भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ८५ )

त्रिलोकीके नमस्कार करने योग्य पवित्र करनेवाले हैं, सो यह कैसे होसकता है?"। कौलिक बोला—"सुभगे ! तुमने सत्य कहा, परन्तु राधा नामक मेरी भार्या जो प्रथम गोपकुलमें उत्पन्न हुईथी, वही तू यहा अवतीर्ण हुई है । इसीकारण मैं यहां आयाहू" ऐसा कहनेपर वह बोली,—"भगवन् ! यदि ऐसाहै तो मुझे मेरे पितासे मांगो वह भी तत्काल तुमको प्रदान करेंगे"। कौलिक बोला—"सुभगे ! मैं मनुष्योंके दर्शनपथको प्राप्त नहीं होताहू फिर बात करनी तो कैसी ! तू गन्धर्व-विवाहसे अपने आपको मुझे प्रदानकर, नहीं तो शापदेकर कुलसहित तेरे पिताको भस्म करदूंगा" यह कह गरुडसे उत्तर सीधे हाथसे उसे ग्रहणकर उस भय लज्जासे कंपित हुईको शय्यापर ले आया शेषरात्रिमें वात्स्यायन विधिके अनुसार उसको सेवनकर बहुत प्रभातमे अलक्षितहो अपने स्थानको गया । इसप्रकार नित्य उसको भोगते, समय बीतता भया । तब कभी कंचुकी उसके अधरोष्ठ रक्त और खंडित देखकर परस्पर कहने लगे—"अहो ! देखो तो इस राजकन्याके पुरुषसे भोगे हुए शरीरके अंगप्रत्यंग दीखते हैं । सो कैसे यह सुरक्षित इस घरमें इस प्रकारका व्योहारहै, सो हम राजासे निवेदन करें"। ऐसा निश्चयकर सब मिलकर राजासे बोले—"देव हम नहीं जानते परन्तु सुरक्षितभी कन्याके अन्तःपुरमे कोई प्रवेश करता है, सो इसमें आपही प्रमाण हैं" यह सुन राजा महाव्याकुल हो विचारने लगा.-

"पुत्रीति जाता महतीह चिन्ता कस्मै प्रदेयेति महान्वितर्कः । दत्त्वा सुखं प्राप्स्यति वा न वेति कन्यापितृत्वं खलु नाम कष्टम् ॥ २२२ ॥

"इस संसारमें कन्या होना यह बडी चिन्ता है, कारण यह किसको दें यह महान् वितर्क है, और भी देनेसे सुख पावेगी या नहीं यह भी नहीं जानाजाता इसलिये कन्या पिताके निमित्त एक कष्टहीहै ॥ २२२ ॥

नद्यश्च नार्य्यश्च सहकप्रभावा- स्तुल्यानि कूलानि कुलानि तासाम् । तोयैश्च दोषैश्च निपातयन्ति नद्यो हि कूलानि कुलानि नार्य्यः ॥ २२३ ॥