भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३१७ )

अन्यस्मिन्नहनि कपिञ्जलः शालिभक्षणादतीव पीवरतनुः स्वमाश्रयं स्मृत्वा भूयोऽपि तत्रैव समायातः । अथवा साधु इदमुच्यते-

प्रथम किसी वृक्षके नीचे मैं रहता था । उसके नीचेकी खखोडलमे कपिंजल नाम चटक रहता था । सदाही सूर्यके अस्तसमय आये हुए हम दोनोकी अनेक सुभाषित गोष्ठीमें देवर्षि ब्रह्मर्षि राजर्षियोके पुराण चरित कीर्तनसे तथा पर्य्यटनके समय देखे हुए अनेक कौतूहलके कथनसे परम सुख अनुभव करते समय बीतता । तब एक समय कपिंजल प्राणयात्राके निमित्त दूसरे पक्षियो (चटक) के साथ और पके हुए धान्यके देशमे गया । सो जबतक यह रात्रि समयमे भी नहीं आया, तबतक मैं उद्विग्नमनसे उसके वियोगसे दुःखी हुआ विचारने लगा । “अहो ! आज कपिंजल क्यों नआया, क्या कहीं पाशसे बन्ध गया, वा कहीं किसीने मारडाला ? सर्वथा यदि कुशल होती तो मेरे बिना न रहता” । इसप्रकार मेरे विचार करने पर बहुत दिन बीतगये । तब उसकी खखोडलमे कदाचित् शीघ्रगनामक खरगोश सन्ध्यासमय आकर प्रविष्ट हुआ । मैनेभी कपिंजलसे निराश होनेके कारण निवारण न किया तब और दिन कपिञ्जल शालिभक्षणसे अतिपुष्टशरीर होकर अपने आश्रयको यादकर फिरभी वहां आया, अथवा यह अच्छा कहाहै-

न तादृग्जायते सौख्यमपि स्वर्गे शरीरिणाम् । दारिद्र्येऽपि हि यादृक् स्यात्स्वदेशे स्वपुरे गृहे ॥ ९२ ॥”

शरीरधारियोंको ऐसा सुख स्वर्गमे भी नहीं है जैसे दरिद्री अपने पुर देश घरमें सुखी होताहै ॥ ९२ ॥”

अथ असौ कोटरान्तर्गतं शशकं दृष्ट्वा साक्षेपमाह-“भोः शशक ! न त्वया सुन्दरं कृतं यत् मम आवासस्थाने प्रविष्टोऽसि, तत् शीघ्रं निष्क्रम्यताम्” । शशक आह,-“न तव इदं गृहं किन्तु मम एव । तत् किं मिथ्या परुषाणि जल्पसि। उक्तञ्च-

तब यह कोटरके अन्तर्गत शशकको देख आक्षेपपूर्वक बोला,-“भो शशक ! तुमने अच्छा नहीं किया, जो मेरे रहनेके स्थानमें तुम प्रविष्ट हुए । सो शीघ्र