पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत। २७३ तिन्हमहँपुनिइकमन्दिरऊँचा। करने१ अह्रापै करनहिंपहुँचा ॥ तेहि मण्डप मूरत मन देखी। बिनतनबिनजिवजायबिशेखी॥ पूरणचन्द्र२ होय जनु तपी। पारसरूप दरश दै छिपी ॥ अबजहँ चतुर्दशी जिव तहां। भान अमावस पावै कहां ॥ दो० विकसों कमलस्वर्ग निशिं, जनहुँलौंकगाबीज । यहू राहुभा मानहिं, राघव मनहिं पतीजै ॥ अति विचित्र देखों सो ठाढ़ी। चितकी चित्र लीन्ह जिव काढ़ी ॥ सिंहलङ्क कुम्भस्थल जोरू। आंकुश नाग महावत मोरू ॥ तेहि ऊपर भा कमल विकासू। फिर अलिलिन्हहुवै परसबासू ॥ दोहुँ खंजनै विच बैठो सुवा। दुइजका चन्द धनुष लै उवा ॥ मिर्ग१४ दिखाय गवन फिरगया। शँशिभा नाग सूर्य्य भा दिया ॥ सुठ ऊँचे देखत वह उचका । दृष्टि पहुँचकर पहुँच न सका ॥ पहुँची भयो दृष्टि गत भई। गहि२० नसका देखत वह गई ॥ दो० राघव हेरंत जो गयो, अच्छत हिये समाध । वैहँ तन राघव बाघभा, सके न कै अपराध ॥ राघव सुनत शीशें भुइँ धरा । युग युग राज भानेंकी किरा ॥ वही किरन वह रूप विशेखी। निश्चय तुम पद्मावत देखी ॥ केहरलङ्क कुम्भस्थल हिया। ग्रीवै मयूर अलंक रवि दिया ॥ कमल बदन श्रौ वाससमीं । खंजन नयन नासिका कीरू ॥ हाथ १ चौदहीं रातका चांद २-३ खिलना ४-११ आसमान ५ रात ६ सूर्य ७-२४-२६ सुरझाना ८ चीता की कमर ९-२५ हाथी १०-२६ मँवरा १२ फूल १३ ममोला १४-३१ हिरन १५ चांद १६ निगाह १७ हाथ १८ देखते ही चाहा कि आप को पहुँचाऊँ १९ पकड़ना २० देखना २१ तदबीर काम न आई शेरकी तरह गुस्सा किया २२ शिर २३ गर्दन २७ बाल २८ हवा ३० नाक तोता की ३२ ॥