पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 213, कुल 318 में से
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२१२ पद्मावत। पूजा योग दई हौं गढ़ी। मन महेशके माथे चढ़ी ॥ जानी जगत कमल की करी। तोहि असनहिंनागिनविषभरी ॥ तुइँ सब लिये जगतके नागा। कोयल वेष न छांडेसिकागा ॥ तू भुजैल हौं हंसकी जोरी। मोहिंतोहिंमोतिपोतकीचोरी ॥ कंचनकली रतन नग बिना। जहांपदार्थसोहनहिं पनाँ ॥ तुइँतोराहुहौं शँशि उजियारी। दिनहिनपूँजीनिशिंअँधियारी ॥ दो० ठाढ़ होसि जेहिठाईं, मँसिलागै तेहि ठाउँ। तेहि डर रांध न बैठों, जनु साँवरहोयजाउँ ॥ कमल सो कौन सुपौरी रोठा। जेहिके हिये सहसदश कोठा॥ रही न झापै आपन गठा। सखंति उघेल चहै परगटा ॥ कमलपत्र दोँड़िम तोर चोली। देखोसि मूर देश है खोली ॥ ऊपर रातौ भीतर पियरा। जौंरौँ वही हरद अस हियरा ॥ यहां भँवर सुखवातहि लावसि। वहां मूर्य कहँ हँसहँसलावसि ॥ सबनिशितपतपमरेसिपियासी। भोर भये पावसि पिय बासी ॥ सेजवा रोय रोय निशिँ भरसी। तू मोसों का सरवरि करसी ॥ दो० सूर्य्यकिरन तेहि रौँवी, सरवरि लहर न पूज। सँचर यहां तोह पावै, धूप देह तोर भूज ॥ मैंहौं कमल सूर्य्य की जोरी। जोपिय आपन तेहिकाचोरी ॥ हौं वह आपन दरपन लेखों। करों शृंगार भोर मुख देखों ॥ मोर विकांसं बहक परकाशू। तुइँजरमरेसि निहारअकाशू ॥ सोने की अँगूठी १ लाल २ पन्ना ३ चाँद ४ बराबर ५ रात ६ सियाही ७ सुपारी सख्त के सामने कमल की क्या हक़ीक़त ८ कमल अपना गट्टा नहीं छिपासक्का ६ सखती उघेरडालो तब ज़ाहिर हो १० अनार ११ सूर्य्य १२ लाल १३ हल्दी की तरह जलाता हूं १४ रात १५ बराबर १६-१७-१८ सूर्य्य से जल १६ खिलना २० ॥