भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ४२६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

एकभी धैर्यवान् उत्साहवालेके रणमें स्थित होनेसे सेना उत्साहवाली होती है और भय होनेसे भङ्ग होजाती है ॥ ४३ ॥

तथाच- और देखो-

अत एव हि वाञ्छन्ति भूपा योधान्महाबलान् ।
शूरान्वीरान्कृतोत्साहान्वर्जयन्ति च कातरान् ॥ ४४ ॥”

इसी कारण राजा महाबली योद्धाओंकी इच्छा करते हैं शूर, वीर, उत्साह-संपन्नका संग्रह करना । कायरोका नहीं ॥ ४४ ॥”

अथ तौ द्वौ अपि गृहं प्राप्य पित्रोरग्रतो विहसन्तौ ज्येष्ठभ्रातृचेष्टितमूचतुः। “यथा गजं दृष्ट्वा दूरतोऽपि नष्टः” । सोऽपि तदाकर्ण्य कोपाविष्टमनाः प्रस्फुरिताधरपल्लवः ताम्रलोचनः त्रिशिखां भुकुटिं कृत्वा तौ निर्भर्त्सयन् परुषतरवचनानि उवाच । ततः सिंह्या एकान्ते नीत्वा प्रबोधितोऽसौ—“वत्स! मैवं कदाचित् जल्प । भवदीयलघुभ्रातरौ एतौ” । अथ असौ प्रभूतकोपाविष्टः तामुवाच—“किमहं एताभ्यां शौर्येण रूपेण विद्याभ्यासेन कौशलेन वा हीनः । येन मां उपहसतः । तन्मया अवश्यं एतौ व्यापादनीयौ” । तदाकर्ण्य सिंही तस्य जीवितमिच्छन्ती अन्तर्विहस्य प्राह-

तब वे दोनोंही घरको प्राप्त होकर माता पिताके आगे हँसकर बडे भाईकी चेष्टाको कहते हुए । “जैसे वह हाथीको देख दूरसेही भाग गया”। वहभी यह सुन क्रोधाविष्ट मनसे होठरूपी पल्लव फडकाता लाल नेत्र तीन शिखावाली भृकुटी-को कर उन दोनोको घुडकता हुआ अधिक कठोर वचन बोला । तब सिंहोने एकान्तमें लेजाकर उसे समझाया । “पुत्र ! ऐसा कभी न कहना । यह दोनो तेरे छोटे भ्राता हैं”। तब यह अत्यन्त क्रोधितहो उस ( सिंही ) से बोला, “क्या मैं इनसे शूरता, रूप, विद्या अभ्यास, चतुराईमें कम हूं? जिससे मेरा हास्य करते है इससे अवश्यही मैं इन दोनोको मार डालूगा” । यह सुन सिंही उसके जीनेकी इच्छा करती मनमें हँसकर बोली-