पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिरैं पांच कुतवार सुभँवरी । काँपै पाउँ चापत वे पँवेरी ॥ पँवेरिहिं पँवेरि सिंह गढ़गाढ़े । डरपहिं रायं देखि तहँ ठाढ़े ॥ बहु बनाव वे नाहर गढ़े । जनु गाजहिं नाहहिं शिर चढ़े ॥ टारहिं पूँछ पसारें जीहा । कुंजर डराहिं कि गंजरलीहा ॥ कनक शिलागढ़ सीढ़ी लाई । जगमगाहिं गढ़ ऊपर ताई ॥ दो० नवौखण्ड नवपँवेरी, औतहँ बज्र केवार । चार बसेरे सो चढ़े, सुनै सो उतरै पार ॥ नवँपँवरी पर दसौंदुवारा । तेहिपर बाजिगह बरियारा ॥ घड़ी सो बैठि गिनै घरियारी । भरी मु अपनी अपनी वारी ॥ जोहि घड़ी पूजे वह मारा । घड़ी घड़ी घरियार पुकारा ॥ मरा जो डांड़ै जगतैं सब डांड़ा । का निश्चिन्त माटीकर भांड़ा ॥ तुम तेहि चाक चढ़ेहो कांची । अबहिं न फिरी नथिरह्वै बांची ॥ घड़ी जो भरी घटी तुम आऊँ । का निश्चिन्त सोवे जो बटाऊँ ॥ पहरहि पहरगूजर नितें होई । हिया न सोगा जागन सोई ॥ दो० मुहम्मदज्यों जल भरत, रहँटघड़ी की रीति । घड़ीजो आई ज्यों भरी, ढरी जन्म गा बीति ॥ गढ़परनीर खीर दुइनदी । पानि भरेँ जैसे सुरपदी ॥ और कुण्ड एक मोती चूरू । पानी अमृत कीच कपूरू ॥ वहां का पानी राजा पिया । वृद्धे होय न हिं जबलग जिया ॥ कंचनबृक्ष एक तेहि पासा । जस कल्पतरु इन्द्र कैलासा ॥ महल १-२-३ शेर ४ मर्द ५ शेर ६ हाथी गस्त ७ सोना ८ किला ९ मकान १० पत्थर ११ मुक़ाम १२ सच्चाई १३ नव मकान तथा आंख कान नाक मुंह गुदा लिंग नवइंद्री बदनकी १४ दशवां दरवाज़ा तथा ब्रह्माएड १५ घाटा १६ दुनिया १७ ग़ाफ़िल १८-२१ आदमी १९ उमर २० मुसाफ़िर २२ हमेशा २३ पानी २४ दूध २५ बूढ़ा २६ सोनेकापेड़ २७ नाम दरख्त जो स्वर्गलोक में है २८ ॥