पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
दष्टः। तद अनेन दोषेण त्वं मण्डूकानां वाहनं भविष्यसि, तत्प्रसादलब्धजीविकया वर्त्तिष्यसे" इति। ततोऽहं युष्माकं वाहनार्थमागतोऽस्मि"। तेन च सर्वमण्डूकानामिदमावेदितं ततः तैः प्रहृष्टमनोभिः सर्वैरेव गत्वा जलपादनाम्नोद्दर्दुरा- राज्ञ्य विज्ञातम्। अथ असौ अपि मन्त्रिपरिवृतोऽत्यद्भुतमिद- मिति मन्यमानः ससम्भ्रमं ह्रदात् उत्तीर्य मन्दविषस्य फणिनः फणप्रदेशमधिरूढः। शेषा अपि यथाज्येष्ठं तत्पृष्ठोपरि समारुरुहुः। किं बहुना तदुपरि स्थानं प्राप्तवन्तः तस्य अनुपर्द धावन्ति। मन्दविषोऽपि तेषां तुष्ट्यर्थमनेकप्रकारान् गतिविशेषान् अदर्शयत्। अथ जलपादो लब्धतदङ्गसंस्पर्श- सुखः तमाह,-
वरुण पर्वतके समीप एक स्थानमें बूढा मन्दविष नाम कृष्णसर्प था। वह इस प्रकार चित्तमे विचारने लगा कि "किस प्रकार मैं सुखके उपायसे जीवन निर्वाह करूं"। तब बहुतसे मेंडकवाले ह्रदके समीप प्राप्त होकर धैर्यशालीकी समान अपनेको दिखाता हुआ। तब उसके ऐसा स्थित होनेपर जलके समीप आये एक मेडकने पूछा "मामा ! क्यों आज यथायोग्य पूर्वकी समान भोजनके निमित्त नहीं विचरते हो?" वह बोला-"भद्र ! मुझ मन्दभाग्यको भोजनकी अभि- लाषा कहां। कारण कि आज रात्रिमें प्रदोषके समय आहारके निमित्त विचरते हुए मैंने एक मण्डूक देखा। उसके पकडनेको मैंने उद्योग किया। वहभी मुझे देख मृत्युके भयसे वेदपाठमें रत ब्राह्मणोंके बीचमें गया हुआ मुझे विदित न हुआ, कि कहां गया। उस मण्डूककी सदृशतासे मोहित चित्तवाले मैंने किसी ब्राह्मणके पुत्रका ह्रदके किनारे जलान्तमें स्थित अंगूठा काट लिया तब वह शीघ्रही मर- गया। तब उसके पिताने दुःखी होकर मुझे शाप दिया। "दुरात्मन्! तैने निरपराध मेरे पुत्रको काटा इस दोषसे तू मेंडकोंका वाहन होगा। उनके प्रसादसे प्राप्त हुई जीविकासे निर्वाह करेगा" ( इस प्रकार ) सो मैं तुम्हारे वाहनके निमित्त आयाहूं"। उसने यह बात सब मण्डूकोंसे कही। तब उन प्रसन्नमनवाले सबने जाकर जलपादनामवाले मेढकराजसे कहा तब यह भी मंत्रियोंसे युक्त यह अतिचमत्कार हुआ ऐसा मानता हुआ। सम्भ्रम ह्रदसे निकलकर मन्दविष