पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 318 में से
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पद्मावत। १७१ मोकहँ फूल भये सब कांटे। दृष्टिहेरी जनु लागहिं चांटे ॥ भर यौवन भइ नारँग शाखा। सो अब बिरह तातहैं बाखा ॥ ॥ दो० चरन परेवा आव जस, आय परो पिय टूट। री नारि पराये हाथ है, तुम बिन पांवन छूट॥ भा बैशाख तपन अति लागी। चोला चीर चँदन भा आगी॥ सूरज जरत हिमंचल ताका। बिरहबिजागि सौंहैं रथहांका॥ जरत बचासि होय पियडाहां। आय बुझाव अँग़ारहिंमाहां॥ तोहि दरशनहै शीतल नारी। आय आग सो कर फुलवारी॥ लागे जरै नरै जस भारू। फिरिफिरिभूजेसितज्योंनबारूँ ॥ सरवर्र हियाँ घटत नित जाई। तरक तरक है है भर आई ॥ बेहिरतहियों करहु पिय टेकों। दृष्टि मयाकरमिलवेहु एका ॥ दो० कमलजोविकसंतमानसरे, बिनजलगयो सुखाय। अबहुँ बेलफिर पल्हवै, जो पिय सींचहु आय॥ जेठंजरों जग सुनहि लुवारा। उठहिं बौंडरा परहिं अँङ्गारा ॥ बिरह गाजैं हनुमत हैं जागा। लंका दाँह करै तनलाँगा ॥ चारो पवन झकोरैं आगी। लंका दाह प्रलंका लागी ॥ दह भइश्याम नदी कालिँन्दी। बिरहकी आँग कठिन असमुन्दी॥ उठै आग औ आवै आँधी। नयन न सूझै मरौं दुखबाँधी॥ अधजर भई मांस तन सूखा। लाग्यो बिरह काल है भूखा ॥ मांस खाय अब हाड़हि लागा। अबहुँआव आवत सुनिभागा॥ दो० गिरिसमुद्र शँशिमेघरवि, सहि न सकै यह आग ।
पाद-टिप्पणी (Footnotes): १ चींटी १ जवानी २ कबूतर ३ भारी ४ सामने ५ ठंडा ६ दरवाज़ा ७ तालाब ८ दिल ६ छाती फटना १० मदद ११ निगाह १२ खिलना १३ बि- जुली १४ जलाना १५ यमुना १६ चाँद १७ सूर्य १८॥