पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३६९ )
इसके संग विवाह करो” । ऐसा कह अपनी कन्यासे बोले-“पुत्रि ! क्या यह त्रिलोकीके प्रकाशक भगवान् सूर्य्य तुमको रुचते हैं ?” । पुत्रिका बोली-“पितः ! यह अधिक प्रज्वलित है । मैं इनकी अभिलाषा नहीं करती । सो इनसे अधिक उत्कृष्ट कोई बुलाओ” तब उसके यह वचन सुन मुनि सूर्य्यसे बोले-“भगवन् ! कोई तुमसे भी अधिक शक्तिमान् है ?” सूर्य्य बोले-“मुझसे भी अधिक मेघ है जिससे ढक कर मैं अदृश्य होता हूं” । तब मुनिने मेघदेवताको बुलाकर कन्यासे कहा-“पुत्रिके ! इसके निमित्त तुझे दूं ?” । वह बोली । “-यह कृष्णवर्ण जडात्मा है । सो इससे अधिक किसी प्रधानके निमित्त मुझे दो” । तब मुनिने मेघसे पूछा-“भो मेघ ! तुझसे भी अधिक कोई है ?” मेघने कहा मुझसे भी अधिक वायुहै वायुसे हत हुआ मैं सहस्रधा हो जाता हूं”। यह सुनकर मुनिने वायुको बुलाया । बोले भी-“पुत्रिके ! क्या यह वायु विवाहके निमित्त तुझे अच्छा लगता है ?” वह बोली-“तात ! यह अधिक चपल है । सो इससे अधिक कोई और बुलाओ” । मुनिने कहा-“वायो ! क्या कोई तुमसे भी अधिक है ?” । वायुने कहा-“मुझसे अधिक पर्वत है जिससे निश्चल होकर बलवान् भी मैं धारित होता हूं” । तब मुनि पर्वतको बुलाकर कन्यासे बोले-“पुत्रिके ! तुमको इसके निमित्त दूं ?” । वह बोली-“तात ! यह कठिनात्मा और निश्चल हे, सो और किसीके निमित्त मुझे दो” । मुनिने पर्वतसे पूछा,-“भो पर्वतराज ! कोई तुमसे भी अधिक है ?” पर्वतने कहा-“मुझसे अधिक मूषे हैं जो मेरे शरीरको बलसे विदीर्ण करते हैं”। तब मुनिने मूषकराजको बुलाय उसे दिखाया और बोले-“पुत्रिके ! क्या इसके निमित्त तुझे दूं यह मूषिकराज तुझको अच्छा लगता है ?” वह भी उसको देख यह स्वजातीय है ऐसा मानकर पुलकावलीसे अलंकृत शरीरवाली उससे बोली,--“तात ! मुझे मूषिका करके इसके निमित्त दो । जिससे अपनी जातिके योग्य गृहधर्मका अनुष्ठान करूं” । तब वह भी अपने तपोबलसे उसे मूषिका करके उस (मूषकराज ) को देते भये । इससे मैं कहता हूं-
सूर्य्यं भर्तारमुत्सृज्य पर्जन्यं मारुतं गिरिम् ।
स्वजातिं मूषिका प्राप्ता स्वजातिर्दुरतिक्रमा ॥ २२१ ॥”
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