भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३०९ ) ( सत्कृत ) स्थित है । सो तूभी अपना मतदे । कारण कि, प्रसगके प्रारंभमें आयाहै" । तब यह काक हँसकर बोला- "अहो ! यह तो बात ठीक नहीं जो मोर, हंस, कोकिला, चक्रवाक, शुक, कारण्डव, हरियल, सारस आदि प्रधान पक्षियोंकी विद्यमानतामे दिनमें अन्धे इस भयंकर मुखको अभिषेक कर- तेहो । सो मेरी इसमें सम्मति नहीं । वक्रनासं सुजिह्माक्षं क्रूरमप्रियदर्शनम् । अक्रुद्धस्येदृशं वक्त्रं भवेत्क्रुद्धस्य कीदृशम् ॥ ७६ ॥ कुटिल नासिका, क्रूरनेत्र, स्वभावसे कुटिल, अप्रियदर्शन, विना क्रोध किये भी इसका मुख ऐसाहे, क्रोध करेगा तो कैसा होगा ॥ ७६ ॥ तथाच- तैसेही- स्वभावरौद्रमत्युग्रं क्रूरमप्रियवादिनम् । उलूकं नृपतिं कृत्वा का नः सिद्धिर्भविष्यति ॥ ७७ ॥ स्वभावसे रौद्र, अतिउग्र, क्रूर, अप्रियवादी उलूकको राजा करके हमारी क्या सिद्धि होगी ? ॥ ७७ ॥ अपरं वैनतेये स्वामिनि स्थिते किमेष दिवान्धः क्रियते राजा, तत् यद्यपि गुणवान् भवति तथापि एकस्मिन् स्वा- मिनि स्थिते नान्यो भूपः प्रशस्यते । और फिर स्वामी गरुडके स्थित होनेमें क्यों यह दिनका अंधा राजा किया जाता है, यदि गुणवान्भी हो तथापि एक स्वामीके स्थित होनेमें दूसरा राजा नहीं श्लाघनीय होसकता- एक एव हितार्थाय तेजस्वी पार्थिवो भुवः । युगान्त इव भास्वन्तो बहवोऽत्र विपत्तये ॥ ७८ ॥ तेजस्वी राजा एकही पृथ्वीके हितकरनेमें नियुक्त होताहै बहुतोंके परस्पर द्वेषसे प्रजाका उच्छेद होताहै ॥ ७८ ॥ तत् तस्य नाम्नापि यूयं परेषामगम्या भविष्यथ । उक्तञ्च- सो तुम उनके नामसे शत्रुओंको दुर्धर्ष होरहे हो । कहा है- गुरूणां नाममात्रेऽपि गृहीते स्वामिसम्भवे । दुष्टानां पुरतः क्षेमं तत्क्षणादेव जायते ॥ ७९ ॥

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