पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत । ८१ तहँ चितवों चारहुदिशि को गहि लावे तीरै । पद्मावत तुइ समुद्र सयानी । तुइ सरै समुद्र न पूजी रानी ॥ नदी समाय समुद्र महँ आई । समुद्रडोल कहु कहाँ समाई ॥ अवहीं कमलकरी हियँ तोरा । अइहै भँवर जो तोकहँ जोरा ॥ जोबन तुरी हाथ गहि लीजे । जहां जाय तहँ जाय न दीजे ॥ जोबनैं जोर माँते गज अहे । गहहु ज्ञान अंकुश जिमि रहे ॥ अवहिं बारँ तुइँ प्रेम नखेला । काजानिस कस होय दहेलाँ ॥ गगनें दृष्टि करपाय तराहीं । सूर्य देखकर आवत नाहीं ॥ दो० जब लग पीउ मिले तुहि, साधि प्रेमकी पीर । जैसे सीप स्वातिकहँ, तप समुद्र मैंभैं नीरै ॥ दहतैं धार्य जोबन औ जीव । जानहु परा अगिनिमहँ घीव ॥ करवट सहों होत दुइ आधा । सही न जाय बिरहकी दाधा ॥ बिरह समुद्र बिपहर अस भारा । भँवर मेल जिव लहरनमारा ॥ विरह नाग होय शिर चढ़ डसा । वही अगिन चन्दनमहँ बसा ॥ जोवन पंखी बिरह बियाधूँ । केहरि भयो कुरङ्गिंन खाँधूँ ॥ कनक पानि कित जोबन कीन्हा । औटन कठिनैं बिरह वह दीन्हा जोबन जलहि बिरहमैंसि छुवा । भूलहिंभँवर फिरहिं भासुवाँ ॥ दो० जोबन चन्द उजास, विरह भयो सँग राहु । घटतहि घटत खीनँ भय, कहेन पैरों काहु ॥ १७२ नयनँ जो चक्र फिरे चहुँओरा । चरची बायैं समाय न कोरा ॥ चारों तरफ १ पकड़ना २ किनारा ३ बराबर ४ दिल ५ घोड़ा ६ जबानी ७ हाथी मस्त ८ लड़की ६ मारी १० आसमान ११ नज़र १२ बीच १३ पानी १४-२३ जलना १५ दाया १६ परदार जानवर १७ बहेलिया १८ शेर १६ हिरन २० खाना २१ सोना २२ मुश्किल २४ सियाही २५ तोता २६ बारीक २७ कहि नहीं सकता २८ आंख २६ दाया ३० ॥