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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पद्मावत । २८६

सुनि पद्मावत मंदिर बोलाई । पूछी कौन देश ते आई ॥ तरुणवैस$^{१}$ तोहि छाजन योगू । केहि कारण अस कीन्ह बियोगू$^{२}$ ॥ कहेसि बिरह दुख जान न कोई । बिरहिन जान बिरह जेहि होई ॥ कन्त हमार गयो परदेशा । तेहिकारण हम योगिन भेशा ॥ काकर जिय यौवन औ देहा । जो पिय गयो भयो सब खेहा$^{३}$ ॥ फार पटोरें$^{४}$ कीन्ह मन कन्थाँ$^{५}$ । जहाँ पिय मिलै लेहुँ सो पन्थाँ$^{६}$ ॥ फिरौं करौं चहुँ चक्र पुकारा । जटा परी को शीश$^{७}$ सँभारा ॥ दो० हिरदय$^{८}$ भीतर पिय बसै, मिलै न पूछै काहि । सून जगत सब लागै, वह बिन कछू न आहि ॥ श्रवण$^{९}$ छेद में मुद्रों मेला$^{१०}$ । शब्दे$^{११}$ सुनाउँ कहाँ पियगेलो$^{१२}$ ॥ तेहिवियोगैं सिंघी नितपूरी । बारबार किंगरी$^{१४}$ भइ झूरी ॥ को मोहिं ले पियकंठ$^{१५}$ लगावै । परस अधारी बात जनावै ॥ पांवरे$^{१७}$ टूट चलत गा छाला । मन न फेरै तन यौवनबाला ॥ गयौं प्रयाग मिला नहिं पीउ । करवंट लीन्ह दीन्ह बल जीव$^{१८}$ ॥ जाय बनारस जाखौं कयाँ । पारथ्यो पिण्ड नहायों गया ॥ जगन्नाथ चक्रहिं के आय । पुनि सो द्वारका जाय नहाय ॥ दो० जाय केदारा दागतन, तहँ न मिला तनआँकै$^{१९}$ । ढूँढ़ि अयोध्या आय फिर, स्वर्गद्वारी झांक ॥ गाउमुखै हरिद्वारै फिर कीन्हों । नगर कोटैं कित रसना दीन्हों ॥ ढूँढूँ बालें नाथ कर टीला । मथुरामथ्योनसोपिय मेला ॥ सूर्यकुण्डँ महँ जाख्यो देहा । बद्री$^{२२}$ मिला न जासों नेहा ॥


पाद-टिप्पणी: १ नवजवान २ दुख २-१४ वास्ते ३ धूर ४ झारी ५ गुदड़ी ६ राह ७ शिर ८ दिल ६ कान १० चाली ११ आवाज़ १२ जाना १३ शेर १४ नाम बाजा १५ गले १७ खड़ाऊँ १८ शिरकटाना १६ तप किया २० पता २१ नाम तीर्थ २२ से २८ तक ॥

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