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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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१५० पद्मावत। थलथल नगन होहिं जेहि ज्योती। जलजल सीपन उपजहिं मोती॥ बनबन बृक्ष न चन्दन होई। तनतन विरह न उपजें सोई॥ जहँउपजा सो औट मरगयो। जन्म निरारें १ न कबहूँ भयो॥ जलअम्बुज २ रबि रहै अकासा। जो प्रीति जानहुँ इकपासा॥ योगी भँवर जो थिरै न रहाहीं। जेहि खोजहिं तहँ पावै नाहीं॥ मैंतो पावा आपन जीव। छांड़ सेवात जाय नहिं पीव॥ भँवरमालती मिलै जो आई। सो तर्ज आनफूल कित जाई॥ दो० चम्पाप्रीति जो तेल है, दिन दिन आकर वास। गलगल आप हेराय जो, सुयहिं न छांडै पास॥ ऐसैं राजकुँवर नहिं मानौ। खेल सारँपांसा तब जानौ॥ कच्ची बारहिंबार फिरासी। पकी तौ फिर थिर न रहासी॥ रहै न आठ अठारह भाखा। सोरह सत्रह रहै सो राखा॥ सतयें धरे सो खेलनहारा। द्वारा ग्यारा जासु न मारा॥ तूं लीन्हेसि आछे मन दुवा। औ यगसार चहेसिपुनि छुवा॥ हौं तूनेह रच्यों तोहि पाहीं। दसों दांत तोरे हियँ माहीं॥ तंव चौपर खेलौं कै मर्या। जो तरहेलें होय सो तिया॥ दो० जेहिमलि बिछुरन औतपन, अंते तंत तेहिनन्त। तेहिमलि कंचन को सहै, पर बिन मिलै न चन्त॥ बोलों बचन नारि सुनि सांचा। पुरुपका बोल संस्रौ वांचा॥ यहि समलाग्योतुहि असनारी। दिनतोहिं पास और निशेंसारी॥ मैं पर बारहिंबार मनायों। शिरसों खेल निपटजिवलायों॥ पैदा १ अलग २ कमल ३ सूर्य्य ४ क़ायम ५ छोड़ना ६ चौपर ७ दिल ८ मेहरबानी ६ जो मेरे साथ बाजी हारजाय १० आख़िरको सुख ११ सोना १२ रात १३॥