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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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फिरत नीर योजन१ लख तांका। जैसे फिरै कुम्हार का चांका॥ भा परलौ२ नेराना जबहीं। मरे सो तकहैं परलौ तबहीं॥ दो० गये औसान३ सबनके, देख समुद्रकी बाढ। नेरिहोत जनुलीले, रहा नयन४ अस काढ़॥ हीरामन५ राजासों बोला। यही समुद्र आय सतडोलाँ॥ सिंहलद्वीप जो नाहिं निबाहू। यही ठाँउ सांकर सबकाहू॥ यहिकिलकिलै अससमुद्रगँभीरू। जेहिगुनहोयसोपावैतीरू॥ यही समुद्रपंथ मँझधारा। खांडे की असरेखें हजारा॥ तीस सहस कोसनकी बाटो। अस सांकर चलिसकै न चाँटा॥ खांडे१६ चाहि१७ पैन पैनाई। वारे चाहि पातर पतराई॥ वही पंथें सब काहू जाना। होय दूसरे बिश्वास नदानां॥ दो० मरन जियन यहि पंथहि, येही आशे निराशें। पड़ा सो गयो पतालहि, तरा सो गा कैलाशे॥ राजे दीन्ह कटक कहँ वीरा। सपुरुष होहु करहु मनधीरा॥ ठाकुर जेहिक शूरै भा कोई। कटक शूरै पुनि आपहि होई॥ जौलहि सतीन जिय सतबांधा। तौलहि देइ कहार न कांधा॥ प्रेम समुद्र महँ बांधा बेरा। यहि सब समुद्र बुन्द जेहि केरा॥ नाहीं स्वर्ग न चाहौं राजू। ना मोहिं नरक सितै कुछकाजू॥ चाहौं वह कर दर्शन पावा। जेहिमो आन प्रेमपंथ लावा॥ काठ काहि गाढ़ का ढीला। बूड़न समुद्र मगर नहिं लीला॥ १ चारलाख कोस १ क्यामत २-३ हवास ४ आंख ५ नामतोता ६ बद- हवास ७ जगह ८ मुश्किल ६ नाम समुद्र १० गहरा ११ किनारा १२ राह १३-१५-१६-३० धार १४ तलवार १६ ज्यादा १७ पानी १८ नादान २० रास्ता २१ उम्मेद २२ नाउम्मेद २३ नाम वैकुण्ठ २४-२६ फ़ौज २५ क़ायम २६ बहादुर २७-२८ ॥