भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ८४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

ज्ञां वेपमानां शय्यायामानयत् । ततश्च रात्रिशेषं यावद् वात्स्यायनोक्तविधिना निषेव्य प्रत्यूषे स्वगृहमलक्षितो जगाम । एवं तस्य तां नित्यं सेवमानस्य कालोयाति । अथ कदाचित् कंचुकिनः तस्या अधरोष्ठप्रवालखण्डनं दृष्ट्वा मिथः प्रोचुः—"अहो ! पश्यत अस्या राजकन्यायाः पुरुषोपभुक्ताया इव शरीरावयवाः विभाव्यन्ते । तत् कथमयं सुरक्षितेऽपि अस्मिन् गृहे एवंविधो व्यवहारः। तत् राज्ञे निवेदयामः” । एवं निश्चित्य सर्वे समेत्य राजानं प्रोचुः—"देव ! वयं न विद्मः । परं सुरक्षितेऽपि कन्यान्तःपुरे कश्चित् प्रविशति । तद्देवः प्रमाणम्” इति । तच्छ्रुत्वा राजा अतीव व्याकुलितचित्तो व्यचिन्तयत् ।

रथकारभी इसप्रकार सकाम उसके वचनको सुनकर हँसता भया । "मित्र ! यदि ऐसा है तो भाग्यसे हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ । सो आजही उसके साथ समागम करो” । कौलिक बोला—"मित्र ! जिस कन्याके अन्तःपुरमें वायुको छोड अन्य वस्तुका प्रवेश नहीं है, वहां राजाके पुरुषोंसे युक्त स्थानमे मेरा उसके साथ कैसा समागम होगा । सो क्यों मुझे असत्यवचनसे वंचित करताहै.”!। रथकार बोला—"मित्र ! मेरी बुद्धि और बलको देखो” ऐसा कह उसीसमय कील घुमानेसे चलनेवाले गरुड जो वायुज वृक्षके काष्ठकी दो भुजा शंख, चक्र, गदा, पद्म, किरीट और कौस्तुभकोभी बनाताहुआ उसपर उस कौलिकको चढाकर विष्णुचिन्हसे चिन्हितकर कील प्रवेशके विज्ञानकोभी दिखाकर बोला—"मित्र ! इस विष्णुरूपसे जाकर कन्याके अन्तःपुरमे अर्धरात्रिके समय उस राजकन्याको जो इकली सतमहले मन्दिरमें प्राप्त हुई मुग्धस्वभावसे तुझे वासुदेव माननेवाली उसको अपनी कुटिल उक्तिसे प्रसन्नकर वात्स्यायन मुनिके कहे कामशास्त्रके विधानसे भोगो”। कौलिकभी यह वचन सुन उस रूपसे वहां जाकर उससे बोला—"राजपुत्रि ! सोतीहो या जागती ? मैं तुम्हारे निमित्त समुद्रसे अनुराग करनेवाली लक्ष्मीको त्याग करके आयाहूं । सो मेरे साथ समागम करो” । वहभी गरुडपर चढे चार भुजा आयुध लिये कौस्तुभसे युक्त देखकर विस्मयपूर्वक शयनसे उठकर बोली—"भगवन् ! मैं मानुषी कीटजाति अपवित्रहूं । आप