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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 163

१६३ पद्मावत ! भइकटकैई शरद शशिआवा । फेर गगन रविचाही छावा ॥ मुनि धनै धनुष भौंहकरफेरी । काम कटाक्षै मकोरतैंहेरी ॥ जानैहुँ न कै बीच पै खाचों । पितासौं हों आज न बाचौं ॥ काल्ह न होय रहे सुख रामा । आज करों रावणसंग्रामा ॥ सैनै शिंगार मुहूँ है सजा । गजंगतचालअँचलगकधुजा ॥ नयनसमुद्र खड्ग नासिकों । सरबरे जूभको मोसोंजिता ॥ दो० हों रानी पद्मावती, मैं जीता सुख भोग । तू सरबेरे कर तासों, जसयोगी तोहि योग ॥ हौ असयोगि जान सब कोऊ । बीरैं श्रृंगार जिते मैं दोऊ ॥ वहँ तो हनूँ बीर घट माहीं । यहँतो कामकटकैं तुम्हपाहीं ॥ वहां तो हर्य चढ़के महि मंडों । यहां तो अधरं अमीरसखंडों ॥ वहां तो खड्ग नरन्दहि मारों । यहां तो बिरहतुम्हार सँहारों ॥ वहां तो गजैं पेलों होय केहेरै । यहां तो कुचै कामिनकरहेहर ॥ वहां तो लूटौं कटकैं खँडारू । यहां तो जीत तुम्हार शिंगारू ॥ वहां तो कुम्भस्थलें गजनाऊँ । यहां तो गजकलश हिकरलाऊँ ॥ दो० पड़ा बीच तब घर घर, प्रेमै राज के टेक । मानौ भोग छहू ऋतु, मिल दोनों होय एक ॥ खण्ड चौबीसवां छहऋतुबारहमास ॥ प्रथमै बसन्तनवलऋतु आई । सुऋतु चैत बैशाख सुहाई ॥ हुक्म १-आसमान पर सूर्य्य तथा कोठे पर जाना २ पद्मावंत ३ रामज़ा ४ कोर से देखना ५ भौंह चढ़ाके न बचोगे ६ क़सम ७ रावण की तरह लड़ो ८ फ़ौज ६-१७-२४ हाथी १०-२१ तलवार ११ नाक १२ बराबरी १३-१४ मैदान लड़ाई वा भोग १५ हनुमान् जी १६ घोड़ा १८ ज़मीन १६ होंठ २० शेर २२ औरत की छाती से काम २३ नाम हाथी २५ प्रेमने बीचबचाव कर दिया २६ पहिले २७ ॥