पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ पद्मावत । तुइँ रबि१ उवा भँवर होय, पवन२ मिलाले वास ॥ सो गढ़ देखि गगन३ ते ऊंचा । नयन४ देखिकर ज्ञाननपहुँचा ॥ बिजुरी५ चक्र फिरै चहुँ फेरे । औ जमकात६ फिरहिं यमँ घेरे ॥ धायँ जो बाजा कियमनसाधा । मारा चक्र भयो दुइ आधा ॥ चांद सूर्य औ नखत तराई । तेहिडर अंतरिखं फिरें सबेई ॥ पवनजाय तहँ पहुँचा चहा । मारा तैसो लोटि भुइँ रहा ॥ अगिन उठे जरिबुझे नियानों । धुवांउठा उठि बीच मिलाना ॥ पानि उठा उठिजाय न छुवा । फिरा रोय आय भुइँ चुवा ॥ दो० रवन चहा सौहिं१२ के हेरों१३ उत्तर दशोगयेमाथ १४। शंकरधरा ललाटै भुइँ, और को योगी नाथ ॥ तहां देख पद्मावत रामा । भँवर न जाय न पंखे१६ नामा ॥ अबसिखैं एक देउँ तुहि योगी । पहिले दरशन होय तो भोगी ॥ कंचन मेरु१७ दिखावे जहां । महादेव कर मण्डफ तहां ॥ वह खखरेण्ड जस परवत मेरुँ । मेरुहि १९ लाग होय तस फेरु ॥ माघमास पाछल पख लागें । श्री पंचमी होय यहि आगे ॥ उघरे महादेव कर बारू२२ पूजनजाय सकलै संसारू ॥ पद्मावत पुनि पूजन आई । हैहै वह दिन दृष्टि २४ मिलाई ॥ दो० तुम गवनो वह मण्डफ कहँ, हौ पद्मावत पास । पूजे आय बसन्त जो, पूजे मन की आस ॥ राजै कहा दरश जो पाऊँ । पर्बत काहि गगन कहँ धाऊँ ॥ सूर्य १ हवा २ आसमान ३-२६ आंख ४ बिजुली ५ राँद ६ यमराज ७ दौड़ना ८ पहुँचना ६ बीचोबीच १० सब ११-२३ आखिर १२ सामने १३ देखना १४ शिर १५ उड़नेवाले जानवर १६ सबाह १७ सोने का पहाड़ १८-२०-२१ बीहड़ १६ दरवाज़ा २२ दीदार २४ जाना २५