भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (२४९)

योग्य अर्थको प्राप्त होता है" इत्यादि । फिर औरभी किसीके पूछनेपर उसने यही कहा । इस प्रकार नगरमें उसका नाम प्राप्तव्यमर्थ हुआ । तब राजकन्या चन्द्रवतीनाम नये रूपयौवनसे सम्पन्न दूसरी सखीको साथ लिये एक महो- त्सवके दिनमें नगरको देखती हुई आई, वहाही कोई राजपुत्र अत्यन्त रूप- सम्पन्न मनोहर किसीप्रकार उसके दृष्टिगोचर हुआ, उसके दर्शनकरतेही कुसुम- बाणसे हत हुई उसने अपनी सखीसे कहा-"सखि ! अवश्यही जिसप्रकार इससे समागम होजाय ऐसा तुम यत्न करो" । यह सुन वह सखी उसके पास जाकर शीघ्र बोली-‘ मुझे चन्द्रवतीने तुम्हारे पास भेजा है और उसने तुमसे कहा है कि, तुम्हारे दर्शनसेही कामदेवने मेरी मृत्युदशा करदी सो यदि शीघ्रही हमारे निकट न आओगे तो मैं मरणको शरणलूंगी,” यह सुनकर उसने कहा- “यदि अवश्य मैं वहा आऊ तो बताओ किस उपायसे आऊ” । तब सखीने कहा-“रात्रिमें महलपरसे लम्बायमान कठिन रस्सीके सहारे तुम यहा चढि आना” । वह बोला,-“जो तुम्हारा यह निश्चय है तो मैं यही करूंगा,” ऐसा निश्चयकर सखी चन्द्रावतीके समीप गई । तब रात होनेपर वह राजपुत्र अपने मनमें विचारने लगा ! “अहो यह बडा कुकर्म है । कहा है- गुरोः सुतां मित्रभार्यां स्वामिसेवकगेहिनीम् । यो गच्छति पुमांल्लोके तमाहुर्ब्रह्मघातिनम् ॥ ११६ ॥ गुरुकन्या, मित्रकी भार्या, स्वामि सेवककी स्त्री इनसे जो पुरुष संसारमें गमन करता है उसे ब्रह्मघाती कहते हैं ॥ ११६ ॥ अपरञ्च- औरभी- अयशः प्राप्यते येन येन चापगतिर्भवेत् । स्वर्गाच्च भ्रश्यते येन तत्कर्म्म न समाचरेत् ॥ ११७ ॥” जिससे अयशहो जिसकर्मसे दुर्गतिहो जिसकर्मसे स्वर्गसे भ्रष्टहो वह कर्म नकरे ॥ ११७ ॥” इति सम्यग्विचार्य्य तत्सकाशं न जगाम । अथ प्राप्त- व्यमर्थः पर्य्यटन् धवलगृहपार्श्वे रात्रावलम्बितवरत्रां दृष्ट्वा कौतुकाविष्टहृदयः तामालम्ब्य अधिरूढः । तया च राज-