पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४२५
तो इस समय तू इसको भक्षण करके पथ्य कर प्रात'समय और कुछ उपार्जन करूंगा”। वह बोली- “भो स्वामिन् ! जब आपने इसे बालक जान-कर न मारा तो कैसे इसको मैं अपने उदरके निमित्त विनाश करू। कहाहै कि-
अकृत्यं नैव कर्त्तव्यं प्राणत्यागेऽपि संस्थिते । न च कृत्यं परित्याज्यं धर्म एष सनातनः ॥ ४२ ॥
प्राणत्याग होनेपरभी अकृत्य नहीं करना चाहिये और कृत्यको छोड़ना नहीं चाहिये यह सनातन धर्म है ॥ ४२ ॥
तस्मात् मम अयं तृतीयः पुत्रो भविष्यति” । इत्येवमुक्त्वा तमपि स्वस्तनक्षीरेण परां पुष्टिम नयत् । एवं ते त्रयोऽपि शिशवः परस्परमज्ञातजातिविशेषा एकाचारविहारा बाल्य-समयं निर्वाहयन्ति । अथ कदाचित् तत्र वने भ्रमन् अरण्यगजः समायातः । तं दृष्ट्वा तौ सिंहसुतौ द्वौ अपि कुपिताननौ तं प्रति प्रचलितौ यावत् तावत् तेन शृगालसुतेन अभिहितम्,-“अहो ! गजोऽयं युष्मत् कुलशत्रुः, तन्न गन्तव्यमेतस्य अभिमुखम्” । एवमुक्त्वा गृहं प्रधावितः । तौ अपि ज्येष्ठबान्धवभङ्गान्निरुत्साहतां गतौ अथवा साधु इदमुच्यते-
इससे मेरा यह तीसरा पुत्र होगा”। ऐसा कह उसको भी स्तनके दूधसे पुष्ट करनेलगी । इस प्रकार वे तीनो बालक परस्पर अपनी जातिको न जाननेवाले एक आचरण और विहारसे बाल समयको बिताते हुए । एक समय उस वनमें घूमता हुआ बनचारी हाथी आया । उसे देख वे दोनोही सिंहपुत्र क्रोधितमुख हो उसकी ओर ज्योंही चले तबतक उस शृगालपुत्रने कहा-“अहो ! यह हाथी तुम्हारे कुलके शत्रु हैं । सो इसके सम्मुख मत जाओ” ऐसा कह घरको भागा व दोनों भी बड़े भाईके पलायन करनेसे निरुत्साह होकर गये । अथवा यह अच्छा कहाहै-
एकेनापि सुधीरेण सोत्साहेन रणं प्रति । सोत्साहं जायते सैन्यं भग्ने भंगमवाप्नुयात् ॥ ४३ ॥