पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत। ३१ देवलोक देखत हुत ठाढ़े। लागबान हिये'जाहिनकाढ़े॥ दो० जनहु दीन्ह ठगलाड़, देख आय तस मीचें। रहा न कोइ धरहरियाँ, करै जो दोउमहँबीच॥ पवन श्रवनैं राजा के लागा। कहेसिलड़हिंपद्मिनऔनागा॥ दोनों सौत श्याम औ गोरी। मरहिंतोकहँपावसियसजोरी॥ चल राजा आवा तेहि बारी। जरत बुझाई दोनों नारी॥ एक वार जेहिपिय मन चूमा। सो दूसरे सों काहेक झूमा॥ ऐसो ज्ञान मन जान न कोई। कबहूँ रात कबहूँ दिन होई॥ धूप छाँह दोऊ इक रंगा। दोनों मिले रहें इक संगा॥ जूझवै छांड़हु बूझौ दोऊ। सेव करहु सेवाफल होऊ॥ दो० गंग यमुन तुम नारि दोउ, लिखी मुहम्मदयोग। सेव करहु मिल दोनों, तो मानहु सुख भोग॥ अस कहि दोनों नारि मनाई। बिहँसिदोउतबकण्ठ लगाई॥ लै दोउ संग मँदिर महँ आई। सोन पलँग तहँ जायबिछाई॥ सीझी पाँच अमृत ज्योणारा। औ भोजन बावन परकारा॥ हुलसी सरस घचिचर्चा खायें। भोग करत बिहँसीं रहसायें॥ सोनमँदिरनगमतिकहँदीन्हा। रूप मँदिर पद्मावत लीन्हा॥ मन्दिर रतन रतन के खंभा। बैठा राज जोहारे सभा॥ सभा सो सबै शुर्म मन कहा। सोईअसे गुरु जो भलकहा॥ दो० बहु सुगन्ध बहु भोगसुख, कुरलहिं केलकराहिं। दोहु सो केल नितमानी, रहसअनन्ददिनजाहिं॥ जाई नागमती नगसेनी११। ऊँच भाग ऊँची दिन रेनी॥ १दिल १ मौत २ पड़नेवाला ३ कान ४ लड़ना ५-खिदमत ६ गलेलगाया ७ अंगूर ८ अच्छी बात कहीं ६ वह अच्छा जिसको गुरू पसन्दकरै १० नागमती से नगसेन पैदाहुआ ११॥