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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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| पद्मावत | ११६ पुरयन छाहिं कमल की करी। सकल विथा सुनियस तुमहरी॥ पुरुष गंभीर न बोलहिं काहू। जो बोलहिं तो और निबाहू॥ दो० इतना बोल कहत मुख, पुनि होइगई अचेत। पुनिकै चेत सँभारी, वही वकत मुखलेत॥ और दग्ध का कहौं अपारा। सती जो जरे कठिन असझारा॥ होय हनुमन्त पैठहै कोई। लङ्का दाह लाग तन सोई॥ लङ्का बुझी आग जो लागी। यहिन बुझैतस आँच विजागी॥ जनहु अगिनके उठहिं पहारा। वैसब लागहिं अंग अँङ्गारा॥ कट कट मांस सराँग पुरोवा। रक्तकी आंसु मांस सबरोवा॥ खनक वार मांस अस भूंजा। खनहिंचपायसिंह असगूंजा॥ यहरी दग्ध हत अतममरीजे। दग्ध न सही जीवपर दीजे॥ दो० जहँलग चन्दन मलयागिरि १०, औ सायर सबनीर २। सबमिल आय बुझावहिं, बुझहि न आगशरीर॥ हीरामंन जो देखेसि नारी। प्रीति बेल उपैजी हियें १३ बारी॥ कहेसि न तुम कस होहु दहेली १५। उरझी प्रेम प्रीतकी बेली॥ प्रीतिबेल जन उरझै कोई। उरझा मुये न छूटै सोई॥ प्रीति बेल ऐसे तन डाढ़ा। पलहत सुख बाढ़त दुख बाढ़ा॥ प्रीति बेलकी अमर को बोई। दिनदिनबढ़े क्षीण नहिं होई॥ प्रीतिबेल सँग विरह अपारा। स्वर्ग पताल जरै तेहिझारा॥ प्रीति अकेल बेल जहँ छावा। दूसर बेल न सरबर पांवा॥ दो० प्रीतिबेल उरझाय जब, तब सुजान सुखसाख। मिले प्रीतम आयके, दाखैं बेल रस चाख॥ सब १ अच्छे लोग २ जलन ३ मुशकिल ४ जलाना ५ आग ६ सीख ७ कभी ८ शेर ६ चन्दन १० तालाव ११ पानी १२ पैदा १३ दिल १४ भारी १५ घटना १६ आसमान १७ बराबरी १८ अंगूर १६॥