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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

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पद्मावत उठि टेंके पाया। तुमहुँ तो देखौ प्रीतम छाया ॥ कहत लाज और हिये¹ न जीव। इक दिशँ² आग दूसर दिशि पीव॥ तुमसो मोर खेवकै³ गुरु देवा। उतरों पार तेही विधि खेवा ॥ सूरै उदयगढ़ चढ़त सुंताना। गहने गहा कमल कुँभलाना॥ औ हत होय मरों नहिं झूरी। यह शठ मरों जो नेरहि दूरी॥ घट महँ वकत वकत भा मेरूँ। मिलहिन मिलहि परा तस फेरू॥ दमर्नाहिं नलहिं जोहंसमिलावा। तब हीरामन नाउँ कहावा॥ दो० मूरै संजीवन दूर है, सालै शक्की वान। प्राण मुक्ति⁹ अब होत है, वेगें¹⁰ देखावहि आन॥ हीरामन भुइँ धरा ललांटू। तुमरानी युगयुगैं सुखपोंटू॥ जेहिकै हाथ जरी औ मूरी¹⁴। सो योगी अब नाहीं दूरी ॥ पिता तुम्हार राज कर भोगी। पूजे विप्रे¹⁶ मरावै योगी ॥ पँवेरैं पँवर कुतवाल सो बैठा। प्रेमकलुम्बै¹⁷ सुरँग होय पैठा ॥ चढ़त रयनिगढ़ होयगा भोरू। आवत वोरें धराकै चोरू ॥ अब लैगयें देय वह शूरी। तेंहिसो अगौँहैं विधातुमपूरी ॥ अब जिव तुम कायों वह योगी। काया रोग जान पै रोगी ॥ दो० रूप तुम्हार योगी आपनं, पिंड कमावा फेर। रहा हेराय खंड तेहि आपै, काल न पावत हेर ॥ हीरामन जो बात यहि कही। सूर्य्यकी गहन चांद पुनि गही॥ सूर्य्यकीदुखजोशशि²² होयदुखी। सो कित दुखमाने करमुखी॥ अबजो योगि मेरै मोहिं नेहौँ। मोहिं वह साथ धर्तगगनेहौँ ॥ छाती १ इकतरफ़ २ मल्लाह ३ सूर्य्य ४ मुलाक़ात ५ रानीदमन ६ नाम राजा ७ नाम बूटी ८ सूराख ६ आख़िर १० जल्द ११ शिर १२ हमेशा १३ तख़्त १४ जड़ १५ ब्राह्मण १६ ड्योढ़ी १७ प्रेमका भराहुआ १८ दरवाज़ा १६- ख़बर २० बदन २१ चांद २२ मुहब्बत २३ ज़मीन-आसमान २४ ॥

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