भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३०८ ) पञ्चतन्त्रम् । मंगल वस्तुओके सजनेमे, बंदी मुख्य जनोंके पढने, वेदोच्चारणमें तत्पर उदित मुख ब्राह्मणोंके होनेमें, स्त्रीजनोंके गीत गानेमें, प्रधान पटरानी कृकालिकाके लानेमें, उलूक अभिषेकके निमित्त जबतक सिंहासनपर बैठताहै, तबतक कहींसे एक वायस आगया वह विचारनेलगा । “अहो ! क्या यह सम्पूर्ण पक्षियोंके समागमका महोत्सवहै” । तब यह पक्षी उसे देखकर परस्पर कहनेलगे- “पक्षि- योंके मध्यमे वायस चतुर सुना जाताहै । कहाहै- नराणां नापितो धूर्त्तः पक्षिणां चैव वायसः । दंष्ट्रिणाञ्च शृगालस्तु श्वेतभिक्षुस्तपस्विनाम् ॥ ७४ ॥ नरोंमे नाई, पक्षियोंमे वायस, डाढवालोंमें शृगाल, तपस्वियोंमें श्वेतभिक्षु- धूर्त्तहै ॥ ७४ ॥ तदस्यापि वचनं ग्राह्यम् । उक्तञ्च- सो इसका वचनभी ग्रहणकरना चाहिये । कहाहै- बहुधा बहुभिः सार्द्धं चिन्तिताः सुनिरूपिताः । कथञ्चिन्न विलीयन्ते विद्वद्भिश्चिन्तिता नयाः ॥ ७५ ॥” अनेक प्रकार बहुतोंके साथ विचारकर निरूपण की तथा विद्वानोंसे विचारी हुई नीति किसी प्रकारसेभी विकारको प्राप्त नहीं होती ॥ ७५ ॥” अथ वायसः समेत्य तानाह, - “अहो ! किं महाजनस- मागमोऽयं परम्महोत्सवश्च” । ते प्रोचुः- “भो ! नास्ति कश्चिदिहविहङ्गनानां राजा । तदस्य उलूकस्य विहङ्गराज्याभि- षेको निरूपितस्तिष्ठति समस्तपक्षिभिः । तत् त्वमपि स्व- मतं देहि, प्रस्तावे समागतोऽसि” । अथ असौ काको विहस्य आह- “अहो ! न युक्तमेतत् यन्मयूरहंसकोकिलच- क्रवाकशुककारण्डवहारितसारसादिषु पक्षिप्रधानेषु विद्य- मानेषु दिवान्धस्य अस्य करालवक्त्रस्य अभिषेकः क्रियते । तन्न एतत् मम मतम् । यतः- तब काक मिलकर उनसे बोला- “अहो ! यह क्या महाजनोंका समागम परम महोत्सवहै ? ” । वे बोले- “भो ! कोई पक्षियोंका राजा नहीं है । सो इस उलूकको विहंगमोंके राज्यमें अभिषेक निरूपण किया है समस्त पक्षियोंसे