पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४६१ )
हुए किसी भक्त श्रावकको देखकर उसके घर चले जाते है, और उसकी अत्यन्त प्रार्थनासे उसके घरमें प्राणधारण मात्र भोजन क्रियाको करते हैं, सो जाओ फिर ऐसा न कहना”। यह सुन नापित बोला-“भगवन् ! मै आपका धर्म जानता हू, परन्तु आपको बहुत श्रावक ( सरावगी ) बुलाते हैं, मैने तो इस समय बहुतसे पुस्तकके बाधने योग्य वस्त्र बहु मूल्यके सग्रह किये हैं। तथा पुस्तकोके निमित्त लेखकोंको धन एकत्र किया स्थित है। सो सर्वथा समयके उचित कार्य करो”। तब नाईभी अपने घर गया। और वहा जाकर खैरकी लकडीको तयार कर दोनों किवाड़ घरकी बदकर डेढ प्रहरतक फिरभी विहारद्वार परस्थित होकर सबके क्रमसे आश्रमसे निकलनेपर बडी प्रार्थनासे उन्हें अपने घरमें लाया। वेभी सब कपट और धनके लोभसे, भक्तियुक्त जाने पूछे हुए सरावगियोंको छोडकर प्रसन्न-मनसे उसके पीछे २ गये। यह अच्छा ही कहा है कि-
एकाकी गृहसंत्यक्तः पाणिपात्री दिगम्बरः ।
सोऽपि संवाह्यते लोके तृष्णया पश्य कौतुकम् ॥ १५ ॥
जो इकल्ला गृहशून्य हाथरूपी पात्रवाला दिगम्बर ( नग्न है ) वहभी ससारमें तृष्णासे हरण होता है इस कौतुकको देखो ॥ १५ ॥
जीर्य्यन्ते जीर्य्यतः केशा दन्ता जीर्य्यन्ति जीर्य्यतः ।
चक्षुः श्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते ॥ १६ ॥
बूढ़े होनेसे बाल जीर्ण होजाते हैं, जीर्ण होनेसे दातभी जीर्ण होजाते हैं नेत्र और कानभी जीर्ण होजाते हैं एक तृष्णाही तरुण होती जाती है ॥ १६ ॥
अपरं गृहमध्ये तान् प्रवेश्य द्वारं निभृतं विधाय लगुड-प्रहारैः शिरसि अताडयत्, तेऽपि ताड्यमाना एके मृताः अन्ये भिन्नमस्तकाः फूत्कर्तुम् उपचक्रमिरे । अत्रान्तरे तमा-क्रन्दम् आकर्ण्य कोटरक्षपालैः अभिहितं,-“भो भोः ! किम् अयं महान् कोलाहलो नगरमध्ये ? तद्गम्यतां गम्यताम्” । ते च सर्वे तदादेशकारिणः तत्सहिता वेगात् तद्गृहं गताः तावत् रुधिरप्लावितदेहाः पलायमाना नग्नका दृष्टाः । तैः स नापितो बद्धः । हतशेषैः सह धर्माधिष्ठानं नीतः । तैः नापितः