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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पद्मावत। १३५ हुलसी लंक कि रावण राजू। रामलषणदर्र साजहिं साजू ॥ आज चांद घर आवा सूरू। आज श्रृंगारहोय सब चूरू ॥ आज कटकै जो राहत कामू। आज विरहकरहोय संग्रामू ॥ दो० अंग अंग सब हुलसैं, कोइ कतहूँ न समाय। ठांवहिं ठांव विमोही, गइ मुरछा गत आय॥ सखी सँभार पियावहिं पानी। राजकुँवरि काहे कुँभिलानी ॥ हमतो तोहिं देखावा पीव। तू मुरझान कैस भा जीव ॥ सुनहु सखी सब कहै विवाहू। मोकहँ जैसो चांद कहँ राहू ॥ तुम जानहु आवै पिउ साजा। यह धमधम मोकहँ सब बाजा ॥ जते बराती औ असवारा। यह सब मोरे चालनहारा ॥ सो आगमँ देखत हों भली। आपन रहन न देखों सखी ॥ होय विवाह पुनि होयहै गौना। गवनवतहां बहुरि नहिं अवना ॥ दो० अब सो मिलन कितहै सखी, परा विछोवा टूट। तैसि गांठ पिउ जोरब, जन्म न होय है छूट ॥ आय बजावत बैठ बराता। पान फूल सेंदुर सब राताँ ॥ जहाँ सोने कर चित्र सँवारी। आन बरात तहां बैठारी ॥ माझ सिंहासन पाट सँवारा। दूलह आन तहां बैठारा ॥ कनकके खंभ लागे चहुँ पांती। माणिकै दिया बरहि दिनराती ॥ भयो अचल धुवै योग पखेरू। फूलबैठ थिरै जैस सुमेरू ॥ आज दई हों कीन्ह सुभागा। जस दुख कीन्ह नेग सब लागा ॥ आज सूर शशिके घरआवा। चांद सूर्य दुहुँ भयो मिलावा ॥ फ़ौज १-३ सूर्य २-१६ लड़ाई ४ दूरअंदेशी ५ लौटके ६ लाल ७ तस- वीर ८ बीचोबीच ६ तख्त १० सोना ११ जवाहिरात १२ नाम नखत जिसे कुतुब कहते हैं १३ क़ायम १४ नामपहाड़ १५ चाँद १७ ॥