पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ पद्मावत। लै सरै ऊपर खाट बिछाई। पौढ़ी दोउ कन्त गल लाई ॥ और जो गांठ कन्त तुम जोरी। आदि अन्त लहि जायन छोरी ॥ यह जग काह जो अर्थहि नयाथी। हमतुम नाहिं दोहूजग साथी॥ लागी कठ आग दै होरी। छार भई जरि अंग न मोरी ॥ दो० राँती पियके नेहकी, स्वर्ग भयो रतनार । जोरेउ वासो अथवा, रहा न कोइ संसार ॥ वै सहगवनैं भई जिय आई। बादशाह गढ़ छेंका आई ॥ तबलग सो औसर है बीता। भये अलोप राम औ सीता ॥ आय शाह जो सुना अखारों। है गइसत दिवसै उजियारा ॥ छोर उठाय लीन्ह इक मूठी। दीन्ह उड़ाय पिरेथैवी झूठी ॥ सगरे कटकै उठाई माटी। पुल बांधा जहँ जहँ गढ़घाटी ॥ जौलहि ऊपर छोर नहिं परै। तौलहि यह तृष्णा नहिं मरै ॥ भा दूर्हवाँ भा जूझ असूझा। बादलैं आय पँवरे पर जूझा ॥ दो० जूनहरे भईं सब स्त्री, पुरुष भये संग्राम। बादशाह गढ़ चूरौं, चितौर भा इसलाम ॥ मैं यह अर्थ पण्डितन बूझा। कहा कि हम कुछ और न सूझा ॥ चौदह भुवनैं जो छत उपराहीं। सो सब मानुष के घट माहीं ॥ तन चितौर मन राजा कीन्हा। हियँ सिंहल बुधि पद्मिनि चीन्हा ॥ गुरु सुवा जेहि पन्थ देखावा। बिन गुरु जगत सोनिरगुण पावा॥ . चिता १ अव्वल से आखिर तक २ आया था ३ खाविन्द ४ राख ५ बदन ६ लाल ७-६ आसमान ८ जब खाविन्द के साथ जल गई १० गायब ११ हाल १२ दिन १३ ख़ाक १४ दुनियां १५ फ़ौज १६ माटी १७ हवस १८ कोई बाकी न रहा उस भारी लड़ाई में १६ नाम मंत्री २० दरवाज़ा २१ मरना २२ तथा राजा २३ तोड़ा २४ सात परदा आसमान, सात परदा ज़मीन २५ भीतर २६ छाती २७ राह २८ दुनियां २६ ॥