करनेवाले अथवा सबके लिये मङ्गलरूप, २२१ सूर्यकोटिप्रतीकाशः—करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी, २२२ यमकोटिदुरासदः—करोड़ों यमराजोंके लिये भी दुर्धर्ष ॥ १५३ ॥
कन्दर्पकोटिलावण्यो दुर्गाकोट्यरिमर्दनः ।
समुद्रकोटिगम्भीरस्तीर्थकोटिसमाह्वयः ॥ १५४ ॥
२२३ कन्दर्पकोटिलावण्यः—करोड़ों कामदेवोंके समान मनोहर कान्तिवाले, २२४ दुर्गाकोट्यरिमर्दनः—करोड़ों दुर्गाओंके समान शत्रुओंको रौंद डालनेवाले, २२५ समुद्रकोटिगम्भीरः—करोड़ों समुद्रोंके समान गम्भीर, २२६ तीर्थकोटिसमाह्वयः—करोड़ों तीर्थोंके समान पावन नामवाले ॥ १५४ ॥
ब्रह्मकोटिजगत्स्रष्टा वायुकोटिमहाबलः ।
कोटीन्दुजगदानन्दी शम्भुकोटिमहेश्वरः ॥ १५५ ॥
२२७ ब्रह्मकोटिजगत्स्रष्टा—करोड़ों ब्रह्माओंके समान संसारकी सृष्टि करनेवाले, २२८ वायुकोटिमहाबलः—करोड़ों वायुओंके तुल्य महाबली, २२९ कोटीन्दुजगदानन्दी—करोड़ों चन्द्रमाओंकी भाँति जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले, २३० शम्भुकोटिमहेश्वरः—करोड़ों शङ्करोंके समान महेश्वर (महान् ऐश्वर्यशाली) ॥ १५५ ॥
कुबेरकोटिलक्ष्मीवाञ्छक्रकोटिविलासवान् ।
हिमवत्कोटिनिष्कम्पः कोटिब्रह्माण्डविग्रहः ॥ १५६ ॥
२३१ कुबेरकोटिलक्ष्मीवान्—करोड़ों कुबेरोंके समान सम्पत्तिशाली, २३२ शक्रकोटिविलासवान्—करोड़ों इन्द्रोंके सदृश भोग-विलासके साधनोंसे परिपूर्ण, २३३ हिमवत्कोटिनिष्कम्पः—करोड़ों हिमालयोंकी भाँति अचल, २३४ कोटिब्रह्माण्डविग्रहः—अपने श्रीविग्रहमें कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेवाले, महाविराड्रूप ॥ १५६ ॥
कोट्यश्वमेधपापघ्नो यज्ञकोटिसमार्चनः ।
सुधाकोटिस्वास्थ्यहेतुः कामधुक्कोटिकामदः ॥ १५७ ॥
२३५ कोट्यश्वमेधपापघ्नः—करोड़ों अश्वमेध
७०२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
यज्ञोंके समान पापनाशक, २३६ यज्ञकोटिसमर्चनः—करोड़ों यज्ञोंके तुल्य पूजन-सामग्रीसे पूजित होनेवाले, २३७ सुधाकोटिस्वास्थ्यहेतुः—कोटि-कोटि अमृतके तुल्य स्वास्थ्य-रक्षाके साधन, २३८ कामधुक्कोटिकामदः—करोड़ों कामधेनुओंके समान मनोरथ पूर्ण करनेवाले ॥ १५७ ॥
ब्रह्मविद्याकोटिरूपः शिपिविष्टः शुचिश्रवाः ।
विश्वम्भरस्तीर्थपादः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ १५८ ॥
२३९ ब्रह्मविद्याकोटिरूपः—करोड़ों ब्रह्मविद्याओंके तुल्य ज्ञानस्वरूप, २४० शिपिविष्टः—सूर्य-किरणोंमें स्थित रहनेवाले, २४१ शुचिश्रवाः—पवित्र यशवाले, २४२ विश्वम्भरः—सम्पूर्ण विश्वका भरण-पोषण करनेवाले, २४३ तीर्थपादः—तीर्थोंकी भाँति पवित्र चरणोंवाले, अथवा अपने चरणोंमें ही समस्त तीर्थोंको धारण करनेवाले, २४४ पुण्यश्रवणकीर्तनः—जिनके नाम, गुण, महिमा तथा स्वरूप आदिका श्रवण और कीर्तन परम पवित्र एवं पावन है—ऐसे भगवान् ॥ १५८ ॥
आदिदेवो जगज्जैत्रो मुकुन्दः कालनेमिहा ।
वैकुण्ठोऽनन्तमाहात्म्यो महायोगेश्वरोत्सवः ॥ १५९ ॥
२४५ आदिदेवः—आदि देवता, सबके आदि कारण एवं प्रकाशमान, २४६ जगज्जैत्रः—विश्वविजयी, २४७ मुकुन्दः—मोक्षदाता, २४८ कालनेमिहा—कालनेमि नामक दैत्यका वध करनेवाले, २४९ वैकुण्ठः—परमधामस्वरूप, २५० अनन्तमाहात्म्यः—जिनकी महिमाका अन्त नहीं है—ऐसे महामहिम परमेश्वर, २५१ महायोगेश्वरोत्सवः—बड़े-बड़े योगेश्वरोंके लिये जिनका दर्शन उत्सवरूप है—ऐसे भगवान् ॥ १५९ ॥
नित्यतृप्तो लसद्भावो निःशङ्को नरकान्तकः ।
दीनानाथैकशरणं विश्वैकव्यसनापहः ॥ १६० ॥
२५२ नित्यतृप्तः—अपने-आपमें ही सदा तृप्त रहनेवाले, २५३ लसद्भावः—सुन्दर स्वभाववाले, २५४ निःशङ्कः—अद्वितीय होनेके कारण भय-शङ्कासे रहित, २५५ नरकान्तकः—नरकके भयका नाश अथवा नरकासुरका वध करनेवाले, २५६ दीनानाथैकशरणम्—दीनों और अनाथोंको एकमात्र शरण देनेवाले, २५७ विश्वैकव्यसनापहः—संसारके एकमात्र संकट हरनेवाले ॥ १६० ॥
जगत्कृपाक्षमो नित्यं कृपालुः सजनाश्रयः ।
योगेश्वरः सदोदीर्णो वृद्धिक्षयविवर्जितः ॥ १६१ ॥
२५८ जगत्कृपाक्षमः—सम्पूर्ण विश्वपर कृपा करनेमें समर्थ, २५९ नित्यं कृपालुः—सदा स्वभावसे ही कृपा करनेवाले, २६० सजनाश्रयः—सत्पुरुषोंके शरणदाता, २६१ योगेश्वरः—सम्पूर्ण योगों तथा उनसे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंके स्वामी, २६२ सदोदीर्णः—सदा अभ्युदयशील, नित्य उदार, सदा सबसे श्रेष्ठ, २६३ वृद्धिक्षयविवर्जितः—वृद्धि और ह्रासरूप विकारसे रहित ॥ १६१ ॥
अधोक्षजो विश्वरेताः प्रजापतिशताधिपः ।
शक्रब्रह्मर्चितपदः शम्भुब्रह्मोर्ध्वधामगः ॥ १६२ ॥
२६४ अधोक्षजः—इन्द्रियोंके विषयोंसे ऊपर उठे हुए, अपने स्वरूपसे क्षीण न होनेवाले, २६५ विश्वरेताः—सम्पूर्ण विश्व जिनके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, वे परमेश्वर, २६६ प्रजापतिशताधिपः—सैकड़ों प्रजापतियोंके स्वामी, २६७ शक्रब्रह्मर्चितपदः—इन्द्र और ब्रह्माजीके द्वारा पूजित चरणोंवाले, २६८ शम्भुब्रह्मोर्ध्वधामगः—भगवान् शङ्कर और ब्रह्माजीके धामसे भी ऊपर विराजमान वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाले ॥ १६२ ॥
सूर्यसोमेक्षणो विश्वभोक्ता सर्वस्य पारगः ।
जगत्सेतुर्धर्मसेतुधरो विश्वधुरन्धरः ॥ १६३ ॥
२६९ सूर्यसोमेक्षणः—सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रवाले, २७० विश्वभोक्ता—विश्वका पालन करनेवाले, २७१ सर्वस्य पारगः—सबसे परे विराजमान, २७२ जगत्सेतुः—संसार-सागरसे पार होनेके लिये सेतुरूप, २७३ धर्मसेतुधरः—धर्म-मर्यादाका पालन करनेवाले, २७४ विश्वधुरन्धरः—शेषनागके रूपसे समस्त विश्वका भार वहन करनेवाले ॥ १६३ ॥
उत्तरखण्ड ]
*** नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन *** ७०३
निर्ममोऽखिललोकेशो निःसङ्गोऽद्भुतभोगवान् ।
वश्यमायो वश्यविश्वो विष्वक्सेनः सुरोत्तमः ॥ १६४ ॥
२७५ निर्ममः—आसक्तिमूलक ममतासे रहित, २७६ अखिललोकेशः—सम्पूर्ण लोकोंका शासन करनेवाले, २७७ निःसङ्गः—आसक्तिरहित, २७८ अद्भुतभोगवान्—आश्चर्यजनक भोगसामग्रीसे सम्पन्न, २७९ वश्यमायः—मायाको अपने वशमें रखनेवाले, २८० वश्यविश्वः—समस्त जगत्को अपने अधीन रखनेवाले, २८१ विष्वक्सेनः—युद्धके लिये की हुई तैयारीमात्रसे ही दैत्यसेनाको तितर-बितर कर डालनेवाले, २८२ सुरोत्तमः—समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ ॥ १६४ ॥
सर्वश्रेयःपतिर्दिव्योऽनर्घ्यभूषणभूषितः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यः सर्वदैत्येन्द्रदर्पहा ॥ १६५ ॥
२८३ सर्वश्रेयःपतिः—समस्त कल्याणोंके स्वामी, २८४ दिव्यः—लोकोत्तर सौन्दर्य-माधुर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न, २८५ अनर्घ्यभूषणभूषितः—अमूल्य आभूषणोंसे विभूषित, २८६ सर्वलक्षणलक्षण्यः—समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त, २८७ सर्वदैत्येन्द्रदर्पहा—समस्त दैत्यपतियोंका दर्प दलन करनेवाले ॥ १६५ ॥
समस्तदेवसर्वस्वं सर्वदैवतनायकः ।
समस्तदेवकवचं सर्वदेवशिरोमणिः ॥ १६६ ॥
२८८ समस्तदेवसर्वस्वम्—सम्पूर्ण देवताओंके सर्वस्व, २८९ सर्वदैवतनायकः—समस्त देवताओंके नेता, २९० समस्तदेवकवचम्—सब देवताओंकी कवचके समान रक्षा करनेवाले, २९१ सर्वदेवशिरोमणिः—सम्पूर्ण देवताओंके शिरोमणि ॥ १६६ ॥
समस्तदेवतादुर्गः प्रपन्नाशनिपञ्जरः ।
समस्तभयहन्नामा भगवान् विष्टरश्रवाः ॥ १६७ ॥
२९२ समस्तदेवतादुर्गः—मजबूत किलेके समान समस्त देवताओंकी रक्षा करनेवाले, २९३ प्रपन्नाशनिपञ्जरः—शरणागतोंकी रक्षाके लिये वज्रमय पिंजड़ेके समान, २९४ समस्तभयहन्नामा—जिनका नाम सब प्रकारके भयोंको दूर करनेवाला है—ऐसे विष्णु, २९५ भगवान्—पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यसे सम्पन्न, २९६ विष्टरश्रवाः—कुशाकी मुष्टिके समान कानोंवाले ॥ १६७ ॥
विभुः सर्वहितोदर्कः हतारिः स्वर्गतिप्रदः ।
सर्वदैवतजीवेशो ब्राह्मणादिनियोजकः ॥ १६८ ॥
२९७ विभुः—सर्वत्र व्यापक, २९८ सर्वहितोदर्कः—सबके लिये हितकर भविष्यका निर्माण करनेवाले, २९९ हतारिः—जिनके शत्रु नष्ट हो चुके हैं, शत्रुहीन, ३०० स्वर्गतिप्रदः—स्वर्गीय—उच्चगति प्रदान करनेवाले, ३०१ सर्वदैवतजीवेशः—समस्त देवताओंके जीवनके स्वामी, ३०२ ब्राह्मणादिनियोजकः—ब्राह्मण आदि वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें नियुक्त करनेवाले ॥ १६८ ॥
ब्रह्मशम्भुपराधायुर्ब्रह्मज्येष्ठः शिशुस्वराट् ।
विराड् भक्तपराधीनः स्तुत्यः स्तोत्रार्थसाधकः ॥ १६९ ॥
३०३ ब्रह्मशम्भुपराधायुः—ब्रह्मा और शिवकी अपेक्षा भी अनन्तगुनी आयुवाले, ३०४ ब्रह्मज्येष्ठः—ब्रह्माजीसे भी ज्येष्ठ, ३०५ शिशुस्वराट्—बालमुकुन्द-रूपसे शोभा पानेवाले, ३०६ विराद्—विशेष शोभा-सम्पन्न, अखिल ब्रह्माण्डमय विराट् रूपधारी भगवान्, ३०७ भक्तपराधीनः—प्रेमविवश होकर भक्तोंके अधीन रहनेवाले, ३०८ स्तुत्यः—स्तुति करने योग्य, ३०९ स्तोत्रार्थसाधकः—स्तोत्रमें कहे हुए अर्थको सिद्ध करनेवाले ॥ १६९ ॥
परार्थकर्ता कृतज्ञः स्वार्थकृत्यसदोज्झितः ।
सदानन्दः सदाभद्रः सदाशान्तः सदाशिवः ॥ १७० ॥
३१० परार्थकर्ता—परोपकार करनेवाले, ३११ कृतज्ञः—कर्तव्यका ज्ञान रखनेवाले, ३१२ स्वार्थकृत्यसदोज्झितः—स्वार्थसाधनके कार्योंसे सदा दूर रहनेवाले, ३१३ सदानन्दः—सदा आनन्दमग्न, सत्पुरुषोंको आनन्द प्रदान करनेवाले अथवा सत् एवं आनन्दस्वरूप, ३१४ सदाभद्रः—सर्वदा कल्याणरूप, ३१५ सदाशान्तः—नित्य शान्त, ३१६ सदाशिवः—निरन्तर कल्याण करनेवाले ॥ १७० ॥
सदाप्रियः सदातुष्टः सदापुष्टः सदार्चितः ।
सदापूतः पावनाग्र्यो वेदगुह्यो वृषाकपिः ॥ १७१ ॥
७०४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
३१७ सदाप्रियः — सर्वदा सबके प्रियतम, ३१८ सदातुष्टः — निरन्तर संतुष्ट रहनेवाले, ३१९ सदापुष्टः — क्षुधा-पिपासा तथा आधि-व्याधिसे रहित होनेके कारण सदा पुष्ट शरीरवाले, ३२० सदार्चितः — भक्तोंद्वारा निरन्तर पूजित, ३२१ सदापूतः — नित्य पवित्र, ३२२ पावनाग्र्यः — पवित्र करनेवालोंमें अग्रगण्य, ३२३ वेदगुह्यः — वेदोंके गूढ़ रहस्य, ३२४ वृषाकपिः — वृष—धर्मको अकम्पित (अविचल) रखनेवाले श्रीविष्णु ॥ १७१ ॥
सहस्रनामा त्रियुगश्चतुर्मूर्तिश्चतुर्भुजः ।
भूतभव्यभवन्नाथो महापुरुषपूर्वजः ॥ १७२ ॥
३२५ सहस्रनामा — हजारों नामवाले, ३२६ त्रियुगः — सत्ययुग, त्रेता और द्वापर नामक त्रियुग-स्वरूप, ३२७ चतुर्मूर्तिः — राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नरूप चार मूर्तियोंवाले, ३२८ चतुर्भुजः — चार भुजाओंवाले, ३२९ भूतभव्यभवन्नाथः — भूत, भविष्य और वर्तमान—सभी प्राणियोंके स्वामी, ३३० महापुरुषपूर्वजः — महापुरुष ब्रह्मा आदिके भी पूर्वज ॥ १७२ ॥
नारायणो मञ्जुकेशः सर्वयोगविनिःसृतः ।
वेदसारो यज्ञसारः सामसारस्तपोनिधिः ॥ १७३ ॥
३३१ नारायणः — जलमें शयन करनेवाले, ३३२ मञ्जुकेशः — मनोहर घुँघराले केशोंवाले, ३३३ सर्वयोगविनिःसृतः — नाना प्रकारके शास्त्रोक्त साधनोंसे जाननेमें आनेवाले, समस्त योग-साधनोंसे प्रकट होनेवाले, ३३४ वेदसारः — वेदोंके सारभूत तत्त्व, ब्रह्म, ३३५ यज्ञसारः — यज्ञोंके सारतत्त्व—यज्ञपुरुष विष्णु, ३३६ सामसारः — सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा गाये जानेवाले सारभूत परमात्मा, ३३७ तपोनिधिः — तपस्याके भंडार नर-नारायण-स्वरूप ॥ १७३ ॥
साध्यश्रेष्ठः पुराणर्षिनिष्ठा शान्तिः परायणम् ।
शिवस्त्रिशूलविध्वंसी श्रीकण्ठैकवरप्रदः ॥ १७४ ॥
३३८ साध्यश्रेष्ठः — साध्य देवताओंमें श्रेष्ठ, साधनसे प्राप्त होनेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ, ३३९ पुराणर्षिः — पुरातन ऋषि नारायण, ३४० निष्ठा — सबकी स्थितिके आधार—अधिष्ठानस्वरूप, ३४१ शान्तिः — परम शान्तिस्वरूप, ३४२ परायणम् — परम प्राप्यस्थान, ३४३ शिवः — कल्याणस्वरूप, ३४४ त्रिशूलविध्वंसी — आध्यात्मिक आदि त्रिविध शूलोंका नाश करनेवाले अथवा प्रलयकालमें महारुद्र-रूप होकर त्रिशूलसे समस्त विश्वका विध्वंस करनेवाले, ३४५ श्रीकण्ठैकवरप्रदः — भगवान् शङ्करके एकमात्र वरदाता ॥ १७४ ॥
नरः कृष्णो हरिर्धर्मनन्दनो धर्मजीवनः ।
आदिकर्ता सर्वसत्यः सर्वस्त्रीरत्नदर्पहा ॥ १७५ ॥
३४६ नरः — बदरिकाश्रममें तपस्या करनेवाले ऋषिश्रेष्ठ नर, नरके अवतार अर्जुन, ३४७ कृष्णः — भक्तोंके मनको आकृष्ट करनेवाले देवकीनन्दन श्रीकृष्ण, सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा, ३४८ हरिः — गजेन्द्रकी पुकार सुनकर तत्काल प्रकट हो ग्राहके प्राणोंका अपहरण करनेवाले भगवान् श्रीहरि, ३४९ धर्मनन्दनः — धर्मके यहाँ पुत्ररूपसे अवतीर्ण होनेवाले भगवान् नारायण अथवा धर्मराज युधिष्ठिरको आनन्दित करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण, ३५० धर्मजीवनः — पापाचारी असुरोंका मूलोच्छेद करके धर्मको जीवित रखनेवाले, ३५१ आदिकर्ता — जगत्के आदि कारण ब्रह्माजीको उत्पन्न करनेवाले, ३५२ सर्वसत्यः — पूर्णतः सत्यस्वरूप, ३५३ सर्वस्त्रीरत्नदर्पहा — जितेन्द्रिय होनेके कारण सम्पूर्ण सुन्दरी स्त्रियोंका अभिमान चूर्ण करनेवाले ॥ १७५ ॥
त्रिकालजितकन्दर्प उर्वशीसृङ्मुनीश्वरः ।
आद्यः कविर्हयग्रीवः सर्ववागीश्वरेश्वरः ॥ १७६ ॥
३५४ त्रिकालजितकन्दर्पः — भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें कामदेवको परास्त करनेवाले, ३५५ उर्वशीसृक् — उर्वशी अप्सराकी सृष्टि करनेवाले भगवान् नारायण, ३५६ मुनीश्वरः — तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ नर-नारायणस्वरूप, ३५७ आद्यः — आदिपुरुष विष्णु, ३५८ कविः — त्रिकालदर्शी विद्वान्, ३५९ हयग्रीवः — हयग्रीव नामक अवतार धारण करनेवाले
उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०५
भगवान्, ३६० सर्ववागीश्वरेश्वरः— ब्रह्मा आदि समस्त वागीश्वरोंके भी ईश्वर ॥ १७६ ॥ सर्वदेवमयो ब्रह्मगुरुर्वागीश्वरीपतिः । अनन्तविद्याप्रभवो मूलाविद्याविनाशकः ॥ १७७ ॥ ३६१ सर्वदेवमयः—सम्पूर्ण देवस्वरूप, ३६२ ब्रह्मगुरुः—ब्रह्माजीको वेदका उपदेश करनेवाले गुरु, ३६३ वागीश्वरीपतिः—वाणीकी अधीश्वरी सरस्वती देवीके स्वामी, ३६४ अनन्तविद्याप्रभवः—असंख्य विद्याओंकी उत्पत्तिके हेतु, ३६५ मूलाविद्या-विनाशकः— भव-बन्धनकी हेतुभूत मूल अविद्याका विनाश करनेवाले ॥ १७७ ॥ सर्वज्ञदो नमज्जाड्यनाशको मधुसूदनः । अनेकमन्त्रकोटीशः शब्दब्रह्मैकपारगः ॥ १७८ ॥ ३६६ सर्वज्ञदः—सर्वज्ञता प्रदान करनेवाले, ३६७ नमज्जाड्यनाशकः—प्रणाम करनेवाले भक्तोंकी जड़ताका नाश करनेवाले, ३६८ मधुसूदनः— मधु नामक दैत्यका वध करनेवाले, ३६९ अनेकमन्त्र-कोटीशः—अनेक करोड़ मन्त्रोंके स्वामी, ३७० शब्दब्रह्मैकपारगः— शब्दब्रह्म (वेद-वेदाङ्गों) के एकमात्र पारङ्गत विद्वान् ॥ १७८ ॥ आदिविद्वान् वेदकर्ता वेदात्मा श्रुतिसागरः । ब्रह्मार्थवेदाहरणः सर्वविज्ञानजन्मभूः ॥ १७९ ॥ ३७१ आदिविद्वान्—सर्वप्रथम वेदका ज्ञान प्रकाशित करनेवाले, ३७२ वेदकर्ता—अपने निःश्वासके साथ वेदोंको प्रकट करनेवाले, ३७३ वेदात्मा—वेदोंके सार तत्त्व—उनके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले सिद्धान्तभूत परमात्मा, ३७४ श्रुतिसागरः—वैदिक ज्ञानके समुद्र, ३७५ ब्रह्मार्थवेदाहरणः—मत्स्यरूप धारण करके ब्रह्माजीके लिये वेदोंको ले आनेवाले, ३७६ सर्वविज्ञानजन्मभूः—सब प्रकारके विज्ञानोंकी जन्मभूमि ॥ १७९ ॥ विद्याराजो ज्ञानमूर्तिर्ज्ञानसिन्धुरखण्डधीः । मत्स्यदेवो महाशृङ्गो जगद्बीजवहित्यधृक् ॥ १८० ॥ ३७७ विद्याराजः—समस्त विद्याओंके राजा, ३७८ ज्ञानमूर्तिः—ज्ञानस्वरूप, ३७९ ज्ञानसिन्धुः—ज्ञानके सागर, ३८० अखण्डधीः—संशय-विपर्यय आदिके द्वारा कभी खण्डित न होनेवाली बुद्धिसे युक्त, ३८१ मत्स्यदेवः—मत्स्यावतारधारी भगवान्, ३८२ महाशृङ्गः—मत्स्य-शरीरमें ही महान् शृङ्ग धारण करनेवाले, ३८३ जगद्बीजवहित्यधृक्—संसारकी बीजभूत ओषधियोंके सहित नौकाको अपने सींगमें बाँधकर धारण करनेवाले मत्स्य-भगवान् ॥ १८० ॥ लीलाव्याप्ताखिलाम्भोधिर्ऋग्वेदादिप्रवर्तकः । आदिकूर्मोऽखिलाधारस्तृणीकृतजगद्भरः ॥ १८१ ॥ ३८४ लीलाव्याप्ताखिलाम्भोधिः—अपने मत्स्य-शरीरसे लीलापूर्वक सम्पूर्ण समुद्रको आच्छादित कर लेनेवाले, ३८५ ऋग्वेदादिप्रवर्तकः—ऋग्वेद, यजुर्वेद आदिके प्रवर्तक, ३८६ आदिकूर्मः—सर्वप्रथम कच्छपरूपमें प्रकट होनेवाले भगवान्, ३८७ अखिलाधारः—अखिल ब्रह्माण्डके आधारभूत, ३८८ तृणीकृतजगद्भरः—समस्त जगत्के भारको तिनकेके समान समझनेवाले ॥ १८१ ॥ अमरीकृतदेवौघः पीयूषोत्पत्तिकारणम् । आत्माधारो धराधारो यज्ञाङ्गो धरणीधरः ॥ १८२ ॥ ३८९ अमरीकृतदेवौघः—अमृत पिलाकर देवसमुदायको अमर बनानेवाले, ३९० पीयूषोत्पत्ति-कारणम्—क्षीरसागरसे अमृतके निकालनेमें प्रधान कारण, ३९१ आत्माधारः—अन्य किसी आधारकी अपेक्षा न रखकर अपने ही आधारपर स्थित रहनेवाले, ३९२ धराधारः—पृथ्वीके आधार, ३९३ यज्ञाङ्गः—यज्ञमय शरीरवाले भगवान् वराह, ३९४ धरणीधरः—अपनी दाढ़ोंपर पृथ्वीको धारण करने-वाले ॥ १८२ ॥ हिरण्याक्षहरः पृथ्वीपतिः श्राद्धादिकल्पकः । समस्तपितृभीतिघ्नः समस्तपितृजीवनम् ॥ १८३ ॥ ३९५ हिरण्याक्षहरः—वराहरूपसे ही हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वध करनेवाले, ३९६ पृथ्वीपतिः—उक्त अवतारमें ही पृथ्वीको पत्नीरूपमें ग्रहण करनेवाले, अथवा पृथ्वीके पालक, ३९७ श्राद्धादिकल्पकः—पितरोंके लिये श्राद्ध आदिकी व्यवस्था करनेवाले, ३९८
७०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
समस्तपितृभीतिघ्नः—सम्पूर्ण पितरोंके भयका निवारण करनेवाले, ३९९ समस्तपितृजीवनम्—समस्त पितरोंके जीवनाधार ॥ १८३॥
हव्यकव्यैकभुग्धव्यकव्यैकफलदायकः ।
रोमान्तर्लीनजलधिः क्षोभिताशेषसागरः ॥ १८४ ॥
४०० हव्यकव्यैकभुक्—हव्य और कव्य (यज्ञ और श्राद्ध) के एकमात्र भोक्ता, ४०१ हव्यकव्यैकफलदायकः—यज्ञ और श्राद्धके एकमात्र फलदाता, ४०२ रोमान्तर्लीनजलधिः—अपने रोम-कूपोंमें समुद्रको लीन कर लेनेवाले महावराह, ४०३ क्षोभिताशेषसागरः—वराहरूपसे पृथ्वीकी खोज करते समय समस्त समुद्रको क्षुब्ध कर डालनेवाले ॥ १८४ ॥
महावराहो यज्ञघ्नध्वंसको याज्ञिकाश्रयः ।
श्रीनृसिंहो दिव्यसिंहः सर्वानिष्टार्थदुःखहा ॥ १८५ ॥
४०४ महावराहः—महान् वराहरूपधारी भगवान्, ४०५ यज्ञघ्नध्वंसकः—यज्ञमें विघ्न डालने-वाले असुरोंके विनाशक, ४०६ याज्ञिकाश्रयः— यज्ञ करनेवाले ऋत्विजोंके परम आश्रय, ४०७ श्रीनृसिंहः—अपने भक्त प्रह्लादकी बात सत्य करनेके लिये नृसिंह रूप धारण करनेवाले भगवान्, ४०८ दिव्यसिंहः—अलौकिक सिंहकी आकृति धारण करनेवाले, ४०९ सर्वानिष्टार्थदुःखहा—सब प्रकारकी अनिष्ट वस्तुओं और दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १८५ ॥
एकवीरोऽद्भुतबलो यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः ।
ब्रह्मादिदुःसहज्योतिर्युगान्ताग्न्यतिभीषणः ॥ १८६ ॥
४१० एकवीरः—अद्वितीय वीर, ४११ अद्भुतबलः—अद्भुत शक्तिशाली, ४१२ यन्त्रमन्त्रैकभञ्जनः—शत्रुके यन्त्र-मन्त्रोंको एकमात्र भंग करनेवाले, ४१३ ब्रह्मादिदुःसहज्योतिः—जिनके श्रीविग्रहकी ज्योति ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुःसह है, ऐसे नृसिंह भगवान्, ४१४ युगान्ताग्न्यतिभीषणः—प्रलयकालीन अग्निके समान अत्यन्त भयङ्कर ॥ १८६ ॥
कोटिवज्राधिकनखो जगद्दुष्प्रेक्ष्यमूर्तिधृक् ।
मातृचक्रप्रमथनो महामातृगणेश्वरः ॥ १८७ ॥
४१५ कोटिवज्राधिकनखः—करोड़ों वज्रोंसे भी अधिक तीक्ष्ण नखोंवाले, ४१६ जगद्दुष्प्रेक्ष्यमूर्तिधृक्—सम्पूर्ण जगत् जिसकी ओर कठिनतासे देख सके, ऐसी भयानक मूर्ति धारण करनेवाले, ४१७ मातृचक्रप्रमथनः—डाकिनी, शाकिनी, पूतना आदि मातृ-मण्डलको मथ डालनेवाले, ४१८ महामातृगणेश्वरः—अपनी शक्तिभूत दिव्य महामातृगणोंके अधीश्वर ॥ १८७ ॥
अचिन्त्यामोघवीर्याढ्यः समस्तासुरघस्मरः ।
हिरण्यकशिपुच्छेदी कालः संकर्षणीपतिः ॥ १८८ ॥
४१९ अचिन्त्यामोघवीर्याढ्यः—कभी व्यर्थ न जानेवाले अचिन्त्य पराक्रमसे सम्पन्न, ४२० समस्तासुरघस्मरः—समस्त असुरोंको ग्रास बनानेवाले, ४२१ हिरण्यकशिपुच्छेदी—हिरण्यकशिपु नामक दैत्यको विदीर्ण करनेवाले, ४२२ कालः—असुरोंके लिये कालरूप, ४२३ संकर्षणीपतिः—संहारकारिणी शक्तिके स्वामी ॥ १८८ ॥
कृतान्तवाहनः सद्यःसमस्तभयनाशनः ।
सर्वविघ्नान्तकः सर्वसिद्धिदः सर्वपूरकः ॥ १८९ ॥
४२४ कृतान्तवाहनः—कालको अपना वाहन बनानेवाले, ४२५ सद्यःसमस्तभयनाशनः—शरणमें आये हुए भक्तोंके समस्त भयोंका तत्काल नाश करनेवाले, ४२६ सर्वविघ्नान्तकः—सम्पूर्ण विघ्नोंका अन्त करनेवाले, ४२७ सर्वसिद्धिदः—सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले, ४२८ सर्वपूरकः—सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले ॥ १८९ ॥
समस्तपातकध्वंसी सिद्धिमन्त्राधिकाह्वयः ।
भैरवेशो हरार्तिघ्नः कालकोटिदुरासदः ॥ १९० ॥
४२९ समस्तपातकध्वंसी—सब पातकोंका नाश करनेवाले, ४३० सिद्धिमन्त्राधिकाह्वयः—नाममें ही सिद्धि और मन्त्रोंसे अधिक शक्ति रखनेवाले, ४३१ भैरवेशः—भैरवगणोंके स्वामी, ४३२ हरार्तिघ्नः—भगवान् शङ्करकी पीड़ाका नाश करनेवाले, ४३३ कालकोटिदुरासदः—करोड़ों कालोंके लिये भी दुर्धर्ष ॥ १९० ॥
उत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७०७ ********************************************************************************
दैत्यगर्भस्राविनामा स्फुटद्ब्रह्माण्डगर्जितः ।
स्मृतमात्राखिलत्राताऽद्भुतरूपो महाहरिः ॥ १९१ ॥
४३४ दैत्यगर्भस्राविनामा—जिनका नाम सुनकर ही दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर जाते हैं—ऐसे भगवान् नृसिंह, ४३५ स्फुटद्ब्रह्माण्डगर्जितः—जिनके गर्जनपर सारा ब्रह्माण्ड फटने लगता है, ४३६ स्मृतमात्राखिलत्राता—स्मरण करनेमात्रसे सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाले, ४३७ अद्भुतरूपः—आश्चर्यजनक रूप धारण करनेवाले, ४३८ महाहरिः—महान् सिंहकी आकृति धारण करनेवाले ॥ १९१ ॥
ब्रह्मचर्यशिरःपिण्डी दिक्पालोऽर्धाङ्गभूषणः ।
द्वादशार्कशिरोदामा रुद्रशीर्षैकनूपुरः ॥ १९२ ॥
४३९ ब्रह्मचर्यशिरःपिण्डी—अपने शिरोभागमें ब्रह्मचर्यको धारण करनेवाले, ४४० दिक्पालः—समस्त दिशाओंका पालन करनेवाले, ४४१ अर्धाङ्गभूषणः—आधे अङ्गमें आभूषण धारण करनेवाले नृसिंह, ४४२ द्वादशार्कशिरोदामा—मस्तकमें बारह सूर्योंके समान तेज धारण करनेवाले, ४४३ रुद्रशीर्षैकनूपुरः—जिनके चरणोंमें प्रणाम करते समय रुद्रका मस्तक एक नूपुरकी भाँति शोभा धारण करता है, वे भगवान् ॥ १९२ ॥
योगिनीग्रस्तगिरिजात्राता भैरवतर्जकः ।
वीरचक्रेश्वरोऽत्युग्रो यमारिः कालसंवरः ॥ १९३ ॥
४४४ योगिनीग्रस्तगिरिजात्राता—योगिनियोंके चंगुलमें फँसी हुई पार्वतीकी रक्षा करनेवाले, ४४५ भैरवतर्जकः—भैरवगणोंको डाँट बतानेवाले, ४४६ वीरचक्रेश्वरः—वीरमण्डलके ईश्वर, ४४७ अत्युग्रः—अत्यन्त भयंकर, ४४८ यमारिः—यमराजके शत्रु, ४४९ कालसंवरः—कालको आच्छादित करनेवाले ॥ १९३ ॥
क्रोधेश्वरो रुद्रचण्डीपरिवारादिदुष्टभुक् ।
सर्वाक्षोभ्यो मृत्युमृत्युः कालमृत्युनिवर्तकः ॥ १९४ ॥
४५० क्रोधेश्वरः—क्रोधपर शासन करनेवाले, ४५१ रुद्रचण्डीपरिवारादिदुष्टभुक्—रुद्र और चण्डीके पार्षदोंमें रहनेवाले दुष्टोंके भक्षक, ४५२ सर्वाक्षोभ्यः—किसीके द्वारा भी विचलित नहीं किये जा सकनेवाले, ४५३ मृत्युमृत्युः—मौतको भी मारनेवाले, ४५४ कालमृत्युनिवर्तकः—काल और मृत्युका निवारण करनेवाले ॥ १९४ ॥
असाध्यसर्वरोगघ्नः सर्वदुर्ग्रहसौम्यकृत् ।
गणेशकोटिदर्पघ्नो दुःसहाशेषगोत्रहा ॥ १९५ ॥
४५५ असाध्यसर्वरोगघ्नः—सम्पूर्ण असाध्य रोगोंका नाश करनेवाले, ४५६ सर्वदुर्ग्रहसौम्यकृत्—समस्त दुष्ट ग्रहोंको शान्त करनेवाले, ४५७ गणेशकोटिदर्पघ्नः—करोड़ों गणपतियोंका अभिमान चूर्ण करनेवाले, ४५८ दुःसहाशेषगोत्रहा—समस्त दुःसह शत्रुओंके कुलका नाश करनेवाले ॥ १९५ ॥
देवदानवदुद्दर्शो जगद्व्यदभीषकः ।
समस्तदुर्गतिस्त्राता जगद्भक्षकभक्षकः ॥ १९६ ॥
४५९ देवदानवदुद्दर्शः—देवता और दानवोंको भी जिनकी ओर देखनेमें कठिनाई होती है—ऐसे भगवान् नृसिंह, ४६० जगद्व्यदभीषकः—संसारके भयदाता असुरोंको भी भयभीत करनेवाले, ४६१ समस्तदुर्गतिस्त्राता—सम्पूर्ण दुर्गंतियोंसे उद्धार करनेवाले, ४६२ जगद्भक्षकभक्षकः—जगत्का भक्षण करनेवाले कालके भी भक्षक ॥ १९६ ॥
उग्रेशोऽम्बरमार्जारः कालमूषकभक्षकः ।
अनन्तायुधदोर्दण्डी नृसिंहो वीरभद्रजित् ॥ १९७ ॥
४६३ उग्रेशः—उग्र शक्तियोंपर शासन करनेवाले, ४६४ अम्बरमार्जारः—आकाशरूपी बिलाव, ४६५ कालमूषकभक्षकः—कालरूपी चूहेको खा जानेवाले, ४६६ अनन्तायुधदोर्दण्डी—अपने बाहुदण्डोंको ही अक्षय आयुधोंके रूपमें धारण करनेवाले, ४६७ नृसिंहः—नर तथा सिंह दोनोंकी आकृति धारण करनेवाले, ४६८ वीरभद्रजित्—वीरभद्रपर विजय पानेवाले ॥ १९७ ॥
योगिनीचक्रगुह्येशः शक्रारिपशुमांसभुक् ।
रुद्रो नारायणो मेषरूपशङ्करवाहनः ॥ १९८ ॥
४६९ योगिनीचक्रगुह्येशः—योगिनी-मण्डलके रहस्योंके स्वामी, ४७० शक्रारिपशुमांसभुक्—इन्द्रके शत्रुभूत दैत्यरूपी पशुओंका भक्षण