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पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

७२८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


पुरुषोत्तमका भलीभाँति भजन करते हुए निरन्तर आपके चरणोंमें भक्ति रखेंगे, वे जीवनमें कभी असफल न होंगे।
इममर्षि स्तवं पुण्यमितिहासं पुरातनम्।
ये नराः कीर्तयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ॥ ३० ॥*

जो लोग परम ऋषि ब्रह्माजीके मुखसे निकले हुए इस पुरातन इतिहासरूप पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा।

यह महात्मा श्रीरघुनाथजीका स्तोत्र है, जो सब स्तोत्रोंमें श्रेष्ठ है। जो प्रतिदिन तीनों समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह महापातकी होनेपर भी मुक्त हो जाता है। श्रेष्ठ द्विजोंको चाहिये कि वे संध्याके समय विशेषतः श्राद्धके अवसरपर भक्तिभावसे मन लगाकर प्रयत्नपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करें। यह परम गोपनीय स्तोत्र है। इसे कहीं और कभी भी अनधिकारी व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिये। इसके पाठसे मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। निश्चय ही उसे सनातन गति प्राप्त होती है। नरश्रेष्ठ ब्राह्मणोंको श्राद्धमें पहले तथा पिण्ड-पूजाके बाद भी इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये; इससे श्राद्ध अक्षय हो जाता है। यह परम पवित्र स्तोत्र मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करनेवाला है। जो एकाग्र चित्तसे इस स्तोत्रको लिखकर अपने घरमें रखता है, उसकी आयु, सम्पत्ति तथा बलकी प्रतिदिन वृद्धि होती है। जो बुद्धिमान् पुरुष कभी इस स्तोत्रको लिखकर ब्राह्मणको देता है, उसके पूर्वज मुक्त होकर श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होते हैं। चारों वेदोंका पाठ करनेसे जो फल होता है, वही फल मनुष्य इस स्तोत्रका पाठ और जप करके पा लेता है। अतः भक्तिमान् पुरुषको यत्नपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। इसके पढ़नेसे मनुष्य सब कुछ पाता है और सुखपूर्वक रहकर उत्तरोत्तर उन्नतिको प्राप्त होता है।


ऋषिपञ्चमी-व्रतकी कथा, विधि और महिमा

**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! एक समयकी बात है, मैंने जगत्के स्वामी भगवान् श्रीविष्णुसे पूछा था—भगवन् ! सब व्रतोंमें उत्तम व्रत कौन है, जो पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला और सुख-सौभाग्यको देनेवाला हो? उस समय उन्होंने जो कुछ उत्तर दिया, वह सब मैं तुम्हें कहता हूँ; सुनो।

**श्रीविष्णु बोले—**महाबाहु शिव! पूर्वकालमें देवशर्मा नामके एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारगामी विद्वान् थे और सदा स्वाध्यायमें ही लगे रहते थे। प्रतिदिन अग्निहोत्र करते तथा सदा अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन एवं दान-प्रतिग्रहरूप छः कर्मोंमें प्रवृत्त रहते थे। सभी वर्णोंके लोगोंमें उनका बड़ा मान था। वे पुत्र, पशु और बन्धु-बान्धव—सबसे सम्पन्न थे। ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ देवशर्माकी गृहिणीका नाम भद्रा था। वे भादोंके शुक्लपक्षमें पञ्चमी तिथि आनेपर तपस्या (व्रत-पालन) के द्वारा इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पिताका एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया करते थे। पहले दिन रात्रिमें सुख और सौभाग्य प्रदान करनेवाले ब्राह्मणोंको निमन्त्रण देते और निर्मल प्रभातकाल आनेपर दूसरे-दूसरे नये बर्तन मँगाते तथा उन सभी बर्तनोंमें अपनी स्त्रीके द्वारा पाक तैयार कराते थे। वह पाक अठारह रसोंसे युक्त एवं पितरोंको संतोष प्रदान करनेवाला होता था। पाक तैयार होनेपर वे पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंको बुलावा भेजकर बुलवाते थे।

एक बार उक्त समयपर निमन्त्रण पाकर समस्त वेदपाठी ब्राह्मण दोपहरमें देवशर्माके घर उपस्थित हुए। विप्रवर देवशर्माने अर्घ्य-पाद्यादि निवेदन करके विधिपूर्वक उनका स्वागत-सत्कार किया। फिर घरके भीतर जानेपर सबको बैठनेके लिये आसन दिया और विशेषतः मिष्टान्नके साथ उत्तम अन्न उन्हें भोजन करनेके


* पद्मपुराण उत्तरखण्डका ७७वाँ अध्याय।

उत्तरखण्ड ] * ऋषिपञ्चमी-व्रतकी कथा, विधि और महिमा * ७२९


लिये परोसा; साथ ही विधिपूर्वक पिण्डदानकी पूर्ति करनेवाला श्राद्ध भी किया। इसके बाद पिताका चिन्तन करते हुए उन्होंने उन ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके वस्त्र, दक्षिणा और ताम्बूल निवेदन किये। फिर उन सबको विदा किया। वे सभी ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले गये। तत्पश्चात् अपने सगोती, बन्धु-बान्धव तथा और भी जो लोग भूखे थे, उन सबको ब्राह्मणने विधिपूर्वक भोजन दिया। इस प्रकार श्राद्धका कार्य समाप्त होनेपर ब्राह्मण जब कुटीके दरवाजेपर बैठे, उस समय उनके घरकी कुतिया और बैल दोनों परस्पर कुछ बातचीत करने लगे। देवि! बुद्धिमान् ब्राह्मणने उन दोनोंकी बातें सुनीं और समझीं। फिर मन-ही-मन वे इस प्रकार सोचने लगे—'ये साक्षात् मेरे पिता हैं, जो मेरे ही घरके पशु हुए हैं तथा यह भी साक्षात् मेरी माता है, जो दैवयोगसे कुतिया हो गयी है। अब मैं इनके उद्धारके लिये निश्चित रूपसे क्या करूँ?' इसी विचारमें पड़े-पड़े ब्राह्मणको रातभर नींद नहीं आयी। वे भगवान् विश्वेश्वरका स्मरण करते रहे। प्रातःकाल होनेपर वे ऋषियोंके समीप गये। वहाँ वसिष्ठजीने उनका भलीभाँति स्वागत किया।

वसिष्ठजी बोले— ब्राह्मणश्रेष्ठ ! अपने आनेका कारण बताओ।

ब्राह्मण बोले— मुनिवर ! आज मेरा जन्म सफल हुआ तथा आज मेरी सम्पूर्ण क्रियाएँ सफल हो गयीं; क्योंकि इस समय मुझे आपका दुर्लभ दर्शन प्राप्त हुआ है। अब मेरा समाचार सुनिये। आज मैंने शास्त्रोक्त विधिसे श्राद्ध किया, ब्राह्मणोंको भोजन कराया तथा समस्त कुटुम्बके लोगोंको भी भोजन दिया है। सबके भोजनके पश्चात् एक कुतिया आयी और मेरे घरमें जहाँ एक बैल रहता है, वहाँ जा उसे पतिरूपसे सम्बोधित करके इस प्रकार कहने लगी—'स्वामिन् ! आज जो घटना घटी है, उसे सुन लीजिये। इस घरमें जो दूधका बर्तन रखा हुआ था, उसे साँपने अपना जहर उगलकर दूषित कर दिया। यह मैंने अपनी आँखों देखा था। देखकर मेरे मनमें बड़ी चिन्ता हुई। सोचने लगी—इस दूधसे जब भोजन तैयार होगा, उस समय सब ब्राह्मण इसको खाते ही मर जायँगे। यों विचारकर मैं स्वयं उस दूधको पीने लगी। इतनेमें बहूकी दृष्टि मुझपर पड़ गयी। उसने मुझे खूब मारा। मेरा अङ्ग-भङ्ग हो गया है। इसीसे मैं लड़खड़ाती हुई चल रही हूँ। क्या करूँ, बहुत दुःखी हूँ।'

कुतियाके दुःखका अनुभव करके बैलने भी उससे कहा—'अब मैं अपने दुःखका कारण बताता हूँ, सुनो; मैं पूर्वजन्ममें इस ब्राह्मणका साक्षात् पिता था। आज इसने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और प्रचुर अन्नका दान किया है; किन्तु मेरे आगे इसने घास और जलतक नहीं रखा। इसी दुःखसे मुझे आज बहुत कष्ट हुआ है।' उन दोनोंका यह कथानक सुनकर मुझे रातभर नींद नहीं आयी। मुनिश्रेष्ठ ! मुझे तभीसे बड़ी चिन्ता हो रही है। मैं वेदका स्वाध्याय करनेवाला हूँ, वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानमें कुशल हूँ; फिर भी मेरे माता और पिताको महान् दुःख सहन करना पड़ रहा है। इसके लिये मैं क्या करूँ ? यही सोचता-विचारता आपके पास आया हूँ। आप ही मेरा कष्ट दूर कीजिये।

ऋषि बोले— ब्रह्मन् ! उन दोनोंने पूर्वजन्ममें जो कर्म किया है, उसे सुनो—ये तुम्हारे पिता परम सुन्दर कुण्डिननगरमें श्रेष्ठ ब्राह्मण रहे हैं। एक समय भादोंके महीनेमें पञ्चमी तिथि आयी थी, तुम्हारे पिता अपने पिताके श्राद्ध आदिमें लगे थे, इसलिये उन्हें पञ्चमीके व्रतका ध्यान न रहा। उनके पिताकी क्षयाह तिथि थी। उस दिन तुम्हारी माता रजस्वला हो गयी थी, तो भी उसने ब्राह्मणोंके लिये सारा भोजन स्वयं ही तैयार किया। रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी और तीसरे दिन धोबिनके समान अपवित्र बतायी गयी है; चौथे दिन स्नानके बाद उसकी शुद्धि होती है। तुम्हारी माताने इसका विचार नहीं किया, अतः उसी पापसे उसको अपने ही घरकी कुतिया होना पड़ा है तथा तुम्हारे पिता भी इसी कर्मसे बैल हुए हैं।

ब्राह्मणने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुने ! मुझे कोई ऐसा व्रत, दान, यज्ञ और तीर्थ बतलाइये, जिसके सेवनसे मेरे माता-पिताकी मुक्ति हो जाय।

७३० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


**ऋषि बोले—**भादोंके शुक्लपक्षमें जो पञ्चमी आती है, उसका नाम ऋषिपञ्चमी है। उस दिन नदी, कुएँ, पोखरे अथवा ब्राह्मणके घरपर जाकर स्नान करे। फिर अपने घर आकर गोबरसे लीपकर मण्डल बनाये; उसमें कलशकी स्थापना करे। कलशके ऊपर एक पात्र रखकर उसे तिन्नीके चावलसे भर दे। उस पात्रमें यज्ञोपवीत, सुवर्ण तथा फलके साथ ही सुख और सौभाग्य देनेवाले सात ऋषियोंकी स्थापना करे। 'ऋषिपञ्चमी' के व्रतमें स्थित हुए पुरुषोंको उन सबका आवाहन करके पूजन करना चाहिये। तिन्नीके चावलका ही नैवेद्य लगाये और उसीका भोजन करे। केवल एक समय भोजन करके व्रत करना चाहिये। उस दिन परम भक्तिके साथ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक ऋषियोंका पूजन करना उचित है। पूजनके समय ब्राह्मणको दक्षिणा और घीके साथ विधिपूर्वक भोजन-सामग्रीका दान देना चाहिये तथा समस्त ऋषियोंकी प्रसन्नता ही इस दानका उद्देश्य होना चाहिये। फिर विधिपूर्वक माहात्म्य-कथा सुनकर ऋषियोंकी प्रदक्षिणा करे और सबको पृथक्-पृथक् धूप-दीप तथा नैवेद्य निवेदन करके अर्घ्य प्रदान करे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—

'ऋषयः सन्तु मे नित्यं व्रतसंपूर्तिकारिणः।
पूजां गृह्णन्तु महत्तामृषिभ्योऽस्तु नमो नमः॥
पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुः प्राचेतसस्तथा।
वसिष्ठोमारिचात्रेया अर्घ्यं गृह्णन्तु वो नमः॥
(७८। ५९-६०)

'ऋषिगण सदा मेरे व्रतको पूर्ण करनेवाले हों। वे मेरी दी हुई पूजा स्वीकार करें। सब ऋषियोंको मेरा नमस्कार है। पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्राचेतस, वसिष्ठ, मारीच और आत्रेय—ये मेरा अर्घ्य ग्रहण करें। आप सब ऋषियोंको मेरा प्रणाम है।'

इस प्रकार मनोरम धूप-दीप आदिके द्वारा ऋषियोंकी पूजा करनी चाहिये। इस व्रतके प्रभावसे पितरोंकी मुक्ति होती है। वत्स! पूर्वकर्मके परिणामसे अथवा रजके संसर्गदोषसे जो कष्ट होता है, उससे इस व्रतका अनुष्ठान करनेपर निःसंदेह छुटकारा मिल जाता है।

**महादेवजी कहते हैं—**यह सुनकर देवशर्माने पिता-माताकी मुक्तिके लिये 'ऋषिपञ्चमी' व्रतका अनुष्ठान किया। उस व्रतके प्रभावसे वे दोनों पति-पत्नी पुत्रको आशीर्वाद देते हुए मुक्तिमार्गसे चले गये। 'ऋषिपञ्चमी' का यह पवित्र व्रत ब्राह्मणके लिये बताया गया, किन्तु जो नरश्रेष्ठ इसका अनुष्ठान करते हैं, वे सभी पुण्यके भागी होते हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष इस परम उत्तम ऋषि-व्रतका पालन करते हैं, वे इस लोकमें प्रचुर भोगोंका उपभोग करके अन्तमें भगवान् श्रीविष्णुके सनातन लोकको प्राप्त होते हैं।


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न्याससहित अपामार्जन नामक स्तोत्र और उसकी महिमा

**पार्वती बोलीं—**भगवन्! सभी प्राणी विष और रोग आदिके उपद्रवसे ग्रस्त तथा दुष्ट ग्रहोंसे हर समय पीड़ित रहते हैं। सुरश्रेष्ठ! जिस उपायका अवलम्बन करनेसे मनुष्योंको अभिचार (मारण-उच्चाटन आदि) तथा कृत्या आदिसे उत्पन्न होनेवाले नाना प्रकारके भयङ्कर रोगोंका शिकार न होना पड़े, उसका मुझसे वर्णन कीजिये।

**महादेवजी बोले—**पार्वती! जिन लोगोंने व्रत, उपवास और नियमोंके पालनद्वारा भगवान् विष्णुको संतुष्ट कर लिया है, वे कभी रोगसे पीड़ित नहीं होते। जिन्होंने कभी व्रत, पुण्य, दान, तप, तीर्थ-सेवन, देव-पूजन तथा अधिक मात्रामें अन्न-दान नहीं किया है, उन्हीं लोगोंको सदा रोग और दोषसे पीड़ित समझना चाहिये। मनुष्य अपने मनसे आरोग्य तथा उत्तम समृद्धि आदि जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब भगवान् विष्णुकी सेवासे निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। श्रीमधुसूदनके संतुष्ट हो जानेपर न कभी मानसिक चिन्ता सताती है, न रोग होता है, न विष तथा ग्रहोंके कष्टमें

उत्तराखण्ड ] * न्याससहित अपामार्जननामक स्तोत्र और उसकी महिमा * ७३१


बाँधना पड़ता है और न कृत्याके ही स्पर्शका भय रहता है। श्रीजनार्दनके प्रसन्न होनेपर समस्त दोषोंका नाश हो जाता है। सभी ग्रह सदाके लिये शुभ हो जाते हैं तथा वह मनुष्य देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष बन जाता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान भाव रखता है और अपने प्रति जैसा बर्ताव चाहता है वैसा ही दूसरोंके प्रति भी करता है, उसने मानो उपवास आदि करके भगवान् मधुसूदनको संतुष्ट कर लिया। ऐसे लोगोंके पास शत्रु नहीं आते, उन्हें रोग या आभिचारिक कष्ट नहीं होता तथा उनके द्वारा कभी पापका कार्य भी नहीं बनता। जिसने भगवान् विष्णुकी उपासना की है, उसे भगवान्‌के चक्र आदि अमोघ अस्त्र सदा सब आपत्तियोंसे बचाते रहते हैं।

पार्वती बोलीं— भगवन् ! जो लोग भगवान् गोविन्दकी आराधना न करनेके कारण दुःख भोग रहे हैं, उन दुःखी मनुष्योंके प्रति सब प्राणियोंमें सनातन वासुदेवको स्थित देखनेवाले समदर्शी एवं दयालु पुरुषोंका जो कर्तव्य हो, वह मुझे विशेषरूपसे बताइये।

महादेवजी बोले— देवेश्वरि ! बतलाता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। यह उपाय रोग, दोष एवं अशुभको हरनेवाला तथा शत्रुजनित आपत्तिका नाश करनेवाला है। विद्वान् पुरुष शिखामें श्रीधरका, शिखाके निचले भागमें भगवान् श्रीकरका, केशोंमें हृषीकेशका, मस्तकमैं परम पुरुष नारायणका, कानके ऊपरी भागमें श्रीविष्णुका, ललाटमें जलशायीका, दोनों भौंहोंमें श्रीविष्णुका, भौंहोंके मध्य-भागमें श्रीहरिका, नासिकाके अग्रभागमें नरसिंहका, दोनों कानोंमें अर्णवेशय (समुद्रमें शयन करनेवाले भगवान्) का, दोनों नेत्रोंमें पुण्डरीकाक्षका, नेत्रोंके नीचे भूधर (धरणीधर) का, दोनों गालोंमें कल्किनाथका, कानोंके मूल भागमें वामनका, गलेकी दोनों हँसलियोंमें शङ्खधारीका, मुखमें गोविन्दका, दाँतोंकी पङ्क्तिमें मुकुन्दका, जिह्वामें वाणीपतिका, ठोढ़ीमें श्रीरामका, कण्ठमें वैकुण्ठका, बाहुमूलके निचले भाग (काँख) में बलघ्न (बल नामक दैत्यके मारनेवाले) का, कंधोंमें कंसघातीका, दोनों भुजाओंमें अज (जन्मरहित) का, दोनों हाथोंमें शार्ङ्गपाणिका, हाथके अँगूठेमें संकर्षणका, अँगुलियोंमें गोपालका, वक्षःस्थलमें अधोक्षजका, छातीके बीचमें श्रीवत्सका, दोनों स्तनोंमें अनिरुद्धका, उदरमें दामोदरका, नाभिमें पद्मनाभका, नाभिके नीचे केशवका, लिङ्गमें धराधरका, गुदामें गदाग्रजका, कटिमें पीताम्बरधारीका, दोनों जाँघोंमें मधुद्विट् (मधुसूदन) का, पिडलियोंमें मुरारिका, दोनों घुटनोंमें जनार्दनका, दोनों घुट्ठियोंमें फणीशका, दोनों पैरोंकी गतिमें त्रिविक्रमका, पैरके अँगूठेमें श्रीपतिका, पैरके तलवोंमें धरणीधरका, समस्त रोमकूपोंमें विष्वक्सेनका, शरीरके मांसमें मत्स्यावतारका, मेदमें कूर्मावतारका, वसा में वाराहका, सम्पूर्ण हड्डियोंमें अच्युतका, मज्जामें द्विजप्रिय (ब्राह्मणोंके प्रेमी) का, शुक्र (वीर्य) में श्वेतपतिका, सर्वाङ्गमें यज्ञपुरुषका तथा आत्मामें परमात्माका न्यास करे। इस प्रकार न्यास करके मनुष्य साक्षात् नारायण हो जाता है; वह जबतक मुँहसे कुछ बोलता नहीं, तबतक विष्णुरूपसे ही स्थित रहता है।*


* तद् वक्ष्यामि सुरश्रेष्ठे समाहितमनाः शृणु। रोगदोषाशुभहरं विद्विडापदविनाशनम् ॥
शिखायां श्रीधरं न्यस्य शिखाधः श्रीकरं तथा। हृषीकेशं तु केशेषु मूर्ध्नि नारायणं परम् ॥
ऊर्ध्वश्रोत्रे न्यसेद्विष्णुं ललाटे जलशायिनम्। विष्णुं वै भ्रुयुगे न्यस्य भ्रूमध्ये हरिमेव च ॥
नरसिंहं नासिकाग्रे कर्णयोरर्णवेशयम्। चक्षुषोः पुण्डरीकाक्षं तदधो भूधरं न्यसेत् ॥
कपोलयोः कल्किनाथं वामनं कर्णमूलयोः। शङ्खिनं शङ्खयोर्न्यस्य गोविन्दं वदने तथा ॥
मुकुन्दं दन्तपङ्क्तौ तु जिह्वायां वाक्पतिं तथा। रामं हनौ तु विन्यस्य कण्ठे वैकुण्ठमेव च ॥
बलघ्नं बाहुमूलाधश्शंसयोः कंसघातिनम्। अजं भुजद्वये न्यस्य शार्ङ्गपाणिं करद्वये ॥
संकर्षणं कराङ्गुष्ठे गोपमङ्गुलिपङ्क्तिषु। वक्षस्यधोक्षजं न्यस्य श्रीवत्सं तस्य मध्यतः ॥
स्तनयोरनिरुद्धं च दामोदरमथोदरे। पद्मनाभं तथा नाभौ नाभ्यधश्चापि केशवम् ॥

७३२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


शान्ति करनेवाला पुरुष मूलसहित शुद्ध कुशोंको लेकर एकाग्रचित्त हो रोगीके सब अङ्गोंको झाड़े; विशेषतः विष्णुभक्त पुरुष रोग, ग्रह और विषसे पीड़ित मनुष्यकी अथवा केवल विषसे ही कष्ट पानेवाले रोगियोंकी इस प्रकार शुभ शान्ति करे। पार्वती ! कुशसे झाड़ते समय सब रोगोंका नाश करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये।

ॐ परमार्थस्वरूप, अन्तर्यामी, महात्मा, रूपहीन होते हुए भी अनेक रूपधारी तथा व्यापक परमात्माको नमस्कार है। वाराह, नरसिंह और सुखदायी वामन भगवान्‌का ध्यान एवं नमस्कार करके श्रीविष्णुके उपर्युक्त नामोंका अपने अङ्गोंमें न्यास करे। न्यासके पश्चात् इस प्रकार कहे—'मैं पापके स्पर्शसे रहित, शुद्ध, व्याधि और पापोंका अपहरण करनेवाले गोविन्द, पद्मनाभ, वासुदेव और भूधर नामसे प्रसिद्ध भगवान्‌को नमस्कार करके जो कुछ कहूँ, वह मेरा सारा वचन सिद्ध हो। तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले भगवान् त्रिविक्रम, सबके हृदयमें रमण करनेवाले राम, वैकुण्ठधामके अधिपति, बदरिकाश्रममें तपस्या करनेवाले भगवान् नर, वाराह, नृसिंह, वामन और उज्ज्वल रूपधारी हयग्रीवको नमस्कार है। हृषीकेश ! आप सारे अमङ्गलको हर लीजिये। सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णको नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाले आदि चक्रधारी श्रीकेशवको नमस्कार है। कमल-केसरके समान वर्णवाले भगवान्‌को नमस्कार है। पीले रंगके निर्मल वस्त्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको नमस्कार है। अपनी एक दाढ़पर समूची पृथ्वीको उठा लेनेवाले त्रिमूर्तिपति भगवान् वाराहको नमस्कार है। जिसके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक तीक्ष्ण और कठोर है, ऐसे दिव्य सिंहका रूप धारण करनेवाले भगवान् नृसिंह ! आपको नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदसे लक्षित होनेवाले परमात्मन् ! अत्यन्त लघु शरीरवाले कश्यपपुत्र वामनका रूप धारण करके भी समूची पृथ्वीको एक ही पगमें नाप लेनेवाले ! आपको बारंबार नमस्कार है। बहुत बड़ी दाढ़वाले भगवान् वाराह ! सम्पूर्ण दुःखों और समस्त पापके फलोंको रौंद डालिये, रौंद डालिये। पापके फलको नष्ट कर डालिये, नष्ट कर डालिये। विकराल मुख और दाँतोंवाले, नखोंसे उद्दीप्त दिखायी देनेवाले, पीड़ाओंके नाशक भगवान् नृसिंह ! आप अपनी गर्जनासे इस रोगीके दुःखोंका भञ्जन कीजिये, भञ्जन कीजिये। इच्छानुसार रूप ग्रहण करके पृथ्वी आदिको धारण करनेवाले भगवान् जनार्दन अपनी ऋक्, यजुः और साममयी वाणीद्वारा इस रोगीके सब दुःखोंकी शान्ति कर दें। एक, दो, तीन या चार दिनका अन्तर देकर आनेवाले हलके या भारी ज्वरको, सदा बने रहनेवाले ज्वरको, किसी दोषके कारण उत्पन्न हुए ज्वरको, सन्निपातसे होनेवाले तथा आगन्तुक ज्वरको विदीर्ण कर उसकी वेदनाका नाश करके भगवान् गोविन्द उसे सदाके लिये शान्त कर दें। नेत्रका कष्ट, मस्तकका कष्ट, उदररोगका कष्ट, अनुच्छ्वास (साँसका रुकना), महाश्वास (साँसका तेज चलना—दमा), परिताप, (ज्वर), वेपथु (कम्प या जूड़ी), गुदारोग, नासिकारोग, पादरोग, कुष्ठरोग, क्षयरोग, कमला आदि रोग, प्रमेह आदि भयङ्कर रोग, वातरोग, मकड़ी और चेचक आदि समस्त रोग भगवान् विष्णुके चक्रकी चोट खाकर नष्ट हो जायें। अच्युत, अनन्त और गोविन्द नामोंके उच्चारणरूपी


मेढ़े धराधरं देवं गुदे चैव गदाग्रजम्। पीताम्बरधरं कट्यामूरुयुगे मधुद्विषम्॥
मुरद्विषं पिण्डकयोर्जानुयुग्मे जनार्दनम्। फणीशं गुल्फयोर्यस्य क्रमयोश्च त्रिविक्रमम्॥
पादाङ्गुष्ठे श्रीपतिं च पादाधो धरणीधरम्। रोमकूपेषु सर्वेषु विष्वक्सेनं न्यसेद्बुधः॥
मत्स्यं मांसे तु विन्यस्य कूर्मं मेदसि विन्यसेत्। वाराहं तु वसामध्ये सर्वास्थिषु तथाच्युतम्॥
द्विजप्रियं तु मज्जायां शुक्रे श्वेतपतिं तथा। सर्वाङ्गे यज्ञपुरुषं परमात्मानमात्मनि॥
एवं न्यासविधिं कृत्वा साक्षान्नारायणो भवेत्। यावन्न व्याहरेत्किंचितावद्विष्णुमयः स्थितः॥ (७९। १६—३०)

उत्तरखण्ड ] * न्याससहित अपामार्जननामक स्तोत्र और उसकी महिमा * ७३३ ************************************************************************

ओषधिसे समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं—यह बात मैं सत्य-सत्य कहता हूँ। स्थावर, जङ्गम अथवा कृत्रिम विष हो या दाँत, नख, आकाश तथा भूत आदिसे प्रकट होनेवाला अत्यन्त दुस्सह विष हो; वह सारा-का-सारा श्रीजनार्दनका नामकीर्तन करनेपर इस रोगीके शरीरमें शान्त हो जाय। बालकके शरीरमें ग्रह, प्रेतग्रह अथवा अन्यान्य शाकिनी-ग्रहोंका उपद्रव हो या मुखपर चकत्ते निकल आये हों अथवा रेवती, वृद्ध रेवती तथा वृद्धिका नामके भयङ्कर ग्रह, मातृग्रह एवं बालग्रह पीड़ा दे रहे हों; भगवान् श्रीविष्णुका चरित्र उन सबका नाश कर देता है। वृद्धों अथवा बालकोंपर जो कोई भी ग्रह लगे हों, वे श्रीनृसिंहके दर्शनमात्रसे तत्काल शान्त हो जाते हैं। भयानक दाढ़ोंके कारण विकराल मुखवाले भगवान् नृसिंह दैत्योंको भयभीत करनेवाले हैं। उन्हें देखकर सभी ग्रह बहुत दूर भाग जाते हैं। ज्वालाओंसे देदीप्यमान मुखवाले महासिंहरूपधारी नृसिंह ! सुन्दर मुख और नेत्रोंवाले सर्वेश्वर ! आप समस्त दुष्ट ग्रहोंको दूर कीजिये। जो-जो रोग, महान् उत्पात, विष, महान् ग्रह, क्रूरस्वभाववाले भूत, भयङ्कर ग्रह-पीड़ाएँ, हथियारसे कटे हुए घावोंपर होनेवाले रोग, चेचक आदि फोड़े और शरीरके भीतर स्थित रहनेवाले ग्रह हों, उन सबको हे त्रिभुवनकी रक्षा करनेवाले ! दुष्ट दानवोंके विनाशक ! महातेजस्वी सुदर्शन ! आप काट डालिये, काट डालिये। महान् ज्वर, वातरोग, लूता रोग तथा भयानक महाविषको भी आप नष्ट कर दीजिये, नष्ट कर दीजिये। असाध्य अमरशूल विषकी ज्वाला और गर्दभ रोग—ये सब-के-सब शत्रु हैं, 'ॐ ह्रां ह्रां हूं हूं' इस बीजमन्त्रके साथ तीखी धारवाले कुठारसे आप इन शत्रुओंको मार डालें। दूसरोंका दुःख दूर करनेके लिये शरीर धारण करनेवाले परमेश्वर ! आप भगवान्‌को नमस्कार है। इनके सिवा और भी जो प्राणियोंको पीड़ा देनेवाले दुष्ट ग्रह और रोग हों, उन सबको सबके आत्मा परमात्मा जनार्दन दूर करें। वासुदेव ! आपको नमस्कार है। आप कोई रूप धारण करके ज्वालाओंके कारण अत्यन्त भयानक सुदर्शन नामक चक्र चलाकर सब दुष्टोंको नष्ट कर दीजिये। देववर ! अच्युत ! आप दुष्टोंका संहार कीजिये।

महाचक्र सुदर्शन ! भगवान् गोविन्दके श्रेष्ठ आयुध ! तीखी धार और महान् वेगवाले शस्त्र ! कोटि सूर्यके समान तेज धारण करनेवाले महाज्वालामय सुदर्शन ! भारी आवाजसे सबको भयभीत करनेवाले चक्र ! आप समस्त दुःखों और सम्पूर्ण राक्षसोंका उच्छेद कर डालिये, उच्छेद कर डालिये। हे सुदर्शनदेव ! आप पापोंका नाश और आरोग्य प्रदान कीजिये। महात्मा नृसिंह अपनी गर्जनाओंसे पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर—सब ओर रक्षा करें। अनेक रूप धारण करनेवाले भगवान् जनार्दन भूमिपर और आकाशमें, पीछे-आगे तथा पार्श्वभागमें रक्षा करें। देवता, असुर और मनुष्योंके सहित सम्पूर्ण विश्व श्रीविष्णुमय है। योगेश्वर श्रीविष्णु ही सब वेदोंमें गाये जाते हैं, इस सत्यके प्रभावसे इस रोगीका सारा दुःख दूर हो जाय। समस्त वेदाङ्गोंमें भी परमात्मा श्रीविष्णुका ही गान किया जाता है। इस सत्यके प्रभावसे विश्वात्मा केशव इसको सुख देनेवाले हों। भगवान् वासुदेवके शरीरसे प्रकट हुए कुशोंके द्वारा मैंने इस मनुष्यका मार्जन किया है; इससे शान्ति हो, कल्याण हो और इसके दुःखोंका नाश हो जाय। जिसने गोविन्दके अपामार्जन स्तोत्रसे मार्जन किया है, वह भी यद्यपि साक्षात् श्रीनारायणका ही स्वरूप है; तथापि सब दुःखोंकी शान्ति श्रीहरिके वचनसे ही होती है। श्रीमधुसूदनका स्मरण करनेपर सम्पूर्ण दोष, समस्त ग्रह, सभी विष और सारे भूत शान्त हो जाते हैं। अब यह श्रीहरिके वचनानुसार पूर्ण स्वस्थ हो जाय। शान्ति हो, कल्याण हो और दुःख नष्ट हो जायँ। भगवान् हृषीकेशके नाम-कीर्तनके प्रभावसे सदा ही इसके स्वास्थ्यकी रक्षा रहे। जो पाप जहाँसे इसके शरीरमें आये हों, वे वहीं चले जायँ।

यह परम उत्तम 'अपामार्जन' नामक स्तोत्र है। समस्त प्राणियोंका कल्याण चाहनेवाले श्रीविष्णुभक्त पुरुषोंको रोग और पीड़ाओंके समय इसका प्रयोग करना चाहिये। इससे समस्त दुःखोंका पूर्णतया नाश हो जाता है। यह

७३४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


सब पापोंकी शुद्धिका साधन है। श्रीविष्णुके 'अपामार्जन स्तोत्र'से आर्द्र¹-शुष्क², लघु-स्थूल (छोटे-बड़े) एवं ब्रह्महत्या आदि जितने भी पाप हैं, वे सब उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्यके दर्शनसे अन्धकार दूर हो जाता है। जिस प्रकार सिंहके भयसे छोटे मृग भागते हैं, उसी प्रकार इस स्तोत्रसे सारे रोग और दोष नष्ट हो जाते हैं। इसके श्रवणमात्रसे ही ग्रह, भूत और पिशाच आदिका नाश हो जाता है। लोभी पुरुष धन कमानेके लिये कभी इसका उपयोग न करें। अपामार्जन स्तोत्रका उपयोग करके किसीसे कुछ भी नहीं लेना चाहिये, इसीमें अपना हित है। आदि, मध्य और अन्तका ज्ञान रखनेवाले शान्तचित्त श्रीविष्णुभक्तोंको निःस्वार्थभावसे इस स्तोत्रका प्रयोग करना उचित है; अन्यथा यह सिद्धिदायक नहीं होता। भगवान् विष्णुका जो अपामार्जन नामक स्तोत्र है, यह मनुष्योंके लिये अनुपम सिद्धि है, रक्षाका परम साधन है और सर्वोत्तम ओषधि है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अपने पुत्र पुलस्त्य मुनिको इसका उपदेश किया था; फिर पुलस्त्य मुनिने दाल्भ्यको सुनाया। दाल्भ्यने समस्त प्राणियोंका हित करनेके लिये इसे लोकमें प्रकाशित किया; तबसे श्रीविष्णुका यह अपामार्जन स्तोत्र तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गया। यह सब प्रसङ्ग भक्तिपूर्वक श्रवण करनेसे मनुष्य अपने रोग और दोषोंका नाश करता है।

'अपामार्जन' नामक स्तोत्र परम अद्भुत और दिव्य है। मनुष्यको चाहिये कि पुत्र, काम और अर्थकी सिद्धिके लिये इसका विशेषरूपसे पाठ करे। जो द्विज एक या दो समय बराबर इसका पाठ करते हैं, उनकी आयु, लक्ष्मी और बलकी दिन-दिन वृद्धि होती है। ब्राह्मण विद्या, क्षत्रिय राज्य, वैश्य धन-सम्पत्ति और शूद्र भक्ति प्राप्त करता है। दूसरे लोग भी इसके पाठ, श्रवण और जपसे भक्ति प्राप्त करते हैं। पार्वती ! जो इसका पाठ करता है, उसे सामवेदका फल होता है; उसकी सारी पाप-राशि तत्काल नष्ट हो जाती है। देवि ! ऐसा जानकर एकाग्रचित्तसे इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये। इससे पुत्रकी प्राप्ति होती है और घरमें निश्चय ही लक्ष्मी परिपूर्ण हो जाती हैं। जो वैष्णव इस स्तोत्रको भोजपत्रपर लिखकर सदा धारण किये रहता है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीविष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। जो इसका एक-एक श्लोक पढ़कर भगवान्‌को तुलसीदल समर्पित करता है, वह तुलसीसे पूजन करनेपर सम्पूर्ण तीर्थोंके सेवनका फल पा लेता है। यह भगवान् विष्णुका स्तोत्र परम उत्तम और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। सम्पूर्ण पृथ्वीका दान करनेसे मनुष्य श्रीविष्णुलोकमें जाता है; किन्तु जो ऐसा करनेमें असमर्थ हो, वह श्रीविष्णुलोककी प्राप्तिके लिये विशेषरूपसे इस स्तोत्रका जप करे। यह रोग और ग्रहोंसे पीड़ित बालकोंके दुःखकी शान्ति करनेवाला है। इसके पाठमात्रसे भूत, ग्रह और विष नष्ट हो जाते हैं। जो ब्राह्मण कण्ठमें तुलसीकी माला पहनकर इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे वैष्णव जानना चाहिये; वह निश्चय ही श्रीविष्णुधाममें जाता है। इस लोकका परित्याग करनेपर उसे श्रीविष्णुधामकी प्राप्ति होती है। जो मोह-मायासे दूर हो दम्भ और तृष्णाका त्याग करके इस दिव्य स्तोत्रका पाठ करता है, वह परम मोक्षको प्राप्त होता है। इस भूमण्डलमें जो ब्राह्मण भगवान् विष्णुके भक्त हैं, वे धन्य माने गये हैं; उन्होंने कुलसहित अपने आत्माका उद्धार कर लिया—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जिन्होंने भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण कर ली है, संसारमें वे परम धन्य हैं। उनकी सदा भक्ति करनी चाहिये, क्योंकि वे भागवत (भगवद्भक्त) पुरुष हैं।


१-स्वेच्छासे किये हुए पाप। २-अनिच्छासे किये हुए पाप।

उत्तरखण्ड ] * श्रीविष्णुकी महिमा—भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा * ७३५


श्रीविष्णुकी महिमा—भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा

श्रीपार्वती बोलीं— विश्वेश्वर ! प्रभो ! भगवान् श्रीविष्णुका माहात्म्य अद्भुत है, जिसे सुनकर फिर कभी संसार-बन्धन नहीं प्राप्त होता। आप पुनः उसका वर्णन कीजिये।

महादेवजीने कहा— सुन्दरी ! मैं भगवान् श्रीविष्णुके उत्तम माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, सुनो; इसे सुनकर मनुष्य पुण्य प्राप्त करता है और अन्तमें उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। महाप्राज्ञ देवव्रत, जो इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष थे, कुरुक्षेत्रकी पुण्यभूमिमें ध्यानयोगपरायण हो रहे थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके आश्रय थे। उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था। उनमें पापका लेश भी नहीं था। वे सत्यप्रतिज्ञ थे और क्रोधको जीतकर समतामें प्रतिष्ठित हो चुके थे। संसारके स्वामी और सबको शरण देनेवाले भक्तवत्सल भगवान् नारायणमें मन, वाणी, शरीर और क्रियाके द्वारा वे परम निष्ठाको प्राप्त थे। ऐसे शान्तचित्त तथा समस्त गुणोंके आश्रयभूत कुरु-पितामह भीष्मको पृथ्वीपर मस्तक झुकाकर राजा युधिष्ठिरने प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा।

युधिष्ठिर बोले— समस्त शास्त्र-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ, धर्मके ज्ञाता पितामह ! कोई तो धर्मको सबसे श्रेष्ठ बतलाते हैं और कोई धनको। कोई दानकी प्रशंसा करते हैं, तो कोई संग्रहके गीत गाते हैं। कुछ लोग सांख्यके समर्थक हैं, तो दूसरे लोग योगके। कोई यथार्थ ज्ञानको उत्तम मानते हैं, तो कोई वैराग्यको। कुछ लोग अग्निष्टोम आदि कर्मको ही सबसे श्रेष्ठ समझते हैं, तो कुछ लोग उस आत्मज्ञानको बड़ा मानते हैं, जिसे पाकर मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें समबुद्धि हो जाती है। कुछ लोगोंके मतमें मनीषी पुरुषोंद्वारा बताये हुए यम और नियम ही सबसे उत्तम हैं। कुछ लोग दयाको श्रेष्ठ बताते हैं, तो कुछ तपस्वी महात्मा अहिंसाको ही सर्वोत्तम कहते हैं। कुछ मनुष्य शौचाचारको श्रेष्ठ बतलाते हैं, तो कुछ देवार्चनको। इस विषयमें पाप-कर्मोंसे मोहित चित्तवाले मानव चक्कर खा जाते हैं—वे कुछ निर्णय नहीं कर पाते। इन सबमें जो सर्वोत्तम कृत्य हो, जिसका महात्मा पुरुष भी अनुष्ठान कर सकें, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

भीष्मजी बोले— धर्मनन्दन ! सुनो, यह अत्यन्त गूढ़ विषय है, जो संसारबन्धनसे मोक्ष दिलानेवाला है। यह विषय तुम्हें भलीभाँति सुनना और जानना चाहिये। पुण्डरीक नामके एक परम बुद्धिमान् और वेदविद्यासे सम्पन्न ब्राह्मण थे, जो ब्रह्मचर्य-आश्रममें निवास करते हुए सदा गुरुजनोंकी आज्ञाके अधीन रहा करते थे। वे जितेन्द्रिय, क्रोधजयी, संध्योपासनमें तत्पर, वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञानमें निपुण और शास्त्रोंकी व्याख्या करनेमें कुशल थे। प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल समिधाओंसे अग्निको प्रज्वलित करके उत्तम हविष्यसे होम किया करते थे। जगत्पति भगवान् विष्णुका ध्यान करके विधिपूर्वक उनकी आराधनामें लगे रहते थे। तपस्या और स्वाध्यायमें तत्पर रहकर वे साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्रकी भाँति जान पड़ते थे। जल, समिधा और फूल आदि लाकर निरन्तर गुरुकी पूजामें प्रवृत्त रहते थे। उनके मनमें माता-पिताके प्रति भी पूर्ण सेवाका भाव था। वे भिक्षाका आहार करते और दम्भ-द्वेषसे दूर रहते

७३६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [संक्षिप्त पद्मपुराण


थे। ब्रह्मविद्या (उपनिषद्) का स्वाध्याय करते और प्राणायामके अभ्यासमें संलग्न रहते थे। उनके हृदयमें सबके प्रति आत्मभाव था। संसारकी ओरसे वे निःस्पृह हो गये थे। एक बार उनके मनमें संसार-सागरसे तारने-वाला विचार उत्पन्न हुआ; फिर तो वे माता-पिता, भाई, सुहृद्, मित्र, सखा, सम्बन्धी, बन्धु-बान्धव, वंश-परम्परासे प्राप्त एवं धन-धान्यसे परिपूर्ण गृह, सब प्रकारके अन्नकी पैदावारके योग्य बहुमूल्य खेत तथा उनकी तृष्णा छोड़कर महान् धैर्यसे सम्पन्न और परम सुखी होकर पैदल ही पृथ्वीपर विचरने लगे। 'यह यौवन, रूप, आयु और धनका संग्रह सब अनित्य है'—यों विचारकर उनका मन तीनों लोकोंकी ओरसे फिर गया। पाण्डुनन्दन ! महायोगी पुण्डरीक पुराणोक्त मार्गसे यथासमय समस्त तीर्थोंमें विधिपूर्वक विचरने लगे।

एक समय धीर तपस्वी महाभाग पुण्डरीक अपने पूर्वकर्मोंके अधीन हो घूमते-घामते शालग्राम-तीर्थमें जा पहुँचे, जो तपस्याके धनी एवं तत्त्ववेत्ता मुनियोंके द्वारा सेवित था। उस परम पुण्यमय क्षेत्रमें सरस्वती नदीके देवह्रद नामक तीर्थमें स्नान करके उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महाबुद्धिमान् ब्राह्मण वहींके जातिस्मरी, चक्रकुण्ड, चक्र नदीसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य कुण्ड तथा अन्यान्य तीर्थोंमें भी घूमने लगे। तीर्थ-सेवनसे उनका अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध हो चुका था, अतः उन्होंने ध्यानयोगमें प्रवृत्त होकर वहीं अपना आश्रम बना लिया। उसी तीर्थमें शास्त्रोक्त विधि तथा परम भक्तिके साथ भगवान् गरुडध्वजकी आराधना करके वे सिद्धि पाना चाहते थे; इसलिये शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित एवं जितेन्द्रिय हो दीर्घ कालतक अकेले ही वहाँ निवास करते रहे। शाक, मूल और फल—यही उनका भोजन था। वे सदा संतुष्ट रहते और सबमें समान दृष्टि रखते थे। यम, नियम, 'आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा आलस्यरहित हो सदा विधिपूर्वक योगाभ्यास करते थे। उनके सारे पाप दूर हो चुके थे; वे वैदिक, तान्त्रिक तथा पौराणिक मन्त्रोंसे सर्वेश्वर भगवान् विष्णुकी आराधना करते थे; अतः उन्होंने भलीभाँति शुद्धि प्राप्त कर ली थी। राग-द्वेषसे मुक्त हो मूर्तिमान् स्वधर्मकी भाँति चित्तवृत्तियोंको भगवान्‌में लगाकर वे निरन्तर उनकी आराधनामें संलग्न रहते थे।

तदनन्तर किसी समय परमार्थ-तत्त्वके ज्ञाता साक्षात् सूर्यके समान महातेजस्वी, विष्णु-भक्तिसे परिपूर्ण हृदयवाले तथा वैष्णवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले देवर्षि नारदजी तपोनिधि पुण्डरीकको देखनेके लिये उस स्थानपर आये। नारदजीको आया देख पुण्डरीक प्रसन्न चित्तसे उठे और हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् विधिपूर्वक अर्घ्य निवेदन करके उन्होंने पुनः नारदजीको मस्तक झुकाया। फिर मन-ही-मन विचार किया—ये अद्भुत आकार और मनोहर वेष धारण करनेवाले तेजस्वी पुरुष कौन हैं। इनके हाथमें वीणा है तथा मुखपर प्रसन्नता छा रही है। यह सोचते हुए वे उन परम तेजस्वी नारदजीसे बोले—महाद्युते! आप कौन हैं? और कहाँसे इस आश्रमपर पधारे हैं? भगवन्! इस पृथ्वीपर आपका दर्शन तो प्रायः दुर्लभ ही है। मेरे लिये जो आज्ञा हो, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।'

नारदजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं नारद हूँ। तुम्हें

उत्तरखण्ड ] * श्रीविष्णुकी महिमा—भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा * ७३७


देखनेकी उत्कण्ठासे यहाँ आया हूँ। द्विजश्रेष्ठ ! भगवान्‌का भक्त यदि चाण्डाल हो तो भी वह स्मरण, वार्तालाप अथवा पूजन करनेपर सबको पवित्र कर देता है*। जो अपने हाथोंमें शार्ङ्ग नामक धनुष, पाञ्चजन्य शङ्ख, सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा धारण करते हैं तथा जो त्रिभुवनके नेत्र हैं, उन देवाधिदेव भगवान्‌का मैं दास हूँ।

पुण्डरीक बोले—देवर्षे ! आपका दर्शन पाकर मैं देहधारियोंमें धन्य हो गया, देवताओंके लिये भी परम पूजनीय बन गया। मेरे माता-पिता कृतार्थ हो गये और आज मैंने जन्म लेनेका फल पा लिया। नारदजी ! मैं आपका भक्त हूँ, मुझपर अनुग्रह कीजिये। मुझे परम गूढ़ रहस्यसे भरे हुए कर्तव्यका उपदेश दीजिये।

नारदजीने कहा—ब्रह्मन् ! इस पृथ्वीपर अनेक शास्त्र, बहुत-से कर्म और नाना प्रकारके धर्म हैं; इसीलिये संसारमें ऐसी विलक्षणता दिखायी देती है। अन्यथा सभी प्राणियोंको या तो केवल सुख-ही-सुख प्राप्त होता या केवल दुःख-ही-दुःख। [कोई सुखी और कोई दुःखी—ऐसा अन्तर देखनेमें नहीं आता।] कुछ लोगोंके मतमें 'यह जगत् क्षणिक, विज्ञानमात्र, चेतन आत्मासे रहित तथा बाह्य पदार्थोंकी अपेक्षासे शून्य है।' दूसरे लोग ऐसा कहते हैं कि 'यह जगत् सदा नित्य अव्यक्त (मूल प्रकृति) से उत्पन्न होता है तथा उसीमें लीन होता है, अतः उपादानकी नित्यताके अनुसार यह भी नित्य ही है। कुछ लोग तत्त्वके विचारमें प्रवृत्त होकर ऐसा निश्चय करते हैं कि 'आत्मा अनेक, नित्य एवं सर्वगत है।' दूसरे लोग इस निश्चयपर पहुँचे हैं कि 'जितने शरीर हैं, उतने ही आत्मा हैं।' इस मतके अनुसार हाथी और कीड़े आदिके शरीरमें तथा [ब्रह्माण्डरूपी] महान् अण्डमें भी आत्माकी सत्ता मौजूद है। कुछ लोगोंका कहना है कि 'आज इस जगत्‌की जैसी अवस्था है, वैसी ही कालान्तरमें भी रहती है। संसारका यह [अनादि] प्रवाह नित्य ही बना रहता है, भला इसका कर्ता कौन है।' कुछ अन्य व्यक्तियोंकी रायमें 'जो-जो वस्तु प्रत्यक्ष उपलब्ध होती है, उसके सिवा और किसी वस्तुकी सत्ता नहीं है; फिर स्वर्ग आदि कहाँ हैं।' कुछ लोग जगत्‌को ईश्वरकी सत्तासे रहित समझते हैं और कुछ लोग इसमें ईश्वरको व्यापक मानते हैं। इस प्रकार एक-दूसरेसे अत्यन्त भिन्न विचार रखनेवाले ये सभी लोग सत्यसे विमुख हो रहे हैं। इसी तरह भिन्न-भिन्न मतका मायाजाल फैलानेवाले दूसरे लोग भी बुद्धि और विद्याके अनुसार अपनी-अपनी युक्तियोंको स्थापित करते हुए भेदपूर्ण विचारोंको लेकर भाँति-भाँतिकी बातें करते हैं।

तपोधन ! अब मैं तर्कमें स्थित होकर वास्तविक तत्त्वकी बात कहता हूँ। यह परमार्थ-ज्ञान परम पुण्यमय और भयङ्कर संसारबन्धनका नाश करनेवाला है। देवता आदिसे लेकर मनुष्यपर्यन्त सब लोग उसीको प्रामाणिक मानते हैं, जो परमार्थज्ञानमूलक प्रतीत होता है। किन्तु जो अज्ञानसे मोहित हो रहे हैं, वे लोग अनागत (भविष्य), अतीत (भूत) और दूरवर्ती वस्तुको प्रमाण-रूपमें नहीं स्वीकार करते। उन्हें प्रत्यक्ष वर्तमान वस्तुकी ही प्रामाणिकता मान्य है। परन्तु मुनियोंने प्रत्यक्ष और अनुमानके सिवा उस आगमको भी प्रमाण माना है, जो पूर्वपरम्परासे एक ही रूपमें चला आ रहा हो। वास्तवमें ऐसे आगमको ही परमार्थ वस्तुके साधनमें प्रमाण मानना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ ! आगम उस शास्त्रका नाम है, 'जिसके अभ्यासके बलसे राग-द्वेषरूपी मलका नाश करनेवाला उत्तम ज्ञान उत्पन्न होता हो। जो कर्म और उसके फलरूपसे प्रसिद्ध है, जिसका तत्त्व ही विज्ञान और दर्शन नाम धारण करता है, जो सर्वत्र व्यापक और जाति आदिकी कल्पनासे रहित है, जिसे आत्मसंवेदन (आत्मानुभव) रूप, नित्य, सनातन, इन्द्रियातीत, चिन्मय, अमृत, ज्ञेय, अनन्त, अजन्मा, अविकारी, व्यक्त और अव्यक्तरूपमें स्थित, निरञ्जन (निर्मल), सर्वव्यापी श्रीविष्णुके नामसे विख्यात तथा वाणीद्वारा वर्णित समस्त


* स्मृतः सम्भाषितो वापि पूजितो वा द्विजोत्तम । पुनाति भगवद्भक्तश्चाण्डालोऽपि यदृच्छया ॥ (८१।५५)

७३८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [संक्षिप्त पद्मपुराण


वस्तुओंसे भिन्नरूपमें स्थित माना गया है, वह परमात्मा ही आगमका दूसरा लक्षण है। तात्पर्य यह कि साधन-भूत ज्ञान और साध्यस्वरूप ज्ञेय दोनों ही आगम हैं। वह ज्ञेय परमात्मा योगियोंद्वारा ध्यान करनेयोग्य है। परमार्थसे विमुख मनुष्योंद्वारा उसका ज्ञान होना असम्भव है। भिन्न-भिन्न बुद्धियोंसे वह यद्यपि भिन्न-सा लक्षित होता है, तथापि आत्मासे भिन्न नहीं है। तात पुण्डरीक ! ध्यान देकर सुनो। सुव्रत ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मेरे पूछनेपर जिस तत्त्वका उपदेश किया था, वही तुम्हें बतलाता हूँ। एक समय अज, अविनाशी पितामह ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमें विराजमान थे। उस समय मैंने विधिपूर्वक उनके चरणोंमें प्रणाम करके पूछा—'ब्रह्मन् ! कौन-सा ज्ञान सबसे उत्तम बताया गया है? तथा कौन-सा योग सर्वश्रेष्ठ माना गया है? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये।'

ब्रह्माजीने कहा— तात ! सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोगका श्रवण करो। यह थोड़े-से वाक्योंमें कहा गया है, किन्तु इसका अर्थ बहुत विस्तृत है। इसकी उपासनामें कोई क्लेश या परिश्रम नहीं है। जिन्हें गुरु-परम्परासे पञ्चविंशक¹ पुरुष बतलाया गया है, वे ही सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं; इसलिये उन्हींको सम्पूर्ण जगत्‌के निवासरूप सनातन परमात्मा नारायण कहा जाता है। वे ही संसारकी सृष्टि, संहार और पालनमें लगे रहते हैं। ब्रह्मन् ! ब्रह्मा, शिव और विष्णु—इन तीनों रूपोंमें एक ही देवाधिदेव सनातन पुरुष विराज रहे हैं। अपना हित चाहनेवाले पुरुषको सदा उन्हींकी आराधना करनी चाहिये। जो निःस्पृह, नित्य संतुष्ट, ज्ञानी, जितेन्द्रिय, ममता-अहङ्कारसे रहित, राग-द्वेषसे शून्य, शान्तचित्त और सब प्रकारकी आसक्तियोंसे पृथक् हो ध्यानयोगमें प्रवृत्त रहते हैं, वे ही उन अक्षय जगदीश्वरको देखते और प्राप्त करते हैं। जो लोग भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण कर चुके हैं तथा जिनके मन-प्राण उन्हींके चिन्तनमें लगे हैं, वे ही ज्ञानदृष्टिसे संसारकी वर्तमान अवस्थाको, कालान्तरमें होनेवाली अवस्थाको, भूत, भविष्य, वर्तमान और दूरको, स्थूल और सूक्ष्मको तथा अन्य ज्ञातव्य बातोंको यथार्थरूपसे देख पाते हैं। इसके विपरीत जिनकी बुद्धि मन्द और अन्तःकरण दूषित है तथा जिनका स्वभाव कुतर्क और अज्ञानसे दुष्ट हो रहा है, ऐसे लोगोंको सब कुछ उलटा ही प्रतीत होता है।

नारदजी कहते हैं— पुण्डरीक ! अब मैं दूसरा प्रसङ्ग सुनाता हूँ, इसे भी सुनो। पूर्वकालमें जगत्के कारणभूत ब्रह्माजीने ही इसका भी उपदेश किया था। एक बार इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता तथा ऋषियोंके पूछनेपर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्माजीने उनके हितकी बात इस प्रकार बतायी थी।

ब्रह्माजीने कहा— देवताओ ! भगवान् नारायण ही सबके आश्रय हैं। सनातन लोक, यज्ञ तथा नाना प्रकारके शास्त्रोंका भी पर्यवसान नारायणमें ही होता है। छहों अङ्गोंसहित वेद तथा अन्य आगम सर्वव्यापी


१. पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच इन्द्रियोंके विषय, मन, पाँच भूत, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति—ये चौबीस तत्त्व हैं, इनसे भिन्न सर्वज्ञ परमात्मा पचीसवाँ तत्त्व है; इसलिये वह 'पञ्चविंशक' कहलाता है।

उत्तरखण्ड ]
* श्रीविष्णुकी महिमा—भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा *
७३९


विश्वेश्वर श्रीहरिके ही स्वरूप हैं। पृथ्वी आदि पाँचों भूत भी वे ही अविनाशी परमेश्वर हैं। देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्‌को श्रीविष्णुमय ही जानना चाहिये; तथापि पापी मनुष्य मोहग्रस्त होनेके कारण इस बातको नहीं समझते। यह समस्त चराचर जगत् उन्हींकी मायासे व्याप्त है। जो मनसे भगवान्‌का ही चिन्तन करता है, जिसके प्राण भगवान्‌में ही लगे रहते हैं, वह परमार्थ तत्त्वका ज्ञाता पुरुष ही इस रहस्यको जानता है। सम्पूर्ण भूतोंके ईश्वर भगवान् विष्णु ही तीनों लोकोंका पालन करनेवाले हैं। यह सारा संसार उन्हींमें स्थित है और उन्हींसे उत्पन्न होता है। वे ही रुद्ररूप होकर जगत्‌का संहार करते हैं। पालनके समय उन्हींको श्रीविष्णु कहते हैं तथा सृष्टिकालमें मैं (ब्रह्मा) और अन्यान्य लोकपाल भी उन्हींके स्वरूप हैं। वे सबके आधार हैं, परन्तु उनका आधार कोई नहीं है। वे सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त होते हुए भी उनसे रहित हैं। वे ही छोटे-बड़े तथा उनसे भिन्न हैं। साथ ही इन सबसे विलक्षण भी हैं; अतः देवताओ ! सबका संहार करनेवाले उन श्रीहरिकी ही शरणमें जाओ। वे ही हमारे जन्मदाता पिता हैं। उन्हींको मधुसूदन कहा गया है।

**नारदजी कहते हैं—**कमलयोनि ब्रह्माजीके यों कहनेपर सब देवताओंने सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी सर्वव्यापी देव भगवान् जनार्दनकी शरण होकर उन्हें प्रणाम किया; अतः विप्रर्षे ! तुम भी श्रीनारायणकी आराधनामें लग जाओ। उनके सिवा दूसरा कौन ऐसा परम उदार देवता है, जो भक्तकी माँगी हुई वस्तु दे सके। वे पुरुषोत्तम ही पिता और माता हैं। सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी, देवताओंके भी देवता और जगदीश्वर हैं। तुम उन्हींकी परिचर्या करो। प्रतिदिन आलस्यरहित हो अग्निहोत्र, भिक्षा, तपस्या और स्वाध्यायके द्वारा उन देवदेवेश्वर गुरुको ही संतुष्ट करना चाहिये। ब्रह्मर्षे ! उन्हीं पुरुषोत्तम नारायणको तुम सब तरहसे अपनाओ।

उन बहुत-से मन्त्रों और उन बहुत-से व्रतोंके द्वारा क्या लेना है। 'ॐ नमो नारायणाय' यह मन्त्र ही सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करनेवाला है। द्विजश्रेष्ठ ! ब्राह्मण चीरवस्त्र पहनकर जटा रखा ले या दण्ड धारण करके मूँड़ मुँड़ा ले अथवा आभूषणोंसे विभूषित रहे; ऊपरी चिह्न धर्मका कारण नहीं होता। जो भगवान् नारायणकी शरण ले चुके हैं, वे क्रूर, दुरात्मा और सदा ही पापाचारी रहे हों तो भी परमपदको प्राप्त होते हैं। जिनके पाप दूर हो गये हैं, ऐसे वैष्णव पुरुष कभी पापसे लिप्त नहीं होते। वे अहिंसा-भावके द्वारा अपने मनको काबूमें किये रहते हैं और सम्पूर्ण संसारको पवित्र करते हैं।*

क्षत्रबन्धु नामके राजाने, जो सदा प्राणियोंकी हिंसामें ही लगा रहता था, भगवान् केशवकी शरण लेकर श्रीविष्णुके परमधामको प्राप्त कर लिया। महान् धैर्यशाली राजा अम्बरीषने अत्यन्त कठोर तपस्या की थी और भगवान् पुरुषोत्तमकी आराधना करके उनका साक्षात्कार किया था। राजाओंके भी राजा मित्रासन बड़े तत्त्ववेत्ता थे। उन्होंने भी भगवान् हृषीकेशकी आराधना करके ही उनके वैकुण्ठधामको प्राप्त किया था। उनके सिवा बहुत-से ब्रह्मर्षि भी, जो तीक्ष्ण व्रतोंका पालन करनेवाले और शान्तचित्त थे, परमात्मा विष्णुका ध्यान करके परम सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त हुए। पूर्वकालमें परम आह्लादसे भरे हुए प्रह्लाद भी सम्पूर्ण जीवोंके आश्रयभूत श्रीहरिका सेवन, पूजन और ध्यान करते थे; अतः भगवान्‌ने ही उनकी संकटोंसे रक्षा की। परम धर्मात्मा और तेजस्वी राजा भरतने भी दीर्घ कालतक इन श्रीविष्णुभगवान्‌की उपासना करके परम मोक्ष प्राप्त कर लिया था।


* किं तैस्तु मन्त्रैर्बहुभिः किं तैस्तु बहुभिर्व्रतैः। ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः॥
चीरवासा जटी विप्रो दण्डी मुण्डी तथैव च। भूषितो वा द्विजश्रेष्ठ न लिङ्गं धर्मकारणम्॥
ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचारपराः सदा। तेऽपि यान्ति परं स्थानं नारायणपरायणाः॥
लिप्यन्ते न च पापेन वैष्णवा वीतकल्मषाः। पुनन्ति सकलं लोकमहिंसाजितमानसाः॥ (८१।१०७—११०)

७४० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ***********************************************************************************************************

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी— कोई भी क्यों न हो, भगवान् केशवकी आराधनाको छोड़कर परमगतिको नहीं प्राप्त हो सकता। हजारों जन्म लेनेके पश्चात् जिसकी ऐसी बुद्धि होती है कि 'मैं भगवान् विष्णुके भक्तोंका दास हूँ', वह समस्त पुरुषार्थोंका साधक होता है। वह पुरुष भी निस्सन्देह श्रीविष्णुधाममें जाता है। फिर जो कठोर व्रतोंका पालन करनेवाले पुरुष भगवान् विष्णुमें ही मन-प्राण लगाये रहते हैं, उनकी उत्तम गतिके विषयमें क्या कहना है। अतः तत्त्वका चिन्तन करनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे नित्य-निरन्तर अनन्य चित्तसे विश्वव्यापी सनातन परमात्मा नारायणका ध्यान करते रहें।*

भीष्मजी कहते हैं— यों कहकर परोपकारपरायण परमार्थवेत्ता देवर्षि नारद वहीं अन्तर्धान हो गये। नारायणकी शरणमें पड़े हुए धर्मात्मा पुण्डरीक भी 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षरमन्त्रका जप करने लगे। वे अपने हृदयकमलमें अमृतस्वरूप गोविन्दकी स्थापना करके मुखसे सदा यही कहा करते थे कि 'हे विश्वात्मन्! आप मुझपर प्रसन्न होइये।' द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित हो तपोधन पुण्डरीकने उस निर्मल शालग्रामतीर्थमें अकेले ही चिरकालतक निवास किया। स्वप्नमें भी उन्हें केशवके सिवा और कुछ नहीं दिखायी देता था। उनकी निद्रा भी पुरुषार्थ-सिद्धिकी विरोधिनी नहीं थी। तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा विशेषतः शौचाचारके पालनसे, जन्म-जन्मान्तरोंके विशुद्ध संस्कारसे तथा सर्वलोकसाक्षी देवाधिदेव श्रीविष्णुके प्रसादसे पापरहित पुण्डरीकने परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि प्राप्त कर ली। वे सदा हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा लिये कमलके समान नेत्रोंवाले श्यामसुन्दर पीताम्बरधारी भगवान् अच्युतकी ही झाँकी किया करते थे। मृगों और प्राणियोंकी हिंसा करनेवाले सिंह, व्याघ्र तथा अन्यान्य जीव अपना स्वाभाविक विरोध छोड़कर उनके समीप आते और इच्छानुसार विचरण करते थे। उनकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ प्रसन्न रहती थीं। उनके हृदयमें एक-दूसरेके हितसाधनका मनोरम भाव भर जाता था। वहाँके जलाशय और नदियोंके जल स्वच्छ हो गये थे। सभी ऋतुओंमें वहाँ प्रसन्नता छायी रहती थी। सबकी इन्द्रिय-वृत्तियाँ शुद्ध हो गयी थीं। हवा ऐसी चलती थी, जिसका स्पर्श सुखदायक जान पड़े। वृक्ष फूल और फलोंसे लदे रहते थे। परम बुद्धिमान् पुण्डरीकके लिये सभी पदार्थ अनुकूल हो गये थे। देवदेवेश्वर भक्तवत्सल गोविन्दके प्रसन्न होनेपर उनके लिये समस्त चराचर जगत् प्रसन्न हो गया था।

तदनन्तर एक दिन बुद्धिमान् पुण्डरीकके सामने भगवान् जगन्नाथ प्रकट हुए। हाथोंमें शङ्ख, चक्र और


* ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः। केशवाराधनं हित्वा नैव याति परां गतिम्॥
जन्मान्तरसहस्रेषु यस्य स्यान्मतिरीदृशी। दासोऽहं विष्णुभक्तानामिति सर्वार्थसाधकः॥
स याति विष्णुसालोक्यं पुरुषो नात्र संशयः। किं पुनस्तद्गतप्राणाः पुरुषाः संशितव्रताः॥
अनन्यमनसा नित्यं ध्यातव्यस्तत्त्वचिन्तकैः। नारायणो जगद्व्यापी परमात्मा सनातनः॥ (८९।११७—१२०)

उत्तरखण्ड ] * श्रीविष्णुकी महिमा-भक्तप्रवर पुण्डरीककी कथा * ७४१


गदा शोभा पा रहे थे। तेजोमयी आकृति, कमलके समान बड़े-बड़े नेत्र और चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् मुख। कमरमें करधनी, कानोंमें कुण्डल, गलेमें हार, बाहुओंमें भुजबन्द, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न और श्याम शरीरपर पीतवस्त्र शोभा पा रहे थे। भगवान् कौस्तुभमणिसे विभूषित थे। वनमालासे उनका सारा अङ्ग व्याप्त था। मकराकृत कुण्डल जगमगा रहे थे। चमकते हुए यज्ञोपवीत और नीचेतक लटकती हुई मोतियोंकी मालासे उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। देव, सिद्ध, देवेन्द्र, गन्धर्व और मुनि चँवर तथा व्यजन आदिसे भगवान्‌की सेवा कर रहे थे। पापरहित पुण्डरीकने स्वयं उन देवदेवेश्वर महात्मा जनार्दनको वहाँ उपस्थित देख पहचान लिया और प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़ प्रणाम करके स्तुति करना आरम्भ किया।

**पुण्डरीक बोले—**सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र नेत्र आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप निरञ्जन (निर्मल), नित्य, निर्गुण एवं महात्मा हैं; आपको नमस्कार है। आप समस्त प्राणियोंके ईश्वर हैं भक्तोंका भय एवं पीड़ा दूर करनेके लिये गोविन्द तथा गरुडध्वज-रूप धारण करते हैं। जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये अनेक आकार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपमें ही स्थित है। केवल आप ही इसके उपादान कारण हैं। आपने ही जगत्‌का निर्माण किया है। नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले आप भगवान् पद्मनाभको बारंबार नमस्कार है। समस्त वेदान्तोंमें जिनकी आत्मविभूतिका ही श्रवण किया जाता है, उन परमेश्वरको नमस्कार है। नारायण! आप ही सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी और जगत्‌के कारण हैं। मेरे हृदय-मन्दिरमें निवास करनेवाले भगवान् शङ्ख-चक्र-गदाधर! मुझपर प्रसन्न होइये। समस्त प्राणियोंके आदिभूत, इस पृथ्वीको धारण करनेवाले, अनेक रूपधारी तथा सबकी उत्पत्तिके कारण श्रीविष्णुको नमस्कार है। ब्रह्मा आदि देवता और सुरेश्वर भी जिनकी महिमाको नहीं जानते, जिनकी महिमाका तपस्यासे ही अनुमान हो सकता है, उन परमात्माको नमस्कार है। भगवन्! आपकी महिमा वाणीका विषय नहीं है, उसे कहना असम्भव है। आप जाति आदिकी कल्पनासे दूर हैं, अतः सदा तत्त्वतः ध्यान करनेके योग्य हैं। पुरुषोत्तम! आप एक—अद्वितीय होते हुए भी भक्तोंपर कृपा करनेके लिये भेदरूपसे मत्स्य-कूर्म आदि अवतार धारण करके दर्शन देते हैं।

**भीष्मजी कहते हैं—**इस प्रकार जगत्‌के स्वामी वीरवर भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करके पुण्डरीक उन्हींको निहारने लगे; क्योंकि चिरकालसे वे उनके दर्शनकी लालसा रखते थे। तब तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले तथा नाभिसे कमल प्रकट करनेवाले भगवान् विष्णुने महाभाग पुण्डरीकसे गम्भीर वाणीमें कहा—'बेटा पुण्डरीक! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। महामते! तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, उसे वरके रूपमें माँगो। मैं अवश्य दूँगा।'

**पुण्डरीक बोले—**देवेश्वर! कहाँ मैं अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला मनुष्य और कहाँ मेरे परम हितैषी आप। माधव! जिसमें मेरा हित हो, उसे आप ही दीजिये।

पुण्डरीकके यों कहनेपर भगवान् अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—'सुव्रत! तुम्हारा कल्याण हो। आओ, मेरे ही साथ चलो। तुम मेरे परम उपकारी और सदा मुझमें ही मन लगाये रखनेवाले हो; अतः सर्वदा मेरे साथ ही रहो।'

**भीष्मजी कहते हैं—**भक्तवत्सल भगवान् श्रीधरने प्रसन्नतापूर्वक जब इस प्रकार कहा, उसी समय आकाशमें देवताओंकी दुंदुभी बज उठी और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। ब्रह्मा आदि देवता साधुवाद देने लगे। सिद्ध, गन्धर्व और किन्नर गान करने लगे। समस्त लोकोंद्वारा वन्दित देवदेव जगदीश्वरने वहीं पुण्डरीकको अपने साथ ले लिया और गरुड़पर आरूढ़ हो वे परम धामको चले गये; इसलिये राजेन्द्र युधिष्ठिर!

७४२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


तुम भी भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लग जाओ। उन्हींमें मन, प्राण लगाये रहो और सदा उनके भक्तोंके हितमें तत्पर रहो। यथायोग्य अर्चना करके पुरुषोत्तमका भजन करो और सब पापोंका नाश करनेवाली भगवान्‌की पवित्र कथा सुनो। राजन् ! जिस उपायसे भी भक्तपूजित विश्वात्मा भगवान् विष्णु प्रसन्न हों, वह विस्तारके साथ करो। जो मनुष्य भगवान् नारायणसे विमुख होते हैं, वे सौ अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी उन्हें नहीं पा सकते। जिसने एक बार भी 'हरि' इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने मोक्षतक पहुँचनेके लिये मानो कमर कस ली। जिनके हृदयमें नीलकमलके समान श्यामसुन्दर भगवान् जनार्दन विराजमान हैं, उन्हींको लाभ है, उन्हींकी विजय है; उनकी पराजय कैसे हो सकती है।* जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इसे सुनता या पढ़ता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।


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श्रीगङ्गाजीकी महिमा, वैष्णव पुरुषोंके लक्षण तथा श्रीविष्णु-प्रतिमाके पूजनका माहात्म्य

**पार्वती बोलीं—**महामते ! श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये, जिसे सुनकर सभी मुनि संसारकी ओरसे विरक्त हो जाते हैं।

**श्रीमहादेवजीने कहा—**देवि ! बुद्धिमें बृहस्पति और पराक्रममें इन्द्रके समान भीष्मजी जब बाणशय्यापर शयन कर रहे थे, उस समय उन्हें देखनेके लिये अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, गौतम, अगस्त्य और सुमति आदि बहुत-से ऋषि आये। धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ वहाँ मौजूद थे। उन्होंने उन परम तेजस्वी, जगत्पूज्य ऋषियोंको प्रणाम करके विधिपूर्वक उनका पूजन किया। पूजा ग्रहण करके वे तपोधन महात्मा जब सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये, तब युधिष्ठिरने भीष्मजीको प्रणाम करके इस प्रकार पूछा—पितामह ! धर्मार्थी पुरुषोंके नित्य सेवन करनेयोग्य परम पुण्यमय देश, पर्वत और आश्रम


* अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतैरपि। प्राप्नुवन्ति नरा नैव नारायणपराङ्मुखाः ॥

उत्तरखण्ड ] * श्रीगङ्गाजीकी महिमा तथा श्रीविष्णु-प्रतिमाके पूजनका माहात्म्य * ७४३


कौन-कौन-से हैं?'

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास बतलाया जाता है, जिसमें शिल और उञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मणका किसी सिद्ध पुरुषके साथ हुए संवादका वर्णन है। कोई सिद्ध पुरुष समूची पृथ्वीकी परिक्रमा करके किसी उञ्छवृत्तिवाले महात्मा गृहस्थके घर गये। वे आत्मविद्याके तत्त्वज्ञ, सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखनेवाले, राग-द्वेषसे रहित, ज्ञान-कर्ममें कुशल, वैष्णवोंमें श्रेष्ठ, वैष्णव-धर्मके पालनमें तत्पर, वैष्णवोंकी निन्दासे दूर रहनेवाले, योगाभ्यासी, त्रिकालपूजाके तत्त्वज्ञ, वेदविद्यामें निपुण, धर्माधर्मका विचार करनेवाले, नित्य नियमपूर्वक वेदपाठ करनेवाले और सदा अतिथिपूजामें तत्पर रहनेवाले थे। सिद्ध पुरुषको आया देख गृहस्थने उनका विधिपूर्वक आतिथ्य-सत्कार किया। तत्पश्चात् उनसे पूछा— द्विजवर ! कौन-कौनसे देश, पर्वत और आश्रम पवित्र हैं? मुझे प्रेमपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।

सिद्ध पुरुषने कहा— ब्रह्मन् ! जिनके बीच नदियोंमें श्रेष्ठ त्रिपथगा गङ्गाजी सदा बहती रहती हैं, वे ही देश, वे ही जनपद, वे ही पर्वत और वे ही आश्रम परम पवित्र हैं। जीव गङ्गाजीका सेवन करके जिस गतिको प्राप्त करता है, उसे तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागसे भी नहीं पा सकता।* अपने मनको संयममें रखनेवाले पुरुषोंको गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे जो संतोष होता है, वह सौ यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी नहीं हो सकता। जैसे सूर्य उदयकालमें तीव्र अन्धकारका नाश करके तेजसे उद्भासित हो उठता है, उसी प्रकार गङ्गाजीके जलमें डुबकी लगानेवाला मनुष्य पापोंका नाश करके पुण्यसे प्रकाशमान होने लगता है। विप्र ! जैसे आगका संयोग पाकर रूईका ढेर जल जाता है, उसी प्रकार गङ्गाका स्नान मनुष्यके सारे पापोंको दूर कर देता है।† जो मनुष्य सूर्यकी किरणोंसे तपे हुए गङ्गाजलका पान करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो जाता है। जो पुरुष एक पैरसे खड़ा होकर एक हजार चान्द्रायण व्रतोंका अनुष्ठान करता है और जो केवल गङ्गाजीके जलमें डुबकी लगाता है—इन दोनोंमें डुबकी लगानेवाला मनुष्य ही श्रेष्ठ है। जो दस हजार वर्षोंतक नीचे सिर करके लटका रहता है, उसकी अपेक्षा भी वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो एक मास भी गङ्गाजलका सेवन कर लेता है। नरश्रेष्ठ ! गङ्गाजीमें स्नान करके मनुष्य देहत्यागके पश्चात् तुरंत वैकुण्ठमें चला जाता है। जो सौ योजन दूरसे भी 'गङ्गा-गङ्गा'का उच्चारण करता है, वह


सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति ॥
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः। येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥ (८१।१६३—१६५)

* तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुनः। गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गङ्गां संसेव्य यां लभेत् ॥ (८२। २४)
† अपहृत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रविः। तथापहृत्य पाप्मानं भाति गङ्गाजलाप्लुतः ॥
अग्निं प्राप्य यथा विप्र तूलराशिविनश्यति। तथा गङ्गावगाह्य सर्वपापं व्यपोहति ॥ (८२। २६-२७)

७४४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण

सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुलोकको चला जाता है।*

ब्रह्महत्यारा, गोघाती, शराबी और बालहत्या करनेवाला मनुष्य भी गङ्गाजीमें स्नान करके सब पापोंसे छूट जाता और तत्काल देवलोकमें चला जाता है। माधव तथा अक्षयवटका दर्शन और त्रिवेणीमें स्नान करनेवाला पुरुष वैकुण्ठमें जाता है। जैसे सूर्यके उदय होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार गङ्गामें स्नान करनेमात्रसे मनुष्यके सारे पाप दूर हो जाते हैं। गङ्गाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक, नील पर्वत तथा कनखल तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता।†

**भीष्मजी कहते हैं—**ऐसा जानकर श्रेष्ठ मनुष्यको बारंबार गङ्गास्नान करना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। जैसे देवताओंमें विष्णु, यज्ञोंमें अश्वमेध और समस्त वृक्षोंमें अश्वत्थ (पीपल) श्रेष्ठ है, उसी प्रकार नदियोंमें भागीरथी गङ्गा सदा श्रेष्ठ मानी गयी है।

**पार्वतीने पूछा—**विश्वेश्वर ! वैष्णवोंका लक्षण कैसा बताया गया है तथा उनकी महिमा कैसी है? प्रभो ! यह बतानेकी कृपा करें।

**महादेवजी बोले—**देवि ! भक्त पुरुष भगवान् विष्णुकी वस्तु माना गया है, इसलिये इसे 'वैष्णव' कहते हैं। जो शौच, सत्य और क्षमासे युक्त हो, राग-द्वेषसे दूर रहता हो, वेद-विद्याके विचारका ज्ञाता हो, नित्य अग्निहोत्र और अतिथियोंका सत्कार करता हो तथा पिता-माताका भक्त हो, वह वैष्णव कहलाता है। जो कण्ठमें माला धारण करके मुखसे सदा श्रीरामनामका उच्चारण करते, भक्तिपूर्वक भगवान्‌की लीलाओंका गान करते, पुराणोंके स्वाध्यायमें लगे रहते और सर्वदा यज्ञ किया करते हैं, उन मनुष्योंको वैष्णव जानना चाहिये। वे सब धर्मोंमें सम्मानित होते हैं। जो पापाचारी मनुष्य उन वैष्णवोंकी निन्दा करते हैं, वे मरनेपर बारंबार कुत्सित योनियोंमें पड़ते हैं। जो द्विज धातु अथवा मिट्टीकी बनी हुई चार हाथोंवाली शोभामयी गोपाल-मूर्तिको सदा पूजन करते हैं, वे पुण्यके भागी होते हैं। जो ब्राह्मण पत्थरकी बनी हुई परम सुन्दर रूपवाली श्रीकृष्ण-प्रतिमाकी पूजा करते हैं, वे पुण्यस्वरूप हैं। जहाँ शालग्रामशिला तथा द्वारकाकी गोमती-चक्राङ्कित शिला हो और उन दोनोंका पूजन किया जाता हो, वहाँ निःसन्देह मुक्ति मौजूद रहती है। वहाँ यदि मन्त्रद्वारा मूर्तिकी स्थापना करके पूजन किया जाय तो वह पूजन कोटिगुना अधिक पुण्य देनेवाला तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करनेवाला होता है। वहाँ भगवान् जनार्दनकी नवधा भक्ति करनी चाहिये। भक्त पुरुषोंको मूर्तिमें भगवान्‌का ध्यान और पूजन करना चाहिये। सम्भव हो तो भगवन्मूर्तिकी राजोचित उपचारोंसे पूजा करे तथा उस मूर्तिमें दीनों और अनाथोंको एकमात्र शरण देनेवाले, सम्पूर्ण लोकोंके हितकारी एवं बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाले सर्वात्मा भगवान् अधोक्षजका नित्य-निरन्तर स्मरण करे। जो मूर्तिके सम्बन्धमें 'ये गोपाल हैं', 'ये साक्षात् श्रीकृष्ण हैं', 'ये श्रीरामचन्द्रजी हैं'—यों कहता है और इसी भावसे विधिपूर्वक पूजा करता है, वह निश्चय ही भगवान्‌का भक्त है। श्रेष्ठ वैष्णव द्विजोंको चाहिये कि वे परम भक्तिके साथ सोने, चाँदी, ताँबे अथवा पीतलकी विष्णु-प्रतिमाका निर्माण करायें, जिसके चार भुजा, दो नेत्र, हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा, शरीरपर पीत वस्त्र, गलेमें वनमाला, कानोंमें वैदूर्यमणिके कुण्डल, माथेपर मुकुट और वक्षःस्थलमें कौस्तुभमणिका दिव्य प्रकाश हो। प्रतिमा भारी और शोभासम्पन्न होनी चाहिये। फिर वेद-शास्त्रोक्त मन्त्रोंके द्वारा विशेष समारोहसे उसकी स्थापना कराकर पीछे शास्त्रके अनुसार षोडशोपचारके मन्त्र आदिद्वारा विधिपूर्वक उसका पूजन करना चाहिये। जगत्‌के स्वामी भगवान् विष्णुके पूजित होनेपर सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा हो जाती है। अतः इस प्रकार आदि-अन्तसे रहित, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले


* गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥ (८२। ३४-३५)
† गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते। स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते॥ (८२। ३८-३९)

उत्तरखण्ड ] * चैत्र और वैशाख मासके विशेष उत्सवका वर्णन * ७४५


भगवान् श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। वे सर्वेश्वर पुण्यस्वरूप वैष्णवोंको सब कुछ देते हैं। जो शिवकी पूजा नहीं करता और श्रीविष्णुकी निन्दामें तत्पर रहता है, उसे निश्चय ही रौरव नरकमें निवास करना पड़ता है। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही रुद्र हूँ और मैं ही पितामह ब्रह्मा हूँ। मैं ही सदा सब भूतोंमें निवास किया करता हूँ।

चैत्र और वैशाख मासके विशेष उत्सवका वर्णन, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़में जलस्थ श्रीहरिके पूजनका महत्त्व

पार्वती बोलीं— महेश्वर! सब महीनोंकी विधिका वर्णन कीजिये। प्रत्येक मासमें कौन-कौन-से महोत्सव करने चाहिये और उनके लिये उत्तम विधि क्या है ? सुरेश्वर ! किस महीनेका कौन देवता है ? किसकी पूजा करनी चाहिये, उस पूजनकी महिमा कैसी है और वह किस तिथिको करना उचित है ?

महादेवजी बोले— देवि ! मैं प्रत्येक मासके उत्सवकी विधि बतलाता हूँ। पहले चैत्र मासके शुक्लपक्षमें विशेषतः एकादशी तिथिको भगवान्‌को झूलेपर बिठाकर पूजा करनी चाहिये। यह दोलारोहणका उत्सव बड़ी भक्तिके साथ और विधिपूर्वक मनाना चाहिये। पार्वती ! जो लोग कलियुगके पाप-दोषका अपहरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको झूलेपर विराजमान देखते हैं—उस रूपमें उनकी झाँकी करते हैं, वे सहस्रों अपराधोंसे मुक्त हो जाते हैं। करोड़ों जन्मोंमें किये हुए पाप तभीतक मौजूद रहते हैं, जबतक मनुष्य विश्वके स्वामी भगवान् जगन्नाथको झूलेपर बिठाकर उन्हें अपने हाथसे झुलाता नहीं। जो लोग कलियुगमें झूलेपर बैठे हुए जनार्दनका दर्शन करते हैं, वे गोहत्यारे हों तो भी मुक्त हो जाते हैं; फिर औरोंकी तो बात ही क्या है। दोलोत्सवसे प्रसन्न होकर समस्त देवता भगवान् शङ्करको साथ लेकर झूलेपर बैठे हुए श्रीविष्णुकी झाँकी करनेके लिये आते हैं और आँगनमें खड़े हो हर्षमें भरकर स्वयं भी नाचते, गाते एवं बाजे बजाते हैं। वासुकि आदि नाग और इन्द्र आदि देवता भी दर्शनके लिये पधारते हैं। भगवान् विष्णुको झूलेपर विराजमान देख तीनों लोकोंमें उत्सव होने लगता है; अतः सैकड़ों कार्य छोड़कर दोलोत्सवके दिन झूलनका उत्सव करो। जो लोग झूलेपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णके सामने रात्रिमें जागरण करते हैं, उन्हें एक निमेषमें ही सब पुण्योंकी प्राप्ति हो जाती है। सुरेश्वरि ! झूलेपर विराजमान दक्षिणाभिमुख भगवान् गोविन्दका एक बार भी दर्शन करके मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे छूट जाता है।

ॐ दोलारूढाय विद्महे माधवाय च धीमहि। तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥

'झूलेपर बैठे हुए भगवान्‌का तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। श्रीमाधवका ध्यान करते हैं। अतः वे देव—भगवान् विष्णु हमलोगोंकी बुद्धिको प्रेरित करें।'

इस गायत्री-मन्त्रके द्वारा भगवान्‌का पूजन करना चाहिये। 'माधवाय नमः', 'गोविन्दाय नमः' और 'श्रीकण्ठाय नमः' इन मन्त्रोंसे भी पूजन किया जा सकता है। मन्त्रोच्चारणके साथ विधिपूर्वक पूजन करना उचित है। एकाग्रचित्त होकर गुरुको यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये तथा निरन्तर भक्तिपूर्वक श्रीविष्णुकी लीलाओंका गान करते रहना चाहिये। इससे उत्सव पूर्ण होता है। सुमुखि ! और अधिक कहनेसे क्या लाभ। झूलेपर विराजमान भगवान् विष्णु सब पापोंको हरनेवाले हैं। जहाँ दोलोत्सव होता है, वहाँ देवता, गन्धर्व, किन्नर और ऋषि बहुधा दर्शनके लिये आते हैं। उस समय 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मन्त्रद्वारा षोडशोपचारसे विधिवत् पूजा करनी उचित है। इससे सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं।' सुव्रते ! अङ्गन्यास, करन्यास तथा शरीरन्यास—सब कुछ द्वादशाक्षर मन्त्रसे करना चाहिये और इस आगमोक्त मन्त्रसे ही महान् उत्सवका कार्य सम्पन्न करना चाहिये। झूलेपर सबसे

७४६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


ऊँचे लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको बैठाना चाहिये। भगवान्‌के आगे [कुछ नीची सतहमें] वैष्णवोंको, नारदादि देवर्षियोंको तथा विष्वक्सेन आदि भक्तोंको स्थापित करना चाहिये। फिर पाँच प्रकारके बाजोंकी आवाजके साथ विद्वान् पुरुष भगवान्‌की आरती करे और प्रत्येक पहरमें यत्नपूर्वक पूजा भी करता रहे। तत्पश्चात् नारियल तथा सुन्दर केलोंके साथ जलसे भगवान्‌को अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—

देवदेव जगन्नाथ शङ्खचक्रगदाधर ।
अर्घ्यं गृहाण मे देव कृपां कुरु ममोपरि ॥
(८५।३१)

'देवताओंके देवता, जगत्‌के स्वामी तथा शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले दिव्यस्वरूप नारायण ! यह अर्घ्य ग्रहण करके मुझपर कृपा कीजिये।'

तदनन्तर भगवान्‌के प्रसादभूत चरणामृत आदि वैष्णवोंको बाँटे। वैष्णवजनोंको चाहिये कि वे बाजे बजाकर भगवान्‌के सामने नृत्य करें और सभी लोग बारी-बारीसे भगवान्‌को झुलायें। सुरेश्वरि ! पृथ्वीपर जो-जो तीर्थ और क्षेत्र हैं, वे सभी उस दिन भगवान्‌का दर्शन करने आते हैं—ऐसा जानकर यह महान् उत्सव अवश्य करना चाहिये।

पार्वती ! वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन वैष्णव पुरुष भक्ति, उत्साह और प्रसन्नताके साथ जगदीश्वर भगवान्‌को जलमें पधराकर उनकी पूजा करे अथवा एकादशी तिथिको अत्यन्त हर्षमें भरकर गीत, वाद्य तथा नृत्यके साथ यह पुण्यमय महोत्सव करे। भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी लीला-कथाका गान करते हुए ही यह शुभ उत्सव रचाना उचित है। उस समय भगवान्‌से प्रार्थना-पूर्वक कहे—'हे देवेश्वर ! इस जलमें शयन कीजिये।' जो लोग वर्षाकालके आरम्भमें भगवान् जनार्दनको जलमें शयन कराते हैं, उन्हें कभी नरककी ज्वालामें नहीं तपना पड़ता। देवेश्वरि ! सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टीके बर्तनमें श्रीविष्णुको शयन कराना उचित है। पहले उस बर्तनमें शीतल एवं सुगन्धित जल रखकर विद्वान् पुरुष उस जलके भीतर श्रीविष्णुको स्थापित करे। गोपाल या श्रीराम नामक मूर्तिकी स्थापना करे अथवा शालग्रामशिलाको ही स्थापित करे या और ही कोई प्रतिमा जलमें रखे। उससे होनेवाले पुण्यका अन्त नहीं है। देवि ! इस पृथ्वीपर जबतक पर्वत, लोक और सूर्यकी किरणें विद्यमान हैं, तबतक उसके कुलमें कोई नरकगामी नहीं होता। अतः ज्येष्ठ मासमें श्रीहरिको जलमें पधराकर उनकी पूजा करनी चाहिये। इससे मनुष्य प्रलय-कालतक निष्पाप बना रहता है। ज्येष्ठ और आषाढ़के समय तुलसीदलसे वासित शीतल जलमें भगवान् धरणीधरकी पूजा करे। जो लोग. ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें नाना प्रकारके पुष्पोंसे जलमें स्थित श्रीकेशवकी पूजा करते हैं, वे यम-यातनासे छुटकारा पा जाते हैं। भगवान् विष्णु जलके प्रेमी हैं, उन्हें जल बहुत ही प्रिय है; इसीलिये वे जलमें शयन करते हैं। अतः गर्मीके मौसममें विशेषरूपसे जलमें स्थापित करके ही श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। जो शालग्रामशिलाको जलमें विराजमान करके परम भक्तिके साथ उसकी पूजा करता है, वह अपने कुलको पवित्र करनेवाला होता है। पार्वती ! सूर्यके मिथुन और कर्कराशिपर स्थित होनेके

उत्तरखण्ड ] * पवित्रारोपणकी विधि तथा श्रीहरिकी पूजामें आनेवाले पुष्पोंका वर्णन * ७४७


समय जिसने भक्तिपूर्वक जलमें श्रीहरिकी पूजा की है, विशेषतः द्वादशी तिथिको जिसने जलशायी विष्णुका अर्चन किया है, उसने मानो कोटिशत यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया। जो वैशाख मासमें भगवान् माधवको जलपात्रमें स्थापित करके उनका पूजन करते हैं, वे इस पृथ्वीपर मनुष्य नहीं, देवता हैं।

जो द्वादशीकी रातको जलपात्रमें गन्ध आदि डालकर उसमें भगवान् गरुडध्वजकी स्थापना और पूजा करता है, वह मोक्षका भागी होता है। जो श्रद्धारहित, पापात्मा, नास्तिक, संशयात्मा और तर्कमें ही स्थित रहनेवाले हैं, ये पाँच व्यक्ति पूजाके फलके भागी नहीं होते।* इसी प्रकार जो जगत्‌के स्वामी महेश्वर श्रीविष्णुको सदा जलमें रखकर उनकी पूजा करता है, वह मनुष्य सदाके लिये महापापोंसे मुक्त हो जाता है। देवेश्वरि ! 'ॐ ह्रां ह्रीं रामाय नमः' इस मन्त्रसे वहाँ पूजन बताया गया है। 'ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय नमः' इस मन्त्रसे जलको अभिमन्त्रित करना चाहिये। तत्पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्रसे अर्घ्य निवेदन करे—

देवदेव महाभाग श्रीवत्संकृतलाञ्छन।
महादेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन॥
अर्घ्यं गृहाण भो देव मुक्तिं मे देहि सर्वदा।
(८७।२३-२४)

'देवदेव ! महाभाग ! श्रीवत्सके चिह्नोंसे युक्त महान् देवता ! विश्वको उत्पन्न करनेवाले भगवान् नारायण ! मेरा अर्घ्य ग्रहण करें और मुझे सदाके लिये मोक्ष प्रदान करें।'

जो नाना प्रकारके पुष्पोंसे गरुडासन श्रीविष्णुकी पूजा करता है, वह सब बाधाओंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके सायुज्यको प्राप्त होता है। द्वादशीको एकाग्रचित्त हो रातमें जागरण करके अविकारी एवं अविनाशी भगवान् विष्णुका भक्तिपूर्वक भजन करे। इस तरह भक्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको भक्तिभावसे तत्पर हो भगवान् विष्णुका वैशाखसम्बन्धी उत्सव करना चाहिये, तथा उसमें आगमोक्त मन्त्रद्वारा समस्त विधिका पालन करना चाहिये। महादेवि ! ऐसा करनेसे कोटि यज्ञोंके समान फल मिलता है। इस उत्सवको करनेवाला पुरुष राग-द्वेषसे मुक्त हो महामोहकी निवृत्ति करके इस लोकमें सुख भोगता और अन्तमें श्रीविष्णुके सनातन धामको जाता है। वेदके अध्ययनसे रहित तथा शास्त्रके स्वाध्यायसे शून्य मनुष्य भी श्रीहरिकी भक्ति पाकर वैष्णवपदको प्राप्त होता है।

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पवित्रारोपणकी विधि, महिमा तथा भिन्न-भिन्न मासमें श्रीहरिकी पूजामें काम आनेवाले विविध पुष्पोंका वर्णन

श्रीमहादेवजी कहते हैं— देवेश्वरी ! श्रावण मास आनेपर पवित्रारोपणका विधान है। इसका पालन करनेपर दिव्य भक्ति उत्पन्न होती है। विद्वान् पुरुषको भक्तिपूर्वक श्रीविष्णुका पवित्रारोपण करना चाहिये। पार्वति ! ऐसा करनेसे वर्षभरकी पूजा सम्पन्न हो जाती है। श्रीविष्णुके लिये पवित्रारोपण करनेपर अपनेको सुख होता है। कपड़ेका सूत, जो किसी ब्राह्मणीका काता हुआ हो अथवा अपने हाथसे तैयार किया हुआ हो, ले आये और उसीसे पवित्रक बनाये। उपर्युक्त सूतके अभावमें किसी उत्तम शूद्र जातिकी स्त्रीके हाथका काता हुआ सूत भी लिया जा सकता है। यदि ऐसा भी न मिले तो जैसा-तैसा खरीदकर भी ले आना चाहिये। पवित्रारोपणकी विधि रेशमके सूतसे ही करनी चाहिये अथवा चाँदी या सोनेसे श्रीविष्णु देवताके लिये विधिपूर्वक पवित्रक बनाना चाहिये। सब धातुओंके अभावमें विद्वान् पुरुषोंको साधारण सूत ग्रहण करना चाहिये। सूतको


* अश्रद्दधानः पापात्मा नास्तिकोऽच्छिन्नसंशयः। हेतुनिष्ठश्च पञ्चैते न पूजाफलभागिनः॥ (८७।१९)