पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत। ३१७ जानेहुमर्म कमलकर कोई। देख बिथा बिरहिन की रोई॥ बिरहा कठिन काल की कला। बिरहन सही कालपर भला॥ काल काढ़ि लैजीव सिधारा। बिरह काल मारे पर मारा॥ बिरह आग पर मेलै आगी। बिरहघावपर घावबिजाँगी॥ बिरह बानपर बान पसारा। बिरह रोग पर रोग सँचारा॥ बिरहसालै परसालि नवेला। बिरहकाल परकाल दहेला॥ दो० तनरावन होय शिरचढ़ा, बिरह भयो हनुमन्त। जारे ऊपर जरै, तजै न कै भसमन्त॥ कोइकुमोदैंपरसहिंकरपाया। कोइमलयागिरि छिड़कहिंकाया॥ कोइ मुख शीतलनीर चुवावै। कोइ अंचलसों पवनडुलावै॥ कोइमुखअमृत आननिचोवा। जनुबिषदोन्हअधिकैं धने सोवा॥ जोवहिंश्वास खनँहिखनसखी। कब जिव फिरै पवन औ पँखी॥ बिरहकाल होयहिये जो पैठा। जीव काढ़ लै हाथे बैठा॥ खनक मवन बांधा खनखोला। गहेसि जीभमुखजायनबोला॥ खनहि बीजै की बानन मारा। कँपकँप नारिमरै बिकरारा॥ दो० कतहू विरह न छोड़ै, भा शशिगहन गिराश। नखत चहूँदिशि रोवहिं, अँधरे धरत अकाश॥ घड़ीचारइमि गहनगिराशी। पुनिविधि हिये ज्योतिपरकाशी॥ निससे ऊभभर लीन्हे श्वासा। भइ अधार जीवनकी आसा॥ बिनवहिं सखी छूटशिशि राहू। तुम्हरी ज्योति ज्योतिसबकाहू॥ ⋆भेद १ कोकावेली २-७ आंग ३ सुराख ४ भारी ५ छोड़ना ६ चन्दन ८ ठण्ढापानी ६ बहुत १० पद्मावत ११ हरघड़ी १२ दिल १३ रुकना १४ बिजुली १५ बेकरार १६ चाँदगहन १७ इस तरह १८ ईश्वर १६ दिल २० रोशनी २१ बेहोश २२ कछु खाया २३ चाँद २४ना