पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें4 पद्मावत । ४५ प्रेम छोड़ि कुछ और नहिं, सुना जो देखौं मनबूझ ॥ प्रेम सुनत मनभूल न राजा। कठिनप्रेम शिरदियेतेहिछाजा॥ प्रेम फन्द जो पड़ा न छूटा। जीव दीन्ह पै फांद न छूटा॥ गिरगिटै छन्दधरै दुखतीताँ। खनहो पीतं रोंति खन सीतोँ॥ जानिपुछारै जो भयबनबासी। रोवँरोवँपरी फांदनकोआसी॥ पांख फरेरा सोई फांदू। उड़ न सकहिं उरझे भये बाँदू॥ मेउमेउँ निशि दिन चिल्लाय। वही रोष नागिन धरखाय॥ पांडुकै सुआकण्ठ वह चीन्हा। ज्यहिँगै परा चाहि जिवदीन्हा॥ दो० तीतर गयैं ११ जो फांद है, नितहिं १२ पुकारै दोष। मुकि १३ हँकारै फांदगैं १४, मेले कित मारे पुनमोषै॥ राजा लीन्ह ऊबके श्वासा। ऐसे बोल नहिं बोल निरासाँ॥ पहिल प्रेमहै कठिन दुहेलोँ। दोजगँ तरा प्रेम जेहि खेला॥ दुख भीतर प्रेम मधुँ राखा। किंचन मरन चहै सो चाखा॥ जेहिनाहिंशीशँ प्रेमपंथ लावा। सो पृथ्वी मँहँ काहेक आवा॥ अब मैं पीय प्रेमपंथ मेला। पायन ठेल राख कै चेला॥ प्रेमवारसो २६ कहै जो देखा। जें न देखि का जानि विशेखा॥ तबलंग दुख प्रीतम नहिं भेंटाँ। मिलातोजा जरमकैं दुखमेटा॥ दो० जस अनूप तुइ बरैणी, नखँशिख बरौँ शिंगार। है मोहिं आश मिलन की, जो पुखै करतारै॥ १ रंग १ गर्म २ पीला ३ लाल ४ सफ़ेद ५ मोर ६ प्रेमका फन्दा ७ रात ८ गुस्सा ६ कुमरी १० गरदन ११-१५ हमेशा १२ चुप १३ बोलाना १४ नजात १६ नाउम्मेद १७ मुश्किल १८ भारी १६ दोनों जहान २० शराब २१ शिर २२-३५ राह २३-२५ ज़मीन २४ दरवाज़ा २६ मुलाक़ात २७ बहुत दिन २८ बयान करना २६ नाखून से शिरकी चोटी तक ३० तारीफ़ ३१ ईश्वर ३२॥