भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४०९ )

सर्प बोला- "कहो किससे तुम्हारा परिभव हुआ है?" वह बोला- "गोत्रियों-से"। वह बोला- "कहा तेरा आश्रय है । बावडी, कुए, तडाग वा हृदमे ? सो अपना आश्रय कहो" वह बोला- "पत्थरसमूहसे बनेहुए कूपमें" । सर्प बोला- "भो ! हमारे चरण नहीं हैं सो हमारा वहा प्रवेश नहीं हो सकता न रहनेका स्थान है जहा स्थित होकर तुम्हारे दायादोंको भक्षण करू सो जाऊँ । कहा है-

यच्छक्यं ग्रसितुं शस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् । हितञ्च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥ २३ ॥"

जो वस्तु भक्षण करनेको सामर्थ्य हो वह प्रशस्त है और जो खाकर पाक होजाय और पाकमे हितकारक हो कल्याणकी इच्छावालेको वह वस्तु खानी चाहिये ॥ २३ ॥

गंगदत्त आह—"भोः ! समागच्छ त्वं अहं सुखोपायेन तत्र तव प्रवेशं कारयिष्यामि । तथा तस्य मध्ये जलोपान्ते रम्यतरं कोटरं अस्ति । तत्र स्थितः त्वं लीलया दायादान् व्यापादयिष्यसि" । तच्छ्रुत्वा सर्पो व्यचिन्तयत् । "अहं तावत् परिणतवयाः, कदाचित् कथञ्चित् मूषकमेकं प्राप्नोमि । तत्सुखावहो जीवनोपायोऽयमनेन कुलांगारेण मे दर्शितः । तद्गत्वा तान् मण्डूकान् भक्षयामि" इति । अथवा साधु इदमुच्यते—

गंगदत्त बोला- "भो ! आप आइये मैं सुख उपायसे वहा तुम्हारा प्रवेश कराऊंगा । उसके मध्य जलके समीप मनोहर खखोडल है । वहा स्थित होकर तू लीलासे ही दायादोंको भक्षण करना " । यह सुन सर्प विचारने लगा । "मेरी अवस्था वृद्ध होगई है कभी एक चूहा प्राप्त होता है । सो सुखदायक जीवनोपाय इस कुलाङ्गारने वर्णन किया है। सो जाकर उन मण्डूकोंको भक्षण करूंगा । अथवा अच्छा कहा है-

यो हि प्राणपरिक्षीणः सहायपरिवर्जितः । स हि सर्वसुखोपायां वृत्तिमर्चयेद्बुधः ॥ २४ ॥"

जो प्राणोंसे परिक्षीण सहायसे रहित हो वह पंडित सर्व सुखके उपायवाली वृत्तिको आचरण करे ॥ २४ ॥"