भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३८५ )

सर्पके फणापर चढगया शेषभी ज्येष्ठक्रमानुसार उसकी पीठपर चढगये । बहुत क्या उसपर स्थानको न प्राप्त करते धावमान होते उसके पीछे चले । मन्दविष भी उनके सन्तोषके निमित्त अनेकप्रकारकी गतिविशेष दिखाता हुआ । तब जलपाद उसके अगके स्पर्शसुखको प्राप्त हो बोला—

न तथा करिणा यानं तुरगेण रथेन वा ।
नरयानेन वा यानं यथा मन्दविषेण मे ॥ २४७ ॥

न ऐसा हाथीसे, न घोडेसे, न रथसे, न मनुष्य यानके गमनमे सुख है जैसा मुझे मदविषसे है ॥ २४७ ॥

अथ अन्येद्युः मन्दविषः छद्मना मन्दं मन्दं विसर्पति । तच्च दृष्ट्वा जलपादोऽब्रवीत्,—“भद्र मन्दविष ! यथापूर्वं किमद्य साधु नोह्यते ?” मन्दविषोऽब्रवीत्,—“देव ! अद्य आहारवैकल्यात् न मे वोढुं शक्तिरस्ति” । अथ असौ अब्रवीत्,—“भद्र ! भक्षय क्षुद्रमण्डूकान्” । तच्छ्रुत्वा प्रहर्षितसर्वगात्रो मन्दविषः ससम्भ्रममब्रवीत्,—“मम अयमेव विप्रशापोऽस्ति। तत् तव अनेन अनुज्ञावचनेन प्रीतोऽस्मि” । ततोऽसौ नैरन्तर्येण मण्डूकान् भक्षयन् कतिपयैः एवाहौभिः बलवान् संवृत्तः । प्रहृष्टश्च अन्तर्लीनमवहस्य इदमब्रवीत्,—

तब दूसरे दिन मन्दविष शनैः २ छलसे चला । यह देख जलपाद बोला, “भद्र मन्दविष ! पहलेकी समान भली प्रकार अब क्यों नहीं वहन करता है” । मन्दविष बोला,—“देव ! आज भोजन प्राप्त न होनेके कारण मुझे वहन करनेकी शक्ति नहीं है”। तब यह बोला,—“भद्र ! क्षुद्र मण्डूकोको भक्षण करो” यह सुन सम्पूर्ण शरीरसे प्रसन्न हो मन्द विष सम्भ्रमसहित बोला,—“मुझको यही ब्राह्मणका शाप है । सो इस अनुज्ञा वचनसे प्रसन्न हू” तब यह निरन्तर मण्डूकोंको भक्षण करता हुआ कितने एक दिनोंमें बलवान् होगया । ओर प्रसन्नहो मनमें हँसकर यह बोला—

“मण्डूका विविधा ह्येते छलपूर्वेापसाधिताः ।
कियन्तं कालमक्षीणा भवेयुः खादिता मम ॥२४८॥”

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