भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। ( ४२३ )

किसी एक स्थानमें कुभार रहता था वह कभी प्रमादसे आधे टूटे घडेके तीक्ष्ण कोरके ऊपर वेगसे धावमान होकर पतित हुआ । तब उस ठीकडेकी कोरसे माथा फट जानेके कारण रुधिरसे लिप्त शरीर होकर कठिनतासे उठ अपने घरको गया । तब अपथ्यसेवनसे वह प्रहार उसका अधिक होगया और कठिनतासे निरोगताको प्राप्त हुआ । तब एक समय दुर्भिक्षसे पीडित देशके होनेमें वह कुंभार भूखसे व्याकुल कठ किन्ही राजसेवकोंके साथ देशान्तरमें जाकर किसी राजाका सेवक हुआ । वह राजाभी उसके माथेमें तीक्ष्ण प्रहारका घाव देखकर विचारने लगा ‘यह कोई वीरपुरुष है । इससे माथेके सामने सम्मुख प्रहार सहन किया है’ । इस कारण उसको सन्मानादिसे सम्पूर्ण राजपुत्रोंके मध्य विशेषप्रसन्नतासे देखता । वेभी राजपुत्र उसकी अधिक प्रसन्नताको देखते हुए परम ईर्षोधर्मको वहन करते राजभयसे कुछभी न बोले । तब और दिन उस वीरसभावना (परीक्षा) करनेमें विग्रह होनेपर हाथियोंके कलित होनेमें और घोडोंके सज्जित होनेपर तथा योद्धाओंके प्रकृष्ट सज्जित होनेपर उस राजाने प्रसङ्गसे प्राप्त हुए एकान्तमें उससे पूछा।--‘‘भो गजपुत्र ! तुम्हारा क्या नाम ? क्या जाती है ? किस सङ्ग्राममें यह प्रहार तुम्हारे मस्तकमें लगा है ?’’। वह बोला--‘‘देव ! यह शस्त्रप्रहार नहीं है मैं युधिष्ठिर नामवाला कुभार हू । मेरे घरमें अनेक फूटे बर्तन थे, सो एक समयमें मद्यपान करके निकला दौडता हुआ बर्तनोंपर गिरा उसके प्रहारका विकार यह मेरे माथेमें विकरालताको प्राप्त हो गया है’’ । यह सुन राजा लज्जित हो बोला-‘‘अहो राजपुत्रका अनुकरण करनेवाले इस कुभारने मुझे ठगलिया, सो अभी गलहस्त देकर इसे निकालदो’’ । ऐसा कहनेपर कुभकार बोला-‘‘ऐसा मत करो, रणमें मेरा हस्तलाघव देखो’’ । राजा बोला-‘‘भो ! आप सर्वगुणसपन्न हो तो भी जाओ । कहा है--

शूरश्च कृतविद्यश्च दर्शनीयोऽसि पुत्रक । यस्मिन्कुले त्वमुत्पन्नो गजस्तत्र न हन्यते ॥ ४० ॥’’

हे पुत्र ! तू शूर विद्यावान् और दर्शनीय है परन्तु जिस कुलमे उत्पन्न हुए हो उसमें हस्ती नहीं मारे जाते ॥ ४० ॥

कुलाल आह--“कथमेतत् ?” राजा कथयति - कुलाल बोला-‘‘यह कैसी कथा है ?’’ राजा कहने लगा-