भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

( ४६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

पृष्टः- "भोः ! किमेतत् भवता कुकृत्यमनुष्ठितम् ?" स आह,- "किं करोमि ? मया श्रेष्ठिमणिभद्रगृहे दृष्ट एवंविधो व्यतिकरः।" सोऽपि सर्वमणिभद्रवृत्तान्तं यथादृष्टम् अकथयत । ततः श्रेष्ठिनम् आहूय भणितवन्तः,- "भोः श्रेष्ठिन् ! किं त्वया कश्चित् क्षपणको व्यापादितः ?" ततः तेनापि सर्वः क्षपणकवृत्तान्तः तेषां निवेदितः। अथ तैः अभिहितम्-

तब घरमें उनको प्रवेश कराकर द्वार बंद कर उनके शिरमें डंडेसे प्रहार करने लगा । वे भी ताडित हुए कोई मरगये कोई शिरफूटनेसे चिल्लाते हुए भागे, इसी समय उनके चिल्लानेके शब्दको सुनकर नगरके रक्षकोंने कहा- "भो भो यह नगरके मध्यमें क्या बडा कोलाहल है सो जाओ जाओ"। वे सब उन की आज्ञा करते उद्यके सहित वेगसे उस घरमें गये । उन्होंने रुधिरसे भीजे शरीर भागते हुए क्षपणकोंको देखा । तब उन्होंने उस नाईको बांध लिया । और मरनेसे बचे हुओंके साथ न्यायालयमें प्राप्त किया । तब उन्होंने नाईसे पूछा- "भो ! यह क्या है ? तैने बडा कुकृत्य किया है ?" वह बोला- "मैं क्या करूं ? मैंने सेठ मणिभद्रके घरमे इस प्रकारका व्यापार देखा था"। और वह सब मणिभद्रके दृष्टान्तको जैसा देखा था तैसा कहता भया । तब वे श्रेष्ठीको बुलाकर कहते भये- "भो सेठ ! क्या तैने किसीक्षपणकको मारा ?" तब उसने सब क्षपणकका वृत्तान्त उनसे कहा । तब उन्होंने कहा,-

"अहो ! शूलम् आरोप्यताम् असौ दुष्टात्मा कुपरीक्षितकारी नापितः"। तथा अनुष्ठिते तैः अभिहितम्-

"अहो इस दुरात्माको शूलपर आरोपण करदो यह दुष्टात्मा नाई कुपरीक्षित करनेवाला है"। ऐसा करनेपर उन्होंने कहा,-

"कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् ।
तन्नरेण न कर्त्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥ १७ ॥

"जो बुरा देखा, कुत्सित जाना, कुत्सित सुना, कुत्सित परीक्षा कियाहुआ है मनुष्यको वह बात नहीं करनी चाहिये जो नाईने किया ॥ १७ ॥

अथवा साधु इदमुच्यते-
अथवा यह अच्छा कहा है-