पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 318 में से
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१५२ पद्मावत । रबि परकाशें कमल बिकासा । नाहत कित मधुकर कित वासा ॥ दो० तासों कौन अँतरपटै, जो अस प्रीतम पीव । न्योछावर करिय आपहूँ, तन मन योवन जीव ॥ हँसि पद्मावत मानी बाता । निश्चै तू मोरे रँग राता ॥ तू राजा धनिकुल उजियारा । अस कै चरचों मर्म तुम्हारा ॥ पै तू जम्बूदीप बसेरा । का जानेसि कस सिंहल मेरा ॥ का जानेसि सुमानसरे केवाँ । सुनि सुभँवर भा जिव परलेवाँ ॥ ना तू सुनी न कोई दीठी । कैसें चित्रै होय चित पैठी ॥ जौलहि अगिन फरै नहिं भेदू । तौलहि औटनु वहिन हिं मेदू ॥ कहँ शङ्कर तू ऐसो लखावा । मिला अलख तस प्रेम चखावा ॥ दो० जेहिके सत सँघाती, तांकर डर सो अमेट । सो सत कहु कैसे भा, दुहुँ भांत सो भेट ॥ सत्य कहूँ सुनि पद्मावती । जहँ सतपुरुष तहां सरस्वती ॥ पायौं सुवा कहे वह बाता । भानिश्थै देखत मुख रातो ॥ रूप तुम्हार सुन्यों अस नीका । ना जेहिं चढ़ा काहुँ कहँ टीका ॥ चित्र कियों पुनि लैलै नाऊँ । नयन हि लाग हिये १२ भा ठाऊँ ॥ हौं भा सांच सुनत वह घड़ी । तुम होय रूप आय चित चढ़ी ॥ हौं भा काठ मूर्ति मन मारे । जहँ जहँ कर सब हाथ तुम्हारे ॥ तुम जो डोलावहु सोई डोला । मवन सांस जो दीन्ह तो बोला ॥ दो० कोइ सोवै कोइ जागै, अस हौं गयो विमोहि १३ । परगट गुप्तै न दूसर, जहँ देखौं तहँ तोहि ॥
पाद-टिप्पणी (Footnotes): ओट १ भेद २ नाम तालाव ३ कमल ४ जानपर खेला ५ देखना ६ तसवीर ७ शोला ८ अतर ९ ईश्वर १० लाल ११ दिल १२ दीबाना १३ ज़ाहिर वा छिपा १४ ॥-