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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पद्मावत | १६६ हौं का खेलौं कन्त बिन, रही छारै शिर मेल ॥ अगहन दिवस घटा निश बाढ़ी। दुपहर रयनि जाय किमि गाढ़ी॥ अब धन दिवस बिरह भारराती। जरों बिरह जस दीपक बाती ॥ कांपा हियों जनावा सीव। तौ पै जाय होय सँग पीव ॥ घर घर चीर रचे सब काहू। मोर रूप सब लैगा नाहूँ ॥ पलट न बहुरा गा जो बिछोई । अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई ॥ बज्रांगिन बिरहिन हिय जारा। सुलग सुलग दग्धै भइ छारा ॥ यह दुख दग्ध न जानै कन्तू । यौवन जन्म करै भसमन्तू ॥ दो० पियसों कहो सँदेशरा, ये भँवरा ये काग। सो धन बिरहिन जर गई, तेहि क धुवां हम लाग ॥ पूष जाड़ थर थर तन कांपा । सूर्य जुड़ाय लंक दिशि तापा ॥ विरह बाढ़भा दारुनै सीव। कँप कँप मरों लेइ हर जीव ॥ कन्त कहां हो लागों हियरे। पन्थ अपार सूझ नहिं नियरे ॥ सौरैं सेती आवै जूड़ी। जानहु सेज हिमंचलै बूड़ी ॥ चकई निश बिछुड़े दिन मिला। हौं दिन रात बिरह कोकिला॥ रयनि अकेल साथ नहिं सखी। कैसे जिये बिछोही पखी ॥ विरह सजान भयो तन जाड़ा। जियत खाय औ मुयेहिन छांड़ा॥ दो० रक्त ढुरा माँसू गिरा, हाड़ भये सब शंख । धने सारस होइ रुरुमुई, आय समेटहिं पंख ॥ लाग्यो माघ परै अति पाला। बिरहा काल भयो जड़काला॥ पहल पहल तन रुई जो झांपों। अहिल अहिल अधिको हिय कंपों ॥ १-६ दिन २ रात ३-४ दिल ५-१८ जाड़ा ६ खाविन्द ७ जलाना ८ उत्तर तरफ १० टेढ़ा ११ छाती १२ राह १३ तोशक लिहाफ़ १४ पालाकी तरह १५ तथा नागमती १६ बहुत १७ ॥